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ईरान तनाव के बीच ट्रंप को झटका, अमेरिकी सांसदों ने सेना वापसी के प्रस्ताव पर लगाई मुहर

नई दिल्ली। अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ईरान नीति को लेकर राजनीतिक विवाद गहराता जा रहा है। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा (हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स) ने बुधवार को एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित करते हुए ट्रंप प्रशासन से ईरान युद्ध में तैनात अमेरिकी सैनिकों को वापस बुलाने की मांग की है। प्रस्ताव 215-208 मतों के अंतर से पारित हुआ, जिसमें ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के चार सांसदों ने भी डेमोक्रेट्स का समर्थन किया। हालांकि यह प्रस्ताव कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है और प्रतीकात्मक माना जा रहा है, लेकिन इसे ट्रंप प्रशासन के लिए बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है। डेमोक्रेट्स का कहना है कि यह अमेरिकी जनता की ओर से स्पष्ट संदेश है कि ईरान में जारी सैन्य कार्रवाई को समाप्त किया जाना चाहिए।

कांग्रेस की अनुमति के बिना युद्ध का आरोप

डेमोक्रेटिक नेताओं ने आरोप लगाया है कि ट्रंप प्रशासन ने कांग्रेस की मंजूरी के बिना इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर सैन्य कार्रवाई की, जो अमेरिकी संविधान की भावना के खिलाफ है। उनका कहना है कि राष्ट्रपति ने कांग्रेस के अधिकारों को दरकिनार करते हुए युद्ध संबंधी निर्णय लिए।

वार पावर्स एक्ट को लेकर विवाद

विवाद का केंद्र ‘वार पावर्स एक्ट’ बना हुआ है। इस कानून के तहत राष्ट्रपति को किसी सैन्य कार्रवाई के 60 दिनों के भीतर कांग्रेस से अनुमति प्राप्त करनी होती है। डेमोक्रेट्स का दावा है कि यह समयसीमा समाप्त हो चुकी है, जबकि ट्रंप प्रशासन का कहना है कि सैन्य अभियान पहले ही समाप्त हो चुका है। हालांकि क्षेत्र में अब भी हमलों और संघर्ष की खबरें सामने आ रही हैं।

अब सीनेट में होगी अग्निपरीक्षा

प्रतिनिधि सभा से पारित होने के बाद यह प्रस्ताव अब अमेरिकी सीनेट में भेजा जाएगा। सीनेट में भी रिपब्लिकन पार्टी का बहुमत है, लेकिन बढ़ते राजनीतिक दबाव के बीच इस प्रस्ताव को लेकर बहस तेज होने की संभावना है। यदि सीनेट इसे मंजूरी देती है तो भी राष्ट्रपति ट्रंप के पास इसे वीटो करने का अधिकार होगा।

चुनावी राजनीति पर पड़ सकता है असर

विश्लेषकों का मानना है कि ईरान युद्ध का मुद्दा आगामी नवंबर में होने वाले मिडटर्म चुनावों में अहम भूमिका निभा सकता है। रिपब्लिकन पार्टी के भीतर भी इस मुद्दे को लेकर मतभेद सामने आने लगे हैं, जिससे ट्रंप प्रशासन पर राजनीतिक दबाव बढ़ता दिखाई दे रहा है।
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Kailash Jaiswal

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