सुप्रीम कोर्ट में दलील: संघीय ढांचे में राज्यों को राष्ट्रपति और राज्यपाल के आदेशों पर सवाल उठाने का हक नहीं

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में चल रही महत्वपूर्ण संवैधानिक सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि राज्य सरकारें राष्ट्रपति या राज्यपाल के विधेयकों पर लिए गए फैसलों को चुनौती देते हुए अनुच्छेद 32 के तहत रिट याचिका दायर नहीं कर सकतीं।
केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने यह दलील चीफ जस्टिस बी.आर. गवई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ के सामने रखी। इस पीठ में जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस ए.एस. चंदुरकर भी शामिल हैं।
राष्ट्रपति का प्रेसिडेंशियल रेफरेंस
- मेहता ने बताया कि राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट सेअनुच्छेद 143(1) के तहत राय मांगी है। राष्ट्रपति का सवाल है कि
- क्या राज्य सरकारें अनुच्छेद 32 के तहत राष्ट्रपति या राज्यपाल के फैसलों को चुनौती दे सकती हैं?
- क्या अनुच्छेद 361 के तहत राष्ट्रपति और राज्यपाल पूरी तरह न्यायिक जवाबदेही से मुक्त हैं?
- अनुच्छेद 361 यह कहता है कि राष्ट्रपति और राज्यपाल अपने अधिकारों और कर्तव्यों के निर्वहन के लिए किसी भी अदालत के प्रति जवाबदेह नहीं होंगे।
केंद्र की दलील
सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि अनुच्छेद 32 का उद्देश्य नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करना है, जबकि राज्य सरकारें खुद मौलिक अधिकार नहीं रखतीं। उनकी भूमिका केवल नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना है। इसलिए राज्य सरकारें इस आधार पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर नहीं कर सकतीं।
उन्होंने यह भी जोड़ा कि न तो कोर्ट राष्ट्रपति और राज्यपाल को कोई आदेश दे सकती है और न ही उनके फैसलों को चुनौती दी जा सकती है।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई ने सुनवाई के दौरान कहा कि राज्यपाल का किसी विधेयक को छह महीने तक लंबित रखना उचित नहीं है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि यदि अदालतें किसी मामले का वर्षों तक निपटारा न करें, तो क्या राष्ट्रपति को अदालत को आदेश देने का अधिकार होगा?
इससे पहले 26 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया था कि अगर कोई राज्यपाल किसी विधेयक पर अनिश्चितकाल तक निर्णय नहीं लेता, तो क्या अदालत के पास कोई उपाय नहीं रहेगा? कोर्ट ने यह चिंता भी जताई थी कि यदि राज्यपाल की स्वतंत्र शक्ति बनी रही तो बजट जैसे महत्वपूर्ण विधेयक भी अटक सकते हैं।
मई 2025 में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अनुच्छेद 143(1) के तहत सुप्रीम कोर्ट से राय मांगी थी कि क्या अदालत राज्यपाल और राष्ट्रपति को निर्देश दे सकती है कि वे विधानसभा से पारित विधेयकों पर तय समयसीमा के भीतर निर्णय लें।