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पपीते के पत्तों से कैंसर का इलाज संभव? वैज्ञानिकों की नई खोज चर्चा में

Health Desk । देश के प्रतिष्ठित टाटा मेमोरियल सेंटर (TMC) की एक क्लिनिकल स्टडी ने कैंसर उपचार को लेकर नई उम्मीदों के साथ-साथ बड़ा विवाद भी खड़ा कर दिया है। अध्ययन में दावा किया गया था कि पपीते के पत्तों का अर्क (CPLE) कीमोथेरेपी के दौरान कैंसर मरीजों में प्लेटलेट काउंट तेजी से बढ़ाने में मदद कर सकता है। हालांकि, इस रिसर्च पर सवाल उठने के बाद जर्नल ऑफ क्लिनिकल ऑन्कोलॉजी (JCO) ग्लोबल ऑन्कोलॉजी ने शोध पत्र पर ‘एक्सप्रेशन ऑफ कंसर्न’ जारी किया है।

कीमोथेरेपी के दौरान प्लेटलेट बढ़ाने पर हुआ अध्ययन

टाटा मेमोरियल सेंटर के शोधकर्ताओं ने कीमोथेरेपी से गुजर रहे मरीजों में प्लेटलेट काउंट पर पपीते के पत्तों के अर्क के प्रभाव का अध्ययन किया। पपीते की पत्तियों से तैयार CPLE का उपयोग लंबे समय से डेंगू और प्लेटलेट्स की कमी जैसी स्थितियों में पारंपरिक चिकित्सा और फाइटोथेरेपी में किया जाता रहा है।

शोधकर्ताओं ने कहा कि यह अध्ययन वैज्ञानिक मानकों के अनुरूप किया गया और इसके सभी निष्कर्ष प्रमाण आधारित हैं।

अध्ययन में क्या सामने आया?

मार्च में प्रकाशित इस अध्ययन में करीब 200 कैंसर मरीजों को शामिल किया गया, जो कीमोथेरेपी से होने वाली थ्रोम्बोसाइटोपेनिया (प्लेटलेट्स की कमी) से जूझ रहे थे।

शोध के अनुसार—

  • CPLE लेने वाले मरीजों में प्लेटलेट्स की रिकवरी प्लेसीबो समूह की तुलना में अधिक तेजी से हुई।
  • चौथे दिन से ही प्लेटलेट काउंट में स्पष्ट सुधार देखने को मिला।
  • मध्यम स्तर की प्लेटलेट कमी वाले मरीजों में कीमोथेरेपी टालने या डोज कम करने की जरूरत कम हुई।
  • CPLE समूह के केवल 25% मरीजों को इलाज में देरी या डोज कम करनी पड़ी, जबकि प्लेसीबो समूह में यह आंकड़ा 43% रहा।
  • अध्ययन के दौरान कोई गंभीर दुष्प्रभाव सामने नहीं आया।
  • लगभग 10 दिन के उपचार की लागत करीब 300 रुपये बताई गई, जिससे भविष्य में इसे कम खर्चीला सहायक उपचार माना जा सकता है।

विवाद कैसे शुरू हुआ?

यह विवाद तब सामने आया जब केरल के हेपेटोलॉजिस्ट डॉ. सिरियाक एबी फिलिप्स (लिवरडॉक) ने इस अध्ययन पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने सोशल मीडिया पर दावा किया कि उनकी शिकायत के बाद जर्नल ने शोध पत्र पर ‘एक्सप्रेशन ऑफ कंसर्न’ जारी किया है।

डॉ. फिलिप्स ने इस रिसर्च में कथित अनियमितताओं और संभावित डेटा संबंधी चिंताओं का आरोप लगाया तथा इसे “शर्मनाक रिसर्च” बताते हुए बड़े चिकित्सा संस्थानों को वैकल्पिक चिकित्सा से जुड़े शोध में अतिरिक्त सावधानी बरतने की सलाह दी।

अंतिम निष्कर्ष

फिलहाल यह अध्ययन पूरी तरह खारिज नहीं किया गया है, लेकिन जर्नल द्वारा जारी ‘एक्सप्रेशन ऑफ कंसर्न’ का मतलब है कि शोध के कुछ पहलुओं की समीक्षा और जांच जारी है। ऐसे में पपीते के पत्तों के अर्क को कैंसर का इलाज या प्रमाणित दवा मानना जल्दबाजी होगी। विशेषज्ञों का कहना है कि इस विषय पर अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए और स्वतंत्र तथा बड़े स्तर के वैज्ञानिक अध्ययन आवश्यक हैं।

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Kailash Jaiswal

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