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छत्तीसगढ़भाटापारा

“नाम में ‘भाटापारा’, हकीकत में उपेक्षा—जिले का सबसे बड़ा व्यापारिक केंद्र फिर भी प्रशासनिक सुविधाओं से वंचित”

भाटापारा: जिला बलौदाबाजार-भाटापारा नाम से जरूर जाना जाता है, लेकिन हकीकत में भाटापारा सिर्फ नाम तक सीमित होकर रह गया है। जिले का मुख्यालय बलौदाबाजार में है और प्रशासनिक सुविधाओं का हिस्सा भी वहीं सिमट गया है, जबकि भाटापारा व्यापारिक दृष्टि से जिले का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण केंद्र है।

भाटापारा में प्रदेश की सबसे बड़ी कृषि उपज मंडी स्थित है, जहां दूर-दराज़ से किसान अपनी फसल लेकर पहुंचते हैं। लगभग 75 हजार की आबादी वाले इस शहर की आर्थिक अहमियत किसी से छिपी नहीं है, फिर भी प्रशासनिक स्तर पर यहां उपेक्षा साफ नजर आती है।
स्थिति यह है कि भाटापारा को सप्ताह में सिर्फ एक दिन के लिए अपर कलेक्टर मिलता है, वह भी कुछ घंटों के लिए। दूसरी ओर बलौदाबाजार में चार-चार अपर कलेक्टर तैनात हैं।

यह असंतुलन सवाल खड़े करता है कि आखिर भाटापारा के साथ यह भेदभाव क्यों?
इतना ही नहीं, भाटापारा में एडिशनल एसपी की तैनाती तो है, लेकिन उनके लिए अलग से भवन तक उपलब्ध नहीं है। मजबूरी में अपर कलेक्टर के भवन के हिस्से में ही कार्यालय संचालित किया जा रहा है, जो प्रशासनिक व्यवस्थाओं की पोल खोलने के लिए काफी है।
सबसे बड़ी परेशानी आम लोगों को झेलनी पड़ रही है। भाटापारा में काम नहीं होने पर फरियादियों को 25 किलोमीटर दूर बलौदाबाजार का रुख करना पड़ता है। समय, पैसा और परेशानी—तीनों का बोझ जनता पर पड़ रहा है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि “भाटापारा का नाम सिर्फ जिले के साथ जोड़ देना ही पर्याप्त नहीं है, जब तक यहां समान प्रशासनिक सुविधाएं नहीं मिलेंगी, तब तक यह नाम एक दिखावा ही रहेगा।”
अब सवाल यह है कि क्या भाटापारा को उसका हक मिलेगा, या फिर यह शहर यूं ही नाम के सहारे उपेक्षा का शिकार बना रहेगा?

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Kailash Jaiswal

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