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अमेरिकी फैसला सख्त: सस्ता कच्चा तेल खरीदना होगा मुश्किल

नई दिल्ली: अमेरिका ने ईरान और रूस से जुड़े तेल पर दी गई अस्थायी राहत को आगे जारी न रखने का फैसला किया है। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने स्पष्ट किया कि इन दोनों देशों के कच्चे तेल पर लागू जनरल लाइसेंस अब समाप्त हो जाएंगे और उनका नवीनीकरण नहीं किया जाएगा।

यह छूट केवल उन खेपों तक सीमित थी जो 11 मार्च से पहले समुद्र में लोड की जा चुकी थीं। अब जब उन खेपों का अधिकांश उपयोग हो चुका है, अमेरिका ने संकेत दिया है कि वह आगे प्रतिबंधों में ढील देकर बाजार में आपूर्ति बढ़ाने की नीति नहीं अपनाएगा। इससे वैश्विक तेल बाजार के साथ-साथ भारत जैसे आयातक देशों पर भी असर पड़ सकता है।

दरअसल, इस छूट के चलते भारत को हाल के महीनों में बड़ा लाभ मिला था। समुद्री मार्गों में रुकावटों और खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास तनाव के बावजूद भारतीय कंपनियां रूसी तेल खरीदती रहीं। इसी अवधि में भारतीय रिफाइनरियों ने करीब 30 मिलियन बैरल रूसी कच्चे तेल के ऑर्डर दिए।

पहले अमेरिकी दबाव के चलते रिलायंस इंडस्ट्रीज जैसी कंपनियों ने रोसनेफ्ट और लुकोइल से खरीद घटाई थी, लेकिन बाद में हालात को देखते हुए आयात फिर बढ़ा दिया गया। वहीं, ईरान से भी सीमित स्तर पर आपूर्ति दोबारा शुरू हुई और कई वर्षों के अंतराल के बाद सुपरटैंकर भारतीय बंदरगाहों तक पहुंचे।

पृष्ठभूमि में देखें तो मार्च के दौरान ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण कड़ा करने के बाद अमेरिका ने अस्थायी तौर पर 30 दिनों की छूट दी थी, ताकि पहले से लदे तेल की डिलीवरी जारी रह सके। इसी तरह ईरानी तेल को लेकर भी सीमित अवधि की राहत दी गई थी, जिससे वैश्विक बाजार में आपूर्ति का दबाव कुछ हद तक कम हुआ।

अब इन छूटों के समाप्त होने के साथ भारत समेत कई देशों को कच्चे तेल की खरीद के लिए नए विकल्प तलाशने पड़ सकते हैं, जिससे कीमतों और आपूर्ति पर असर पड़ने की संभावना है।

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Kailash Jaiswal

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