RO.NO. 01
ज्योतिषि

श्राद्ध में कौवे को भोजन कराने का क्या है रहस्य? जानिए धार्मिक मान्यता और कथा

नई दिल्ली। पूर्वजों को श्रद्धांजलि देने और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने वाला पितृ पक्ष आज 26 सितंबर से शुरू हो रहा है। हिंदू धर्म में इस अवधि को पितरों के स्मरण, तर्पण और श्राद्ध कर्म के लिए विशेष माना जाता है। पितृ पक्ष भाद्रपद पूर्णिमा से शुरू होकर आश्विन अमावस्या तक चलता है। इस दौरान लोग अपने पूर्वजों की मृत्यु तिथि के अनुसार श्राद्ध और तर्पण करते हैं।

पितृ पक्ष की कई परंपराओं में कौवों को भोजन कराने की परंपरा प्रमुख है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, श्राद्ध के दौरान कौवे को भोजन कराने से यह माना जाता है कि पितरों तक भोजन पहुंचता है। इसी वजह से श्राद्ध का भोजन तैयार करने के बाद उसका एक हिस्सा कौवे के लिए अलग निकाला जाता है।

कौवे को क्यों माना जाता है पितरों से जुड़ा?

धार्मिक मान्यताओं और गरुड़ पुराण से जुड़ी परंपराओं में कौवे को यमराज का संदेशवाहक बताया गया है। मान्यता है कि पितृ पक्ष के दौरान पूर्वज कौवे के रूप में धरती पर आ सकते हैं और उनके लिए अर्पित भोजन स्वीकार करते हैं। कौवे के भोजन ग्रहण करने को पितरों की तृप्ति और आशीर्वाद से जोड़कर देखा जाता है।

श्राद्ध कर्म में केवल कौवे ही नहीं, बल्कि गाय, कुत्ते, चींटी और देवताओं के लिए भी भोजन का अंश निकालने की परंपरा बताई गई है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इन सभी के माध्यम से पितरों और देवताओं को अर्पण पहुंचता है।

भगवान राम और जयंत से जुड़ी है कथा

कौवे को श्राद्ध का भोजन कराने की परंपरा से जुड़ी एक पौराणिक कथा भगवान श्रीराम और जयंत से संबंधित है। कथा के अनुसार, भगवान इंद्र के पुत्र जयंत ने कौवे का रूप धारण कर माता सीता को परेशान किया था। उन्होंने माता सीता के पैर में चोंच मार दी, जिससे उनके पैर से रक्त निकल आया।

यह देखकर भगवान श्रीराम ने तिनके से बाण चलाया। जयंत अपनी रक्षा के लिए तीनों लोकों में गया, लेकिन उसे कहीं शरण नहीं मिली। अंत में वह भगवान श्रीराम के पास वापस आया और क्षमा मांगी। श्रीराम ने उसे क्षमा कर दिया। धार्मिक कथा में आगे बताया जाता है कि इसी प्रसंग के बाद कौवे को पितरों से जोड़ने और श्राद्ध में उन्हें भोजन कराने की परंपरा को विशेष महत्व मिला।

कैसे कराया जाता है कौवे को भोजन?

श्राद्ध के दौरान पितरों के लिए तैयार भोजन में से कुछ हिस्सा अलग निकालकर कौवे को अर्पित किया जाता है। कई जगहों पर उड़द की दाल, चावल और गुड़ से प्रसाद तैयार करने की परंपरा है। इसे तर्पण या श्राद्ध स्थल पर रखकर कौवे को भोजन कराया जाता है।

धार्मिक मान्यता में कौवे के भोजन ग्रहण करने को पितरों की तृप्ति का संकेत माना जाता है। हालांकि पितृ दोष या कालसर्प दोष से जुड़े उपाय धार्मिक मान्यताओं का हिस्सा हैं; इनके संबंध में अलग-अलग परंपराओं और ज्योतिषीय मतों में भिन्न धारणाएं मिलती हैं।

पितृ पक्ष का मुख्य उद्देश्य पूर्वजों का स्मरण, उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करना और उनकी आत्मा की शांति के लिए धार्मिक कर्म करना माना जाता है। यही वजह है कि इस अवधि में तर्पण, श्राद्ध और दान-पुण्य का विशेष महत्व बताया गया है।

Share this
advertisement

Kailash Jaiswal

"BBN24 News - ताजा खबरों का सबसे विश्वसनीय स्रोत! पढ़ें छत्तीसगढ़, भारत और दुनिया की ब्रेकिंग न्यूज, राजनीति, खेल, व्यवसाय, मनोरंजन और अन्य अपडेट सबसे पहले।"

Related Articles

Back to top button