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छत्तीसगढ़

GST 2.0 से छत्तीसगढ़ को झटका, उत्पादन-आधारित मॉडल से 1500 करोड़ तक घाटे का अनुमान

रायपुर। देश में कर प्रणाली को और सरल बनाने के उद्देश्य से लागू किए गए GST 2.0 के बाद जहां राष्ट्रीय स्तर पर कर संग्रह में लगातार वृद्धि दर्ज की जा रही है, वहीं छत्तीसगढ़ जैसे उत्पादन-आधारित राज्यों के लिए यह व्यवस्था नई वित्तीय चुनौतियां लेकर आई है। अनुमान है कि चालू वित्तीय वर्ष में राज्य को लगभग 1500 करोड़ रुपये तक के राजस्व नुकसान का सामना करना पड़ सकता है।

देश में बढ़ रहा GST कलेक्शन

देश में GST लागू होने के बाद से कर संग्रह में लगातार सुधार देखा गया है। दिसंबर 2025 में जहां कुल GST कलेक्शन करीब 1.75 लाख करोड़ रुपये रहा, वहीं जनवरी 2026 में यह बढ़कर लगभग 1.93 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया। सरकार का मानना है कि GST 2.0 के तहत टैक्स दरों में बदलाव और प्रक्रियाओं को आसान बनाने से व्यापारिक गतिविधियों को बढ़ावा मिला है। हालांकि, इस व्यवस्था का असर सभी राज्यों पर समान नहीं पड़ रहा।

गंतव्य आधारित कर प्रणाली बनी कारण

विशेषज्ञों के मुताबिक छत्तीसगढ़ में राजस्व दबाव बढ़ने की मुख्य वजह GST की गंतव्य आधारित कर प्रणाली है। इस प्रणाली में टैक्स का हिस्सा उस राज्य को मिलता है जहां वस्तु या सेवा का उपभोग होता है। छत्तीसगढ़ में स्टील, आयरन और कोयले का बड़े पैमाने पर उत्पादन होता है, लेकिन इनका उपभोग अक्सर अन्य राज्यों में होता है। ऐसे में कर का बड़ा हिस्सा उपभोग वाले राज्यों को चला जाता है, जिससे राज्य के राजस्व पर असर पड़ता है।

कोयला क्षेत्र से भी घटा राजस्व

राज्य की आय पर असर पड़ने का एक प्रमुख कारण कोयला उद्योग भी है। पहले कोयले पर 5 प्रतिशत GST लगता था, जबकि उत्पादन से जुड़े कई इनपुट पर 18 प्रतिशत तक कर लिया जाता था। इससे कंपनियों के पास बड़ी मात्रा में इनपुट टैक्स क्रेडिट जमा हो गया था। बाद में कोयले पर GST दर बढ़ाकर 18 प्रतिशत कर दी गई, लेकिन कंपनियां पुराने ITC का उपयोग कर रही हैं। इसके कारण सरकार को नकद कर कम प्राप्त हो रहा है और राजस्व में कमी आ रही है।

अन्य राज्यों को भी झटका

यह समस्या केवल छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं है। ओडिशा और झारखंड जैसे अन्य उत्पादन-प्रधान राज्यों में भी इसी तरह की स्थिति बन रही है। इन राज्यों में भी करीब 1000 करोड़ रुपये तक राजस्व में कमी का अनुमान लगाया जा रहा है।

विकास योजनाओं पर पड़ सकता है प्रभाव

राजस्व में गिरावट का असर राज्य की विकास परियोजनाओं और जनकल्याण योजनाओं पर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा वित्तीय दबाव कुछ समय तक जारी रह सकता है और स्थिति में सुधार 2027-28 के आसपास देखने को मिल सकता है।

संतुलन के लिए जरूरी सुधार

आर्थिक विशेषज्ञों का सुझाव है कि उत्पादन-प्रधान राज्यों के हितों को ध्यान में रखते हुए कर वितरण प्रणाली की समीक्षा की जानी चाहिए। इसके लिए IGST सेटलमेंट व्यवस्था में सुधार, क्षतिपूर्ति तंत्र को मजबूत करना और संतुलित राजस्व मॉडल तैयार करना जरूरी हो सकता है।

कुल मिलाकर GST 2.0 ने देश की कर व्यवस्था को अधिक व्यवस्थित बनाने की दिशा में कदम बढ़ाया है, लेकिन इसके प्रभाव राज्यों की आर्थिक संरचना के अनुसार अलग-अलग दिखाई दे रहे हैं। ऐसे में छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों के लिए संतुलित वित्तीय व्यवस्था तैयार करना समय की मांग बन गया है।

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Kailash Jaiswal

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