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छत्तीसगढ़

बारनवापारा वानांचल के ग्रामीणों का फूटा गुस्सा, आंदोलन की चेतावनी से जागा प्रशासन; 5 साल की अनदेखी के बाद अब 3 महीने का आश्वासन

मोंहदा / बारनवापारा:बारनवापारा वानांचल के ग्रामीणों के सब्र का बांध आखिरकार टूट गया। पिछले पांच वर्षों से अपनी बुनियादी सुविधाओं—बिजली, सड़क और वन अधिकार—के लिए प्रशासनिक दफ्तरों और जनप्रतिनिधियों के चक्कर काट रहे ग्रामीणों को जब कहीं से राहत नहीं मिली, तो उन्होंने 5 जुलाई से अनिश्चितकालीन धरना प्रदर्शन और शाला बहिष्कार जैसे कड़े कदम उठाने का ऐलान कर दिया।

ग्रामीणों के इस निर्णायक रुख की भनक लगते ही, जो प्रशासन अब तक गहरी नींद में था, वह अचानक सक्रिय हो गया। जिला कलेक्टर के निर्देश पर 3 जुलाई को आनन-फानन में अधिकारियों की टीम ग्राम मोंहदा पहुंची और ग्रामीणों के बीच बैठक कर हालात संभालने की कोशिश की गई।

5 साल तक क्यों नहीं दिखी समस्याएं?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिन समस्याओं को लेकर ग्रामीण वर्षों से गुहार लगा रहे थे, उन पर प्रशासन ने अब तक कोई ठोस पहल क्यों नहीं की? क्या प्रशासन को जनता की परेशानियां तभी नजर आती हैं जब आंदोलन की चेतावनी मिलती है?

अधिकारियों ने दिया आश्वासन, लेकिन भरोसा कमजोर
बैठक में अपर कलेक्टर देवाशीष कुर्रे, तहसीलदार लव कुमार पटेल, विद्युत विभाग के जेई कृष्ण कुमार साहू और वन विभाग के अधिकारी कृष्णानु चंद्राकर मौजूद रहे। अधिकारियों ने ग्रामीणों की समस्याएं सुनीं और उन्हें हल करने का भरोसा दिलाया।

बिजली व्यवस्था सुधारने के लिए 118 करोड़ रुपये का प्रस्ताव तैयार कर उच्च कार्यालय भेजने की बात कही गई। साथ ही सड़क निर्माण और सामुदायिक वन अधिकार पत्र जैसी मांगों को तीन महीने में पूरा करने का मौखिक आश्वासन दिया गया।

हालांकि, ग्रामीणों के मन में यह सवाल बना हुआ है कि जब पांच साल में कुछ नहीं हुआ, तो क्या अब तीन महीने में सब कुछ संभव है?

दबाव में टला आंदोलन
प्रशासन के आश्वासन के बाद ग्रामीणों ने फिलहाल अपना आंदोलन स्थगित कर दिया है, लेकिन यह फैसला पूरी तरह सशर्त है। ग्रामीणों ने साफ चेतावनी दी है कि यदि तय समय-सीमा में वादे पूरे नहीं हुए, तो वे पहले से अधिक उग्र आंदोलन करने के लिए मजबूर होंगे।

जनता का सवाल—जिम्मेदार कौन?
यह पूरा घटनाक्रम प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। क्या विकास योजनाएं केवल कागजों तक सीमित हैं? क्या आम जनता को अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए हर बार आंदोलन का सहारा लेना पड़ेगा?

बैठक में क्षेत्र के कई प्रमुख ग्रामीण और जनप्रतिनिधि उपस्थित रहे, जिन्होंने एक स्वर में प्रशासन को चेताया कि अब और लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

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Kailash Jaiswal

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