अर्थव्यवस्था की दिशा तय करेगी RBI की बैठक, 6 जून को आएगा फैसला

नई दिल्ली। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) की तीन दिवसीय बैठक बुधवार से शुरू हो गई है। बैठक के बाद शुक्रवार को आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा नीतिगत फैसलों की घोषणा करेंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच केंद्रीय बैंक इस बार रेपो दर में कोई बदलाव नहीं कर सकता।
जून की मौद्रिक नीति समीक्षा ऐसे समय हो रही है जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की कीमतों को लेकर अस्थिरता बनी हुई है। ऐसे में आरबीआई के सामने महंगाई को नियंत्रित रखने और आर्थिक वृद्धि को गति देने की दोहरी चुनौती है।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि केंद्रीय बैंक फिलहाल ब्याज दरों को स्थिर रखने की नीति अपना सकता है, हालांकि उसके रुख में सतर्कता देखने को मिल सकती है। एचएसबीसी की मुख्य भारत अर्थशास्त्री प्रांजुल भंडारी के अनुसार, निकट अवधि में दरों में बदलाव की संभावना कम है, लेकिन भविष्य में परिस्थितियों के अनुसार नीतिगत रुख सख्त हो सकता है।
विशेषज्ञों की नजर आरबीआई के संशोधित आर्थिक अनुमानों पर भी टिकी है। खासतौर पर यह देखा जाएगा कि केंद्रीय बैंक कच्चे तेल की औसत कीमत को लेकर अपने अनुमान में बदलाव करता है या नहीं। यदि तेल की कीमतों का अनुमान बढ़ता है, तो महंगाई का अनुमान भी बढ़कर करीब 5 प्रतिशत तक पहुंच सकता है।
वहीं, केयरएज रेटिंग्स की रिपोर्ट में सामान्य से कमजोर मानसून और ईंधन कीमतों में हालिया बढ़ोतरी को महंगाई के लिए जोखिम बताया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, थोक महंगाई का असर खुदरा महंगाई पर तेजी से दिखाई दे सकता है और आने वाले समय में मुद्रास्फीति का दबाव बना रह सकता है।
रिपोर्ट में वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की जीडीपी वृद्धि दर 6.7 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया है, बशर्ते कच्चे तेल की औसत कीमत 90 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहे। हालांकि यदि पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ता है और तेल की कीमतें 110 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचती हैं, तो आर्थिक वृद्धि दर घटकर लगभग 6 प्रतिशत रह सकती है।
एसबीआई रिसर्च और एमके ग्लोबल फाइनेंशियल सर्विसेज ने भी इस बैठक में रेपो दर को यथावत रखने का अनुमान जताया है। उनका मानना है कि वैश्विक अस्थिरता और महंगाई के जोखिमों को देखते हुए आरबीआई फिलहाल कोई बड़ा कदम उठाने से बच सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि आने वाले महीनों में कच्चे तेल की कीमतों में नरमी बनी रहती है और भू-राजनीतिक तनाव कम होता है, तो इससे रुपए को मजबूती मिलेगी और आरबीआई को लंबे समय तक ब्याज दरें स्थिर रखने में मदद मिल सकती है।



