अंतर्राष्ट्रीय संसदीय दिवस पर प्रधानमंत्री मोदी का संदेश, संसद को बताया जनविश्वास का केंद्र

नई दिल्ली। हर वर्ष 30 जून को मनाया जाने वाला अंतर्राष्ट्रीय संसदीय दिवस लोकतांत्रिक मूल्यों, संसदीय परंपराओं और जनप्रतिनिधित्व को सशक्त बनाने का संदेश देता है। इस दिवस का उद्देश्य संसदों की भूमिका के प्रति वैश्विक स्तर पर जागरूकता बढ़ाना तथा लोकतांत्रिक संस्थाओं को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और समावेशी बनाने के प्रयासों को प्रोत्साहित करना है।
यह दिवस वर्ष 1889 में अंतर-संसदीय संघ (आईपीयू) की स्थापना की स्मृति में मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र ने भी इस पहल को समर्थन देते हुए इसे वैश्विक स्तर पर लोकतंत्र को मजबूत करने के महत्वपूर्ण अवसर के रूप में मान्यता दी है।
संसद लोकतंत्र की आधारशिला
संसद किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण संस्था होती है। यहीं कानून बनाए जाते हैं, सरकार को जवाबदेह ठहराया जाता है और जनता की समस्याओं तथा आकांक्षाओं को राष्ट्रीय स्तर पर आवाज़ मिलती है। संसद केवल कानून निर्माण का मंच नहीं, बल्कि सरकार और नागरिकों के बीच संवाद का सबसे प्रभावी माध्यम भी है। इसलिए मजबूत और प्रभावी संसद को स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान माना जाता है।
लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करने का अवसर
अंतर्राष्ट्रीय संसदीय दिवस संसदों के कामकाज की समीक्षा, लोकतांत्रिक मूल्यों को सशक्त बनाने और बदलती वैश्विक चुनौतियों के अनुरूप संसदीय व्यवस्था को आधुनिक बनाने का अवसर प्रदान करता है। इस अवसर पर महिलाओं और युवाओं की भागीदारी बढ़ाने, नई तकनीकों के उपयोग, पारदर्शिता और नागरिक सहभागिता जैसे विषयों पर विशेष जोर दिया जाता है।
भारत की संसदीय परंपरा विश्व के लिए उदाहरण
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत की संसदीय व्यवस्था वैश्विक स्तर पर एक महत्वपूर्ण उदाहरण मानी जाती है। भारतीय संसद में लोकसभा और राज्यसभा के माध्यम से देश के विभिन्न राज्यों और समाज के विविध वर्गों का प्रतिनिधित्व होता है। स्वतंत्रता के बाद संसद ने अनेक ऐतिहासिक कानून पारित किए हैं, जिन्होंने देश के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विकास को नई दिशा दी है।
नियमित एवं स्वतंत्र चुनाव, संसदीय समितियों की सक्रिय भूमिका, व्यापक चर्चा और सत्ता पक्ष तथा विपक्ष के बीच लोकतांत्रिक विमर्श भारतीय संसदीय प्रणाली की प्रमुख विशेषताएं हैं। डिजिटल तकनीकों के बढ़ते उपयोग से संसद की कार्यप्रणाली भी अधिक प्रभावी और पारदर्शी हुई है।
नए संसद भवन से बढ़ी लोकतांत्रिक क्षमता
भारत ने नए संसद भवन के निर्माण के माध्यम से अपनी लोकतांत्रिक संस्थाओं को आधुनिक स्वरूप दिया है। अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस यह भवन भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर बनाया गया है। इसमें डिजिटल संसाधनों, बेहतर तकनीकी व्यवस्था और अधिक बैठने की क्षमता जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जोर
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विभिन्न अवसरों पर संसद को लोकतंत्र का सर्वोच्च मंच बताते रहे हैं। उन्होंने सांसदों से सदन की गरिमा बनाए रखने, सार्थक चर्चा, जनहित के मुद्दों पर गंभीर विमर्श और विकासोन्मुख कानून बनाने पर लगातार बल दिया है। नए संसद भवन के उद्घाटन के दौरान भी उन्होंने इसे विकसित भारत की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं का प्रतीक बताया था। वहीं, 18वीं लोकसभा के पहले सत्र से पूर्व उन्होंने सभी राजनीतिक दलों से रचनात्मक सहयोग और जनहित में सकारात्मक चर्चा की अपील की थी।
वैश्विक स्तर पर भारत की सक्रिय भूमिका
भारत अंतर-संसदीय संघ सहित विभिन्न वैश्विक संसदीय मंचों पर सक्रिय भूमिका निभा रहा है। भारतीय सांसद जलवायु परिवर्तन, सतत विकास, आतंकवाद, लैंगिक समानता, डिजिटल शासन और वैश्विक शांति जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर अंतरराष्ट्रीय संवाद में भाग लेते हैं, जिससे भारत का लोकतांत्रिक अनुभव दुनिया तक पहुंच रहा है।
महिलाओं और युवाओं की बढ़ती भागीदारी
भारतीय लोकतंत्र में महिलाओं और युवाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है। संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। वहीं, युवा सांसद नई सोच, तकनीकी समझ और नवाचार के साथ संसदीय विमर्श को नई दिशा दे रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र और आईपीयू भी संसदों में महिलाओं और युवाओं की अधिक भागीदारी को लोकतंत्र की मजबूती के लिए आवश्यक मानते हैं।
चुनौतियां और आगे की राह
लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के सामने राजनीतिक ध्रुवीकरण, सदनों में व्यवधान, गलत सूचनाओं का प्रसार और नागरिकों के घटते विश्वास जैसी चुनौतियां मौजूद हैं। ऐसे समय में संसदों को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और जन-केंद्रित बनाना पहले से अधिक आवश्यक हो गया है।
अंतर्राष्ट्रीय संसदीय दिवस लोकतंत्र, जवाबदेही और जनभागीदारी के प्रति प्रतिबद्धता को दोहराने का अवसर है। यह संदेश देता है कि मजबूत संसद, सक्रिय जनप्रतिनिधित्व और सार्थक संवाद ही लोकतंत्र को और अधिक सशक्त बना सकते हैं।



