
भाटापारा | संवाददाता: तुलसी राम जायसवाल
भाटापारा के निपनिया धान खरीदी केंद्र में सामने आए बड़े घोटाले ने अब प्रशासनिक तंत्र की गंभीर लापरवाही और जवाबदेही पर सवाल खड़े कर दिए हैं। मार्च में वायरल वीडियो के जरिए उजागर हुए इस मामले में केंद्र प्रभारी को बर्खास्त तो कर दिया गया, लेकिन दो महीने बीतने के बावजूद अब तक FIR दर्ज नहीं होना कई संदेह पैदा कर रहा है।
सबसे चौंकाने वाला पहलू तब सामने आया, जब रायपुर स्थित सहकारिता विभाग की अपर आयुक्त श्रीमती सावित्री भगत ने साफ कहा कि उन्हें इस पूरे मामले की जानकारी ही नहीं है। उन्होंने बताया कि वे बलौदाबाजार के उप पंजीयक से जानकारी लेकर ही आगे की कार्रवाई स्पष्ट कर पाएंगी। इतने बड़े घोटाले से उच्च स्तर का अनभिज्ञ रहना सिस्टम की गंभीर खामी को उजागर करता है।
जांच में यह सामने आया है कि निपनिया केंद्र में धान के बोरो में रेत, कंकड़ और पत्थर मिलाकर मात्रा बढ़ाने का खेल किया गया। जांच अधिकारी माखन सिंह कंवर के अनुसार भौतिक सत्यापन में 343 कट्टा धान अधिक पाया गया, जबकि पहले कमी बताई गई थी। यह विरोधाभास बड़े स्तर पर हेराफेरी की ओर इशारा करता है।
मामले में हमालों और मुकरदमों ने भी बयान में स्वीकार किया है कि समिति प्रभारी के निर्देश पर ही रेत मिलाकर बोरे तैयार किए गए। विधायक इंद्र साव ने भी आरोप लगाया कि तीन ट्रैक्टर रेत मिलाकर हजारों कट्टा धान में गड़बड़ी की गई है।
9 मार्च को प्रभारी लीलाराम सेन को बर्खास्त कर दिया गया, लेकिन अब तक FIR दर्ज नहीं होना पूरे प्रकरण को संदेह के घेरे में ला रहा है। सहकारिता बैंक के नोडल अधिकारी जी.एन. साहू ने 24 अप्रैल को “अंतिम मिलान” के बाद कार्रवाई की बात कही, लेकिन समयसीमा को लेकर कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया।
हीं उप पंजीयक उमेश गुप्ता ने जिम्मेदारी पुलिस पर डाल दी, जबकि SDOP तारेश साहू का कहना है कि मामला कलेक्टर के संज्ञान में भेजा गया है और निर्देश का इंतजार किया जा रहा है। इससे साफ है कि हर स्तर पर जिम्मेदारी टालने का खेल जारी है।
उठते सवाल:
अपर आयुक्त को जानकारी नहीं, तो जांच की निगरानी कौन कर रहा है?
कमी वाला धान अचानक ज्यादा कैसे हो गया?
रेत मिलाने का आदेश किसके इशारे पर हुआ?
प्रभारी पर कार्रवाई हुई, लेकिन FIR क्यों नहीं?
क्या पूरे मामले को दबाने की कोशिश हो रही है?
भाटापारा का यह घोटाला अब केवल एक खरीदी केंद्र तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरे सहकारिता तंत्र की पारदर्शिता और जवाबदेही पर बड़ा सवाल बन गया है। अब नजर इस बात पर है कि अपर आयुक्त के संज्ञान में मामला आने के बाद क्या ठोस कार्रवाई होती है या यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा।



