
भाटापारा। गीताबाई अग्रवाल एवं समस्त गर्ग परिवार द्वारा छत्तीसगढ़ी अग्रवाल समाज भवन, भाटापारा में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान यज्ञ में नगर के प्रख्यात कथावाचक पंडित हरगोपाल शर्मा ने भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य और अलौकिक चरित्रों की भावपूर्ण व्याख्या की। कथा श्रवण हेतु बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।
पंडित शर्मा ने श्रीमद् भागवत पुराण की महिमा बताते हुए कहा कि जैसे क्षेत्रों में काशी, नदियों में गंगा, देवताओं में श्रीकृष्ण और वैष्णवों में भगवान शंकर श्रेष्ठ हैं, वैसे ही समस्त पुराणों में श्रीमद् भागवत श्रेष्ठ है। यह विशुद्ध प्रेम का शास्त्र है, जिसके आश्रय से मानव की समस्त कामनाओं की पूर्ति होती है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य से प्रतिदिन अनजाने में अनेक पाप हो जाते हैं, जिनके प्रायश्चित हेतु पांच यज्ञ— गौ को ग्रास, अग्नि को भोजन, चींटी को आटा, पक्षियों को अन्न और अतिथि का सत्कार— अवश्य करना चाहिए। इससे जीवन दोषमुक्त होता है।
गज-ग्राह कथा के माध्यम से उन्होंने संदेश दिया कि संसार के अधिकांश संबंध स्वार्थ पर आधारित हैं, इसलिए व्यक्ति को सदैव भगवान का स्मरण करते रहना चाहिए। राम जन्म एवं कृष्ण जन्म की कथा सुनाते हुए उन्होंने सूर्यवंश और चंद्रवंश की परंपराओं पर प्रकाश डाला तथा बताया कि जब-जब धरती पर पाप बढ़ता है, तब-तब भगवान अवतार लेकर धर्म की स्थापना करते हैं।
कृष्ण जन्मोत्सव के अवसर पर श्रद्धालु “नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की” जैसे भजनों पर झूमते नजर आए। गोवर्धन पूजन प्रसंग में पंडित शर्मा ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने इंद्र पूजा बंद कराकर पर्वत पूजन का संदेश दिया, जिससे हमें वृक्ष, पर्वत, नदियों और तालाबों के संरक्षण का संदेश मिलता है। उन्होंने प्रकृति के प्रति देवतुल्य भाव रखने की अपील की।
महारास के प्रसंग पर उन्होंने स्पष्ट किया कि यह स्त्री-पुरुष का नहीं, बल्कि जीव और जीवात्मा का दिव्य मिलन था। गोपी-संवाद का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा—
“प्रेम के बदले प्रेम करने वाले सामान्य हैं, अकारण प्रेम केवल माता-पिता करते हैं और जो किसी से प्रेम नहीं करते, वे आत्माराम, आप्तकाम और कृतघ्न होते हैं।”
उद्धव चरित्र में उन्होंने बताया कि बृहस्पति के परम ज्ञानी शिष्य उद्धव का ज्ञान भी गोपियों के प्रेम के आगे नतमस्तक हो गया। इस प्रसंग पर प्रस्तुत भजनों ने श्रोताओं को भाव-विभोर कर दिया।
रुक्मिणी विवाह की कथा में उन्होंने कहा कि रुक्मिणी साक्षात लक्ष्मी स्वरूपा हैं और लक्ष्मी का वरण केवल नारायण ही कर सकते हैं। इस अवसर पर श्याम मित्र मंडल, भाटापारा के भजन गायकों द्वारा प्रस्तुत भजनों पर श्रोतागण खूब झूमे।
सुदामा चरित्र का वर्णन करते हुए पंडित शर्मा ने कहा कि शास्त्रों में सुदामा जी को कहीं भी दरिद्र नहीं कहा गया है। गरीब होना और दरिद्र होना अलग-अलग बातें हैं। त्रिलोकीनाथ श्रीकृष्ण स्वयं सुदामा के स्वागत में नंगे पांव दौड़े— यह सच्ची मित्रता और भक्ति का सर्वोच्च उदाहरण है।
कथा के अंतिम चरण में उद्धव-गोपी संवाद, दत्तात्रेय के 24 गुरु, शुकदेव विदाई, परीक्षित मोक्ष और कलियुग के लक्षण का विस्तार से वर्णन किया गया। अंत में पंडित हरगोपाल शर्मा ने धर्म के साथ-साथ राष्ट्र के प्रति कर्तव्यों के ईमानदार निर्वहन की अपील करते हुए देशभक्ति गीत “हर करम अपना करेंगे ऐ वतन तेरे लिए” गाकर कथा को विश्राम दिया।
इस सात दिवसीय कथा ज्ञान यज्ञ का लाभ सैकड़ों श्रद्धालुओं ने लिया।





