क्या हिड़मा गुंडाधुर और बिरसा की तरह एक प्रतीक बन रहा है?

एक संपादकीय विश्लेषण By विक्रम सिंह चौहान
बस्तर की राजनीति, संस्कृति और संघर्ष को समझने वाले जानते हैं कि यहाँ नक्सलवाद सिर्फ सुरक्षा का सवाल नहीं है यह भूमि, पहचान, संसाधनों और सत्ता-संरचना की गहरी ऐतिहासिक लड़ाई है। ऐसे में माओवादी कमांडर(केंद्रीय समिति सदस्य) माड़वी हिडमा की कथित मुठभेड़ में मौत ने केवल सुरक्षा एजेंसियों को ही नहीं, बल्कि पूरे बस्तर समाज को एक नए प्रश्नचिह्न के सामने खड़ा कर दिया है!
क्या बस्तर हिडमा के जाने के बाद खुद को ‘अनाथ’ महसूस कर रहा है?
यह प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि हिडमा तमिल-तेलुगु प्रभुत्व वाली नक्सली कमान के बीच पहला ऐसा चेहरा था जिसने बस्तर के एक आदिवासी को केंद्रीय नेतृत्व के शीर्ष हलकों तक पहुँचाया। यह वही क्षेत्र है जहाँ स्थानीय आदिवासियों को अक्सर बड़े नक्सली ढाँचे में सिर्फ “फुट सोल्जर्स” की भूमिका में देखा गया।
क्या हिडमा इसलिए अलग था?
कई स्थानीय आदिवासी बुद्धिजीवी कहते हैं “हिडमा की राजनीति गलत हो सकती है, लेकिन उसका अस्तित्व हमारी आवाज़ का प्रतीक था। वह पहली बार था जब लड़ाई की कमान हमारे ही किसी के हाथ में गई थी।” यह विचार भले संवेदनशील हो, पर बस्तर में इसे संपूर्णतः नकारा भी नहीं जा सकता।
क्या बस्तर में ‘अंडरकरंट’ फिर से जाग रहा है?
हिडमा के बाद बस्तर में जो सन्नाटा है, उसकी अपनी भाषा है। सुकमा, बीजापुर और दंतेवाड़ा के कई इलाकों में लोग बातचीत में हिडमा को एक लड़ाका के बजाय एक प्रतिनिधि की तरह याद कर रहे हैं एक ऐसा प्रतिनिधि जो सही या गलत, लेकिन “दिल्ली-रायपुर” सत्ता के बाहर एक अलग व्यवस्था का चेहरा था।
इस खालीपन को कौन भरेगा?
क्या यह वैक्यूम सुरक्षा बल भरेंगे?
या सरकार की योजनाएँ?
या फिर कोई नया स्थानीय कमांडर, जिसे अब हिडमा की जगह ‘स्थानीय नायक’ बनने का अवसर मिलेगा.अंडरकरंट के संकेत कई हैं हल्की बेचैनी, धीमी खामोशी, और यह एहसास कि बदलाव तय है।
क्या हिडमा एक नए प्रतीक में बदल रहा है? गुंडाधुर और बिरसा की तरह?
यह तुलना जल्दबाज़ी जान पड़ सकती है, पर दिल्ली में प्रदूषण-विरोधी प्रदर्शन में अचानक उठे नारे “हिडमा अमर रहें” ने यह संकेत ज़रूर दे दिया कि हिडमा सिर्फ एक माओवादी कमांडर नहीं, बल्कि प्रतीक-निर्माण का हिस्सा बन चुका है।
बस्तर में गुंडाधुर का नाम विद्रोह का प्रतीक है।
झारखंड में बिरसा सिर्फ एक इतिहास नहीं, एक लगातार धड़कती चेतना है। क्या हिडमा भी उसी मार्ग पर चढ़ाया जा रहा है? क्या वह एक जनरेशन के युवा आदिवासियों के लिए चाहे वे हिंसा के साथ सहमत न हों फिर भी एक वैकल्पिक “पॉवर सिंबाल” बनेंगे?सोशल मीडिया में एक युवक ने लिखा “गुंडाधुर ने अंग्रेज़ों को चुनौती दी थी, हिडमा ने राज्य को। फर्क है, पर भावना में कुछ लोग समानता देखते हैं।”
क्या अब बस्तर में अडानी का प्रवेश तय है?
हिडमा के मारे जाने के बाद यह बहस तेज़ हुई है कि क्या अब बड़े कॉर्पोरेट समूहों खासतौर पर खनन और अधोसंरचना क्षेत्रों का विस्तार बस्तर में तेज़ होगा।
बीजापुर के विधायक विक्रम मंडावी ने उद्योगपतियों के चुपके से बस्तर में प्रवेश करने पर मीडिया के सामने कुछ तथ्य लाये हैं. सैकड़ों एकड़ जमीन पर अब उद्योगपति गोयनका का कब्ज़ा हो चुका है! इधर आदिवासी आंदोलनों का यह पुराना डर है कि जब भी कोई बड़ा नक्सली चेहरा हटता है, उसके बाद कंपनियों की गतिविधियाँ बढ़ जाती हैं।
स्थानीय समुदाय में यह चर्चा आम है “हिडमा के रहते कोई भी ‘आसान खनन’ संभव नहीं था। अब क्या रुकावटें खत्म मानी जाएँ?”
राज्य सरकार या कंपनियों ने ऐसा कोई बयान नहीं दिया है, पर बस्तर में जंगल अपनी भाषा में खबरें लिखते हैं और वहाँ इस भाषा को हर नागरिक पढ़ लेता है।
क्या हिडमा अब ‘अमर’ हो चुका है?
माओवादी आंदोलन अपने मारे हुए नेताओं को प्रतीक बनाकर एक नई कथा गढ़ता है। पर इस बार फर्क यह है कि हिडमा को पहले ही बस्तर के एक बड़े हिस्से में चाहे विवादित रूपों में ही सही एक स्थानीय पहचान मिल चुकी थी।
कई विशेषज्ञ और वरिष्ठ पत्रकार आशंका जताते हैं कि उसकी मौत के बाद नए स्थानीय कमांडरों को “हिडमा मॉडल” अपनाने की प्रेरणा मिल सकती है. उसकी कथा को आंदोलन वैचारिक पूंजी के रूप में उपयोग कर सकता है और बस्तर में एक नया, अधिक स्थानीयकृत विद्रोह रूप ले सकता है यानी सवाल यह है कि क्या हिडमा को खत्म करके नक्सलवाद का एक अध्याय बंद हुआ, या एक नया अध्याय खुल गया?
क्या दरभा घाटी ऑपरेशन में हिडमा को जानबूझकर घसीटा गया?
स्थानीय राजनीतिक हलकों और कुछ सुरक्षा विश्लेषकों में यह चर्चा है कि हिडमा की कथित मुठभेड़ की कहानी साफ़ नहीं है। दरभा घाटी ऑपरेशन का रहस्य यह प्रश्न उठाता है
क्या हिडमा वहाँ था भी?
क्या उसे नाम मात्र से जोड़कर राजनीतिक संदेश गढ़ा गया?
या यह उस वैक्यूम को जल्द-से-जल्द भरने की रणनीति थी जिसे राज्य बनाना चाहता था?
पुष्ट उत्तर किसी के पास नहीं। पर सवाल हवा में हैं और बस्तर की राजनीति में सवाल अक्सर ही जमीन की सच्चाई बन जाते हैं।
क्या बस्तर एक नए अनिश्चित भविष्य में प्रवेश कर चुका है?
हिडमा की मौत सिर्फ एक सुरक्षा-घटना नहीं है।
यह बस्तर के इतिहास और भू-राजनीति में एक गहरे परिवर्तन की दस्तक है।क्या नया विद्रोह जन्म लेगा?
क्या विकास और कॉर्पोरेट प्रवेश की गति बढ़ेगी?
क्या हिडमा एक नया प्रतीक बनकर उभरेगा? या क्या बस्तर एक बार फिर अपने अंदर की आग को दबाकर चुप बैठ जाएगा? इन सवालों का उत्तर आने वाले महीनों में बस्तर स्वयं लिखेगा।और बस्तर हमेशा अपनी कहानी बहार के शहरों से नहीं—जंगलों के बीच, पहाड़ियों की खामोशी और छोटे-छोटे गाँवों की धीमी फुसफुसाहटों में लिखता है।

