मंत्रिमंडल विस्तार : अवसर या असंतोष का बीज?

छत्तीसगढ़ में मंत्रिमंडल विस्तार की घोषणा आखिरकार हो गई है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने राज्यपाल को सूची सौंप दी है और अब नए मंत्री शपथ लेने वाले हैं। यह प्रक्रिया जितनी प्रशासनिक मजबूरी है, उतनी ही राजनीतिक परीक्षा भी।
बीते कुछ महीनों से सत्ता गलियारों में जो खिचड़ी पक रही थी, वह साफ़ दिखाती है कि भाजपा नेतृत्व के सामने असली चुनौती संतुलन और समीकरण की है। आदिवासी, पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति और महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाना भी ज़रूरी है, साथ ही पुराने दिग्गजों और नये चेहरों के बीच तालमेल बैठाना भी। सवाल यह है कि क्या मुख्यमंत्री और संगठन इन सबके बीच वह “सोने की सुई” खोज पाएंगे, जिससे सब संतुष्ट हो जाएं?
कांग्रेस पहले ही हमलावर है। विपक्ष का कहना है कि भाजपा केवल सत्ता का बँटवारा कर रही है, जनता के मुद्दों पर कोई ठोस कार्ययोजना नहीं दिख रही। महंगाई, बेरोज़गारी और किसानों की समस्याएँ जस की तस हैं। ऐसे में मंत्रिमंडल विस्तार पर जनता की नज़र यही देखने पर होगी कि क्या यह कदम जनहितकारी नीतियों को मजबूत करेगा या केवल राजनीतिक समीकरण साधने के लिए है।
यह भी सच है कि भाजपा के भीतर भी असंतोष का खतरा टलने वाला नहीं है। दर्जनों विधायक मंत्री पद की उम्मीद लगाए बैठे थे, लेकिन कुर्सियों की संख्या सीमित है। जिनके हाथ खाली रहेंगे, उनके भीतर असंतोष का ज्वालामुखी फूट सकता है। यह सरकार की स्थिरता और संगठन की एकजुटता पर असर डाल सकता है।
जनता की नज़र अब इस पर है कि क्या नए मंत्री केवल फोटो खिंचवाने और बयानबाज़ी तक सीमित रहेंगे, या फिर वे अपनी कार्यशैली से प्रदेश की दिशा बदलने का दमखम दिखाएंगे। आखिरकार, मंत्री पद जनता की सेवा का अवसर है, न कि राजनीतिक रसूख बढ़ाने का मंच।
छत्तीसगढ़ में यह मंत्रिमंडल विस्तार भाजपा सरकार की कसौटी बनने वाला है। यदि यह विस्तार जनहित के ठोस फैसले लाता है तो जनता इसे सराहेगी, लेकिन अगर यह केवल “कुर्सी बाँटने की कवायद” बनकर रह गया, तो जनता इसे याद भी रखेगी और हिसाब भी मांगेगी।