दक्षिण 24 परगना में कड़ा मुकाबला: कमल खिलेगा या जोड़ा फूल करेगा कमाल?

कोलकाता। बंगाल की खाड़ी से सटे दक्षिण 24 परगना का भूगोल जितना समृद्ध है, उतना ही संघर्षपूर्ण भी। एक ओर गंगा का विस्तार, दूसरी तरफ सुंदरबन के मैंग्रोव जंगल और बीच में समुद्री तूफानों की मार झेलता जनजीवन—यह इलाका सिर्फ प्राकृतिक विविधता ही नहीं, बल्कि लगातार चुनौतियों का भी प्रतीक है। ‘आयला’ और ‘अम्फान’ जैसे चक्रवातों ने यहां की अर्थव्यवस्था और लोगों की जिंदगी को बार-बार झकझोरा है, जिससे उबरने से पहले ही नई मुश्किलें सामने खड़ी हो जाती हैं।
ऐसे हालात में यहां का चुनावी मुकाबला केवल सत्ता परिवर्तन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि विकास, आपदा प्रबंधन और सामाजिक समीकरणों की कसौटी भी बन जाता है। कभी वामपंथ का मजबूत किला रहा यह जिला अब पूरी तरह तृणमूल कांग्रेस के प्रभाव में नजर आता है। पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने सतगछिया से लंबे समय तक प्रतिनिधित्व किया था, लेकिन वर्तमान में राजनीतिक तस्वीर बदल चुकी है।
करीब 90 लाख की आबादी और 31 विधानसभा सीटों वाले इस जिले में 2021 के चुनावों में तृणमूल कांग्रेस ने जबरदस्त प्रदर्शन करते हुए 30 सीटों पर कब्जा जमाया था। भाजपा यहां दूसरे स्थान पर रही, जबकि भांगड़ सीट पर इंडियन सेक्युलर फ्रंट के नौशाद सिद्दीकी ने जीत दर्ज कर अलग पहचान बनाई।
डायमंड हार्बर इस जिले की राजनीति का केंद्र बनकर उभरा है। यहां तृणमूल नेता अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व में किए गए विकास कार्यों को ‘डायमंड हार्बर मॉडल’ के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। कोविड काल में राहत कार्य और स्वास्थ्य शिविरों के जरिए पार्टी ने अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश की है।
वहीं भांगड़ क्षेत्र में मुकाबला दिलचस्प बना हुआ है, जहां आईएसएफ के नौशाद सिद्दीकी और तृणमूल के शौकत मोल्ला आमने-सामने हैं। जिले में 40 प्रतिशत से अधिक मुस्लिम आबादी होने के कारण यह वोट बैंक चुनावी नतीजों में अहम भूमिका निभाता है। मतदाता सूची में हालिया संशोधन और नाम कटने का मुद्दा भी यहां चर्चा में है।
सुंदरबन के कई हिस्सों में आज भी 2009 के ‘आयला’ तूफान के असर दिखाई देते हैं। खारे पानी से प्रभावित खेती, कमजोर बांध, पेयजल की कमी और रोजगार के सीमित अवसरों ने लोगों को पलायन के लिए मजबूर किया है। इन समस्याओं को लेकर विपक्ष तृणमूल पर सवाल उठा रहा है, जबकि सत्ताधारी पार्टी केंद्र सरकार पर सहयोग न मिलने का आरोप लगाती है।
शहरी क्षेत्रों में भी चुनावी मुद्दे अलग हैं। बेहाला, महेशतल्ला और बजबज जैसे इलाकों में उद्योगों का बंद होना, खासकर जूट मिलों की स्थिति, बेरोजगारी और आधारभूत सुविधाओं की कमी लोगों की चिंता का कारण है। शिक्षा भर्ती घोटाले से जुड़े विवाद ने भी सियासी माहौल को प्रभावित किया है, जहां तृणमूल को अपनी छवि सुधारने की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है।
सोनारपुर दक्षिण और टालीगंज जैसे इलाकों में भी दिलचस्प मुकाबले देखने को मिल सकते हैं। यहां विकास बनाम बदलाव का सवाल मतदाताओं के सामने है। कुल मिलाकर, दक्षिण 24 परगना में चुनावी लड़ाई केवल दलों के बीच नहीं, बल्कि उम्मीदों, चुनौतियों और भविष्य की दिशा तय करने की जंग बन गई है।



