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संपादकीय

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08-March-2018 6:38:37 am
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लड़की होने पर गर्व करूँ या ?

आज सारी दुनिया महिला दिवस मना रही है और लड़की होने के नाते शायद मुझे भी ये दिन मनाना चाहिए पर मै नहीं मना पा रही इस दिन को | मन में सवालों का बवंडर घूम रहा है की आज मै लड़की होने पर गर्व करूँ या लड़की होने पर उदास होऊं? भगवान् ने इतनी खुबसुरत चीज बनाई है वो है औरत ,जिससे ये सारी दुनिया बनी है | ये ना हो तो इन्सान जाती ही ना हो | हम औरत को कितने ही रूपों में देखते है कभी माँ, बहन, नानी, चाची, पत्नी , बेटी, भाभी और भी ना जाने कितने रूप है औरत के | यहाँ तक की औरत को पूजा भी जाता है सारे स्थानों में माँ का स्थान सबसे ऊपर रखा गया है | तो आज सबसे ज्यादा रेप क्यूँ हो रहें है, पुरुष को ये सब करते समय उसे ध्यान क्यूँ नहीं आता की वो भी इसी औरत से बना है जिस माँ की कोख से पैदा हुआ है उसी औरत के साथ रेप कैसे कर सकता है ?भले ही वो जिसके साथ गलत कर रहा है वो बेशक उसकी माँ , बहन, बेटी ना हो पर है तो उन्ही मेसे एक ? फिर भी उसकी रूह नहीं कापती किसी औरत के साथ गलत करते वक्त ?

 आज मेरे इस आर्टिकल में क्या लिखूं ये समझ नहीं आरहा महिलाओं की तारीफ़ लिखूं या उनके साथ हो रहे अपमान को लिखूं या दूसरों की तरह मै भी महिलाओं की वीरता के किस्से लिखूं ? मै आप सब से एक सवाल पूछना चाहती हूँ की क्या औरत केवल एक दिन के सम्मान के काबिल है ?क्या हमें एक ही दिन औरत का  सम्मान करना चाहिय या हर दिन ?कुछ पति ये कह कर इस दिन पत्नियों को आराम देते है या देंगें की आज का दिन आप का है ये आप एक दिन करने का सोच रहे हो तो ये आप हर रोज भी तो कर सकते हो |एक दिन आराम देने और एक दिन गिफ्ट देने से औरत का सम्मान हो जाता है क्या ? क्या है औरत का असली सम्मान ये हमें सोचना चाहिए ?

 आज औरतें अपने ही घर में मैह्फुस नहीं है | आज एसा माहौल है की कोई दूर का नहीं बल्कि कोई अपना ही हमारे पर बुरी नजर गडाये रहता है, हम अपनी बच्चियों को भी घर में अपनों के पास छोड़ नहीं सकते | मैने  सोशल मीडिया में 26  फरवरी 2018 को उतरप्रदेश के मुजफ्फरनगर एक खबर पड़ी की एक बहन ने अपनी ही  16 साल की बहन को किसी बहाने से एक खाली घर में ले गई जहाँ उसका 22 साल का भाई पहले से ही मौजूद था और जब वो लड़की वहां पहुची तो उसका भाई उसके साथ रेप किया और जो उस लड़की की बहन थी जिसने उसे वहा बहला के लाइ थी वो उसका वीडियो बना रही थी फ़िलहाल ये दोनों भाई बहन फरार है |एक और खबर थी की जो 7 मार्च 2018 कोलकत्ता ही की है जहां एक 3 साल लड़की के साथ एक खाली बस में एक आदमी ने दरिंदागी की जब वो उस लड़की का रेप कर रहा था तो उस लड़की का भाई दरवाजे में खड़े हो कर अपनी बहन को छोड़ देने की मिन्नतें कर रहा था | जब उसने ये सारी बातें अपनी माँ को बताई तो उसकी माँ जब वहां पहुची तो बच्ची के शारीर से खून बह रहा था और जब उस मासूम को अस्पताल ले जाया गया तो उसकी हालत नाजुक बताई है | एसी ही कई खबरे हम रोज अखबार और टेलीविसन में पड़ते और सुनते है | ये सब केवल भारत में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में देखते है की औरत के साथ हमेशा ही गलत होता है |

आज हम बड़े गर्व से कहतें है की आज हम मर्दों के साथ कदम से कदम मिला के चल रहे है पर ये भी सच है की हम कितना भी आगे निकल गयें हों पर आज भी हमारी इज्जत दाव पर लगी रहती है हम आज भी अकेले जाने में अपने आप को सहज महसूस नहीं समझते है और ना ही हमारे घर वाले | अब ये सब पड़ने के बाद आप खुद सोचें की क्या वाकई में हमें इस दिन को सैलीब्रेट करना चाहिए या नहीं ?

आज वक्त है लड़कियों पर हम जो रोक टोक लगाते है वो रोक टोक अब हम लड़कों पर लगायें , उनकी हर बातों पर ध्यान दें की वो क्या कर रहें है, आज लड़कियों को नहीं लड़कों को कहें की शाम के घर से बाहर ना जायें, आधी रात तक बाहर ना रहे क्यूँ की जो भी आज हो रहा है लड़कियों के साथ उसके जिमेदार लड़के ही है और उनकी ये मानसिकता की हम पुरुष हैं कुछ भी कर सकतें है ये हमारी मर्दानगी है और इस सोच को बढावा हमने ही दिया है | हमने ही इन पुरुषों को इतनी छुट दे रखी है की वो कुछ भी करेगा तो हम ही उसे लड़का है करके माफ़ कर देंगें और सारा इल्जाम लड़की पर ही डाल देते है | जब तक इस मानसिकता को नहीं बदलेंगें तब तक लड़कियों के साथ गलत ही होता रहेगा और ये सब कौन बदलेगा ? इन सब को हमने ही बढावा दिया है तो हम ही इसको बदल सकते है अपनी मानसिकता को बदल कर और बच्चों को अच्छी सिख दे कर |

मै आज के दिन की विरोधी नहीं हूँ मैं भी इस दिन को ख़ुशी और गर्व के साथ मनाना चाहती हूँ औरत होने पर घमंड करना चाहती हूँ जो चीज मुझमे है वो पुरषों में नहीं इसपर इतराना चाहती हूँ पर साथ-साथ आप सब को यहीं कहना चाहती हूँ की अपनी सुरक्षा के लिए आत्म रक्षा की शिक्षा हर लड़की को लेनी चाहिए ताकि वो हर जगह अपनी रक्षा खुद कर सके और कोई भी हमारे संस्कार और हमारे पहनावे पर ऊँगली ना उठा सके | हम लोगों को और उनकी सोच को नहीं बदल सकते पर खुद को तो बदल सकतें है | 

वर्षा बी गलपांडे 

 

 

 


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