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संपादकीय

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30-June-2017 4:54:48 pm
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पर्यावरण और इंसानी सोच (बस एक नजर में )

  बचपन में हमारे दादा-दादी,नाना-नानी हमें विभिन्न  प्रकार की कहानियां सुनाते थे,किस्से सुनाते थे, किवदंतियां सुनाते थे, इसमें यह स्थापित करने की कोशिश होती थी कि एक स्वर्ग होता है और एक नरक होता है तथा यह समझाने की भी कोशिश होती थी कि यदि आप अच्छे काम करेंगे तो स्वर्ग में जाएंगे और गलत काम करेंगे तो नरक में जायेंगे।इसके लिए स्वर्ग में स्थापित आनंद की सारी खूबियों का बखूबी वर्णन किया जाता था और नर्क के अंदर कितने भयंकर कष्ट होते हैं उसका वर्णन करते हुई कहानी सुनाई जाती थी। नतीजन जो कहीं ना कहीं हमारे  मन मस्तिष्क में स्वर्ग व नरक की कल्पना स्थापित हो ही जाती है। जिसका असर ताह उम्र इंसान के जीवन मे  कम या अधिक बना ही रहता है। 

    जैसे जैसे हम बड़े होते जाते है समझ बढ़ती है जिससे हममे अपनी तर्क संगत बात लोगो के सामने रखने की क्षमता आने लगती है। एक उम्र के पड़ाव के बाद इंसान को उसका अनुभव ही सीखा जाता है की इस ब्रम्हांड में कोई भी ऐसी जगह प्रकृति के द्वारा स्थापित नहीं है जिसे स्वर्ग और नरक कहा जा सके। 

हर इंसान अपने व्यवहार, आचरण, बोलचाल, चाल- चलन और अपनी सोच से ही इस ब्रम्हांड में अपने लिए और अपने समाज के लिए स्वर्ग और नरक स्थापित करता जाता है।

इंसान की जितनी सोच  स्वार्थ आधारित होगी उतने ही हम इस पृथ्वी को नरक बनाने के करीब ले जाने के जिम्मेदार होंगे तथा दूसरी ओर हमारी जितनी सोच समाजिक व  व्यापक होगी उतने ही हम स्वर्ग को स्थापित करने में भागीदार की भूमिका में होंगे।

इस पृथ्वी के पर्यावरण से ही स्वर्ग और नरक स्थापित होता है। जितना हम अपने जीवन को प्रकृति के करीब रखते हुए पर्यावरण की रक्षा करने का संकल्प अपने दिलों दिमाग में स्थापित कर पाएंगे उतने ही पैमाने में  इंसान इस पृथ्वी को स्वर्ग के करीब तथा नरक से दूरी बनाने में सफल होगा।

अपने चारों तरफ हरियाली  की चादर, चिड़ियों का चहकना, कोयल की मन मोह लेने वाली आवाज को सुनना, नीलकंठ का दिखना, मोरो को नाचते हुए देखना, रंगबिरंगी फूलो का खिलना और उसकी महक, भौरों की गुंजन,जुगनुओं को जगमगाहट, रंगबिनरंगी तितलियों को उड़ते देखना,पहाड़ियों से पानी को गिरते हुए देखना,झील से,जंगलो से प्राकृतिक सौंदर्य की अनुभूति प्राप्त करना किसे अच्छा नही लगता। 

 सभी मन से चाहते है ऐसा ही वातावरण अपने चारों तरफ हो,तभी तो ऐसे ही वातावरण की चाहत में इंसान सपरिवार या दोस्तो के साथ जाता है कुछ दिनों की छुट्टियां मानने ,ऐसे ही किसी कल्पनाशील जगह की तलाश कर जहाँ पर वह कुछ दिन प्रकृति के करीब रहकर उसका भरपूर आनंद ले सके,वह भी भारी भरकम पैसों को खर्च कर।

पृथ्वी में बसे हर इंसान को यह सोचना चाहिए जिस प्राकृतिक वातावरण के चाहत के लिए वह भटकता है उसे अपने आसपास भी तो बना सकता है,कम पैसों को खर्च कर, उसके लिए उसे केवल अपनी सोच के साथ अपनी दिनचर्या भी  बदलनी होगी तभी जाकर बड़ी कठिन तपस्या के बाद हम सब लोग यकीनन ऐसा ही वातावरण अपने आस पास प्राप्त कर सकते है।

  हमेशा सरकार की ओर मुंह नही ताकना चाहिए हमे भी आगे बढ़ कर इस दिशा में कुछ ठोस कदम उठाने होंगे स्वार्थवश ही सही, क्योकि अपने आसपास जो भी वातावरण होगा उसका सीधा असर हमारी जीवन पर ही पड़ता है किसी सरकार के नही। अपने लिए ना सही अपनी आने आने वाली पीढ़ी के लिए तो हम इसकी नीव रख कर जा ही सकते है।

रवि तिवारी 
 


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