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विशेष

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14-February-2019
Posted Date

नरवा घुरवा गरुवा बारी कितनी होगी सार्थक पहल सरकारी,

 धान का कटोरा कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ की पहचान बतौर धरा का सम्मान है जिसकी संपूर्ण जीवन शैली खेत खलिहान नदिया तालाब कोला बारी और गाय भैंस बैल पशु धन के रुप मे है किन्तु कटु सत्य यह है कि बदलते समय के साथ राज्य के पहचान की भरपूर उपेक्षा हुई, बेरोजगारी से कभी अंजान यह राज्य आज इन्ही आयामों की उपेक्षा की वजह से खाली हाथ और मुंह ताकता नजर आ रहा है रोजगार के नाम पर महज सरकारी नौकरी एवं उद्योगों की मोहताज बन चुके छत्तीसगढ़ मे युवाओं को छलावा के सिवाय कुछ नही मिल रहा है और धीरे धीरे यह परिस्थिति यहां की नियति बनती जा रही है ऐसी बात नही है कि इस दिशा मे प्रयास नही हुए है किन्तु यह प्रयास इस शैली मे रही कि बचा खुचा लगाव भी खत्म हो गया,
 
मुआवजा और मुनाफाखोरी
 खेती के उन्नयन के नाम पर अब तक केवल मुआवजे एवं खैरात का ही प्रावधान बना है कभी भी कृषि को वैश्विक पटल पर सम्मान जनक स्थान दिलाने की कोशिश नही हुई  जिसके चलते अधिक फसल हुई तो पानी के भाव उपज बिकने और कम फसल हुई तो अभाव का रोना आज भी बरकरार है उसी तरह प्रमुख पशुधन के लिए सरकार की नीति गायों के मौत की वजह बनती गयी और दर्दनाक कारण बनी गौसेवा मे भ्रष्टाचार और मुनाफाखोरी की प्रवृत्ति का चलन,
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समाज मे पड़ा दुष्प्रभाव 
सरकार की इस अव्यवस्थित नीति का प्रभाव समाज पर भी पड़ा क्योंकि इन कार्यों मे लगे हुए लोगों का अपना प्रभामंडल था और जैसे कि भगवान श्रीकृष्ण ने गीता मे कहा है कि प्रभावशाली का अनुकरण समाज करता है बस उसी तर्ज पर कृषि और गाय उपेक्षित होती गयी तथा ऐनकेन प्रकारेण धन प्राप्ति की अभिलाषा बलवती होती गयी तथा गायों की दुर्दशा पर दुख व्यक्त करने का भाव भी लोपित होता गया, अभी कुछ समय पूर्व भाटापारा के ग्राम कोदवा गौशाला मे लगभग 185गायों की मौत मे भाटापारा जैसे धार्मिक आयोजनों के शहर मे गहन चुप्पी इसका ज्वलंत उदाहरण है
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सरकार पर उठते सवाल
 भाटापारा क्षेत्र मे हुई गायों की मौत का दर्दनाक हादसा एक तरह से छत्तीसगढ़ की ग्राम्य विथा को गहरा आघात पहुँचाने वाली घटना है उस पर सभी की चुप्पी तथा सरकार की इस दिशा मे उदासीनता सीधे तौर पर सरकार की भावी योजनाओं पर सवाल खड़ा करती है कि छत्तीसगढ़ की पहचान कहे जाने वाले नरवा घुरवा गरुवा बारी जैसी मर्म भरी योजनाओं के साथ सरकार कितना न्याय कर पायेगी जबकि माहौल सीधे इसके उलट है|, बजट की समीक्षा के दौर मे कडार के किसान संतोष सेन जैसे कई लोगों द्वारा इसी तरह का सवाल उठाया गया कि क्रियान्वयन मे कितनी सुचिता बरती जाएगी जिसका सीधा तौर पर यही मतलब है कि पूर्व मे इस तरह की योजनाओं का बुरा हश्र क्रियान्वयन मे खामी और पारदर्शिता के अभाव के चलते हुआ था इसी कड़ी मे जनमानस की पुनः मांग है | कि इस दिशा मे गंभीरता एवं पर्याप्त संवेदना की आवश्यकता है और कोदवा जैसी घटनाओं मे शिथिलता एक तरह से उन्ही हौसलों को बुलंद करेगी जो इसमे सेवा नही महज लाभ देखतें है और उसके लिए कुछ भी करने को तैयार रहते है भले ही उस विधा की दुर्गति हो जाये, इसलिए इस पर लगाम कसने ऐसी घटनाओं पर त्वरित तत्परता एवं कठोर कार्यवाही की दरकार है जिससे समाज मे यह संदेश जाए की छत्तीसगढ़ की अस्मिता कितनी अहम है वरन इसके अभाव मे योजनाओं का खेल चलता रहेगा और ढाक के तीन पात की दशा बरकरार रहेगी|


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