ज्योतिष

घिवरा मंदिर महोत्सव रद्द, विश्व शांति के लिए हवन का आयोजन

@BBN24 हेमंत जायसवाल / जांजगीर-चांपा -संपूर्ण विश्व में कोरोना वायरस के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए हर सार्वजनिक आयोजन को रद्द कर दिया गया है,जांजगीर-चांपा जिले में भी कलेक्टर द्वारा 144 लागू कर दिया गया है,इसी कड़ी में चैत्र वासंती नवरात्र पर्व पर आयोजित घिवरा मंदिर मेला महोत्सव को भी रद्द कर दिया गया है।आज बिर्रा पुलिस थाना स्टाफ जय मां डोकरी दाई मंदिर समिति से मुलाकात कर लोगों को समझाइश दी।अब नवरात्रि पर मंदिर में सिर्फ ज्योति कलश प्रज्जवलित होंगे एवं शासन के नियमानुसार तीन से अधिक लोगों की उपस्थिति नहीं रहेगी।। वहीं आज डोकरी दाई मंदिर में विश्व शांति के लिये हवन-पूजन भी किया गया।।

Aaj Ka Panchang : पढ़ें 15 मार्च का पंचांग : राहुकाल के दौरान न करें कोई शुभ कार्य,

श्री शीतला सप्तमी। सूर्य उत्तरायण। सूर्य दक्षिण गोल। वसंत ऋतु। सायं 4 बजकर 30 मिनट से 6 बजे तक राहुकालम्। 15 मार्च 2020, रविवार 25 फाल्गुन (सौर) शक 1941, 1 चैत्र मास प्रविष्टे 2076, 19 रजब सन् हिजरी 1441, चैत्र कृष्णपक्ष सप्तमी रात्रि 3 बजकर 20 मिनट तक उपरांत अष्टमी, अनुराधा नक्षत्र प्रात: 11 बजकर 23 मिनट तक तदनंतर ज्येष्ठा नक्षत्र, वज्र योग सायं 3 बजकर 16 मिनट तक पश्चात सिद्धि (असृक) योग, विष्टि (भद्रा) करण सायं 3 बजकर 47 मिनट तक, चन्द्रमा वृश्चिक राशि में (दिन-रात)।

आज का शुभ मुहूर्तः

अभिजीत मुहूर्त सुबह 12 बजकर 23 मिनट से दोपहर 01 बजकर 11 मिनट तक होगा। रवि योग सुबह 06 बजकर 47 मिनट से सुबह 11 बजकर 24 मिनट तक। विजय मुहूर्त दोपहर 02 बजकर 48 मिनट से 03 बजकर 36 मिनट तक रहेगा। निशिथ काल मध्यरात्रि में 12 बजकर 23 मिनट से 01 बजकर 11 मिनट तक होगा। गौधूलि मुहूर्त शाम 06 बजकर 36 मिनट से शाम 07 बजे तक।

आज का अशुभ मुहूर्तः

राहुकाल सायं 04 बजकर 30 मिनट से 06 बजे तक। दोपहर 03 बजकर 48 मिनट से शाम 05 बजकर 18 मिनट तक गुलिक काल है। शाम 12 बजकर 47 मिनट से 02 बजकर 18 मिनट तक यमगंड रहेगा। भद्रा सुबह 06 बजकर 47 मिनट से दोपहर 03 बजकर 46 तक रहेगा।

जीवन जीने की कला सिखाने ,भागवत ज्ञान गंगा का आयोजन

जांजगीर चम्पा। दिनांक 12 मार्च 2020 मनोकामना दुर्गा मंदिर ग्राम नरियारा में सात दिवसीय आध्यात्मिक श्रीमद्भागवत गीता ज्ञान यज्ञ के आध्यात्मिक खुशहाल रहस्य द्वारा खुशहाल जीवन जीने की कला सिखाने हेतु राजयोगिनी ब्रम्हाकुमारी शशि प्रभा दीदी जी के सानिध्य में भगवत ज्ञान गंगा का आयोजन किया गया है जिसकी शुरुआत दिनांक 16 3 2020 से 22 3 2020 तक समय दोपहर 3:00 बजे से शाम 6:00 बजे तक रहेगाl जिसमें गीता ज्ञान के अद्भुत रहस्य का स्पष्टीकरण किया जाएगा इसकी शुरुआत शोभायात्रा से तथा महात्म्य गीता से किया जायेगा।मनोकामना दुर्गा मंदिर से कलश यात्रा दोपहर 1:00 बजे निकलेगी और जल यात्रा व पूजन कर कथा स्थान पर पहुंचेगी। तत्पश्चात गीता ज्ञान यज्ञ का शुभारंभ दोपहर 3:00 बजे से 6:00 बजे तक प्रतिदिन यह सात दिवसीय श्रीमद्भगवद्गीता ज्ञान यज्ञ का आयोजन किया जाएगा नरियारा ग्राम वासियों द्वारा समय पर कलश यात्रा व कथा श्रवण हेतू प्रयास जारी है। इस कार्यक्रम की रूपरेखा इस प्रकार से रहेगा प्रथम दिवस कलश शोभायात्रा व महात्मा कथा , द्वितीय दिवस आध्यात्मिक रहस्य का प्रकटीकरण, तृतीय दिवस कर्म, विकर्म, अकर्म का बोध एवं प्रहलाद प्रसंग, चतुर्थ दिवस परम सत्य का बोध ,पंचम दिवस सृष्टि का अनादि सत्य, कल्पतरु की कथा ष,्ठम दिवस राजयोग, उद्धव चरित्र , सुदामा चरित्र तथा सप्तम दिवस खुशहाल जीवन जीने हेतु संपूर्ण विधि विधान से हवन ,पूर्णाहुति सहस्त्रधारा, प्रसाद आदि किया जाएगा ब्रह्माकुमारी ज्ञाना बहन ने बताया कि इस आध्यात्मिक गीता ज्ञान यज्ञ हेतू ग्राम वासियों में असीम जिज्ञासा दिखाई दे रही है और बड़ी संख्या में लोगों का आगमन इस कार्यक्रम में होगा कार्यक्रम में बहुत सुंदर झांकियों का दृश्य भी देख पाएंगे।

श्री कृष्ण की पटरानियों में रुक्मणि महत्वपूर्ण स्थान रखती थी -आचार्य नरायण प्रसाद पांडेय जी

कोटमी सोनार। संतोषी मंदिर रहस बेड़ा के पास वार्षिक श्राद्ध के अवसर पर श्रीमद भागवत सप्ताह ज्ञान यज्ञ का आयोजन शुक्ला परिवार द्वारा किया जा रहा है ।कथा व्यास आचार्य श्री नरायण प्रसाद पांडेय जी कटौद वाले के द्वारा कथा का रसपान कराया जा रहा है कथा के छठवें दिवस पर आचार्य श्री ने रास प्रसंग, रूखमणी विवाह का कथा श्रवण कराते हुए द्वारका में रहते हुए भगवान श्रीकृष्ण और बलराम का नाम चारों ओर फैल गया। बड़े-बड़े नृपति और सत्ताधिकारी भी उनके सामने मस्तक झुकाने लगे। उनके गुणों का गान करने लगे। बलराम के बल-वैभव और उनकी ख्याति पर मुग्ध होकर रैवत नामक राजा ने अपनी पुत्री रेवती का विवाह उनके साथ कर दिया। बलराम अवस्था में श्रीकृष्ण से बड़े थे। अतः नियमानुसार सर्वप्रथम उन्हीं का विवाह हुआ। उन दिनों विदर्भ देश में भीष्मक नामक एक परम तेजस्वी और सद्गुणी नृपति राज्य करते थे। कुण्डिनपुर उनकी राजधानी थी। उनके पांच पुत्र और एक पुत्री थी। उसके शरीर में लक्ष्मी के शरीर के समान ही लक्षण थे। अतः लोग उसे लक्ष्मीस्वरूपा कहा करते थे। रुक्मिणी जब विवाह योग्य हो गई, तो भीष्मक को उसके विवाह की चिंता हुई। रुक्मिणी के पास जो लोग आते-जाते थे, वे श्रीकृष्ण की प्रशंसा किया करते थे। वे रुक्मिणी से कहा करते थे, श्रीकृष्ण अलौकिक पुरुष हैं। इस समय संपूर्ण विश्व में उनके सदृश अन्य कोई पुरुष नहीं है। भगवान श्रीकृष्ण के गुणों और उनकी सुंदरता पर मुग्ध होकर रुक्मिणि ने मन ही मन निश्चय किया कि वह श्रीकृष्ण को छोड़कर किसी को भी पति रूप में वरण नहीं करेगी। उधर, भगवान श्रीकृष्ण को भी इस बात का पता हो चुका था कि विदर्भ नरेश भीष्मक की पुत्री रुक्मिणी परम रूपवती तो है ही, परम सुलक्षणा भी है। भीष्मक का बड़ा पुत्र रुक्मी भगवान श्रीकृष्ण से शत्रुता रखता था। वह बहन रुक्मिणी का विवाह शिशुपाल से करना चाहता था, क्योंकि शिशुपाल भी श्रीकृष्ण से द्वेष रखता था। भीष्मक ने अपने बड़े पुत्र की इच्छानुसार रुक्मिणी का विवाह शिशुपाल के साथ ही करने का निश्चय किया। उसने शिशुपाल के पास संदेश भेजकर विवाह की तिथि भी निश्चित कर दी। रुक्मिणी को जब इस बात का पता लगा, तो वह बड़ी दुखी हुई। उसने अपना निश्चय प्रकट करने के लिए एक ब्राह्मण को द्वारिका श्रीकृष्ण के पास भेजा। उसने श्रीकृष्ण के पास जो संदेश भेजा था, वह इस प्रकार था—‘हे नंद-नंदन! आपको ही पति रूप में वरण किया है। मै आपको छोड़कर किसी अन्य पुरुष के साथ विवाह नहीं कर सकती। मेरे पिता मेरी इच्छा के विरुद्ध मेरा विवाह शिशुपाल के साथ करना चाहते हैं। विवाह की तिथि भी निश्चित हो गई। मेरे कुल की रीति है कि विवाह के पूर्व होने वाली वधु को नगर के बाहर गिरिजा का दर्शन करने के लिए जाना पड़ता है। मैं भी विवाह के वस्त्रों में सज-धज कर दर्शन करने के लिए गिरिजा के मंदिर में जाऊंगी। मैं चाहती हूं, आप गिरिजा मंदिर में पहुंचकर मुझे पत्नी रूप में स्वीकार करें।श्री कृष्ण के पटरानियों में रूखमणी की महत्वपूर्ण स्थान रहती थी। कार्यक्रम में विजय शुक्ला, अशोक शुक्ला, अमित शुक्ला ,महेश्वर शुक्ला, गोविंदा शुक्ला, दीपक पांडेय, अभय शुक्ला, अंकित शुक्ला, अमन शुक्ला कार्यक्रम को सफल बनाने में लगे हुए है ।

संगीतमय श्रीमद भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है कोटमी सोनार में ।

कोटमी सोनार। संतोषी मंदिर रहस बेड़ा के पास वार्षिक श्रद्धा के अवसर पर श्रीमद भागवत सप्ताह ज्ञान यज्ञ कथा आयोजन शुक्ला परिवार द्वारा किया जा रहा है । कथा व्यास आचार्य श्री नरायण प्रसाद पांडेय जी कटौद वाले के द्वारा कथा का रसपान कराया जा रहा है । कथा के पांचवें दिवस पर आचार्य श्री ने कृष्ण बाललीला ,गोवर्धन पूजा की कथा श्रवण कराते हुए बताये की हिन्दुओं के प्रसिद्ध त्योहार दीपावली के अगले दिन, कार्तिक शुक्ल पक्ष प्रतिपदा को गोवर्धन पूजन, गौ-पूजन के साथ-साथ अन्नकूट पर्व भी मनाया जाता है। इस दिन प्रात: ही नहा धोकर, स्वच्छ वस्त्र धारण कर अपने इष्टों का ध्यान किया जाता है। इसके पश्चात् अपने घर या फिर देव स्थान के मुख्य द्वार के सामने गोबर से गोवर्धन पर्वत बनाना शुरू किया जाता है। इसे छोटे पेड़, वृक्ष की शाखाओं एवं पुष्प से सजाया जाता है। पूजन करते समय निम्न श्लोक कहा जाता है- गोवर्धन धराधार गोकुल त्राणकारक। विष्णुबाहु कृतोच्छाय गवां कोटिप्रदो भव। भगवान श्रीकृष्ण अपने सखाओं और गोप-ग्वालों के साथ गाय चराते हुए गोवर्धन पर्वत पर पहुँचे तो देखा कि वहाँ गोपियाँ 56 प्रकार के भोजन रखकर बड़े उत्साह से नाच-गाकर उत्सव मना रही हैं। श्रीकृष्ण के पूछने पर उन्होंने बताया कि आज के दिन वृत्रासुर को मारने वाले तथा मेघों व देवों के स्वामी इन्द्र का पूजन होता है। इसे इन्द्रोज यज्ञ कहते हैं। इससे प्रसन्न होकर इन्द्र ब्रज में वर्षा करते हैं और जिससे प्रचुर अन्न पैदा होता है। श्रीकृष्ण ने कहा कि इन्द्र में क्या शक्ति है? उससे अधिक शक्तिशाली तो हमारा गोवर्धन पर्वत है। इसके कारण वर्षा होती है। अत: हमें इन्द्र से भी बलवान गोवर्धन की पूजा करनी चाहिए। बहुत विवाद के बाद श्रीकृष्ण की यह बात मानी गई तथा ब्रज में इन्द्र के स्थान पर गोवर्धन की पूजा की तैयारियाँ शुरू हो गईं। सभी गोप-ग्वाल अपने-अपने घरों से पकवान लाकर गोवर्धन की तराई में श्रीकृष्ण द्वारा बताई विधि से पूजन करने लगे। श्रीकृष्ण द्वारा सभी पकवान चखने पर ब्रजवासी खुद को धन्य समझने लगे। नारद मुनि भी यहाँ इन्द्रोज यज्ञ देखने पहुँच गए थे। इन्द्रोज बंद करके बलवान गोवर्धन की पूजा ब्रजवासी कर रहे हैं, यह बात इन्द्र तक नारद मुनि द्वारा पहुँच गई और इन्द्र को नारद मुनि ने यह कहकर और भी डरा दिया कि उनके राज्य पर आक्रमण करके इन्द्रासन पर भी अधिकार शायद श्रीकृष्ण कर लें। इन्द्र गुस्से में लाल-पीले होने लगे। उन्होंने मेघों को आज्ञा दी कि वे गोकुल में जाकर प्रलय पैदा कर दें। ब्रजभूमि में मूसलाधार बरसात होने लगी। बाल-ग्वाल भयभीत हो उठे। श्रीकृष्ण की शरण में पहुँचते ही उन्होंने सभी को गोवर्धन पर्वत की शरण में चलने को कहा। वही सबकी रक्षा करेंगे। जब सब गोवर्धन पर्वत की तराई मे पहुँचे तो श्रीकृष्ण ने गोवर्धन को अपनी कनिष्ठा अंगुली पर उठाकर छाता-सा तान दिया और सभी को मूसलाधार हो रही वृष्टि से बचाया। सुदर्शन चक्र के प्रभाव से ब्रजवासियों पर एक बूँद भी जल नहीं गिरा। यह चमत्कार देखकर इन्द्रदेव को अपनी की हुई गलती पर पश्चाताप हुआ और वे श्रीकृष्ण से क्षमा याचना करने लगे। सात दिन बाद श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत नीचे रखा और ब्रजवासियों को प्रतिवर्ष गोवर्धन पूजा और अन्नकूट का पर्व मनाने को कहा। तभी से यह पर्व के रूप में प्रचलित है।

love राशिफल 18 फरवरी: पढ़े प्रेम के मामले में किन राशियों के सितारे हैं बलवान

मीन और वृश्चिक राशि, ज्योतिष शास्त्रों के अनुसार 18 फरवरी से मीन और वृश्चिक के सितारे बलवान रहेंगे। इससे इनके रिश्तों में मधुरता आ सकती हैं। इनके सपने साकार हो सकते हैं। लव पार्टनर का साथ इन्हे सफल और कामयाब बना सकता हैं। किसी यात्रा के दौरान लव पार्टनर से मुलाक़ात हो सकती हैं। इनकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो सकती हैं। हनुमान जी की कृपा इनके प्रेम जीवन पर बनी रहेगी।

मेष और धनु राशि, 18 फरवरी से प्रेम के मामले में मेष और धनु राशि के सितारे बलवान रहेंगे। जिससे इनके प्रेम संबंधों में मजबूती आ सकती हैं। इनके सपने साकार हो सकते हैं। इनके रिश्तों में मधुरता आ सकती हैं। प्रेमी प्रेमिका के बीच नजदीकियां बढ़ सकती हैं। इनके संबंधों में मधुरता आ सकती हैं। ये लोग दिल की बात कहने में सफल हो सकते हैं। हनुमान जी की उपासना करना इनके लिए शुभ रहेगा।

कुंभ और तुला राशि, ज्योतिष शास्त्र की बात करें तो 18 फरवरी से प्रेम के मामले में कुंभ और तुला राशि के सितारे बलवान रहेंगे। जिससे इन्हे सच्चा प्यार मिल सकता हैं। इस राशि के जातक प्यार में जीत हासिल कर सकते हैं। इन्हे चारों ओर से खुशखबरी मिल सकती हैं। इन्हे प्यार ही प्यार मिल सकता हैं। ये लोग एक सफल प्रेम जीवन एन्जॉय कर सकते हैं। इनके लिए हनुमान जी की आराधना करना लाभकारी साबित हो सकता हैं।

BBN24 : पढ़े महाशिवरात्रि का शुभ मुहूर्त, ऐसे करें शिव जी की पूजा मिलेगा मनचाहा वरदान

महाशिवरात्रि के दिन शिवजी  की पूजा की जाती है। इस बार महाशिवरात्रि 21 फरवरी को मनाई जाएगी और शिव पूजा की जाएगी। महाशिवरात्रि के दिन शिव अभिषेक कर उनसे मनोकामनाओं को पूरा करने का आशीर्वाद लिया जाता है।

मान्यताओं के अनुसार, इस दिन देवों के देव महादेव का विवाह हुआ था। इसलिये महादेव के साथ साथ मां पार्वती की पूजा भी इस दिन जरुर करें। कहा जाता है कि इस दिन भोलेनाथ का पूरी श्रृद्धा भाव से पूजा करने पर जीवन की कई समस्याएं खत्म हो जाती हैं। तो आइए जानते हैं महशिवरात्रि के दिन क्या करें क्या ना करें...

महाशिवरात्रि 21 फरवरी को शाम को 5 बजकर 20 मिनट से 22 फरवरी, शनिवार को शाम सात बजकर 2 मिनट तक रहेगा।
शैव संप्रदाय के अनुसार- 21 फरवरी को शिवरात्रि का पर्व मनाया जाएगा।
वैष्णवों द्वारा- 22 फरवरी को शिवरात्रि पर्व मनाई जाएगी।
शिव खप्पर पूजन- 23 फरवरी, अमावस्या के दिन

  • शिवरात्रि के दिन सुबह नहा धोकर मंदिर जाकर ओम नम: शिवाय मंत्र का जाप करना चाहिए।
  •  इसके बाद शिवलिंग पर शहद, पानी और दूध के मिश्रण से भोले शंकर को स्नान कराना चाहिए।
  •  स्नान कराने के बाद शिव जी पर बेल पत्र, धतूरा, फल और फूल भगवान शिव को अर्पित करें।
  • अंत में धूप और दीप जलाकर शिव जी की आरती करें।

शिवरात्रि पर भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए भगवान का रुद्राभिषेक किया जाता है। इस दिन भोले शिव को बेर चढ़ाना भी बहुत शुभ होता है। शिव महापुराण में कहा गया है कि इन छह द्रव्यों, दूध, योगर्ट, शहद,घी, गुड़ और पानी से भगवान शिव का रुद्राभिषेक करने से भगवान प्रसन्न होते हैं।

  •  शिव जी का जल से रुद्राभिषेक करने से जातक को शुद्धी मिलती है।
  • भगवान शिव का गु़ड़ से रुद्राभिषेक करने से व्यक्ति को खुशियां प्राप्त होती है।
  •  शिव जी का घी से रुद्राभिषेक करें, आपको हर कार्य में जीत हासिल होगी।
  • शिव जी का शहद से रुद्राभिषेक करना जातक को मीठी वाणी प्रदान करता है।
  •  भगवान शिव का दही से रुद्राभिषेक व्यक्ति को समृद्धि प्रदान करता है।

बिना किसी संत के जीवात्मा को परमात्मा स्वीकार नहीं करते- रामकृष्णाचार्य जी महाराज

*प्रतिभाशाली को कभी भी छोटा नहीं समझना चाहिए*

*जीवन में सफलता का सबसे बड़ा मंत्र सहजता ही है*

राजकुमारी जानकी ने धनुष टूट जाने के पश्चात राघव जी से कहा हे प्रभु इस समाज में जिस ने धनुष को तोड़ा वह तो विनम्रता से सिर झुकाए खड़ा है और जो इसे डिगा तक नहीं सके वे अभी भी अकड़ कर खड़े हैं आप कुछ समय और ऐसे ही खड़े रहें ताकि इन अभिमानीयों को शिक्षा मिले यह बातें निकुंज आश्रम श्रीधाम अयोध्या से पधारे हुए जगद्गुरु रामानुजाचार्य श्री स्वामी रामकृष्णाचार्य जी महाराज ने शिवरीनारायण मठ महोत्सव में राम कथा के रस पान करने के लिए भारी संख्या में उपस्थित श्रोताओं को संबोधित करते हुए व्यासपीठ की आसंदी से अभिव्यक्त की उन्होंने कहा कि रावण और बाणासुर जैसे महान योद्धा शिव धनुष को उठाना, तोड़ना तो बहुत बड़ी बात है तिल भर भूमि डिगा नहीं सके, तब दस हजार राजा एक साथ धनुष को उठाने लगे "भूप सहस दस एकहीं बारा, लगे उठावन टरहिं न टारा" कुछ लोग यह प्रश्न करते हैं कि दस हजार राजागण एक साथ धनुष को कैसे पकड़े होंगे याद रखना यह कोई साधारण धनुष नहीं भगवान शिव का धनुष है यह राजाओं को देखकर उनकी क्षमता के अनुसार भारित या हल्का हो जाता था यह धनुष जड़ नहीं चेतन है, राजाओं का जो समूह है वह तारों की तरह है और धनुष अंधकार की तरह *अहंकार शिव बुद्धि अज, मन शशि चित्त महान* शिव का धनुष अहंकार का प्रतीक है और अहंकार को कभी भी अहंकार तोड़ नहीं सकता उसे तो कोई विनम्र पुरुष ही तोड़ सकता है! सभी राजा श्रीहत हो गए अर्थात उनके चेहरे की कांति मलिन पड़ गई पूरे राजसभा में सन्नाटा छा गया, राजा जनक के हृदय में पीड़ा भर आया उन्होंने कहा *वीर विहीन महि मैं जानी* मैं समझ गया कि अब धरती वीरों से रहित हो गई है, वैदेही का विवाह ब्रह्मा ने लिखा ही नहीं है,हे राजाओं अपने -अपने घर को लौट जाओ मैं अपना प्रतिज्ञा छोड़ नहीं सकता अपने सुकृत पुण्य को जाने नहीं दूंगा, भले ही मेरी बेटी कुंवारी ही क्यों न रह जाए, जनक की बातों को सुनकर लक्ष्मण जी क्रोधित हो गए *कही जनक जस अनुचित बानी, विद्यमान रघुकुल मणि जानी* रघुकुल तिलक के समाज में रहते हुए कोई भी ऐसा अनुचित बानी कहने की साहस नहीं कर सकता जैसा जनक ने कहा है! उनके होंठ फड़कने लगे "जब मणि पर विपत्ति आती है तब फनी ही बोलता है" लक्ष्मण जी शेषनाग हैं उन्होंने एक को धनुष टूटने के पहले डांटा और दूसरे को धनुष टूटने के बाद। उन्होंने ज्ञानी जनक जी को भी डाटा और वीर परशुराम जी को भी कारण कि लक्ष्मण जी *रघुपति कीरति बिमल पताका* रघुनाथ जी की कीर्ति को फहराने वाले दंड के समान हैं, वे जीवों के आचार्य हैं जब कोई परमात्मा के विरुद्ध कार्य करता है तब वे उन्हें दंड देने से नहीं चूकते। लक्ष्मण जी की क्रोध से धरती डगमगाने लगी, लेकिन सीता जी के हृदय में प्रसन्नता छा गई वह जानती थी कि जब तक लक्ष्मण बोलेंगे नहीं तब तक रघुनाथ जी डोलेंगे नहीं, वह शांत ही रहेंगे कारण कि रामजी ब्रह्म हैं, उन्हें ना तो संसार में कुछ पाने की लालसा है और ना ही कुछ खोने की चिंता! जब तक किसी का जीवन बाँकी हो उसे तोड़ा नहीं जा सकता इसलिए विश्वामित्र जी समय की प्रतीक्षा कर रहे थे अभी धनुष का जीवन बाँकी था उचित समय आने पर विश्वामित्र ने राघव को आदेश दिया। याद रखना राजा जनक ज्ञानी हैं और जब ज्ञानी दुखित हो जाता है तब समाज का अहित होता है इसलिए मुनि विश्वामित्र ने कहा हे राम उठो धनुष का भंजन करो और हे तात जनक जी के हृदय की संताप को मिटाओ *सहज ही चले सकल जग स्वामी* संपूर्ण जगत के स्वामी साधारण चाल से सहजता पूर्वक चलने लगे, याद रखना आप जब समाज में आगे बढ़ जाओगे तब आपको आलोचना -समालोचना का सामना करना ही पड़ेगा, आप इन सभी के मध्य अपनी सहजता को बनाए रखना राम जी जब धनुष तोड़ने के लिए आगे बढ़े तब माता सुनैना व्याकुल हो गई उसने सोचा कि यह छोटा सा बालक धनुष कैसे तोड़ पाएगा ?इसे कोई समझाता क्यों नहीं है? तब उनकी सखीयों ने कहा- हे महारानी प्रतिभाशाली को कभी छोटा नहीं समझना चाहिए! एक छोटा सा दीपक कमरे का अंधकार दूर कर देता है। धनुष टूटने के पश्चात माता जानकी जय माला लेकर राघव के सामने उपस्थित हुई वह प्रेम से विहल हो गई है, उनसे प्रेम विवसता के कारण जय माला पहनाई नहीं जा रही थी रामचंद्र जी ने कहा हे राजकुमारी जयमाला पहनाओ तब सीता जी ने कहा प्रभु इस समाज में जिस ने धनुष को तोड़ा वह तो विनम्रता से सिर झुकाए हैं, और जो इसे तिल भर भूमि हिला तक न सके वह अभी भी अकड़ कर खड़े हैं आप कुछ समय ऐसे ही खड़े रहें ताकि अभिमानियों को शिक्षा मिले। धनुष अहंकार का प्रतीक है जब तक अहंकार रहता है तब तक भक्त और भगवान का मिलन हो ही नहीं सकता बिना किसी संत के जीवात्मा को परमात्मा स्वीकार नहीं करते *बिलासपुर विश्वविद्यालय के कुलपति उपस्थित हुए कथा श्रवण के लिए* शिवरीनारायण मठ महोत्सव अपने पूरे शबाब पर है लोगों का हुजूम उमड़ रहा है लोग दूर-दूर से बड़ी संख्या में सपरिवार आकर के भगवान की कथा को सुनकर अपना जीवन धन्य बना रहे हैं, इसी सिलसिले में अटल बिहारी वाजपेई विश्वविद्यालय बिलासपुर के कुलपति श्री जी डी शर्मा कथा सुनने के लिए उपस्थित हुए उनके साथ श्री लक्ष्मण प्रसाद मिश्र भी थे कुलपति ने व्यासपीठ का अभिवादन किया एवं आशीर्वाद प्राप्त की इस अवसर पर उन्होंने उपस्थित विशाल जनसमूह को संबोधित करते हुए कहा कि यहां आकर शिक्षा की पद्धति पर विचार करने का मन करता है हम लोग बहुत परिश्रम करके भी ऐसी शिक्षा अपने विश्वविद्यालय एवं विद्यालयों में छात्र-छात्राओं को प्रदान नहीं कर पाते। हमें भी अपने विश्वविद्यालय स्तर पर इस तरह के शिक्षा पद्धति का समावेश करना होगा ताकि लोगों को अच्छे से अच्छा संस्कार मिल सके, वर्तमान परिवेश में छात्र-छात्राएं उच्च शिक्षा प्राप्त तो कर रहीं हैं लेकिन उचित संस्कार के अभाव में वे अपनी माता पिता एवं समाज से दूर होते जा रहे हैं जो कि चिंता का विषय है उन्होंने राजेश्री महन्त जी महाराज के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त किया और कहा कि हमें बार-बार इस तरह के कार्यक्रम में उपस्थित होने का सौभाग्य प्रदान करते हैं। मंच में हमेशा की तरह मुख्य यजमान के रूप में राजेश्री डॉक्टर महन्त रामसुन्दर दास जी महाराज विराजित थे।

1 नवंबर को अचानक खुल जाएगी इन राशियों की बंद किस्मत

काफी समय से इन पांच राशि वाले लोगों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था। परंतु अब आपके जीवन से सारे दुख और कष्ट दूर होने वाले हैं। आप सभी को जीवन में सफलता प्राप्त करने के नए अवसर मिलेंगे। आपका मन शांत रहेगा। प्रेमी जोड़ों के लिए भी यह समय बहुत उचित होने वाला है। आपके घर में सुख समृद्धि और खुशहाली आएगी। लक्ष्मी माता की कृपा आप सभी लोगों पर बनी रहेगी।अब आप सभी लोगों को किसी प्रकार की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है बजरंगबली की कृपा से अब आपके घर में धन की कोई कमी नहीं रहेगी आपके सारे दुख और कष्ट समाप्त हो जाएंगे आप सभी को जीवन में सफलता प्राप्त करने के नए अवसर मिलेंगे।

 

आपका कोई भी शत्रु आपका कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा बजरंगबली कृपा आप सभी लोगों पर बनी रहेगी।आपको अचानक से धन लाभ हो सकता है। आपका रुका हुआ धन भी आपके पास वापस आ जाएगा। यदि आपका कोई कार्य पिछले काफी समय से अधूरा पड़ा है तो वह भी संपन्न हो जाएगा। आपकी मुलाकात किसी पुराने मित्र से हो सकती है। आपके घर में धन की कोई कमी नहीं रहेगी। आपका मन प्रसन्न रहेगा। कुबेर भगवान की कृपा आप सभी लोगों पर बनी रहेगी।

वे 5 राशियां मिथुन, कर्क, तुला, धनु और कुंभ हैं।

लगभग साढ़े 04 किलो स्वर्ण आभूषणो से मां का किया राजकीय श्रृंगार।

अजीत मिश्रा --शारदीय(क्वांर)नवरात्र की नवमी पर सोमवार को रतनपुर महामाया मंदिर में माता के राजसी श्रृंगार से सजे स्वरूप का दर्शन करने के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी । राजसी श्रृंगार,आरती और राजसी नैवेद्य चढ़ाने के बाद ट्रस्ट द्वारा कन्या और ब्राम्हण भोज का आयोजन किया गया । इसके बाद सुबह से शाम तक भंडारा चलता रहा।


-नवरात्रि की नवमीं तिथि पर सोमवार को सुबह 06 बजे राजसी श्रृंगार के बाद मंदिर का पट खोला गया। तो दर्शनार्थीयो ने माता के भव्य स्वरूप का दर्शन किया। ट्रस्ट के पदाधिकारियों ने बताया कि माता को रानीहार, कंठ हार, मोहर हार,ढार,चंद्रहार,पटिया समेत 9 प्रकार के हार,करधन,नथ धारण कराया गया। राजश्री श्रृंगार के बाद मां महामाया की महाआरती हुआ । इसमें ट्रस्ट के पदाधिकारी और सदस्यों के अलावा आम श्रद्धालु जन भी मौजूद रहें। पूजा अर्चना के बाद मां को राजश्री नैवेद्य समर्पित किया गया । जिसके बाद भोग प्रसाद वितरण के बाद ट्रस्ट की पुरानी धर्मशाला में कुंवारी कन्याओं के पैर धुलवाकर उन्हें आसन पर बिठाकर आरती की गई। वही कन्या भोज कराने के बाद उन्हें उपहार दिया गया। इसके बाद धर्मशाला में ही ब्राम्हण भोज का आयोजन में मंदिर के पुरोहितों समेत ब्राम्हणों को भोज कराया गया । कन्या और ब्राम्हण भोज के बाद ज्योति कलश रक्षकों को भोज कराकर उन्हें वस्त्र और दक्षिणा प्रदान की गई । इसके बाद भंडारे का आयोजन हुआ जिसमें अतिथियों को भोजन प्रसाद का वितरण किया गया। कन्या, ब्राम्हण भोज और भंडारे के बाद दोपहर करीब तीन बजे पूजन सामग्री के साथ पुजारी सभी ज्योति कलश कक्ष में प्रज्जवलित मनोकामना ज्योति कलश की पूजा अर्चना किया । पूजा अर्चना के बाद मंत्रोच्चारण कर ज्योति विसर्जित की गई ।