कृषि

मुंगेली के युवा किसान 2 सालों से देशी चिरपोटी टमाटर लगा कर ऑर्गेनिक खेती के प्रति लोगो को कर रहा जागरूक,,

नीलकमल सिंह ठाकुर

मुंगेली- छत्‍तीसगढ़ इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर में चेरी टमाटर पर शोध चल रहा है। कृषि वैज्ञानिकों का दावा है कि यह किसानों के साथ ही खाने वालों के लिए भी काफी फायदेमंद है। चेरी टमाटर पाचन में और मस्तिष्क संबंधी रोगों को दूर करने में सहायक है।

इसमें पाया जाने वाला एंटी ऑक्सीडेंट दिल संबंधी रोगों को ठीक करने के अलावा शरीर को स्फूर्ति प्रदान करता है। इसका उत्पादन भी आम टमाटर की तुलना में दोगुना है। यह प्रति पौधा 15 से 25 किलो तक उत्पादन देता है। इससे यह किसानों के लिए भी फायदेमंद है।

कृषि विश्वविद्यालय में स्थित सुनियोजित कृषि विकास केंद्र (पीएफडीसी) में प्रमुख अन्वेषक डॉ.जीडी साहू के मार्गदर्शन में चेरी टमाटर की उन्नत किस्म विकसित करने के लिए शोध किया जा रहा है। चेरी टमाटर ग्रीन हाउस या शेड नेट के अलावा खुले मैदानों में भी अच्छी उपज देता है।

शेड नेट व ग्रीन हाउस से प्राप्त टमाटर उच्च कोटि के, अच्छी गुणवत्ता वाले होते हैं। पीएफडीसी में चेरी टमाटर का रोपण शोध प्रक्षेत्र में स्थित शेड नेट में किया गया है। शेड नेट में रोपण के लिए चेरी टमाटर की लता वाली (इनडिटरमिनेट) प्रजाति का चयन किया गया।

इनडिटरमिनेट वे किस्में हैं, जिनमें निरंतर वानस्पतिक वृद्धि के साथ फल-फूल लगते रहते हैं। ये किस्में अक्टूबर में नर्सरी प्रोटे्र में तैयार की गईं। चूंकि इनडिटरमिनेट किस्मों में वानस्पतिक वृद्धि अधिक होती है, इसलिए पौधों का रोपण 60 से 60 सेमी की दूरी पर किया गया। इस परियोजना में डॉ.जीडी साहू के साथ डॉ. केशव चंद्र राजहंस, डॉ.कन्हैया लाल पटेल, डॉ. ईशु, पूर्णेंद्र कुमार साहू एवं कमलेश सिन्हा कार्यरत हैं। ये है चेरी टमाटर

चेरी टमाटर सामान्य टमाटर की तुलना में छोटे आकार का होता है। यह लाल, पीला, नारंगी, सफेद, गुलाबी, काला आदि सहित विभिन्न रंग एवं आकार में पाए जाते हैं। छत्तीसगढ़ में बरसात के दिनों में बारिश के दौरान उगने वाली चिरपोटी टमाटर का संकर (हाइब्रिड) प्रारूप ही चेरी टमाटर है। इसका उपयोग छत्तीसगढ़ में मुख्य रूप से चटनी बनाने के लिए किया जाता है। ये छोटे टमाटर पूर्ण आकार वाले टमाटर की तुलना में मीठे होते हैं और पोषण संबंधी कई लाभ प्रदान करते हैं। चेरी टमाटर के गुण

कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक चेरी टमाटर विटामिन ए, बी-6 सी, के, फॉस्फोरस, मैग्निशियम मैंगनीज, कॉपर, पोटेशियम एवं खाद्य रेशों का एक अच्छा श्रोत है। इसमें सूक्ष्मतम मात्रा में सोडियम, वसा व कोलेस्ट्रॉल भी पाया जाता है। चेरी टमाटर सामान्य टमाटर की तुलना में अधिक दामों में बिकता है। ये एक विलायती सब्जी है, जो व्यंजनों में नया स्वाद एवं आकर्षण लाता है। गमलों में भी उत्पादन

चेरी टमाटर मुख्य भूमि के अलावा गमलों में रोपण के लिए उपयुक्त है। गर्मी में यदि दो चेरी टमाटर के पौधों का रोपण गमलों में कर दिया जाए तो एक परिवार के टमाटर की आवश्यकता को पूरा किया जा सकता है। पौधो को स्टैकिंग की जरूरत

इनडिटरमिनेट प्रजाति में स्टैकिंग (सहारा) अनिवार्य है। स्टैंकिंग के लिए पौधों को सुतली से बांधने के बाद, सुतली को बांस से बांध दिया जाता है। स्टैकिंग से पौधो में फल वहन करने की क्षमता बढ़ जाती है। फल सतह को स्पर्श नहीं करते हैं, जिससे फल गलन एवं रोगों से मुक्त रहती है। वानस्पतिक वृद्धि को नियंत्रित करने के लिए पौधों में समय समय पर कटाई-छंटाई करनी चाहिए। छंटाई करते समय 3-4 कमजोर टहनियों को सिकेटियर की सहायता से काटकर अलग करना चाहिए। पौधों में उर्वरक की निर्धारित मात्रा में टपक सिंचाई पद्धति से दी गई। सलाद के लिए अच्छा

चेरी टमाटर सलाद के लिए अच्छा है। इसके लिए लोकल मार्केट डिवेलप नहीं हुआ है। अच्छा उत्पादन होने पर किसानों के लिए दिक्कत हो जाएगी। यह नेट शेड तकनीक से उत्पादन के लिए अच्छा है। यह ज्यादा गर्मी बर्दाश्त नहीं कर सकता।

कृषि अनुसंधान में परमाणु ऊर्जा के उपयोग के मिल रहे हैं चमत्कारिक परिणाम

रायपुर, 22 फरवरी, 2020। परमाणु ऊर्जा का नाम सुनते ही जेहन में परमाणु बम या नाभिकीय विखण्डन का खयाल आता है लेकिन कृषि अनुसंधान के क्षेत्र में परमाणु ऊर्जा के उपयोग के चमत्कारिक परिणाम सामने आ रहे हैं। परमाणु ऊर्जा के उपयोग से फसलों के गुणों में परिवर्तन और उत्पादन में वृद्धि के साथ ही उनकी संग्रहण अवधि में बढ़ोतरी की जा रही है। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर और भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र, मुम्बई के संयुक्त तत्वावधान में फसलों में सुधार की परियोजना के आशातीत परिणाम प्राप्त हुए हैं। विभिन्न फसलों की अनेक किस्मों में विकिरण तकनीक का उपयोग कर पौधों की ऊचाई कम करने, उपज बढ़ाने और परिपक्वता अवधि कम करने में कामयाबी हांसिल की गई है। इसके साथ ही विकिरण तकनीक का उपयोग कर फसलों एवं उनके उत्पादों की संग्रहण अवधि बढ़ाने में भी सफलता मिली है। यह जानकारी इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय में भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र एवं छत्तीसगढ़ शासन के कृषि विभाग के सहयोग से ‘‘कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण में विकिरण तकनीक का अनुप्रयोग’’ विषय पर आयोजित एक दिवसीय कार्यशाला में दी गई। कार्यशाला के मुख्य अतिथि छत्तीसगढ़ शासन में कृषि विभाग के सचिव श्री धनंजय देवांगन ने इस अवसर पर कहा कि यहां आकर पता लगा कि परमाणु ऊर्जा का कृषि अनुसंधान के क्षेत्र में किस तरह रचनात्मक उपयोग किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय और भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र कृषि तथा किसानों के हित में महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं। विकिरण तकनीक के माध्यम से फसलों की उपज और संग्रहण अवधि बढ़ाई जा रही है जिससे कुपोषण दूर करने में मदद मिलेगी। उन्होंने कहा कि इस तकनीक के उपयोग से छत्तीसगढ़ के 37 लाख किसान परिवारों को किस तरह लाभान्वित किया जा सकता है, इस पर विचार किया जाना चाहिए। कार्यशाला की अध्यक्षता करते हुए इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डाॅ. एस.के. पाटील ने कहा कि इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय में बार्क के सहयोग से संचालित फसल सुधार परियोजना में म्यूटेशन ब्रीडिंग तकनीक का उपयोग कर फसलों के आनुवांशिक गुणों में परिवर्तन कर धान की नई किस्में विकसित की गई है जैसे - ट्राॅम्बे छत्तीसगढ़ दुबराज म्यूटेन्ट-1, विक्रम टी.सी.आर.। नवीन किस्मों के पौधों की ऊंचाई और परिपक्वता अवधि कम की गई है तथा उपज में वृद्धि की गई है। इसके साथ ही अन्य फसलों पर भी अनुसंधान कार्य चल रहा है। डाॅ. पाटील ने बताया कि परियोजना के तहत कृषि वैज्ञानिकों द्वारा 90 दिन में पकने वाली तिवड़ा की नई किस्म विकसित की गई है जबकि तिवड़ा की फसल सामान्यतः 120 दिन में पकती है। उन्होंने बताया कि इस परियोजना में मुख्य रूप से तीन बिन्दुआंे पर अनुसंधान चल रहा है - फसल सुधार, संग्रहण अवधि में वृद्धि और खाद्य प्रसंस्करण कर रेडी टू ईट फूड का निर्माण। उन्होंने उम्मीद जताई कि आने वाले वर्षाें में इस परियोजना के अंतर्गत और भी उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल होंगी। कार्यशाला में भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र के नियंत्रक डाॅ. पी. गोवर्धन ने कहा कि इस परियोजना के तहत इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय ने काफी उपलब्धियों हासिल की है जिसका लाभ छत्तीसगढ़ और देश के किसानों को मिलेगा उन्होंने कहा कि आज की कार्यशाला में परियोजना के बारे में स्पष्ट रोड मैप देखने को मिला है जिससे पता चलाता है कि इस परियोजना में आगे और भी सफलताएं मिलनी तय है। उन्होंने परियोजना के सफल संचालन के लिए इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डाॅ. एस.के. पाटील, प्रमुख अन्वेषक डाॅ. दीपक शर्मा और उनकी पूरी टीम को बधाई और शुभकामनाएं दी। उन्होंने आशा व्यक्त की कि आगामी वर्षाें में भाभा परमाणु आनुसंधान केन्द्र और इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय इसी तरह मिलकर नई-नई सफलताएं प्राप्त करते रहेंगे। कार्यशाला को बार्क मुम्बई के वरिष्ठ अधिकारियों डाॅ. वी.पी. वेनुगोपालन, डाॅ. पी.के. पुजारी और डाॅ. पी. सुप्रसन्ना ने भी संबोधित किया। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय में परियोजना के प्रमुख अन्वेषक डाॅ. दीपक शर्मा ने परियोजना के तहत संचालित अनुसंधान कार्य की रूप-रेखा प्रस्तुत की। उल्लेखनीय है कि परमाणु ऊर्जा विभाग भारत सरकार द्वारा प्रायोजित इस एक दिवसीय कार्यशाला में भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र के वैज्ञानिकों द्वारा विभिन्न विषयों पर व्याख्यान दिए गए जिनमें कृषि में विकिरण तकनीक का उपयोग और फसल पौधों का सुधार, प्रेरित विकिरण उत्परिवर्तन प्रजनन द्वारा पारंपरिक/कृषक प्रजातियों में सुधार, जैव कीटनाशक एवं जैव उर्वर, कृषि अपशिष्ट के उपयोग हेतु तकनीकी, फसल वृद्धि एवं जल संरक्षण वृद्धि के लिए विकिरण आधारित तकनीकी, व्यवसायिक फसल सुधार के लिए कृत्रिम परिवेशम में उत्परिवर्तन प्रजनन, कृषि उत्पाद की विकिरण प्रसंस्करण और पैकेजिंग प्रौद्योगिकी एवं रेडी टू ईट उत्पादों के विकास के लिए विकिरण तकनीकी शामिल हैं। इस अवसर पर परियोजना में सहयोग देने वाले प्रगतिशील कृषकांे को सम्मानित किया गया। परियोजना के व्यापक प्रचार-प्रसार के लिए दूरदर्शन केन्द्र, रायपुर में कृषि दर्शन कार्यक्रम के अधिकारी नीलम सोना को भी सम्मानित किया गया

कोण्डागांव : काली मिर्च की खेती से लिखेंगे ग्रामीण अब विकास की नई ईबारत

 कोण्डागांव, 07 सितम्बर 2019

बस्तर संभाग के सभी जिलों में साल वनो की बहुलता है किन्तु यह शायद ही किसी ने सोचा होगा कि कोण्डागांव जिले के अनमोल साल वनो का उपयोग किसी खेती के लिए हो सकता है। वह भी ऐसी खेती जो आने वाले तीन-चार वर्षो में पूरे क्षेत्र के आर्थिक एवं सामाजिक परिदृश्य को बदल देगी। वैसे तो बस्तर के साल वन निश्चय ही स्थानीय निवासियों के लिए ‘कल्प वृक्ष‘ का दर्जा रखते हैे वनों से क्षेत्र के निवासी अब तक मात्र काष्ठ, वनोपज या अन्य दैनिक-घरेलू सामग्रियों के जुटाने का साधन के रूप से करते थे परन्तु इन सघन पेड़ों का उपयोग को बहुआयामी बनाते हुए स्थानीय निवासियों के जीवन की दशा और दिशा को बदलने वाले प्रमुख आर्थिक संसाधन के केन्द्र के रुप में विकसित करने की योजना बनाई जा रही है प्रायोगिक तौर पर सालवृक्ष के पेड़ तले कालीमिर्च के रोपण को अनुकूल पाया गया है और इस पेड़ के लंबे और विशाल काय तने कालीमिर्च की लताओं की बढ़ोतरी में उपयोगी सिद्ध होगी। 
    कोण्डागांव जिले के विकासखण्ड फरसगांव के ग्राम लंजोड़ा के आश्रित पारा सल्फीपदर को  जिला प्रशासन ने कालीमिर्च की खेती के लिए चयन किया। इसका प्रमुख कारण स्थानीय ग्रामीणों द्वारा ग्राम सीमा के समीप एक हजार एकड़ में फैले हुए प्राकृतिक साल वनो का सुरक्षा एवं संवर्धन का प्रयास करना रहा है। बिना किसी शासकीय प्रयास अथवा दबाव के इस वन ग्राम के निवासियों ने आने वाले पीढ़ियो के भविष्य हेतु ही इन वनो को संरक्षित करके रखा हुआ है। जिसके फलस्वरुप जिले के अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा यहां के साल वन क्षेत्रफल की दृष्टि से सघन है, जिनकी संख्या 59 हजार बताई गई है। ग्रामवासियों की माने तो उनके पूर्वजों ने ही इस वनो की सुरक्षा प्रबंधन का आधार रखा है, जिसे वे आज तक निभाते चले आ रहे है। वनो के संरक्षण के संबंध में प्रति रविवार ग्राम बैठक होती है जिसमें 72 परिवार में से किसी न किसी सदस्य का शामिल होना अनिवार्य होता है अवैध कटाई रोकने के लिए सामुहिक प्रयास किया जाता है। वनो की रखवाली के लिए समिति भी बनाए गए है जो नियमित रुप से इन वनों की सुरक्षा के लिए तैनात रहते है।
      उत्साहित ग्रामवासियों ने काली मिर्च परियोजना का पुरजोर समर्थन करते हुए अपने विचारो को साझा किया। स्थानीय निवासी बिसरु राम नेताम ने बताया कि हम लोगो ने तो जैसे-तैसे अपना जीवन को गुजार लिया है परन्तु आने वाले पीढ़ी के भविष्य के लिए जी-जान से इस योजना को सफल बनायेंगे। अधिकारियों ने हमें बताया कि वनांे का तो आप लोगो ने संरक्षण किया ही है अब इन्हीें वनो से अगर आपको अतिरिक्त आमदनी उपलब्ध कराई जायेगी। इसी प्रकार लखमू राम नेताम नामक किसान ने बताया कि वनो का संरक्षण हमारे पूर्वजों ने प्रारंभ किया था उससे प्रेरित होकर एवं क्षेत्र में घट रहे वन प्रतिशत को देखकर गांव के लोगो ने लगातार वनो का बचाने के लिए लगातार बैठके की। वन बचाने के अलावा इन वनों से हमें अतिरिक्त आमदनी होती है तो यह हमें और हमारे बच्चों के लिए सुुनहरा अवसर होगा। गांव की एक अन्य ग्रामीण महिला लछंतीन नेताम ने बताया कि हम वनों को बचाने के लिए किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार है इसके लिए वनो से दातौन अथवा पत्ते-झाड़ियां लाने एवं पशु चराई भी प्रतिबंधित कर दिया गया है और वन की सुरक्षा के लिए तैनात समिति के सदस्य बारी-बारी से संपूर्ण वन क्षेत्र का निरंतर दौरा करते रहते है।  
    कृषि वैज्ञानिक ने ग्रामीणों को बताया गया कि काली मिर्च के पौधा को पूर्णतः विकसित होने में 2 से 3 वर्ष लग जाते है इसके बाद इनकी लताओं में फल आना प्रारंभ हो जाता है। इस प्रकार प्रत्येक पौधे से 15 सौ की आमदनी होगी। साथ ही वृक्षो के मध्य की भूमि पर केयूकंद, सेमर, नांगर, शकरकंद, जिमीकंद, कोचई, तिखुर, अदरक, हल्दी जैसे मसाले वाले पौधे भी रोपित किए जा सकते है। साथ ही ग्राम के 10-10 एकड़ की खाली भूमि पर केले और पपीते के पौधे भी लगाये जायेंगे ताकि वर्ष के छह महीने के भीतर ग्रामीणों को अतिरिक्त आय का जरिया मुहैया कराया सके। इसके अलावा जिला प्रशासन द्वारा स्थानीय ग्रामीणों को तात्कालिक रुप से लाभान्वित करने के लिए सामुदायिक वन अधिकार पट्टे भी दिए जा रहे है, ताकि ग्रामीण बे-रोक-टोक पौधो का संरक्षण कर सके।
काली मिर्च की खेती से सल्फीपदर गांव कोण्डागांव जिले के अलावा राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर पर भी विख्यात होने के साथ-साथ ही अन्य ग्रामों के लिए एक रोल मॉडल बनने को अग्रसर है। इस दौरान ‘न वनो का काटेंगे-न काटने देंगे‘ एवं ‘पेड़ बचाओ भविष्य के लिए‘ जैसे स्लोगन को ग्रामीणों द्वारा दोहराया जा रहा है इन ठेठ ग्रामीणों ने सही मायने में पर्यावरण संदेश को आत्मसात करके एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया है और भविष्य को बेहतर करने की कोशिश की है।

खाद्य मंत्री अमरजीत भगत ने कहा है कि मैनपाट में जल्द होगी चाय की खेती बुलाया गया है विशेषज्ञ

 छत्तीसगढ़-  पहाड़ी आलू और विदेशी फसल टाउ की खेती के लिए मशहूर मैनपाट सरगुजा जिले के सीतापुर विधानसभा में आता है। खाद्य मंत्री अमरजीत भगत क्षेत्र से लगातार चौथी बार विधायक बने हैं। ऐसे में वे क्षेत्र की जनभावनाओं के अनुरूप विकास और निर्माण कायोर् के साथ क्षेत्रवासियों को आय उपार्जक गतिविधियों से जोड़ने में लगे हैं। सोमवार को नईदुनिया से चर्चा में खाद्य मंत्री भगत ने कहा कि उन्हें जशपुर जिले का प्रभार मिला है। जशपुर जिले में व्यावसायिक तौर पर चाय की खेती की जा रही है, जो हम सभी के लिए बड़ी उपलब्धि है। पिछले दिनों जशपुर प्रवास के दौरान चाय की खेती का अवलोकन किया था, वहीं से विचार आया कि मैनपाट में भी चाय की खेती कराई जाएगी। जशपुर और मैनपाट का मौसम लगभग एक समान है।

इसलिए मैंने विशेषज्ञों से चर्चा की और मैनपाट में इसी सीजन से चाय की खेती शुरू करने का निर्देश दिया है। यदि मैनपाट में चाय की खेती सफल हुई तो इसकी अलग पहचान बनेगी और लोगों को रोजगार का नया अवसर भी मिलेगा। खाद्य मंत्री ने मैनपाट के पहुंचविहीन इलाकों में बारिश के सीजन में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी पर कहा कि परिस्थितियां बदल रही है। इन क्षेत्रों में सुलभ आवागमन की सुविधा वर्ष भर लोगों को मिल सके इसके लिए कार्ययोजना बनाकर उसे अमल में लाने का प्रयास किया गया है। स्वास्थ्य विभाग के मैदानी कर्मचारियों को मुख्यालय में रहने के निर्देश दिए गए हैं।

चिकित्सकों कर्मचारियों को मौसमी बीमारियों के लिए अति संवेदनशील क्षेत्रों पर खास नजर रखने कहा गया है। मैनपाट क्षेत्र में नदी, नाले, पहाड़ और भौगोलिक परिस्थितियों से जो चुनौतियां हैं, उससे निपटने हमारी पूरी तैयारी है। केंद्र सरकार द्वारा जम्मू कश्मीर से धारा 370 ख हटाने पर प्रतिक्रिया में खाद्य मंत्री अमरजीत भगत ने कहा कि उन्हें मामले की पूरी जानकारी नहीं है, लेकिन जहां तक देश की बात है, भारत के लिए सभी नागरिकों को एक साथ खड़ा होने की आवश्यकता है। खाद्य मंत्री पिछले तीन दिनों से सरगुजा प्रवास पर हैं और अपने विधानसभा क्षेत्र के दूरस्थ गांवों में जाकर लोगों से वे सीधा संवाद कर रहे हैं।

 


 

जिले में हो रही है खंड वर्षा किसान के साथ-साथ वन विभाग की बढ़ी चिंता , 15 अगस्त तक जिले में नहीं हुई बारिश तो वन विभाग पौधारोपण लक्ष्य को नहीं कर सकेगा पूरा।

4 विधानसभा को मिलाकर बनाया गया जिला बलौदा बाजार भाटापारा पिछले 4 वर्षों से खंड वर्षा के कारण अकाल की मार झेल रहा है इस वर्ष सन् 2019 में भी जिले के किसान चिंता में डूबे हुए हैं तो वहीं वन विभाग भी पौधारोपण के लक्ष्य को लेकर चिंता में है। आपको बता दें वन विभाग के द्वारा प्रतिवर्ष 15 जुलाई से पौधारोपण कार्य चालू कर दिया जाता था इस वर्ष भी चार-पांच जुलाई को हुई बारिश को देखते हुए वन विभाग पौधारोपण का कार्य चालू कर दिया था लेकिन जैसे-जैसे तारीख बढ़ती गई और बारिश नहीं होते देख वन विभाग ने पौधरोपण का कार्य बंद कर दिया। आपको बता दें की अभी भी जिला वन मंडल अधिकारी विश्वेश झा ने उम्मीद नहीं छोड़ी है उनका कहना है कि अगर जिले में 15 अगस्त तक भी पानी सही गिरता है तो वह जिले में 600000 पौधारोपण करने का लक्ष्य पूरा कर लेंगे वहीं उन्होंने बताया कि अगर पानी नहीं गिरता है तो सिंचाई साधन वाले स्थानों में ही लगाए जाएगें पौधा और ऐसे पौधे का रोपण किया जाएगा जिनको कंपनी में भी जिंदा रखा जा सकता है,

राजधानी में मसूर की नई किस्म तैयार, आधे पानी में होगी बेहतर पैदावार

रायपुर -  किसानों के लिए इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय ने कम पानी में बेहतर पैदावार देने वाली मसूर की नई किस्म ईजाद की है। विवि के आनुवांशिकी एवं पादप प्रजनन विभाग के कृषि वैज्ञानिकों की मानें तो राज्य उपसमिति की बैठक में प्रथम किस्म छत्तीसगढ़ मसूर -1 को प्रदेश के लिए अनुमोदित किया गया है।


यह किस्म 88-95 दिनों में पककर तैयार हो जाती हैं, जिसकी औसत उपज 14 क्विंटल है। इस किस्म के पुष्प हल्के बैंगनी रंग के होते हैं। इसके 100 दानों का औसत वजन 3.5 ग्राम होता है। इस किस्म की दाल रिकवरी 70 फीसद तथा 24.6 प्रतिशत प्रोटीन की मात्रा पाई जाती है, जो कि अर्ध-सिंचित अवस्था में अधिक उपयुक्त होगी। छत्तीसगढ़ मसूर-1 किस्म छत्तीसगढ़ में प्रचलित किस्म जेएल-3 की अपेक्षा 25 प्रतिशत अधिक उपज देती है।

अधिक सिंचाई से गलने की समस्या

राज्य के मसूर की खेती करने वाले कृषकों को मसूर-1 का लाभ मिल सकेगा। छत्तीसगढ़ में डोरसा तथा कन्हार भूमि मृदाओं में मसूर की खेती की जाती है। वैज्ञानिक डॉ.एचसी नन्दा की मानें तो अच्छी फसल की पैदावार के लिए मिट्टी का पीएच का मान 5.8 -7.5 के बीच होना चाहिए। अधिक क्षारीय एवं अम्लीय मृदा मसूर की खेती के लिए उपयुक्त नहीं है। इस किस्म को विकसित करने में वैज्ञानिक डॉ.एचसी नन्दा, डॉ.अभिनव साव, डॉ. सुनील नायर, डॉ. दीपक चन्द्राकर की सतत मेहनत एवं सराहनीय योगदान रहा है।

वहीं डॉ. साव की मानें तो सिंचाई शाखा निकलते समय अर्थात बुवाई के 30-35 दिन तथा दूसरी सिंचाई फल्लियों में दाना भरते समय बुवाई के 70-75 दिन बाद करना चाहिए। ध्यान रखें कि पानी अधिक न होने पाए। संभव हो तो स्प्रिंकलर से सिंचाई करें या खेत में स्ट्रिप बनाकर हल्की सिंचाई करना लाभकारी रहता है। अधिक सिंचाई से मसूर की फसल में गलने की समस्या आती है ।

दलहन इकाई के माध्यम से विकसित राज्य में क्षेत्रफल का लगभग 2.4 प्रतिशत भाग में मसूर की खेती होती है। वहीं छत्तीसगढ़ में मुख्य रूप से दुर्ग, कवर्धा, राजनांदगांव, बिलासपुर, कोरिया, धमतरी कांकेर सहित रायपुर जिलों में की जाती है, जिससे वर्तमान में इसकी खेती लगभग 26.18 हजार हेक्टेयर में की जाती है, जिसका उत्पादन 8.72 हजार टन है और औसत पैदावार 333 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है। इसकी बोनी अक्टूवर से नवंबर के बीच उपयुक्त होती है। 80 फीसद फल्लियां पकने पर कटाई की जानी चाहिए।

वर्षा ऋतु में मत्स्य पालकों को उपयोगी सलाह

रायपुर, 26 जून 2019 वर्षा ऋतु प्रारंभ हो रही है इसलिए मत्स्य पालकों को मछलीपालन में मत्स्य बीज संचय पूर्व एवं इसके बाद की तैयारी करना आवश्यक है।  

मछलीपालन हेतु मत्स्य बीज संचय पूर्व आवश्यक तैयारी करना जरूरी है। इसके तहत सर्वप्रथम तालाब की जुताई कर चूना डालकर तैयार करें। जिन तालाबों में पानी है एवं मत्स्य संचयन नहीं है। ऐसे तालाब में जाल चलाकर अनुपयोगी मछलियों का निष्कासन कर लेना चाहिए एवं चूना पाउडर डालना चाहिए। प्रदेश के निजी एवं शासकीय मत्स्य बीज प्रक्षेत्रों पर मत्स्य प्रजनन प्रारंभ हो गया है। पोखर में मत्स्य बीज संचयन की आवश्यक मात्रा की जानकारी निकटस्थ मत्स्य अधिकारी को देकर उन्नत मत्स्य बीज समय पर पोखर में संचय करें। तालाब में पर्याप्त जलस्तर होने पर एवं प्राकृतिक भोजन उपलब्ध होने पर उन्नत मत्स्य बीज संचयन करें। बारहमासी तालाबों में संचयन के लिए मत्स्य बीज प्रक्षेत्रों पर बोन्साई मत्स्य बीज उपलब्ध है। अतः आवश्यकता अनुसार मत्स्य बीज क्रय कर संचय कर सकते हैं। संचित मत्स्य के पोषण के लिए सरसों खली, चावल की कनकी या पैलेट फिड आवश्यक मात्रा में लेकर रख लें, जिससे समय पर आहार का उपयोग कर सके।

बंद ऋतु (16 जून 2019 से 15 अगस्त 2019 तक) में नियमानुसार नदियों एवं संबंद्ध जलाशयों से मत्स्य निष्कासन निषेध है। अतः निषिद्ध जलस्रोतों में मत्स्याखेट न करें। तालाब पट्टे पर लेकर मछलीपालन करने वाले मत्स्य कृषक निर्धारित अवधि में तालाब की पट्टा राशि जमा कर सुचारू रूप से मत्स्य पालन करें।

विभाग से प्राप्त जानकारी अनुसार प्रदेश के दुर्ग, रायपुर, बस्तर, अम्बिकापुर एवं बिलासपुर संभाग में शासकीय या निजी मत्स्य बीज प्रक्षेत्रों पर उन्नत मत्स्य बीज उपलब्ध है। अतः मत्स्य कृषक समय पर मत्स्य बीज संचयन करें। प्रदेश में 738 करोड़ स्पॉन उत्पादन संभावित है, जिसमें से अभी तक 110 करोड़ स्पॉन का उत्पादन हो चुका है। कार्य प्रगति पर है एवं शत्-प्रतिशत लक्ष्य पूर्ण करने के प्रयास जारी है।

उद्यानिकी रोपणी के वेजिटेबल सीडलिंग यूनिट को एक महीने में फिर से शुरू करने के निर्देश

 रायपुर, 0 8 मार्च 2019उद्यानिकी एवं प्रक्षेत्र वानिकी विभाग के संचालक डॉ प्रभाकर सिंह ने आज रायपुर जिले की विभिन्न विभागीय रोपणियों का आकस्मिक रूप से निरीक्षण किया। उन्होंने शासकीय उद्यान रोपणी, सोकरनाला में वेजिटेबल सीडलिंग यूनिट के पिछले तीन वर्षो से बंद की जानकारी मिलने पर अप्रसन्नता व्यक्त की और एक महीने में फिर से शुरू करने के निर्देश दिए। इस यूनिट के बनने से नए पौधे तैयार कर किसानों को उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी।
 उद्यानिकी संचालक ने यहां के उद्यान अधीक्षक एवं उप संचालक, रायपुर को यह भी निर्देश दिया कि नए क़िस्म के मदर ब्लाक के साथ-साथ मौसमी फल, फूल एवं सब्ज़ी के पौधे तैयार कर विक्रय करने के लिए रोपणी में एक विक्रय केंद्र बनाने को भी कहा।
    मंदिर हसौद की मनरेगा नर्सरी के निरीक्षण के दौरान संचालक उद्यानिकी ने पाया कि नन्हे पौधों से दो शाखाएं एक साथ निकल रही है उनमंे से एक शाखा को छोड़ बाकी शाखाओं को काटने के निर्देश दिए, जिससे पौधे का तना मोटा और स्वस्थ्य हो तथा बडे होने पर उसका आधार मजबूत बने । उन्होंने रोपणी में ’मॉडल बाड़ी’ के निर्माण किए जाने के लिए भी निर्देशित किया। उन्होंने उद्यानिकी विभाग के अंतर्गत संचालित फल परिरक्षण एवं प्रशिक्षण केंद्र तथा प्रमुख उद्यान के के कार्य के प्रगति एवं बजट की स्थिति की समीक्षा की और इसके माध्यम से लोगों को प्रोत्साहित करने तथा अधिक से अधिक जानकारी देने को कहा।
    डॉ. सिंह ने बीज प्रगुणन प्रक्षेत्र, बाना का भी निरीक्षण किया गया। उन्होंने यहां प्लग टाइप वेजिटेबल प्रोडक्शन यूनिट, मिस्ट चैम्बर, हार्डनिंग चैम्बर का निरीक्षण किया तथा आर्किड के पौधों संरक्षित खेती करने तथा प्रक्षेत्र में संरक्षित खेती के अंतर्गत उच्च घनत्व (हाई डेन्सिटी क्रॉप) वाली फसलों को लेने की सलाह दी गयी। उन्होंने बीज विक्रय के सम्बन्ध में पैकेजिंग मशीन खरीदने हेतु निर्देश दिए। इस अवसर पर संयुक्त संचालक  एस के अग्रवाल, संयुक्त संचालक  के के मिश्रा, सहित उद्यानिकी विभाग के अन्य अधिकारी-कर्मचारी उपस्थित थे।

बिहार की शाही लीची पर लगा जीआई टैग

मुजफ्फरपुर - बिहार के मुजफ्फरपुर की पहचान शाही लीची को अब राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिल गई है। बौद्धिक संपदा कानून के तहत शाही लीची को अब जीआई टैग (जियोग्राफिकल आइडेंटिफि केशन) दे दिया गया है। बिहार लीची उत्पादक संघ ने जून 2016 को जीआई रजिस्ट्री कार्यालय में शाही लीची के जीआई टैग के लिए आवेदन किया था।

मुजफ्फरपुर राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र के निदेशक विशालनाथ ने गुरुवार को बताया कि जीआई टैग मिलने से शाही लीची की बिक्री में नकल या गड़बड़ी की आशंकाएं काफी कम हो जाएंगी। जीआई टैग मिलने से खुश विशालनाथ ने कहा कि मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर, वैशाली व पूर्वी चंपारण के किसान ही अब शाही लीची के उत्पादन का दावा कर सकेंगे। ग्राहक भी ठगे जाने से बच सकेंगे। बिहार लीची उत्पादक संघ के अध्यक्ष बच्चा प्रसाद सिंह ने बताया कि काफी परिश्रम के बाद बिहार की शाही लीची को जीआई टैग मिल गया है। उन्होंने बताया कि जीआई टैग देने वाले निकाय ने शाही लीची का सौ साल का इतिहास मांगा था। उन्होंने बताया कि कई साक्ष्य प्रस्तुत करने पर पांच अक्टूबर को शाही लीची पर जीआई टैग लग गया।
जियोग्राफिकल आइडेंटिफि केशन किसी उत्पाद को दिया जाने वाला एक विशेष टैग है। जीआई टैग उसी उत्पाद को दिया जाता है, जो किसी विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र में उत्पन्न होता है। लीची की प्रजातियों में ऐसे तो चायना, लौगिया, कसैलिया, कलकतिया सहित कई प्रजातियां है परंतु शाही लीची को श्रेष्ठ माना जाता है। यह काफी रसीली होती है। गोलाकार होने के साथ इसमें बीज छोटा होता है। स्वाद में काफी मीठी होती है। इसमें खास सुगंध होता है।
बिहार के मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर, वैशाली व पूर्वी चंपारण शाही लीची के प्रमुख उत्पादक क्षेत्र हैं। देश में कुल लीची उत्पादन का आधा से अधिक लीची का उत्पादन बिहार में होता है। आंकड़ों के मुताबिक बिहार में 32,000 हेक्टेयर में लीची की खेती की जाती है।

पूर्वी राज्यों में धान की पड़त भूमि में दलहन-तिलहन उत्पादन की रणनीति बनाने कार्यशाला का आयोजित

देश के आठ राज्यों के प्रतिनिधि हुए शामिल
रायपुर, 09 सितम्बर 2018  मुख्य सचिव  अजय सिंह ने कहा है कि छत्तीसगढ़ में धान की फसल के बाद पड़ती भूमि पर रबी में दलहन और तिलहन फसलें उगाये जाने की असीम संभावनाएं हैं। विगत दो वर्षाें से इस पड़ती भूमि पर रबी में दलहन और तिलहन फसलें उगाये जाने के अच्छे परिणाम मिले हैं। इस योजना के तहत पिछले वर्ष राज्य के पांच जिलों के पांच सौ गांवों को लिया गया था जिसका विस्तार इस वर्ष नौ जिलों के नौ सौ गांवों में किया जा रहा है।  सिंह ने उम्मीद जताई कि इस योजना के आशानुकूल परिणाम प्राप्त होंगे और छत्तीसगढ़ दलहन और तिलहन उत्पादन के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनेगा।  सिह आज यहां भारत सरकार के कृषि, सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग तथा छत्तीसगढ़ शासन के कृषि एवं जैव प्रौद्योगिकी विभाग के संयुक्त तत्वावधान में ‘‘पूर्वी भारत में चावल की पड़त भूमि पर दलहन एवं तिलहन उत्पादन की रणनीति’’ विषय पर आयोजित एक दिवसीय कार्यशाला का शुभारंभ कर रहे थे। इस कार्यशाला में पूर्वी भारत के आठ राज्यों - असम, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, बिहार, झारखण्ड़, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के प्रतिनिधि शामिल हुए। शुभारंभ समारोह को  छत्तीसगढ़ के कृषि उत्पादन आयुक्त श्री सुनिल कुजूर, भारत सरकार के कृषि आयुक्त डॉ. एस.के. मल्होत्रा, भारत सरकार के संयुक्त सचिव कृषि श्री बी. राजेन्द्रन, छत्तीसगढ़ शासन के सचिव कृषि श्री अनूप कुमार श्रीवास्तव, इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. एस.के. पाटील तथा संचालक कृषि   एम.एस. केरकेट्टा ने भी संबोधित किया।  

उल्लेखनीय है कि भारत के पूर्वी राज्यों में लगभग 85 लाख हेक्टेयर भूमि ऐसी है जो खरीफ में धान की फसल लेने के बाद वर्ष के शेष समय में पड़ती पड़ी रहती है। इस भूमि का सदुपयोग करने के लिए राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत वर्ष 2016-17 से ‘‘टारगेटिंग राइस फैलो एरिया (टी.आर.एफ.ए)’’ उपयोजना प्रारंभ की गई जिसके तहत प्रथम वर्ष में छह राज्यों के 15 जिलों के 15 सौ गांवों में धान के बाद दलहन एवं तिलहन फसल लेने का कार्यक्रम शुरू किया गया। कार्यक्रम की सफलता से उत्साहित होकर वर्ष 2017-18 में यह योजना 35 जिलों के 35 सौ गांवों में संचालित की गई। इस वर्ष यह योजना पूर्वी भारत के आठ राज्यों के 50 जिलों के पांच हजार गांवों में क्रियान्वित की जा रही है। छत्तीसगढ़ में यह योजना गरियाबंद, रायगढ़, राजनांदगांव, कांकेर, कोण्डगांव, सरगुजा, बिलासपुर, बलोदाबाजार और बस्तर जिलों मंे क्रियान्वित की जा रहीं है। वर्ष 2020 तक इस योजना के तहत पूर्वी राज्यों में 25 लाख टन दलहन और सात लाख टन तिलहन के अतिरिक्त उत्पादन संभावित है

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