संपादकीय

कोई धर्म नहीं चांद का, ईद से लेकर करवा चौथ तक चांद है बेहद खास


क्या आप जानते है चांद का कोई धर्म नहीं होता और ना ही चांद किसी एक धर्म तक सीमित होता है। अलग अलग धर्मों में चांद का अपना एक महत्व होता है। हिंदू धर्म में चांद को चंद्र देवता के रूप में मानते है। वहीं मुस्लिम धर्म में ईद का त्योहार चांद पर आधारित होता है।


चांद सभी के लिए समानता की भावना रखता है। हमारे देश में कई ऐसे त्योहार है जो चांद पर आधारित है। इन व्रत त्योहारों की पूजा चांद के दर्शन करने और अर्ग देने के बाद ही संपन्न मानी जाती है।

चांद पर आधारित हैं हिंदू धर्म के ये त्योहार

हिंदू धर्म में करवा चौथ को महिलाओं का एक बेहद महत्वपूर्ण व्रत माना जाता है। जिसे महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए रखती है। यह व्रत पूरी तरह से चांद पर आधारित है। इस व्रत में चौथ माता की पूजा के बाद रात को चांद के दर्शन किए जाते है इसके बाद ही ये व्रत संपन्न होता है। वहीं हिंदू धर्म में गणेश चतुर्थी का चांद देखना वर्जित माना जाता है। इसके पीछे एक पौराणिक मान्यता है।

जिसके मुताबिक एक बार चांद को गणेश जी ने श्राप दिया था कि जो भी चतुर्थी के दिन तूझे देखेगा उस पर कलंक लग जाएगा। इसके बाद से ही लोग गणेश चतुर्थी के दिन चांद के दर्शन नहीं करते हैं। हिंदू धर्म में चौथ का व्रत, होई अष्टमी, करवा चौथ पूर्णिमा व्रत, कजरी तीज, जैसे कई व्रत त्योहार हैं जो चांद पर आधारित हैं।

चांद और हिजरी कैलेंडर

हिंदू धर्म के अलावा मुस्लिम धर्म में भी चांद का भी काफी महत्व है। आपको जानकर हैरानी हो मगर मुस्लिम धर्म में सभी पर्व, त्यौहार मनाने से पहले चांद का दीदार करते हैं। इसे मानने के पीछे का प्रमुख कारण मुसलमानों का कैलेंडर माना जाता है जिसे हिजरी कैलेंडर कहा जाता है।

जिसकी शुरुआत 622 ईस्वी में बताई जाती है। हिजरी कैलेंडर चंद्र गणना पर आधारित है। कहा जाता है कि रसूल ने इसी दौरान मक्का से मदीना के बीच यात्रा करते हुए हिजरत की शुरुआत की थी। चूंकि मुसलमानों के कैलेंडर का आधार चांद ही है इसीलिए मुस्लिम धर्म में चांद का जरूरी महत्व है।

चंद्रग्रहण का है खास महत्व

धरती से चांद भले ही करोड़ो मीलों दूर है मगर इसका प्रभाव इसी बात से लगाया जा सकता है कि हिंदू धर्म में ग्रहण का बड़ा महत्व बताया गया है। ग्रहण का प्रभाव धरती पर भी पड़ता है। चंद्रग्रहण से पहले सूतक काल लग जाता है। आपको बता दें कि चंद्रग्रहण का सूतक 9 घंटे का होता है।

जिसमें मंदिरों में भगवान के कपाट नहीं खुलते सूतक काल में घर, मंदिरों में पूजा भी नहीं की जाती, सूतक काल में शुभ कार्य नहीं होते हैं। सूतक काल में ग्रहण का प्रभाव जीव-जंतुओ, खाद्य सामग्री पर पड़ता है।

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लड़के और लड़कियों की शादी की उम्र में अंतर क्यूँ ?

भारत में लड़कियों को यूँ तो बहुत सम्मान की नज़रों से देखा जाता है |आज की महिलाए भी अपने अधिकारों के प्रति सजग है और किसी भी तरह के अन्याय के प्रति वो आवाज उठाने के लिए डरती नहीं | वर्ष १९६० और वर्ष २०१९ तक के महिलाओं के सफ़र पर नजर डाले तो हमें देखते है की उनका सफ़र कितना कठिनाइयों से भरा हुआ था वर्ष २०१९ तक आते-आते में इनकी परिस्थितियों में कितना सुधार हुआ है |आज हम बहुत गर्व से कहते है की हम आज की नारी है लडको के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है पर जब समाज में झाकते है तो वहां की हकीकत हमारे सामने दिख रहे समाज से बिलकुल परे है जैसे पुराने मकान को रंगीन चटकदार रंगों से रंग दिया हो, हाँ वो रंगने के बाद थोडा नया जरुर दिखेगा पर हकीकत में वो पुराना मकान ही कहलायेगा वैसे ही आज हमारा समाज खुद को आधुनिकता के रंगों से रंग तो लिया है पर आज भी अपनी सोच को नहीं बदल सका है और इनमें हम केवल पुरुषों को ही इसके जिम्मेदार नहीं कहेंगे इसमें महिलाए भी शामिल है जो दकिया नुसी समाज के नियमों का पालन कर रही है और पुरानी सोच का पालन बड़ी उदारता के साथ कर रही है |समाज पुरुषों और महिलायें से मिलकर बनता है, हाँ ये बात कहना गलत नहीं होगा की हमारा समाज हमेशा से ही पुरुष प्रधान देश रहा है | आज मैं समाज और हमारे कानून की बात करुँगी जिसमें लड़के और लड़कियों की शादी की उम्र में इतना अंतर क्यूँ है ?वैसे आज भी समाज में बहुत सी परम्पराएं है जो समाज के लिए हितकारी नहीं है उन्हें बंद करना चाहिए पर हमारे देश में समाज के आगे कुछ कदम उठाना मतलब आग से टकराने जैसा है |कई परिस्थितियों में मैंने कानून को भी इस समाज के सामने झुकते देखा है, इससे ही आप समझ सकते है की हमारे देश में समाज का क्या स्थान है |आपने कभी सोचा है की शादी के लिए लड़कों की उम्र २१ वर्ष और लड़कियों की उम्र १८ वर्ष क्यूँ राखी गई है ?भारत ही नहीं दुनिया के कई देशों में लड़के और लड़की की शादी की उम्र में फर्क है |लड़कियों की उम्र कहीं भी लड़कों से ज्यादा नहीं राखी गई है |दिलचस्प बात ये है की हमारे देश में बालिग़ होने की कानूनी उम्र दोनों को एक है पर मगर शादी के लिए न्यूनतम कानूनी उम्र अलग-अलग है | इतना पड़ने के बाद हम सब के मन में एक सवाल जरुर आ रहा होगा की क्या किसी ने इसके प्रति आवाज नहीं उठाई होगी ?आपको बता दूँ की इस विषय के लिए समाज और कोर्ट में आवाजें हमेशा उठती रही है और समय-समय जरूरत के हिसाब से कानून भी बने है |अभी हाल ही में फिर ये मुद्दा उठाया है वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय ने इन्होने दिल्ली हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की है |याचिका में मांग की गई है की लड़के और लड़कियों के लिए शादी की उम्र का कानूनी अंतर ख़त्म किया जाए |याचिका कहती है की उम्र के इस अंतर का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है |यह पित्र सत्तात्मक विचारों की देन है |इस याचिका ने एक बार फिर भारतीय समाज के सामने शादी की उमरा का मुद्दा सामने खड़ा कर दिया है |आपको बता देन की ये पहला मौका नहीं है | भारत में शादी कि उम्र काफी अरसे से चर्चा में रही है |इसके पीछे सदियों से चली आरही बाल विवाह की प्रथा को रोकने का ख़याल रहा है |ध्यान देने वाली बात है की इसके केंद्र में हमेशा लडकियों की जिन्दगी रही है |उसी की जिन्दगी बेहतर बनाने के लिहाज़ से ही उम्र का मसला सवा सौ साल से बार-बार उठता रहा है | साल १८८४ में औपनिवेशिक भारत में डॉक्टर रुखमाबाई के केस और १८८९ में फुलमोनी दासी की मौत के बाद यह मामला पहली बार जोरदार तरीके से बहस के केंद्र में आया |रुखमाबाई ने बचपन की शादी को मानने से इनकार कर दिया था जबली ११ साल की फुलमोनी की मौत ३५ साल के पति के जबरिया यौन सम्बन्ध बनाने यानी बलात्कार की वजह से हो गई थीं | फुलमोनी के पति को हत्या की सज़ा तो मिली लेकिन वह बालात्कार के आरोप से मुक्त हो गया |तब बाल विहाह की समस्या से निपटने के लिए ब्रितानी सरकार ने १८९१ में सहमती की उम्र का कानून बनाया |इसके मुताबिक़ यौन संबंधन के लिए सहमती की उम्र १२ साल तय की गई|इसके लिए बेहरामजी मालाबारी जैसे कई समाज सुधारकों ने कई अभियान चलाये | डी नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ़ चाइल्ड राइट्स {एनसीपीसीआर } की रिपोर्ट चाइल्ड मैरेज इन इंडिया के मुताबिक़ ,इसी तरह मैसूर राज्य ने १८९४ में एक कानून बनाया |इसके बाद आठ साल से कम उम्र की लड़की की शादी पर रोक लगी | इंदौर रियासत ने १९१८ में लडको के लिए शादी की न्यूनतम उम्र १४ और लड़कियों के लिए १२ साल तय की|पर एक पुख्ता कानून की मुहीम चलती रही |१९२७ में राय साहेब हरबिलास सारदा ने बाल विवाह रोकने के लिए विधेयक पेश किया और इसमें लडको के लिए न्यूनतम उम्र १८ और लड़कियों के लिए १४ साल करने का प्रस्ताव था |१९२९ में यह कानून बना|इसे ही सारदा एक्ट के नाम से जाना जाता है | इस कानून में १९७८ में संशोधन हुआ |इसके बाद लड़कों के लिए शादी की कानूनी उम्र २१ साल और लड़कियों के लिए १८ साल हो गई |मगर कम उम्र की शादियाँ रुकी नहीं |तब इसकी जगह २००६ में इसकी जगह नया कानून बाल विवाह रोकने के लिए बनाया गया |इस कानून ने बाल विवाह को जुर्म बताया | अब सवाल ये उठता है की इतना सब कानून बनने के बाद भी क्या बाल विवाह प्रथा को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया है इसका जवाब क्या है, हम सब भली भाति जानते है | यूनिसेफ के मुताबिक़ भारत में बाल विवाह के बंधन में बंधी दुनिया भर की एक तिहाई लडकियां रहती है | राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ सर्वेक्षण २०१५-१६ के आंकड़े बताते है की पुरे देश में २०-२४ साल की लगभग २६.८ फीसदी लड़कियों की शादी १८ साल से पहले हो चुकी थी |इसके बारअक्स २५-२९ साल के लगभग २०.४ फीसदी लड़कों की शादी २१ साल से पहले हुई थी |यूएनएफ़पीए बाल विवाह को मानवाधिकार का उल्लंधन मानता है | सभी धर्मों ने लड़कियों की शादी के लिए सहीं समय उसके शारीर में होने वाले जैविक बदलाव को माना है |यानी महावारी से ठीक पहले या महावारी के तुरंत बाद या माहावारी के आते ही लड़कियों की शादी कर देनी चाहिए एसा धार्मिक ख़याल रहा है |इसलिए चाहे आजादी के पहले के कानून हो या बाद के ,जब भी लड़कियों की शादी की उम्र बढाने का मुद्दा जब भी समाज के सामने आया तो बड़े पैमाने में इसे विरोध का सामना करना पडा है |आज भी कम उम्र की शादी के पीछे वजह है साथ ही ,लड़कियों को बोझ मानने ,लड़कियों की सुरक्षा ,लड़कियों के बिगड़ जाने की आशंका ,दहेज़ ,गरीबी,लड़कियों की कम पढाई अनेक एसी बातें है जो कम उम्र की शादी की वजह है | इससे ये पता लगता है की हमारा समाज लड़कियों को उसके शारीर से नापता-जोखता है |उसके लिए उम्र के साल बेमानी है |बदन से ही वह उसे शादी और माँ बनने लायक तय कर देता है | हमारे देश में चाहे बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, हिन्दू विवाह कानून या पारसी विवाह अधिनियम और तलाक अधिनियम या भारतीय इसाई अधिनियम सब में यही माना गया है की शादी के लिए लड़के को २१ साल और लड़की को १८ साल से कम नहीं होना चाहिए | अगर हम सच्चे मायने में बराबरी चाहते है तो आपसी रजामंदी से शादी के लिए बालिगों के अलग-अलग उम्र की मान्यता ख़त्म क्र देनी चाहिए |जब बालिक होने की दोनों की उम्र १८ साल है तो शादी की उम्र भी सामान ही होनी चाहिए |पतियों और पत्नी की बीच अंतर का क़ानूनी तौर पर कोई आधार नहीं है|शादी में शामिल दंपत्ति हर मामले में बराबर है और उनकी समझदारी भी बराबर लोगों के बीच होनी चाहिए |उम्र का अंतर गैर बराबरी है इसलिए गैरबराबरी को कम से कम कानूनी तौर पर ख़त्म होना चाहिए |इसलिए बेहतर है इससे आगे की सोची जानी चाहिए | नोट-इसमें दिए गये आकड़े बीबीसी की एक रिपोर्ट से लिए गये है | लेखक - वर्षा गलपांडे

लोकतंत्र : क्वालिटी नहीं महज क्वांटिटी की बात

लोकतंत्र में संख्याबल ही सबकुछ है... जिसके पास ज्यादा लोग उसके हाथ में लोकसत्ता... और वही राजा... आज इसे वोट बैंक के नाम से परिभाषित किया जाता है। जिसका जैसा वोट बैंक उसका वैसा ही दर्जा.. अब तो सरकारों ने ब्यूरोकेसी में भी लोकतंत्र की नींव रख दी है। अच्छा होगा... शायद मैं नहीं समझ पा रहा.. इसलिए सोचता हूं कि क्या क्वालिटी (गुणवत्ता) नहीं क्वांटिटी(संख्या) ही तय करेगी की इस सरकार में मुखिया कौन हो... प्रदेश का सबसे बड़ा अधिकारी किस तबके से हो...ऐसा ही हो रहा है.. यह लोकशाही का विगत कुछ वर्षों में सामने आया मॉडल है.. प्रदेश में फलां तबके का वोट बैंक कम है तो उस समुदाय से सरकार में उनका प्रतिनिधि(मंत्री ) होगा या नहीं... उसका अनुभव.. राजनितिक कुशलता कोई मायने नहीं रखती... क्योंकि चयन का आधार सिर्फ यही है कि संख्याबल उसके साथ कितना है यह और इससे बड़ी बात.. क्या वह जिस वर्ग से आता है उसका संख्या बल प्रदेश में कितना है.. इनके असंतोष का सरकार पर असर कितना होगा...

इससे आगे बढ़कर बात करना ज्यादा जरूरी है... हाल में ही प्रदेश के स्कूलों में एक भाषा विशेष को पढ़ाए जाने की वकालत शुरू हुई... वकालत इस लिए लिख रहा हूं क्योंकि मामला हाइकोर्ट तक पहुंचा है... आधार यहां भी संख्याबल ही.. जिसके आगे सरकारें नतमस्तक हैं... अब जरा सोचिए... देश में हिंदी हर प्रदेश में अनिवार्य विषय हो इसकी वकालत क्यों नहीं हो रही... खैर प्रदेश में ही पिछले15 सालों में छत्तीसढ़ी कामकाज और स्कूलों में विषय के रुप में क्यों लागू नहीं हो पाई.. क्या इनका संख्याबल कम है... जी.. नहीं.. दरअसल मसला एक तबके विशेष को साधने का है... और जब नगरीय निकाय चुनाव सामने हों तो यह राजनीतिक पार्टियों के लिए बहुत जरूरी हो जाता है। लेकिन क्या ऐसा करने से सामाजिक सुचिता नहीं बिगड़ेगी... इस बात से किसी को क्या लेना देना.. कल दूसरे तबके के लोग भी हैं जो दो लाख से ज्यादा हैं वे भी किसी विशेष मांग को लेकर खड़े हो जाएंगे... जरा पड़ोसी राज्य के सीएम से पूछ लीजिए... वे छत्तीसगढ़ से भाषा विशेष को पढ़कर निकले यहां के किसी मूलनिवासी व्यक्ति को ओडिशा में नौकरी देंगे... तो फिर छत्तीसगढ़ी का क्या होगा... भूल जाना चाहिए..

बात इन सबसे बहुत ऊपर उठकर सोचने की है...दरअसल लोकतंत्र में संख्याबल को कुछ लोगों ने गलत तरीके से परिभाषित कर दिया है... संख्याबल किसी एक समुदाय विशेष की संख्या से तय नहीं होता.. दरअसल यह मामला सहयोग और लोकप्रियता का है... और सच कहूं तो पसंद और नापसंद का है... अगर ऐसा नहीं तो कोई बुद्धजीवी ही मुझे बता दे कि पिछड़ा वर्ग बाहुल्य क्षेत्र से उसी वर्ग का प्रत्याशी चुनाव क्यों हार जाता है... कई बार तो सबसे कम संख्याबल होने के बावजूद उस क्षेत्र से किसी दूसरे ही तबके का नेता चुन लिया जाता है। तो क्या विधानसभावार आरक्षण बेमानी नहीं है। दरअसल तय यह होना चाहिए कि इस प्रदेश में इस तबके का संख्याबल इतना है इन्हें राजनीतिक पार्टी को हर हाल में इतने पदों पर उम्मीदवारी देनी ही होगी... मतलब पार्टीवार उम्मीदवारी में आरक्षण हो.. न कि विधानसभा रिजर्व की जाए... फिर उम्मीदवारों का चयन कर राजनीतिक कौशल परीक्षण आजमाया जाए... आधार है भी कुछ ऐसा ही...थोड़ा बहुत संविधान मैंने भी पढ़ा है... और मैं यही समझ सका हूं...

अब सोचना यह है कि लोकतंत्र की नुमाइंदगी कर रहे लोगों ने भला संख्याबल का जो गणित पढ़ाना शुरू किया है वह सफल कहां तक है... जिस समाज का संख्याबल ज्यादा उसकी चलेगी... तो फिर सरकार को जनसंख्या नियंत्रण और परिवार नियोजन जैसी योजनाओं पर खर्च होने वाले अरबों रुपयों की बर्बादी बंद कर देनी चाहिए..साथ ही बच्चे दो ही अच्छे.. हम दो हमारे दो.. काबिल बच्चा एक ही अच्छा जैसे नारों पर भी रोक लगा ही देना चाहिए... क्योंकि जब लोकतंत्र में संख्याबल ही सबकुछ तय करेगा.. तो हर सामाजिक तबका संख्याबल बढ़ाने पर ही जोर रखे... भुखमरी... बेरोजगारी... आवास.. शिक्षा...स्वास्थ्य.. यह सरकार देखे... हम तो संख्या में ज्यादा होना चाहेंगे... देश का फिर चाहे जो हो...

जरा सोचिएगा... अगर सोच ऐसी बनने लगी तो हालात क्या होंगे... फिलहाल, मैं सच कहूं.. तो संख्याबल बढ़ाने की ही सोच रहा हूं... आप क्या करेंगे... यह आप सोचिए....

बाल विवाह हे एक सामाजिक बुराई, रोकथाम के लिए पुलिस को करें फोन

बाल विवाह को रोकने की अपील पुलिस ने लोगों से की है। रामनवमी और अक्षय तृतीया पर बाल विवाह होने की अधिक संभावना रहती है। बाल विवाह समाजिक बुराई ही नहीं कानूनन अपराध भी है। बालविवाह प्रतिशोध अधिनियम 2006 के अन्तर्गत बालविवाह करवाने वाले वर व वधू के माता पिता, सगे संबंधी, बराती, विवाह करवाने वाले पुरोहित पर कानूनी कार्यवाही की जा सकती है। यदि वर या कन्या को बालविवाह के बाद विवाह स्वीकर ना हो तो यह शून्य माना जाता। बाल विवाह के कारण बच्चों मे कुपोषण, शिशु मृत्य दर, मातृ मृत्यदर व घरेलू हिंसा में बढ़त होती है। समाज में फैली इस बुराई के उन्मूलन के लिए बाल विवाह होने की जानकरी पुलिस कंट्रोल रूम धमतरी फोन नम्बर 07722-232511 मोबाइल नम्बर 9479192299 एवं पुलिस कार्यालय धमतरी फोन नम्बर 07722- 238265 पर सूचित करें। बाल विवाह की रोकथाम के लिए पुलिस ने सहयोग की अपील है।

संगीतमय श्रीमद् भागवत कथा देवरानी में 11फरवरी सें

हेमंत जायसवाल@BBN24- ●साहू परिवार द्वारा आयोजित भागवत कथा● *बिर्रा - मुरली मनोहर श्री माधव के असीम कृपा से ग्राम देवरानी में संगीतमय श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन 11 फरवरी से कलश यात्रा एवं व्यास पूजन के साथ प्रारंभ होगी।व्यास वाचक आदरणीय पं.अवधेश तिवारी जी द्वारा कथा सुनाई जायेगी। कथा प्रतिदिन 2बजे सें शाम 07बजे तक भागवत कथा का रस पान करेगें।12फरवरी भागवत महात्म्य, 13 फरवरी परिक्षित जन्मकथा, 14फरवरी प्रहलाद चरित्र, भरत चरित्र, 15 फरवरी श्रीराम जन्म श्रीकृष्ण जन्मोत्सव, 16फरवरी बाललीला, माखनचोर, 17फरवरी श्रीकृष्ण रूखमणी विवाह, 18फरवरी सुदामा चरित्र कथा विश्राम चढोतरी, 19 फरवरी तुलसी वर्षा हवन सहस्त्र धारा बाम्हण भोजन के साथ विसर्जन किया जायेगा।वहीं इसके मुख्य यजमान तीजू राम साहू - श्रीमती मोहनकुमारी साहू (सरपंच ग्राम पंचायत देवरानी)होगें वहीं आयोजन को लेकर साहू परिवार जुटे हुए है।

लड़की होने पर गर्व करूँ या ?

आज सारी दुनिया महिला दिवस मना रही है और लड़की होने के नाते शायद मुझे भी ये दिन मनाना चाहिए पर मै नहीं मना पा रही इस दिन को | मन में सवालों का बवंडर घूम रहा है की आज मै लड़की होने पर गर्व करूँ या लड़की होने पर उदास होऊं? भगवान् ने इतनी खुबसुरत चीज बनाई है वो है औरत ,जिससे ये सारी दुनिया बनी है | ये ना हो तो इन्सान जाती ही ना हो | हम औरत को कितने ही रूपों में देखते है कभी माँ, बहन, नानी, चाची, पत्नी , बेटी, भाभी और भी ना जाने कितने रूप है औरत के | यहाँ तक की औरत को पूजा भी जाता है सारे स्थानों में माँ का स्थान सबसे ऊपर रखा गया है | तो आज सबसे ज्यादा रेप क्यूँ हो रहें है, पुरुष को ये सब करते समय उसे ध्यान क्यूँ नहीं आता की वो भी इसी औरत से बना है जिस माँ की कोख से पैदा हुआ है उसी औरत के साथ रेप कैसे कर सकता है ?भले ही वो जिसके साथ गलत कर रहा है वो बेशक उसकी माँ , बहन, बेटी ना हो पर है तो उन्ही मेसे एक ? फिर भी उसकी रूह नहीं कापती किसी औरत के साथ गलत करते वक्त ?

 आज मेरे इस आर्टिकल में क्या लिखूं ये समझ नहीं आरहा महिलाओं की तारीफ़ लिखूं या उनके साथ हो रहे अपमान को लिखूं या दूसरों की तरह मै भी महिलाओं की वीरता के किस्से लिखूं ? मै आप सब से एक सवाल पूछना चाहती हूँ की क्या औरत केवल एक दिन के सम्मान के काबिल है ?क्या हमें एक ही दिन औरत का  सम्मान करना चाहिय या हर दिन ?कुछ पति ये कह कर इस दिन पत्नियों को आराम देते है या देंगें की आज का दिन आप का है ये आप एक दिन करने का सोच रहे हो तो ये आप हर रोज भी तो कर सकते हो |एक दिन आराम देने और एक दिन गिफ्ट देने से औरत का सम्मान हो जाता है क्या ? क्या है औरत का असली सम्मान ये हमें सोचना चाहिए ?

 आज औरतें अपने ही घर में मैह्फुस नहीं है | आज एसा माहौल है की कोई दूर का नहीं बल्कि कोई अपना ही हमारे पर बुरी नजर गडाये रहता है, हम अपनी बच्चियों को भी घर में अपनों के पास छोड़ नहीं सकते | मैने  सोशल मीडिया में 26  फरवरी 2018 को उतरप्रदेश के मुजफ्फरनगर एक खबर पड़ी की एक बहन ने अपनी ही  16 साल की बहन को किसी बहाने से एक खाली घर में ले गई जहाँ उसका 22 साल का भाई पहले से ही मौजूद था और जब वो लड़की वहां पहुची तो उसका भाई उसके साथ रेप किया और जो उस लड़की की बहन थी जिसने उसे वहा बहला के लाइ थी वो उसका वीडियो बना रही थी फ़िलहाल ये दोनों भाई बहन फरार है |एक और खबर थी की जो 7 मार्च 2018 कोलकत्ता ही की है जहां एक 3 साल लड़की के साथ एक खाली बस में एक आदमी ने दरिंदागी की जब वो उस लड़की का रेप कर रहा था तो उस लड़की का भाई दरवाजे में खड़े हो कर अपनी बहन को छोड़ देने की मिन्नतें कर रहा था | जब उसने ये सारी बातें अपनी माँ को बताई तो उसकी माँ जब वहां पहुची तो बच्ची के शारीर से खून बह रहा था और जब उस मासूम को अस्पताल ले जाया गया तो उसकी हालत नाजुक बताई है | एसी ही कई खबरे हम रोज अखबार और टेलीविसन में पड़ते और सुनते है | ये सब केवल भारत में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में देखते है की औरत के साथ हमेशा ही गलत होता है |

आज हम बड़े गर्व से कहतें है की आज हम मर्दों के साथ कदम से कदम मिला के चल रहे है पर ये भी सच है की हम कितना भी आगे निकल गयें हों पर आज भी हमारी इज्जत दाव पर लगी रहती है हम आज भी अकेले जाने में अपने आप को सहज महसूस नहीं समझते है और ना ही हमारे घर वाले | अब ये सब पड़ने के बाद आप खुद सोचें की क्या वाकई में हमें इस दिन को सैलीब्रेट करना चाहिए या नहीं ?

आज वक्त है लड़कियों पर हम जो रोक टोक लगाते है वो रोक टोक अब हम लड़कों पर लगायें , उनकी हर बातों पर ध्यान दें की वो क्या कर रहें है, आज लड़कियों को नहीं लड़कों को कहें की शाम के घर से बाहर ना जायें, आधी रात तक बाहर ना रहे क्यूँ की जो भी आज हो रहा है लड़कियों के साथ उसके जिमेदार लड़के ही है और उनकी ये मानसिकता की हम पुरुष हैं कुछ भी कर सकतें है ये हमारी मर्दानगी है और इस सोच को बढावा हमने ही दिया है | हमने ही इन पुरुषों को इतनी छुट दे रखी है की वो कुछ भी करेगा तो हम ही उसे लड़का है करके माफ़ कर देंगें और सारा इल्जाम लड़की पर ही डाल देते है | जब तक इस मानसिकता को नहीं बदलेंगें तब तक लड़कियों के साथ गलत ही होता रहेगा और ये सब कौन बदलेगा ? इन सब को हमने ही बढावा दिया है तो हम ही इसको बदल सकते है अपनी मानसिकता को बदल कर और बच्चों को अच्छी सिख दे कर |

मै आज के दिन की विरोधी नहीं हूँ मैं भी इस दिन को ख़ुशी और गर्व के साथ मनाना चाहती हूँ औरत होने पर घमंड करना चाहती हूँ जो चीज मुझमे है वो पुरषों में नहीं इसपर इतराना चाहती हूँ पर साथ-साथ आप सब को यहीं कहना चाहती हूँ की अपनी सुरक्षा के लिए आत्म रक्षा की शिक्षा हर लड़की को लेनी चाहिए ताकि वो हर जगह अपनी रक्षा खुद कर सके और कोई भी हमारे संस्कार और हमारे पहनावे पर ऊँगली ना उठा सके | हम लोगों को और उनकी सोच को नहीं बदल सकते पर खुद को तो बदल सकतें है | 

वर्षा बी गलपांडे 

 

 

 

पर्यावरण और इंसानी सोच (बस एक नजर में )

  बचपन में हमारे दादा-दादी,नाना-नानी हमें विभिन्न  प्रकार की कहानियां सुनाते थे,किस्से सुनाते थे, किवदंतियां सुनाते थे, इसमें यह स्थापित करने की कोशिश होती थी कि एक स्वर्ग होता है और एक नरक होता है तथा यह समझाने की भी कोशिश होती थी कि यदि आप अच्छे काम करेंगे तो स्वर्ग में जाएंगे और गलत काम करेंगे तो नरक में जायेंगे।इसके लिए स्वर्ग में स्थापित आनंद की सारी खूबियों का बखूबी वर्णन किया जाता था और नर्क के अंदर कितने भयंकर कष्ट होते हैं उसका वर्णन करते हुई कहानी सुनाई जाती थी। नतीजन जो कहीं ना कहीं हमारे  मन मस्तिष्क में स्वर्ग व नरक की कल्पना स्थापित हो ही जाती है। जिसका असर ताह उम्र इंसान के जीवन मे  कम या अधिक बना ही रहता है। 

    जैसे जैसे हम बड़े होते जाते है समझ बढ़ती है जिससे हममे अपनी तर्क संगत बात लोगो के सामने रखने की क्षमता आने लगती है। एक उम्र के पड़ाव के बाद इंसान को उसका अनुभव ही सीखा जाता है की इस ब्रम्हांड में कोई भी ऐसी जगह प्रकृति के द्वारा स्थापित नहीं है जिसे स्वर्ग और नरक कहा जा सके। 

हर इंसान अपने व्यवहार, आचरण, बोलचाल, चाल- चलन और अपनी सोच से ही इस ब्रम्हांड में अपने लिए और अपने समाज के लिए स्वर्ग और नरक स्थापित करता जाता है।

इंसान की जितनी सोच  स्वार्थ आधारित होगी उतने ही हम इस पृथ्वी को नरक बनाने के करीब ले जाने के जिम्मेदार होंगे तथा दूसरी ओर हमारी जितनी सोच समाजिक व  व्यापक होगी उतने ही हम स्वर्ग को स्थापित करने में भागीदार की भूमिका में होंगे।

इस पृथ्वी के पर्यावरण से ही स्वर्ग और नरक स्थापित होता है। जितना हम अपने जीवन को प्रकृति के करीब रखते हुए पर्यावरण की रक्षा करने का संकल्प अपने दिलों दिमाग में स्थापित कर पाएंगे उतने ही पैमाने में  इंसान इस पृथ्वी को स्वर्ग के करीब तथा नरक से दूरी बनाने में सफल होगा।

अपने चारों तरफ हरियाली  की चादर, चिड़ियों का चहकना, कोयल की मन मोह लेने वाली आवाज को सुनना, नीलकंठ का दिखना, मोरो को नाचते हुए देखना, रंगबिरंगी फूलो का खिलना और उसकी महक, भौरों की गुंजन,जुगनुओं को जगमगाहट, रंगबिनरंगी तितलियों को उड़ते देखना,पहाड़ियों से पानी को गिरते हुए देखना,झील से,जंगलो से प्राकृतिक सौंदर्य की अनुभूति प्राप्त करना किसे अच्छा नही लगता। 

 सभी मन से चाहते है ऐसा ही वातावरण अपने चारों तरफ हो,तभी तो ऐसे ही वातावरण की चाहत में इंसान सपरिवार या दोस्तो के साथ जाता है कुछ दिनों की छुट्टियां मानने ,ऐसे ही किसी कल्पनाशील जगह की तलाश कर जहाँ पर वह कुछ दिन प्रकृति के करीब रहकर उसका भरपूर आनंद ले सके,वह भी भारी भरकम पैसों को खर्च कर।

पृथ्वी में बसे हर इंसान को यह सोचना चाहिए जिस प्राकृतिक वातावरण के चाहत के लिए वह भटकता है उसे अपने आसपास भी तो बना सकता है,कम पैसों को खर्च कर, उसके लिए उसे केवल अपनी सोच के साथ अपनी दिनचर्या भी  बदलनी होगी तभी जाकर बड़ी कठिन तपस्या के बाद हम सब लोग यकीनन ऐसा ही वातावरण अपने आस पास प्राप्त कर सकते है।

  हमेशा सरकार की ओर मुंह नही ताकना चाहिए हमे भी आगे बढ़ कर इस दिशा में कुछ ठोस कदम उठाने होंगे स्वार्थवश ही सही, क्योकि अपने आसपास जो भी वातावरण होगा उसका सीधा असर हमारी जीवन पर ही पड़ता है किसी सरकार के नही। अपने लिए ना सही अपनी आने आने वाली पीढ़ी के लिए तो हम इसकी नीव रख कर जा ही सकते है।

रवि तिवारी 
 

सभी चाहते है सुख-दुःख,प्यार-घृणा में स्पर्श

सभी सुख-दुःख,प्यार-घृणा में एक दूसरे का स्पर्श चाहते और करते हैं। माँ का वात्सल्य बच्चे को सीने से स्पर्श में ही प्रकट होता है। हम जब किसी को प्रेम करते हैं तो उसे आलिंगनबद्ध करना चाहते हैं।  
जब कोई दोस्त किसी बात से परेशान होता है तो हम उसका हाथ अपने हाथ में लेकर बिना कुछ कहे ही बहुत कुछ कह देते है..रात को जब बच्चा सोता है तो माँ उसके सर पर हाथ फेरती है और बच्चा सुकून से सो जाता है...आप सोच रहे होगे की मैं क्या लिखना चाह रही हूँ......मैं एक ऐसे शब्द  के बारे में लिखना चाह रही हूँ जो सोचने में बहुत छोटा लगता है पर ये शब्द बहुत बड़ा...जी हाँ मैं बात कर रही हूँ “स्पर्ष” शब्द के बारे में ...ये शब्द की सुनने में कितना साधारण सा शब्द लगता है....पर है कितना सुकून पहुचने वाला..आप को मुन्ना भाई MBBS फिल्म तो याद होगी उसमें हीरो जो भी व्यक्ति दुखी होता या परेशां होता उसे वो “हग” करता यानि की गले से लगाता और सब को यही करने को कहता..जिसे वो जादू की “झप्पी” कहता....आप ने कभी सोचा है की इस फिल्म के माध्यम से क्या दिखाना और समझाना चाह रहा था....ये स्पर्ष ही है जो इस फिल्म में दिखाया गया था...हम इसे “टचिंग पावर ” भी कह सकते है....इसमे इतनी शक्ति होती है की एक बीमार आदमी को  भी ठीक कर सकता है....एक रोते इन्सान को सुकून दे सकता है... स्पर्ष के बहुत से रूप है जैसे माता–पिता का स्पर्ष, पति-पत्नी का स्पर्ष, दोस्त का स्पर्ष, दादा-दादी का स्पर्ष, स्पर्ष चाहे जिस रूप में भी हो सच यही है की स्पर्ष हमेशा ख़ुशी ही देता है....
वर्षा.....

संपादकीयः सुनवाई से उम्मीद

तीन तलाक के मसले पर सर्वोच्च न्यायालय की ऐतिहासिक सुनवाई गुरुवार को शुरू हो गई। न्यायालय ने इस मसले को कितना महत्त्व दिया है इसका अंदाजा दो बातों से लगाया जा सकता है। न्यायालय ने गरमी की छुट्टी में भी सुनवाई करना मंजूर किया। दूसरे, उसने इस मामले को संविधान पीठ को सौंप दिया। पीठ में प्रधान न्यायाधीश समेत पांच वरिष्ठतम जज शामिल हैं। यह भी गौरतलब है कि पांचों जज अलग-अलग धर्म से ताल्लुक रखते हैं। तीन तलाक प्रथा से पीड़ित मुसलिम महिलाओं द्वारा दायर की गई सात याचिकाओं पर अलग-अलग विचार करने के बजाय अदालत को मुसलिम समुदाय में तीन तलाक के चलन की कानूनी वैधता पर विचार करना जरूरी लगा। पीठ को इस पर दो खास बिंदुओं से विचार करना है। एक, यह कि क्या तीन तलाक मजहब का अनिवार्य या अंतर्निहित अंग है? दूसरा, क्या यह संविधान द्वारा प्रदत्त नागरिक अधिकारों के आड़े आता है?

आॅल इंडिया मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड समेत अनेक मुसलिम संगठन और तमाम मौलाना मानते हैं कि तीन तलाक उनकी मजहबी व्यवस्था का अंग है और इसे बदलना या निरस्त करना उनके धार्मिक मामले में दखल देना होगा, जबकि संविधान ने सारे समुदायों को धार्मिक स्वायत्तता की गारंटी दे रखी है। लेकिन याचिकाकर्ताओं और मुसलिम महिलाओं के कई संगठनों का कहना है कि तीन तलाक का इस्लाम के बुनियादी उसूलों या कुरान से कोई लेना-देना नहीं है; यह लैंगिक भेदभाव का मामला है और इसी नजरिए से इसे देखा जाना चाहिए। इस आग्रह में दम है। हमारा संविधान कानून के समक्ष समानता का भरोसा दिलाता है। जबकि तीन तलाक प्रथा तलाक के मामले में मुसलिम मर्द के एकतरफा व मनमाने अधिकार की व्यवस्था है। यही कारण है कि मुसलिम महिलाओं में शिक्षा तथा अपने हकों के प्रति जागरूकता के प्रसार के साथ-साथ मुसलिम समाज में भी तीन तलाक के खिलाफ आवाज उठने लगी है, भले अभी उसे मुख्य स्वर न कहा जा सके। केंद्र सरकार ने जरूर इस मामले में दिए हलफनामे के जरिए अपना पक्ष रखते हुए कहा है कि तीन तलाक मुसलिम महिलाओं की प्रतिष्ठा व सम्मान के खिलाफ है और इसे समाप्त होना चाहिए। बहरहाल, अगर मजहबी नजरिए से देखेंगे, तो तीन तलाक का विवाद अंतहीन बना रह सकता है। क्योंकि मजहबी मान्यताओं और परंपराओं की कई व्याख्याएं होंगी, फिर किस व्याख्या को माना जाएगा? इसलिए असल मसला तो यह है कि क्या यह कानून के समक्ष समानता के सिद्धांत और नागरिक अधिकारों के आड़े आता है?

शनि शिंगणापुर और हाजी अली की दरगाह के मामलों में संबंधित धार्मिक स्थलों के प्रबंधकों ने यही दलील दी थी कि वहां स्त्रियों के प्रवेश पर लगी पाबंदी सदियों पुरानी है तथा परंपरा का हिस्सा है। लेकिन मुंबई उच्च न्यायालय ने इस तर्क को नहीं माना और पाबंदी हटा लेने का आदेश देते हुए अपने फैसले में कहा कि विभिन्न समुदायों को धार्मिक स्वायत्तता की गारंटी संविधान ने जरूर दे रखी है, पर वह असीमित नहीं हो सकती। धार्मिक स्वायत्तता तभी तक है जब तक वह नागरिक अधिकारों के आड़े न आए। तीन तलाक का मसला चूंकि मुसलिम महिलाओं के खिलाफ भेदभाव व अन्याय का मसला है, इसलिए इसे मजहबी चश्मे से न देख कर, सभी के समान नागरिक अधिकार तथा कानून के समक्ष समानता की दृष्टि से देखना होगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि मामले की सुनवाई कर रहे संविधान पीठ का फैसला जल्द आएगा और तीन तलाक के पीड़ितों को इंसाफ मिलने के साथ ही एक लंबे विवाद का तर्कसंगत पटाक्षेप होगा।

सुकमा की लालक्रांति का अंत कब ?

 

हमारी आतंरिक सुरक्षा के लिए आतंक और नक्सलवाद की पनती विषबेलें बड़ा खतरा बन गयी हैं। लोकतंत्र में विचारों की संस्कृति पर बंदूक की सभ्यता भारी दिखती है। चरमपंथ की यह विचाराधारा देश को कहां ले जाएगी पता नहीं, लेकिन अतिवाद के बल पर सत्ता के समानांतर व्यवस्था खड़ी करने वालों का सपना पूरा होगा या नहीं,ं यह वक्त बताएगा। हलांकि मजबूत होती नक्सलवाद की जड़ें और जवानों की बढ़ती शहादत हमें विचलित करती हैं। आतंकवाद से भी बड़े खतरे के रुप में नक्सलवाद उभरा है। आतंकवादी हमलों में इतनी तादात में जवान कभी नहीं शहीद हुए जितने की नक्सल प्रभावित इलाकों में बारुदी सुरंगों और सीधी मुठभेंड में मारे गए। हमें यह कबूल करने में कोई गुरज नहीं करना चाहिए की नक्लवाद और आतंकवाद की रणनीति के आगे हमारा सुरक्षा और खुफिया तंत्र बौना साबित हो रहा है। सुकमा के जंगलों में काफी तादात में सेना और सीआरपीएफ के जवान शहीद हुए हैं। जवानों की शहादत का देश अभ्यत हो चुका है। एक हमले से निपटने के लिए जब तक हम रणनीति बनाते हैं तब तक दूसरा हमला हो चुका होता है। छत्तीगढ़ के बस्तर जिले में एक बार फिर सुकमा के जंगलों में नक्सलियों ने खूनी खेल खेला है। सैकड़ों की संख्या में महिला और पुरुष नक्सलियों ने रणनीति के तहत जवानों पर हमला बोला और उन्हें मौत की नींद सुला दिया। इस सुनियोजित षडयंत्र में अब तक 40 से अधिक सीआरपीएफ के जवान शहीद हो गए। हमला उस समय किया गया जब जवान निर्माणाधीन सड़क पर चलने वाले काम को खुलवाने गए थे। नक्सलियों ने सड़क निर्माण पर प्रतिबंध लगा रखा। सुबह छह बजे 90 की संख्या में जवान गए थे।

सुकमा से 64 किमी दूर बुर्कापाल में दोपहर में जब जवान भोजन ले रहे थे उसी समय हथियारों से लैस नक्सलियों ने चैथरफा हमला कर, गोलिया बरसा जवानों की निर्मम हत्या कर दी। कहा जा रहा है कि हमला करने वाली गैंग में सबसे आगे सेना की वर्दी में महिलाएं थी और उन्हें सुरक्षा कवर पुरुष नक्सली दे रहे थे। यह घटना दिल को दहलाने वाली है। लेकिन कहीं न कहीं से हमारे सुरक्षा और खुफिया तंत्र की विफलता साबित करती है। हमें यह पता नहीं चल सका की नक्सली बड़े हमले का गेम प्लान तैयार कर रखें है। नक्सलियों ने जवानों की हत्या करने के बाद उनके पर्स, मोबाइल, हथियार भी लूट ले गए। यहां तक की मुठभेंड में मरे अपने साथियों को भी घसीट कर जंगल में ले गए। सुकमा के जंगलों में सेना और सीआरपीएफ के जवानों की शहादत आम बात हो चली है। लेकिन नक्सलियों से निपटने के लिए अभी तक हमने कोई ठोस नीति नहीं तैयार कर पाए। 2011 के बाद संभवतः यह दूसरा बड़ा नक्सली हमला है जिसमें 76 जवानों की मौत हुई थी। इसके पूर्व बड़े हमले में कांग्रेस के कई दिग्गत नेताओं को मौत के घाट उतार दिया गया था। जिसमें वीसी शुक्ल, कर्माकर और दूसरे नेता शामिल थे। इस घटना में तो नक्सलियों ने लाशों में नृत्य भी किया था। नक्सलवाद हमारे लिए आतंक से भी बड़ी चुनौती बना है।

  माओेवाद विकास और लोकतंत्र की भाषा नहीं समझता है। वह वर्तमान व्यवस्था से अलग बंदूक संस्कृति के जरिए जल, जंगल और जमींन की आजादी चाहता है। वह अपनी सत्ता चाहता है जहां उसका कानून चले जबकि सरकार ऐसा कभी होने नहीं देगी। सरकारें आदिवासी और पिछड़े इलाकों में उनकी सांस्कृतिक सुरक्षा और सर्वांगीण विकास के लिए संकल्पित हैं। नक्सल प्रवावित उड़ीसा, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, झारखंड और बिहार में विकास योजनाएं क्रियान्वित हैं। लेकिन माओवादियों का विकास में भरोसा ही नहीे, आदिवासी इलाकों में वह विकास नहीं चाहते। उन्हें डर है कि अगर ऐसा हो गया तो लोग मुख्यधारा की तरफ लोैट जाएंगे, फिर हमारे अतिवाद का क्या होगा। वह लोकतांत्रिक मूल्यों का गलाघांेट बंदूक के बल पर सब कुछ हासिल करना चाहते हैं। मुख्यधारा में लौटना नहीं चाहते या फिर कोशिश नहीं करना चाहते। दुनिया भर में हिंसक संस्कृति का कोई स्थान नहीं है। लोकतांत्रिक और वैचारिक नीतियों के जरिए ही हम कामयाब हो सकते हैं।जिन बारह जिलों में नक्सवाद फैला है वहां सबसे अधिक प्राकृतिक खनिज संपदा है। लेकिन वहां के आदिवासी लोगों का विकास आज भी बदतर हालात में हैं। सरकारों ने प्राकृतिक संसाधनों को खूब दोहन किया। लेकिन आदिवासियों के पुनर्वास के लिए नीतिगत योजनाएं नहीं बनाई गई। सरकारी नीतियों ने प्राकृतिक संसाधनों से संपंन इन इलाकों के लोगों को विपन्न बना दिया। जिसका नतीजा हमारे सामने नक्सलवाद के रुप में है।

नक्सलवाद के खात्मा के लिए हमें ठोस और नीतिगत निर्णय लेना होगा। सुरक्षा और खुफिया तंत्र को नक्सलियों के मुकाबले अधिक सुरक्षित और मजबूत बनाना होगा। इसके अलावा स्थानीय लोगों का विश्वास जीतना होगा। हमें यह अच्छी तरह मालूम है कि सुरक्षा में जरा सी लापरवाही हमारे लिए मुश्किल खड़ी कर सकती है। आपको मालूम होगा नोटबंदी के बाद सरकार की तरफ से खूब प्रचारित किया गया कि इस फैसले से आतंक और नक्सलवाद की कमर टूट गई है। काफी तादात में नक्सलियों ने आत्मसमर्पण भी किया। मीडिया ने इस तरह की खबरों को खूब प्रसारित भी हुई। लोगों में भरोसा जगा कि विपक्ष जो भी चिल्लाए, लेकिन सरकार ने अच्छा काम किया है। उसके बाद भी कई हमले हुए जिसमें हमारे बेगुनाहों की जान गई।  नक्सलवाद सिर्फ एक विचारधारा की जंग नहीं है। इकसे पीछे राष्टविरोधी ताकतें भी लगी हैं। हमारा तंत्र नक्सलियों की रणनीति में सेंध लगाने में नाकाम रहा है। दुर्गम इलाकों में इतनी आसानी से आधुनिक आयुध, एक-47, गोले, बारुद, सेना की वर्दी और रशद सामाग्री की पहुंच कैसे सुलभ होती है। देश की सीमा पाकिस्ता, बंग्लादेश, अफगानिस्ता, नेपाल, से घिरी हुई है। यहां हमारे सशस्त्र जवान सुरक्षा में लगे हैं। इसके बाद भी इतनी सामाग्रियंा कहां से और कैसे पहुंच जाती हैं। इन सबके लिए फंडिंग कहा से होती है। युवाओं और महिलाओं को इतनी सुनियोंजित तरीके से प्रक्षिण कैसे दिया जाता है। सेना की तरफ नक्सलियों ने भी कई स्तरीय सुरक्षा कोर स्थापित किया है

। सभी नेटवर्क को ध्वस्त करने में हम नाकाम हुए हैं। हम इसके लिए किसी खास सरकारों को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते हैं। इसके लिए हमारी सुरक्षा नीतियां ही दोषी हैं। हमने कभी इस रणनीति पर विचार नहीं किया कि बस यह अंतिम हमला होगा। आदिवासी इलाकों की समस्याओं के गहन अध्यन के लिए आयोग गठित करने की जरुरत हैं। यह जरुरी नहीं की हम बंदूक की संस्कृति का जबाब उसकी लौटती भाषा में ही दें। नक्सल संगठनों से बात करनी चाहिए। उनकी मांगों पर जहां तक संभव हो, उस पर लोकतांत्रिक तरीकों और बातचीत के जरिए विचार होना चाहिए। उन्हें मुख्यधारा में लौटाना चाहिए। क्योंकि मरने और मारने वाले दोनों अपने हैं। किसी भी स्थिति में छति देश की होती है। अब वक्त आ गया है जब लाल सलाम की खूनी संस्कृति पर विराम लगना चाहिए।

प्रभुनाथ शुक्ल स्वतंत्र पत्रकार

Mo : 8924005444  

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