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लुप्त होती 140 वर्ष पुरानी रतनपुरिहा भादो गम्मत ...पढ़े ये रिपोर्ट

कोटा -- फिरोज खान

रतनपुर को प्राचीन छत्तीसगढ़ के राजधानी होने का गौरव हासिल है यहां कई प्राचीन परंपराओं के साथ साथ प्राचीन धरोहर आज भी मौजूद है जिसमें से कई विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुके है उन्हीं में से एक है भादो गम्मत जिसकी रचना आज से करीब 140 वर्ष पूर्व यहां के कवि बाबुरेवा राम ने की थी जिसमें श्री कृष्ण की लीलाओं को बड़े ही मोहक अंदाज में प्रस्तुत किया गया है वर्षों पहले रतनपुर के हर गली मोहल्ले में इस भादों गम्मत का आयोजन होता था और लोगों के मनोरंजन और मेल मिलाप का यही एक साधन भी हुआ करता था लेकिन आज के इस डिजिटल यूग में यह विलुप्ति के कगार पर पहुच गया है जिसे रतनपुर करहैयापारा के कुछ युवा और बुजुर्ग बचाने में लगे हुए है उनके द्वारा प्रतिवर्ष भादों महीने में इस भादो गम्मत का आयोजन किया जाता है इस आयोजन में इन कलाकारों के द्वारा पारंपरिक वाद्य यंत्र जैसे तबला, हारमोनियम और मजीरा का ही उपयोग किया जाता है साथ ही प्राचीन 140 से चले आ रहे परंपरा के अनुरूप ही इस रतनपुरिहा भादों गम्मत का मंचन भी किया जाता है छत्तीसगढ़ सरकार को भी इस प्राचीन परंपरा को आगे आकर बचाने के लिए प्रयास किए जाने की जरूरत है नहीं तो यह 140 वर्ष पुरानी रचना और परंपरा केवल किताबों में ही सिमटकर रह जाएगी।


गणेश “विसर्जन” क्या सिखाता है हमें ?

“जन्म होता है हमारा माँ की कोख से और “विसर्जन” भी होता है हमारा माँ की गोद में |”

हम गणेश जी को हर साल बड़े हो धूमधाम से अपने घर में लेकर आते है|गणेश जी कहीं एक,तीन,पांच या दस दिनों तक बैठाया जता है|गणेश जी को हम बिलकुल अपने घर के सदस्य की तरह सेवा करते है गणेश जी को कोई अपना बेटा मानता है, कोई उसे अपना छोटा भाई और कोई उसे अपना दोस्त कहता है ये सब लोगों की उनके प्रति उनकी श्रद्धा होती है रिश्ता चाहे कोई भी गणेश जी का उनके साथ पर वो सबका मंगल ही करते है |उनके बहुत से नाम है पर हम उन्हें प्यार से “बप्पा” कहते है | इस दौरान दस दिनों तक गणेश पंडालों में काफी रौनक होती है इसी बहाने सब लोग एक जगह मिलते है और साथ में मिलकर इस त्यौहार को मनाते है | इन दस दिनों में पूरे शहर का वातावरण भक्तिमय हो जाता है |

गणेश उत्सव मनाने की शुरुवात:-

जैसा की हम सब जानते है की गणेश जी हिन्दुओं के अराध्य देव है |कोई भी धार्मिक उत्सव,पूजा हो या फिर विवाह उत्सव हो या किसी भी शुभ अवसर सबसे पहले गणेश जी की ही पूजा सर्व प्रथम की जाती है |कहा जाता है की महाराष्ट्र में सात वाहन,राष्ट्र कूट,चालुक्य आदि राजाओं ने गणेश उत्सव की प्रथा चलाई थी |छत्रपति शिवाजी महाराज गणेश जी की उपासना करते थे|इतिहास में ये वर्णन मिलता है की बाल्यकाल में उनकी माँ जीजाबाई ने पुणे के ग्रामदेवता कसबा गणपति की स्थापना की थी |तभी से यह परम्परा चली आरही है |उसके बाद पेशवाओं ने यह परम्परा को आगे बढाया|

पहले सिर्फ घरों में होती थी गणेश पूजा:-

ब्रिटिश काल में लोग किसी भी संस्कृत कार्यक्रमों या उत्सवों को साथ में मिलकर या एक जहग इकठा होकर नहीं मना सकते थे |इसलिए लोग घरों में ही गणेश जी पूजा किया करते थे|लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने पुणे में पहली बार सार्वजनिक रूप से गणेश उत्सव मनाया |आगे चलकर उनका यह प्रयास एक आन्दोलन बना और स्वतंत्रता आन्दोलन में इस गणेश उत्सव ने लोगों को एक जुट करने में अहम् भूमिका निभाई है |इस तरह गजानन राष्ट्रिय एकता के प्रतिक बन गये | पूजा को सार्वजनिक महोत्सव का रूप देते समय उसे केवल उसे धार्मिक कर्म कांडों तक ही सिमित नहीं रखा गया बल्कि गणेश उत्सव को आजादी की लड़ाई,छुआछुत दूर करने और समाज को संगठित करने तथा आप आदमी का ज्ञानवर्धन करने का जरिया भी बनाया गया |गंगाधर तिलक ने १८९३ में गणेश उत्सव का सार्वजनिक पौधारोपण किया था जो आज एक विराट वत वृक्ष का रूप ले चुका है |

गणेश जी मूर्ति कैसी होनी चाहिए और क्यूँ ?

चलिए हमने गणेश उत्सव की शुरुवात कैसे और कब हुई ये तो जान गये अब दिमाग में ये सवाल है की गणेश की मूर्ति किसकी बनाई जाए क्यूँ की मंदिरों में जो मूर्तियाँ स्थापित की जाती है वो पत्थरों की बनी होती है इस तरह की मूर्तियों को तो हम गणेश उत्सवों में नहीं विराजित कर सकते क्यूँ की इन उत्सवों में हम दस दिनों तक ही गणेश जी की पूजा करते है और फिर उसका विसर्जन करते है इसलिए इस समय जो गणेश जी की मूर्तियाँ बनाइ जाती है वो मिटटी की होती है ताकि उसे जब हम विसर्जित करे तो वो आराम से पानी में घुल जाए | लेकित आजकल मिटटी की जगह प्लास्टर ऑफ़ पैरिस की मूर्तियाँ बनाई जा रही है इसकी बनी मूर्तियाँ पानी में नहीं घुलती जिसके कारण पानी प्रदूषित होता है और मूर्तियाँ जैसी की वैसी ही रह जाती जो जो बहकर हमारे पैरों के निचे तो कभी बहकर गंदें पानी में चली जाती है और इस तरह भगवान् का अपमान होता है| इस तरह की मूर्तियाँ काफी कीमती होती है साथ ही परियावर्ण को नुकसान भी पहुचाती है |इसलिए हमें हमेशा मिटटी से बनी मूर्तियाँ ही खरीदनी या बनानी चाहिए ताकि वो पानी में आसानी से घुल जाए और कोई नुकासान भी न हो |इस बार कई जगहों पर फिटकरी से बनी गणेश जी की प्रतिमायें भी बनाई गई है |फिटकरी से गणेश जी प्रतिमा बनाने का उद्देश्य ये था की जब इन मूर्तियों का विसर्जन हम पानी में करेंगें तो वो पानी को साफ़ करेगा और इससे कोई नुकसान भी नहीं होगा |

विसर्जन शब्द का अर्थ :-

हमने जान लिया की गणेश उत्सव की शुरुवात कैसे हुई और किस तरह मिटटी की बनी गणेश जी की प्रतिमायें प्रकृति के लिए अच्छी होती है|पर कभी हमने इस बात पर गौर किया है की विसर्जन शब्द का वास्तविक क्या अर्थ होता है,

हम पानी में ही मूर्तियों को क्यूँ विसर्जित करते है ?

ये धर्म और विश्वास की बात है की हम गणेश जी को अकार देते है लेकिन ऊपर वाला तो निराकार है और सब जगह व्याप्त है लेकिन आकार को समाप्त होना ही पड़ता है इसलिए विसर्जन होता है |जन्म का त्याग करना पडेगा विसर्जन हमें ये सिखाता है की इंसान को अगला जन्म पाने के लिए इस जन्म में अपने इस शारीर का त्याग करना पडेगा | गणेश जी मूर्तियाँ बनती है,पूजा होती है फिर उसका विसर्जन कर दिया जाता है ताकि अगले बरस आने के लिए उनको इस साल विसर्जित होना होता है | जीवन भी यही है इस जन्म में अपनी जिम्मेदारियां पूरी कीजिये और समय समाप्त होने पर अगले जन्म के लिए इस जन्म को छोड़ दीजिये |

इस उत्सव को और उपयोगी कैसे बनाए ?

दस दिनों तक ये उत्सव हम बड़े ही धूमधाम से मनाते है काफी सारे रंगारंग कार्यक्रमों का भी आयोजान करते है |हम इस उत्सव को और भी कैसे उपयोगी बना सकते है ?हमें इस बात पर भी जोर देना चाहिए |हम इस उत्सव में जरूरत मंदों को उनके जरूरत की वस्तुएं दान दे सकते है,मिटटी की मूर्तियों को किस तरह अपने घर में कैसे विसर्जित करे?हमें तालाबों या नदियों में मूर्तियों को विसर्जित करने की अपेक्षा कृतिम तालाब बनाकर उसमे विसर्जन की प्रकिया शुरू करनी चाहिए |इस समय काफी झाकियों का भी जगह–जगह आयोजन होता है उन झाकियों में रामयण की कथा आदि बताने से अच्छा ज्ञान वर्धक कहानियां या साफसफाई से जुडी बातें शिक्षा,खेल या विज्ञान से जुडी उपलब्धियों को इन में प्रदर्शित किया जाए ताकि बच्चों और लोगों को जानकारी मिल सके |हम सब जानते है मुंबई में लालबाग के गणपति काफी फेमस है इस बार यहाँ पंडाल में चन्द्रयान-२ के बारे लोगों को जानकारी मिल सके इस तरह यहाँ इस पंडाल को सजाया गया है |हमें विसर्जन बहुत शालीनता के साथ करना चाहिए इस वक्त शराब आदि का सेवन नहीं करना चाहिए |इस तरह हम इस उत्सव को और भी बेहतर बना सकते है | जाते-जाते यहीं कहना चाहूँगीं गणपति बप्पा मोरियाँ, अगले बरस तू जल्दी आ |

||वर्षा||

अपने ही घर में पराई होती जा रही हमारी भाषा हिंदी

“अंग्रेजी भाषा मैहमान है उसे वही रहने दीजिये, और अपनी भाषा हिंदी को पराया न करे”

भारत में हमेशा ही अतिथि देवो भव: की परम्परा रही है |इसी परम्परा के चलते हमारी पुरे विश्व में एक अलग पहचान है |यूँ तो भारत की बहुत सारी खूबियाँ है पर आज हम हमारी राष्ट्रभाषा हिंदी के बारे में बात करते है इस विषय को आगे बढने से पहले मैं आप लोगों को थोडा फ़्लैश-बैक में ले जाना चाहती हूँ जैसा की हम सब जानते है करीब २०० सालों तक अंग्रेजों ने हम पर राज किया बाद में काफी प्रयासों के बाद हमें आजादी मिली| अंग्रेज तो चले गये पर अपनी भाषा यहीं छोड़ गये और हम आज भी उतना ही आदर सम्मान इस भाषा का कर रहे है जैसे एक मैहमान का करते है |

आज कल हमारे समाज में जिस व्यक्ति को फराटेदार इंग्लिश आती है उसे बहुत सम्मान की नज़रों से देखा जाता है

जैसे उसने कोई जादुई विद्या सिख ली हो और हम यहीं नहीं रुकते दूसरों को भी उसकी मिसाल देते नहीं थकते |ऐसे लोगों से मैं यहीं कहना चाहूँगीं की उनको अपने बच्चों के विदेशी नाम रखने चाहिए ,तब राम,लक्ष्मण ओम जैसे क्यूँ नाम रखते है ?आज कल जब बच्चा पैदा होता है और जब कुछ दिनों बाद वो टूटी-फूटी भाषा में कुछ बोलता सीखता है तो आज कल के माता-पिता उसे पहले अ,आ,इ ,ई नहीं बल्कि A,B,C,D सिखाते है ,उसे माँ-बाबूजी बोलना नहीं बल्कि मम्मा-पापा सिखाते है क्यूँ ,क्यूँ की आज के समय की यहीं मांग है वो घर में भी ज्यादा से ज्यादा उससे अंग्रेजी में बात करने की कोशिश करते है यहाँ तक की आज कल स्कूलों में एक नया ट्रेंड शुरू हो गया है ।बच्चों के एडमिशन के वक्त माता-पिता का भी इंटरव्यु लिया जाता है जिसमें उन्हें अंग्रेगी आती है या नहीं और भी कई चीजे देखी जाती है उनकी जॉब, फैमिली स्टेटस आदि जिन पालकों को अंग्रेजी नहीं आती उन्हें सीधा-सीधा ये कह दिया जाता है की आपको अंग्रेजी नहीं आती तो आप बच्चों को पढाई में कैसे मदत करेंगें | आज कल जो हिंदी बोलते है उसे हिन दृष्टि से देखा जाने लगा है |जिसका बुरा असर हमारे बच्चों पर पड़ रहा है कई लोग इसी वजह से डिप्रेशन में चले गये है या तो उनको अच्छी नौकरियों से हाथ धोना पड़ रहा है |क्या इन बच्चों में प्रतिभा की कोई कमी है नहीं ।इसकी मुख्य वजह हम ही है,जी हाँ हम हमने ही अपनी भाषा को उसी के घर में अजनबी बना दिया है ।आज यदि कोई शुद्ध हिंदी में कुछ पूछ ले की ट्रेन को हिंदी में क्या कहते है ,या फिर क्रिकेट गेम को हिंदी में क्या कहते है? तो हम ही उसका जवाब नहीं दे पायेंगे |

लोग हिंदी फ़िल्में देखना तो पसंद करते है पर हिंदी बोलने में शर्मिन्दगीं महसूस करते है |

कभी हमने इस बात पर गौर किया है की भारत में हिंदी से ज्यादा अंग्रेजी को जितना महत्व दिया जाता है उतना क्या दुसरे देशों में हिंदी को दिया जाता है जितना प्रयास हम अंग्रेजी बोलने में करते है उतना ही प्रयास दुसरे देश हिंदी सिखने की इक्षा रखते होंगें,इसका जवाब हम सब को पता है नहीं |इससे हमें क्या सीखना चाहिए पहले हमें अपनी राष्ट्रभाषा को ज्यादा महत्व देना चाहिए|हमें बच्चों की हिंदी पर ज्यादा जोर देना चाहिए न की अंग्रेजी पर |मैं ये नहीं कह रही की अंगेजी हमें नहीं सीखनी चाहिए या वो बुरी भाषा है बल्कि अंग्रेजी हमें जरुर सीखनी चाहिए क्यूँ की इसे पुरे विश्व में ज्यादा से ज्यादा बोला जाता है और समझा भी। हमे इसका उपयोग जरूत के वक्त उपयोग करना चाहिए | हमे अपनी राष्ट्रभाषा का उपयोग ज्यादा से ज्यादा करना चाहिए उसे सम्मान देना चाहिए और अपने बच्चों को भी इसका महत्व बताना चाहिए क्यूँ की यहीं आने वाले देश का भविष्य होते है |हमें सरकारी या प्राइवेट कंपनियों में ज्यादा से ज्यादा हिंदी का उपयोग करना चाहिए तभी हम हिंदी को बचा पायेंगें |

आज का परिदृश्य देखने से एसा लगता है की हम धीरे-धीरे अंग्रेजी भाषा के गुलाम होते जा रहे है ये और अपनी भाषा हिंदी को खुद ही मिटाते जा रहे है यदि ऐसी ही स्थिति रही तो हम अपने ही घर में अजनबी बन कर रह जायेंगें ।जैसे अंग्रेजों की गुलामी के वक्त थे फर्क इतना होगा की उस वक्त विदेशी हम पर राज कर रहे थे और इन्सान गुलामी| इस वक्त विदेशी भाषा हम पर राज कर रही है और हमारी मानसिकता उसकी गुलामी | ✍वर्षा

जांजगीर चांपा : विवादों के कारण चर्चा में रहने वाला विकासखंड शिक्षा कार्यालय अकलतरा फिर सुर्खियों में , दो बीईओ के बीच कुर्सी की खींचातानी का मामला पंहुचा थाने.... पढ़े पूरा मामला..देख विडियों

A REPORT BY : यश कुमार लाटा

हमेशा अपने विवादों के कारण चर्चा में रहने वाला विकासखंड शिक्षा कार्यालय अकलतरा फिर सुर्खियों में है | दो बीईओ के बीच कुर्सी की खींचातानी का मामला थाने तक पहुच गया है | नवपदस्थ बीईओ  वेंकट रमन  सिंह पाटले द्वारा कार्यालय में ताला लगा कर चले जाने का आरोप लगाते हुए पुराने बीईओ लक्ष्मण सराफ बाहर बैठकर काम करते नजर आए तथा अवैधानिक रूप से चार्ज लेने की बात को लेकर थाने में लिखित शिकायत दर्ज कराई गई है |

देखे विडियों....

वही नए बीईओ वेंकट रमन  सिंह पाटले का कहना है कि मैंने शासन के आदेश का पालन करते हुए पद ग्रहण किया है और कार्यालय में जरूरी दस्तावेज तथा कीमती सामान होने के कारण ताला लगाया था |पुराने बीईओ लक्ष्मण सराफ का स्थानांतरण अकलतरा से पाली कर दिया गया था वही उनके स्थान पर वेंकट रमन  सिंह पाटले को अकलतरा बीईओ का प्रभार दिया गया है वही बीईओ लक्ष्मण सराफ शासन के इस आदेश को कोर्ट में चुनोती दिया है  वही बीईओ लक्ष्मण सराफ  कोर्ट से  फिलहाल स्थानांतरण पर स्टे होने का दावा कर रहे हैं | 

अवैध शराब कि बिक्री जोरों पर, बिर्रा पुलिस की कार्यप्रणाली उठ रहे है सवाल ...पढ़े ये खास रिपोर्ट

बिर्रा :- क्षेत्र में अवैध शराब कि बिक्री जोरों पर है, लेकिन बिर्रा पुलिस मौन है, इनदिनों बिर्रा थाना क्षेत्र के तालदेवरी, सेमरिया,बसुंला,करनौद,बसंतपुर, किकिरदा, करही में अवैध शराब कि बिक्री जोरों पर, लेकिन बिर्रा पुलिस द्वारा इस पर कोई कार्यवाही नहीं कि जा रही हैं अवैध शराब के कारण युवा पीढ़ी नशे की चपेट में है। नशे में चूर हो कर युवा पीढ़ी अपराधिक घटनाओं को अंजाम देते हैं। अवैध शराब की बिक्री से सबसे ज्यादा परेशानी महिलाओं व विद्यार्थियों को होती है। शाम होते ही शराबियों का जमावड़ा होता है जिससे महिलाओं का शाम ढलते ही घर से निकलना मुश्किल हो जाता है। शराबियों द्वारा शराब पी कर जमकर उत्पात मचाया जाता है। शराबियों द्वारा विद्या के मंदिर को भी नहीं बख्सा गया है। शराब पीकर शराबियों द्वारा बोतल को विद्यालय में फोड़कर जमकर उत्पात मचाते हैं जिससे विधार्थीयों को परेशानी होती है। ग्रामीणों ने इसकी शिकायत पुलिस, आबकारी विभाग से की है लेकिन आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है। ग्रामीणों ने बताया कि ऐसा नहीं है कि इसकी जानकारी बिर्रा पुलिस, आबकारी विभाग को नहीं हैं इसकी सूचना समय - समय पर दी जाती है लेकिन आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। पुलिस व आबकारी विभाग की अनदेखी से अवैध शराब विक्रेताओं के हौसले बुलंद है। बिर्रा क्षेत्र के आसपास के क्षेत्रों से सुबह, शाम, रात को बोरी, कार्टून व थैला से भारी मात्रा में शराब की खेप पंहुचती है। शराब बाकायदा पन्नी में भर कर पहुंचाया जाता हैं। घर तो घर अब दुकानों में भी शराब बिक रही है। इस बात की जानकारी आबकारी अधिकारियों के साथ पुलिस को भी है फिर भी शराब धड़ल्ले बिक रहा है। वही एक व्यक्ति ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि बिर्रा थाना में टीआई,एसआई द्वारा एक बाहरी व्यक्ति को रखा गया है जो दिन-रात थाना में ही रहता है, साथ ही SI के साथ ही घुमता है इससे अंदेशा लगाया जा रहा है कि अवैध शराब विक्रेताओं से यही व्यक्ति सांठगांठ - वसूली करता है, साथ ही पुलिस कि गोपनीय जानकारी भी भंग करता है। अब देखना होगा कि मीडिया में खबर आने के बाद अधिकारियों द्वारा इसे कितना गंभीरता से लिया जाता है और कार्यवाही कि जाती है, या हमेशा कि तरह मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है।

मोर तीजा तिहार

कइसन सुघघर लागथे वो, मयके के तिहार.,, करू भात के दिन अउ तीजा उपवास...बड़े बड़े डेचकि में चुरही डुबकी कढ़ही, ठेठरी अउ खुरमी के भोग परसाद चढ़ही।।। सरी मंझनीया द्वारी में संगवारी मन संग गोठीयाबोन, काकर लइका कातेक बाड़हीस यहु ला देखबोन, बइठे- बइठे अइसने अपन दुःख संसो ला बताबोन, अउ खेलत खेलत गिरही लइका तेला दु मुटका मार के सुताबोन।।। नवा लूगरा अउ साटी मुँदरी, ए दरी बीसाए हो फूलसकरी, भरे बीहीनया सबो ला पहिन के मंदिर जाबोन, पाँव पर के, बीनसा पी के नवा दुलहीन कस इतराबोन।।। अइसने मया दया ला राखे रहीबे भौजी ला सुरता देवाबोन, चार दिन के तिहार ला हँसी खुसी ले बीताबोन।।। फेर जाए के बेरा आही अउ काम के सुरता लाही.. जतका जल्दी आए के ओतका जल्दी जाए के घेरी बेरी गोठीयाही।।। अपन अपन मोटरा ला जोर के, मइके के मया ला भुला के, आँसू ला अचरा में पोंछ के, एक दरी फेर अंगना ला छोर के मोटर में बैठ जाबोन।।। लेखक:- ।।।कामायनी।।।

महारानी पद्मिनी का बलिदान।चित्तौड़ का पहला जौहर

नीलकमल सिंह ठाकुर : जौहर की गाथाओं से भरे पृष्ठ भारतीय इतिहास की अमूल्य धरोहर हैं। ऐसे अवसर एक नहीं, कई बार आये हैं, जब हिन्दू ललनाओं ने अपनी पवित्रता की रक्षा के लिए ‘जय हर-जय हर’ कहते हुए हजारों की संख्या में सामूहिक अग्नि प्रवेश किया था। यही उद्घोष आगे चलकर ‘जौहर’ बन गया। जौहर की गाथाओं में सर्वाधिक चर्चित प्रसंग चित्तौड़ की रानी पद्मिनी का है, जिन्होंने 26 अगस्त, 1303 को 16,000 क्षत्राणियों के साथ जौहर किया था। पद्मिनी का मूल नाम पद्मावती था। वह सिंहलद्वीप के राजा रतनसेन की पुत्री थी। एक बार चित्तौड़ के चित्रकार चेतन राघव ने सिंहलद्वीप से लौटकर राजा रतनसिंह को उसका एक सुंदर चित्र बनाकर दिया। इससे प्रेरित होकर राजा रतनसिंह सिंहलद्वीप गया और वहां स्वयंवर में विजयी होकर उसे अपनी पत्नी बनाकर ले आया। इस प्रकार पद्मिनी चित्तौड़ की रानी बन गयी। पद्मिनी की सुंदरता की ख्याति अलाउद्दीन खिलजी ने भी सुनी थी। वह उसे किसी भी तरह अपने हरम में डालना चाहता था। उसने इसके लिए चित्तौड़ के राजा के पास धमकी भरा संदेश भेजा; पर राव रतनसिंह ने उसे ठुकरा दिया। अब वह धोखे पर उतर आया। उसने रतनसिंह को कहा कि वह तो बस पद्मिनी को केवल एक बार देखना चाहता है। रतनसिंह ने खून-खराबा टालने के लिए यह बात मान ली। एक दर्पण में रानी पद्मिनी का चेहरा अलाउद्दीन को दिखाया गया। वापसी पर रतनसिंह उसे छोड़ने द्वार पर आये। इसी समय उसके सैनिकों ने धोखे से रतनसिंह को बंदी बनाया और अपने शिविर में ले गये। अब यह शर्त रखी गयी कि यदि पद्मिनी अलाउद्दीन के पास आ जाए, तो रतनसिंह को छोड़ दिया जाएगा। यह समाचार पाते ही चित्तौड़ में हाहाकार मच गया; पर पद्मिनी ने हिम्मत नहीं हारी। उसने कांटे से ही कांटा निकालने की योजना बनाई। अलाउद्दीन के पास समाचार भेजा गया कि पद्मिनी रानी हैं। अतः वह अकेले नहीं आएंगी। उनके साथ पालकियों में 800 सखियां और सेविकाएं भी आएंगी। अलाउद्दीन और उसके साथी यह सुनकर बहुत प्रसन्न हुए। उन्हें पद्मिनी के साथ 800 हिन्दू युवतियां अपने आप ही मिल रही थीं; पर उधर पालकियों में पद्मिनी और उसकी सखियों के बदले सशस्त्र हिन्दू वीर बैठाये गये। हर पालकी को चार कहारों ने उठा रखा था। वे भी सैनिक ही थे। पहली पालकी के मुगल शिविर में पहुंचते ही रतनसिंह को उसमें बैठाकर वापस भेज दिया गया और फिर सब योद्धा अपने शस्त्र निकालकर शत्रुओं पर टूट पड़े। कुछ ही देर में शत्रु शिविर में हजारों सैनिकों की लाशें बिछ गयीं। इससे बौखलाकर अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ पर हमला बोल दिया। इस युद्ध में राव रतनसिंह तथा हजारों सैनिक मारे गये। जब रानी पद्मिनी ने देखा कि अब हिन्दुओं के जीतने की आशा नहीं है, तो उसने जौहर का निर्णय किया। रानी और किले में उपस्थित सभी नारियों ने सम्पूर्ण शृंगार किया। हजारों बड़ी चिताएं सजाई गयीं। ‘जय हर-जय हर’ का उद्घोष करते हुए सर्वप्रथम पद्मिनी ने चिता में छलांग लगाई और फिर क्रमशः सभी हिन्दू वीरांगनाएं अग्नि प्रवेश कर गयीं। जब युद्ध में जीत कर अलाउद्दीन पद्मिनी को पाने की आशा से किले में घुसा, तो वहां जलती चिताएं उसे मुंह चिढ़ा रही थीं।

स्त्री के मन की बात

"अपमान मत करना नारियों का, इनके बल पर जग चलता है, पुरुष जन्म लेकर तो, इन्हीं की गोद में पलता है।" हम अक्सर एक औरत के बाहरी रूप को देख के प्रभावित होते है चाहे उसके सौन्दर्य की बात हो या या उसके गुणों की |जब लड़की स्कुल में पढ़ रही होती है तो हम उसके परीक्षा के परिणामों की चर्चा करते है बाद में उसके बाद उसके कॉलेज के चयन की फिक्र करते है कभी-कभी लडकियां माता-पिता के द्वारा बताये कैरियर को चुनती है जैसे की हम सब को पता है भारत में सदियों से लड़की की शादी उसके घर वालों की मर्जी से की जाती है जिसका पालन हर लड़की आज भी करती है| हां आज की लडकियां इन लड़कियों में हम भी शामिल है जो अपनी पसंद के लड़के से शादी करने की मर्जी अपने परिवार के सामने रखने में नहीं झिझकती है और माता-पिता को भी इस बात से कोई आपत्ति नहीं होती है |आज हम लड़कियों के मन की बात करेंगे जिन बातों को हम महसूस नहीं कर पाते वो बातें जो लडकियां अपने फर्ज को पूरा करने के लिए अपनी इच्छा को अक्सर मार देती है और हम उन बातों को गौर नहीं कर पाते | जब लडकियां छोटी होती है तो उसे अक्सर हम उसे ये याद दिलाते रहते है की तुम लड़की हो भाई को वो उससे ज्यादा छुट दी जाती है जो लड़कियों को आज भी नहीं दी जाती लडकियां बहुत कुछ करने की काबिलियत रखती है पर हम उसकी इन बातों का गला बचपन से ही घोटते आते है ये याद दिलादिला कर की हम लडकियां है यदि उसे अपनी सहेलियों के साथ कहीं घुमने भी जाना हो तो वो खुले मन से हाँ नहीं कह सकती क्यूँ क्यूंकि उसके मन में डर होता है की नहीं उसे परिवार वालों की इजाजत मिलेगी या नहीं और समय और परिवार वालों का मुड़ देखकर जाने की परमिशन मिल जाती है चलो परमिशन मिल भी गई उसमें भी कई प्रश्नों के जवाब देने के बाद समय अवधि भी बता दी जाती है कब तक अना है |लडकियां अपनी मर्जी से कुछ नहीं कर सकती यदि कर ले तो उसे बिगडैल का टैग मिल जाता है और पाबंदियां बड़ा दी जाती है जब हम बड़े होने का फर्ज निभाते है तब हम एक बार भी इस बात को सोचते है की हमारे इन फैसलों का असर हमारी बच्चियों पर कैसा होगा ?कभी हम उनके पास बैठकर उनकी मन की बात समझने का प्रयास करते है ?कभी हम उनके लिए खुद के फैसलों की तारीफ़ करते है नहीं ? जब लड़की की शादी होती है तब उसकी जिम्मेदारी और भी बड जाती है यहाँ से उसका असली सफ़र या यूँ कहें उसकी परीक्षा शुरू होती है| माता-पिता के घर को छोड़ नए लोगों के बिच वो एकदम अनजान लोगों के बिच अकेली होती है तब यदि पति उसका दोस्त बनकर उसका हौसला दे दे तो वो कम समय में ही सब कुछ संभाल लेती है पर एसा कम ही होता है| हम लड़कियों को खुद ही सब कुछ अपनी सूझबुझ से करना होता है पति,सास-ससुर,देवर-देवरानी और समाज के लोगों का ध्यान रखना होता है ये तो सच है की लडकियां कितना भी करे वो कम ही होता है |अब लडकियों के कंधे पर दो घरों की जिम्मेदारियां होती है अब बात-बात पर उनके संस्कारों पे सवाल खड़े होते है |घर में सब को खाना खिलाने के बाद घर की बहुएं खाना खाती है इसे हम अच्छी बहुओं के संस्कार कहते है चाहे उसे भूख लगी हो तो भी वो इस परम्परा का पालन करती है |आज कल नारियां अक्सर पड़ी लिखी होती है कुछ लडकियां शादी के बाद भी जॉब करती है पर कुछ होती है जो पारिवारिक कारण से शादी के बाद नौकरियां छोड़ देती है और सारा समय घर के काम करने में बिताती है पर हम उसके त्याग को समझ नहीं पाते की वो किस कारण से अपनी जॉब छोड़ी है हम हमेंशा उसे कमजोर समझ बैठते है और उसके इस त्याग को हम लड़कियों को ये सब करना ही पड़ता है क्या करें किस्मत का खेल है एसा बोलकर उसे सांत्वना देते है पर उसके मन की बात को समझने की कोशिश करते है |वो भी चाहती तो नौकरी कर सकती है पर नहीं कर रही क्यूँ क्या वो किसी से कम हा या शादी के बाद बेड़ियाँ बाँध दी गई उसके पैरों में नहीं? यही हम उसे समझने में गलती कर देते है उसके मन की बात,उसकी भावना को नहीं समझ पाते यहाँ तक की उसका जीवन साथी भी उसके मन की बात नहीं समझ पाता|कई बार उसकी गलती न होने पर भी बातें सुन लिया करती है वो एसा क्यूँ करती है?हमने कभी सोचा है नहीं?पति के मन की बातों को पत्नियां हमेशा समझ जाती है पर पति कभी उसके मन की बात समझने की कोशिश नहीं करते बहुत ही कम पति होते है जो पत्नियों के मन को समझते हो |पत्नियां पतियों से ज्यादा काम करती है वो उसके उठने से पहले उठती है और उसके सोने के बाद सोती है वो जली हुई रोटी और ठंडा खाना खा लेती है पर पतियों को अक्सर गर्म खाना ही परोसेगी,कभी यदी मुड़ न हो खाना बनाने का या तबियत खराब हो तो भी वो दूसरों का ख़याल करके खाना बनाती है पर आराम करने की इच्छा होते हुए भी नहीं करती वो दूसरों का ख़याल रखने में कोई कसर नहीं छोडती पर जब बात खुद की हो तो वो बहाने बना देती है |ये सब वो क्यूँ करती है क्यूँ की उसका फर्ज है करके करती है या कुछ और कारण भी हो सकता है ये सोचा है नहीं ? मुझे अक्सर मेरी माँ ने कभी बासी खाना नहीं खिलाया हाँ पर मैंने अपनी माँ को रात की बची रोटी को गर्म करके चाय के साथ खाते देखा है या रात का खाना गर्म करके खाते देखा है जब भी मैं कहती माँ मुझे दे देते आप, आप गर्म रोटी खा लेते तो मुस्कुराकर कहती नहीं मुझे आदत है अब खाना बचा है इसे फेकेंगें तो नहीं ना |ऐसा हर माँ करती है अपने बच्चों के लिए पर हम कभी उसकी भावनाओं को समझ पायें है ?हमने कभी उसे अपने दोस्तों पार्टियों में ले गये है हाँ भले उसने अपनी कई सहेलियों से तुम्हे मिलवाया होगा |कभी हमने उसे फिल्म दिखाने की सोची या उसे कभी ये कहाँ की मम्मी आप रोज काम करते हो आज आप आराम करो हम सारा काम करते है? हम तो सन्डे एन्जॉय करते है पर हमारी माँ का किस दिन हॉलिडे होता है ये सब बातें हमनें कभी सोची है उसने सारी उम्र हमारे बारे में सोच कर अपना पूरा जीवन निकाल दिया उसने एसा क्यूँ किया ये बात कभी हमारे जहन में आई ?उसने हर वक्त हमारी पसंद ना पसंद का ख़याल रखा क्या हमने रखा ? दोस्तों जो बाते हम नहीं समझ पाए की लडकियां,पत्नियां और हमारी माँ ये सब क्यूँ करती है इसका जवाब बहुत ही सिंपल है क्यूँ की वो हमसे प्यार करती है हमारी फिक्र करती है इसलिए वो ये सब करती है पर हम उसके इस प्यार को,त्याग को फर्ज का नाम दे देते है इसके बदले हम कई बार उसका तिरस्कार भी कर देते है पर वो हमसे क्या चाहती है इस पर कभी गौर नहीं करते |वो सिर्फ हमसे थोड़ा प्यार,समय और सम्मान चाहती है यही बात हम नहीं समझ पाते ?स्त्रियाँ कभी-भी किसी से कम नहीं होती वो सीता है तो राधा भी और जरूरत पड़ने पर वो दुर्गा भी बन जाती है ऐसा कोई काम नहीं जो स्त्री न कर सके |आज की स्त्री हर बात पर लड़कों से आगे है वो घर के काम के साथ-साथ ऑफिस के काम को भी बखूबी निभाती है | वो अक्सर अपने मन की बात भले ही नहीं कहती पर इसका ये मतलब हर कीज ये नहीं की वो कमजोर है |उम्मीद करती हूँ की ये पड़ने के बाद हम स्त्रियों के मन की बात को समझ सके जो वो नहीं कह पाती है उसके प्यार को समझे और उसका सम्मान करें | लेखक वर्षा

अकलतरा : ट्रैलर वाहन और अकलतरा लायंस DAV स्कूल बस की टक्कर के बाद जिस मांग को लेकर लगा रहा 5 घंटों तक रोड पर चक्काजाम ! प्रशासन की तत्परता साबित हुई खोखली स्टॉपर लगाने के आधे घंटे बाद ही सड़क किनारे दिखे स्टॉपर...पढ़े लापरवाह प्रशासन की पूरी खबर

यश कुमार लाटा : अकलतरा

जांजगीर-चांपा जिले के अकलतरा थाना अंतर्गत ग्राम तरौद के पास एनएच 49 पर सोमवार सुबह एक तेज रफ्तार ट्रैलर वाहन ने लॉयन डीएवी स्कूल अकलतरा की बस को जोरदार टक्कर मार दी साथ की एक मोटरसायकल को भी अपनी चपेट में ले लिया वही मोटरसायकल चालक ने गाड़ी से कूद कर अपनी जान बचाई वही स्कूल बस में सवार छात्र छात्राओं को गंभीर चोटे आई थी जन्हें ग्रमीणों की मदद से अकलतरा के हरि कृष्ण अस्पताल में भर्ती कराया गया था जहाँ से प्रथमिक उपचार के बाद गंभीर छात्र छात्राओं को बिलासपुर रेफर कर दिया गया था वही हादसे के बाद गुस्साए परिजनों व आसपास के ग्रामीणों ने एनएच 49 में ओवरब्रिज की मांग को लेकर लगभग 5 घंटे तक चक्काजाम किया छात्र के परिजन और ग्रामीणों का कहना था कि यहां पर ओवरब्रिज होना चाहिए परंतु SDM के द्वारा लोगो को समझाया गया कि तत्काल ओवरब्रिज बनना संभव नहीं है तब परिजनों और ग्रामणो ने कहा कि हमें यहां पर तत्काल स्टॉपर और ब्रेकर , चोराहे पर लाइट , यातायात पुलिस एवं सिग्नल की व्यवस्था कराई जाए , इस पर कार्रवाई करते हुए एसडीएम द्वारा तत्काल जांजगीर से स्टॉपर मंगवाया गया और चौक के चारों ऒर में स्टॉपर लगवाया गया माहौल शांत होने के आधे घंटे बाद ही स्टॉपर जिनको रोड के बीच में वाहन की गति धीमी करने के लिए लगाया गया था वह रोड किनारे नजर आए इससे शासन की तत्परता पर सवाल उठ रहे हैं बार-बार एनएच पर हो रही घटनाओं पर शासन के द्वारा कोई उचित कदम नहीं उठाए जा रहे हैं जिनसे इन हादसों पर कोई कमी हो सके ।

स्वस्थ रहना है तो इन 6 मौकों पर जरूर पिएं पानी

जीवन में पानी का बहुत महत्व है। इसके बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। पानी हमारे शरीर के हर सेल में मौजूद है। मानव शरीर का लगभग 60 प्रतिशत पानी से बना है। अगर आपको भी स्वस्थ और फिट रहना है तो इन छः मौकों पर अवश्य पानी पीना चाहिए। 1- सुबह उठते ही, 2- खाने से पहले, 3- जब भी आपको भूख लगे, 4- वर्कआउट करने से पहले और बाद में, 5- जब आप बीमार हों, 6- जब आप थके हुए हों।
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