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बलौदाबाजार की राजनीति के शिखर पुरुष रहे पंडित बंसराज तिवारी का अवतरण दिवस आज, जानिए बलौदा बाजार के विकास में उनके योगदान को और उनके जीवन के संघर्षों की कहानी .....

बलोदा बाजार -  बलौदा बाजार की राजनीति के इतिहास पुरुष रहे पंडित बंसराज तिवारी का अवतरण दिवस है। उनके समय में बलोदा बाजार साधन सुविधा विहीन हुआ करता था। उस समय वह विधायक निर्वाचित होकर बलोदा बाजार के लिए अविस्मरणीय योगदान देकर बलोदा बाजार को एक नए शिखर तक पहुंचाया । उन सुविधाओं को उपलब्ध करवाया जो बलोदा बाजार में नहीं थी। आज हम जानते हैं राजनीति के उस महापुरुष की जीवन गाथा। 

  पं. बंशराज तिवारी का जन्म बलौदाबाजार के तत्कालीन पटेल सेनी टेशन पंचायत के अध्यक्ष एवं मुकद्दम पं. महावीर प्रसाद तिवारी के पुत्र रूप मे 6 मई 1925 को हुआ था। बाल्यावस्था मे ही पिता के स्वर्गारोहण के उपरांत बंशराज जी अल्पायु मे ही पटेल के पद पर पदस्थ हुए।महात्मा गांधी जी की प्रेरणा से सन 1940मे पटेल पद से इस्तीफा देकर स्वतंत्रता आंदोलन मे सक्रिय भूमिका निभाई। सन 1946मे बंशराज जी कांग्रेस समाजवादी पार्टी के सक्रिय सदस्य रहे। विधि स्नातक उत्तीर्ण बंशराज जी ने बलौदाबाजार मे वकालत प्रारंभ की। वकालत के साथ साथ राजनीतिक रूप से सक्रिय रहे हुए बंशराज जी ने असहाय और कमजोर लोंगो की भरपूर मदद की। बार कौंसिल बलौदाबाजार मे सचिव रहते हुए उन्होंने पृथक छत्तीसगढ राज्य एवं बलौदाबाजार को जिला बनाने के लिए अपनी आवाज मुखर की। आपातकाल के दौरान बंशराज जी ने अपने साथियों सहित बलौदाबाजार मे तत्कालीन दमनकारी सरकार के विरुद्ध जुलूस निकाला जिसके फलस्वरूप वह गिरफ्तार कर लिए गए और उन पर राजद्रोह का मामला चला।समाजवादी नेता मधु लिमये, जार्ज फर्नांडिस आदि के साथ सेंट्रल जेल रायपुर मे रहे। सन 1977 मे आपातकाल समाप्त होने के बाद जब देश मे जनता पार्टी की सरकार बनी तब बंशराज तिवारी जी बलौदाबाजार विधानसभा से विधायक निर्वाचित हुए और सन 1977 से 1980 के बीच विधायक रहते हुए उन्होंने क्षेत्र के विकास के लिए अप्रत्याशित कार्य किए जिसमे बलौदाबाजार नगर को पानी की किल्लत से निजात दिलाने के लिए शिवनाथ नदी मे सोनाडीह से बलौदाबाजार नगर तक पाईप लाईन के द्वारा जल प्रदाय योजना लाकर पानी उपलब्ध कराना, बलौदाबाजार नगर को गावों से जोड़ने के लिए सडको एवं पूल पूलियों का निर्माण, खोरसी नाला पर बडे पूल का निर्माण, बलौदाबाजार न्यायालय मे अतिरिक्त जिला सत्र न्यायालय की स्थापना, क्षेत्र के एकमात्र निजी महाविद्यालय को शासन के आधिन करके सुविधाजनक बनाना,नगर मे टेलीफोन एक्सचेंज, डाकघर, पानी टंकी का निर्माण, शासकीय अस्पताल को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से बड़े अस्पताल का स्वरूप देना आदि कार्य प्रमुख रूप से शामिल रहे। सन 2001मे पं. बंशराज तिवारी द्वारा अपनी पत्नी श्रीमती चंदा देवी तिवारी के देहावसान के पश्चात उनकी याद मे चंदा देवी तिवारी हास्पिटल की स्थापना की गई जिसका संचालन क्षेत्र के प्रसिद्ध चिकित्सक प्रमोद तिवारी द्वारा कुशलतापूर्वक किया गया। 9फरवरी 2006 को बंशराज तिवारी जी का स्वर्गारोहण हुआ और उनकी याद मे चंदा देवी तिवारी हास्पिटल बलौदाबाजार प्रत्येक वर्ष नि:शुल्क रोग निदान शिविर का आयोजन किया जाता रहा है जिसमे अभी तक हजारों जरूरत मंद लाभांवित हो चुके हैं।बंशराज जी की याद मे उनके पुत्र डा.प्रमोद तिवारी द्वारा मुख्य मार्ग बलौदाबाजार के चौड़ीकरण के लिए करोड़ों की जमीन शासन को दान की गई जिसके बाद बलौदाबाजार मुख्य मार्ग पं. बंशराज तिवारी के नाम से जाना जाता है

इस जिले के SDM ने किया शादी के आदेश को स्थगित, देखे आदेश

रायपुर:- पूरे प्रदेश में कोरोना संक्रमण का खतरा मंडराना शुरू हो चुका है इसे ही देखते हुए मुंगेली अनुविभागीय अधिकारी राजस्व द्वारा संक्रमण के रोकथाम के लिए मुंगेली के विभिन्न जगहों को कंटेंटमेंन जोन घोषित कर शादी के लिए जारी आदेश की सूचना को आगामी आदेश तक स्थगित कर दिया गया है।

बच्चों ने रखा रोजा, कहा- अल्लाह की इबादत कर कोरोना दूर भगाना है

बैकुंठपुर- इस्लाम के पवित्र माह रमजान में पिछले साल की तरह लोग घरों में इबादत कर रहे हैं। रोजा रखने में छोटे बच्चे भी पीछे नहीं है। बच्चे न सिर्फ रोजा रख रहे हैं, बल्कि नमाज अता कर कोरोना से मुक्ति के लिए दुआ कर रहे हैं। पूरी दुनिया में कोरोना महामारी फैली हुई है। लोग भयभीत हैं और लॉकडाउन की वजह से घरों में कैद हैं। ऐसे में खुदा की इबादत कर बस यही दुआ है कि दुनिया कोरोना से मुक्त हो जाए। शनिवार को रमजान माह के चौथे दिन मुस्लिम समुदाय के लाेगाें ने सवेरे से रोजा रखकर भूखे प्यासे शाम को इफ्तार के समय रोजा खोला। इसके बाद रब का शुक्रिया अता किया। बता दें कि हर साल की तरह भीषण गर्मी में रमजान शुरू हुआ है। 38 डिग्री के तापमान व कोरोना वायरस के प्रकोप के बीच कई तरह की परेशानियां रोजेदारों हो रही हैं, लेकिन इससे वह डगमग नहीं हैं, अल्लाह के लिए सबकी आस्था दोगुनी हो गई है। मुस्लिम समुदाय के घर, मोहल्लों में रमजान को लेकर उत्साह दिख रहा है। राेजेदाराें सुबह जल्दी उठकर परिजनों के साथ सहरी कर रहे हैं, और दिनभर रोजे का पूरे नियम के साथ पालन कर रहे हैं। इसमें खासकर ऐसे बच्चे अधिक उत्साहित हैं जो अपने जीवन में पहली बार रोजा रख रहे हैं। चिरमिरी पोड़ी के रेयान अली, सुफियान सिद्धिकी, सहन अख्तर खान, सादिया अली, अयान सिद्धिकी, जुनेरा फातिमा बताते है कि रोजा रखकर काफी खुशी हो रही है। उनका कहना था कि निश्चित तौर पर इस रमजान महीने में की जाने वाली इबादत से कोरोना वायरस से छुटकारा मिलेगा। बच्चों ने कहा कि वे सजदा के साथ अल्लाह की इबादत कर रहे है। रोजा के दौरान अल्लाह से नेक दिल बनने और खूब शिक्षा अर्जित करने की दुआ मांग रहे है। जुम्मे पर घर से नमाज अता करने की अपील : बैकुंठपुर जामा मस्जिद के इमाम वाहिद अली ने बताया कि काेराेना के गाइडलाइन का पालन करते हुए रोजेदारों को घरों पर ही नमाज अता करना है। माहे रमजान की मुबारकबाद देते हुए कहा है कि इस बार इफ्तार में पड़ोस के जरूरतमंद लोगों की मदद भी करें। सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कर लोग घरों पर ही परिवार के साथ रोजा इफ्तार करें। उन्हांेने कहा कि काेराेना संक्रमण काे देखते हुए घर पर ही नमाज अता करें।

BBN24 सेहत मंत्रा : सर्दियों में खाएं चना भाजी, स्वादिष्ट होने के साथ ही रोगों से लड़ने में है मददगार

रायपुर। बदलते मौसम के साथ खुद का ध्यान रखना भी काफी जरूरी है. वहीं, कोरोना की इस महामारी में सेहत का ख्याल रखना और भी जरूरी हो जाता है. सर्दियों का मौसम चल रहा है ऐसे में इस मौसम में लोग सेहत को लेकर काफी लापरवाही बरतते हैं. इस मौसम में सर्दी जुकाम होना आम बात है. साथ ही इस मौसम में मार्केट में कई तरह के साग-भाजी मिलने लगते हैं. यह स्वादिष्ट होने के साथ ही सेहत के लिए काफी अच्छा होता है. ऐसे में आज हम आपको सर्दियों में मिलने वाले चने की भाजी के बारे में बताने जा रहे हैं. चना भाजी में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, फाइबर, कैल्शियम, आयरन और विटामिन भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं. आइए जानते हैं इससे मिलने वाले फायदों के बारे में-

कब्ज की समस्या करे दूर- सर्दियों में चना भाजी का साग खाने से कब्ज की समस्या दूर होती है. चना भाजी के साग में प्रोटीन की मात्रा अधिक पाई जाती है. जो ब्लड सर्कुलेशन को बढ़ाता है.

वजन घटाने के लिए- इसमें कैलोरी की मात्रा काफी कम होती है. ऐसे में अगर आप वजन घटाने के बारे में सोच रहे हैं तो चना भाजी का साग आपके लिए काफी फायदेमंद साबित हो सकता है.

रोगों से लड़ने में मददगार- चना भाजी का साग शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है. इसके सेवन से आपको सर्दी-जुकाम, बुखार, इंफेक्शन आदि का खतरा नहीं रहता. साथ ही इसमें आयरन की मात्रा भी कााफी अधिक होती है.

प्रोटीन से भरपूर- इसमें प्रोटीन की मात्रा काफी अधिक पाई जाती है. यह प्रोटीन का काफी अच्छा सोर्स है. ऐसे में शरीर में जब भी प्रोटीन की कमी हो तो इसे जरूर खाएं.

छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले से दो शिक्षक की सामने आई ऐसी तस्वीरें , पढ़े क्या है पूरा मामला

छत्तीसगढ़ कोरिया से सरवर अली की रिपोर्ट....

कुछ दिनों पहले कोरिया जिले में एक शिक्षक की ऐसा तस्वीर  हमने दिखाई थी  अशोक लौधी  शिक्षक सिनेमा वाले बाबू कहे जाने वाले... बाईक में LEDTV बांध कर पहुंच रहे जहा छात्र-छात्राओं के पास पहुंचकर शिक्षा दे रहे हैं 

अब छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले शिक्षक रुद्र मोटरसाइकिल में छतरी, घण्टी, ब्लैक बोर्ड और माईक के साथ हमेशा मौजूद...घण्टी की आवाज से दौड़े आते है बच्चें....शिक्षक मोटरसाइकिल में बांध के छाता रुद्र पहुचते है लेने मोहल्ला क्लास...रौजाना राष्ट गान के बाद यहाँ होती है पढ़ाई.... कोरोना काल मे बेहतर शिक्षा देने का बीड़ा उठाया रुद्र ने निजी खर्चो में बच्चों को दे रहे  शिक्षा...

आप को पता है की कोविड-19 कोरोना महामारी की वजह से स्कूल बंद हैं। इस वजह से छत्तीसगढ़ शिक्षा विभाग की ओर से वर्चुअल क्लास, मोहल्ला क्लास और लाउडस्पीकर के माध्यम से पढ़ाई कराई जा रही है। सामाजिक दूरी बनाए रखने के लिए एक साथ सभी बच्चों को साथ बैठाना भी जोखिम भरा है। इसलिए शिक्षा विभाग की ओर से गांव - गांव चलाए रहे मोहल्ला क्लास सफल साबित हो रहे है। शिक्षा के क्षेत्र में ऐसी मदद से पढ़ाई का अच्छा माहौल तैयार हो रहा हैं जिसमें बच्चें भी बढ़चढ़ कर हिस्सा लेते दिखाई दे रहे हैं ।

आज हम बात करेंगे एक और अजब गजब छतरी वाले शिक्षक की जो छत्तीसगढ़ कोरिया जिला मुख्यालय से लगभग 70 किलोमीटर दूर कोरिया और पेंड्रा जिला के सरहदी इलाका या यूं कहें कि जिला कोरिया का वो अंतिम स्कूल जो ग्राम सकड़ा में प्राथमिक शाला सकड़ा के नाम से जाना जाता हैं। यहाँ के शिक्षक रुद्र प्रताप सिंह राणा अपनी मोटरसाइकिल में छतरी, एक सूटकेस में पुस्तकालय, माईक, घण्टी, ब्लैक बोर्ड लेकर बच्चों को पढ़ाने मोहल्ला क्लास में पहुचते हैं और प्राथमिक शाला सकड़ा के आसपास गुरच्वापारा, पटेल पारा, स्कूल पारा, बिही पारा, मुहारी पारा में मोहल्ला क्लास आयोजित कर बच्चों में शिक्षा की अलख जगा रहे हैं। यहाँ हम आपको बता दे कि शिक्षक रुद्र प्रताप सिंह राणा रौजाना पेंड्रा मरवाही जिले के लगभग 40 किलोमीटर दूर ग्राम प्रारासी से आना जाना करते हैं। 

छतरी वाले बाबू रुद्र प्रताप सिंह राणा शिक्षक जिस भी मोहल्लों में मोहल्ला क्लास लेने जाते है, तो सर्वप्रथम मोहल्ला पहुच कर अपनी मोटरसाइकिल को स्टैंड में खड़ा कर घण्टी बजाते है जिसे सुन कर मोहल्ला के सभी बच्चें कहीं भी रहे दौड़ते भागते अपने - अपने घरों के बाहर झज्जे में चटाई, स्कूल बैग लेकर मौहल्ला क्लास में शामिल होते है और फिर मोहल्ला क्लास शुरू करने से पहले अपनी - अपनी जगहों में खड़े हो कर राष्ट गान गया जाता है जिसके बाद पढ़ाई प्रारम्भ होती है। यह परिक्रिया रौजाना सभी मोहल्ला क्लास में अपनाई जाती है। छतरी वाले बाबू रुद्र प्रताप सिंह राणा गीतों के माध्यम से अपनी सूटकेस में रखे पुस्तको से बेहतर शिक्षा मुहैया कराने का प्रयास कर रहें है।

छतरी वाले बाबू रुद्र प्रताप सिंह राणा ने बताया कि जिस दिन से मोहल्ला क्लास शुरू हुई है उस दिन से बच्चे भी बड़ी उत्सुकता से इस क्लास में शामिल हो रहे हैं। सही मायने में यह मोहल्ला क्लास बच्चों को कोरोना से बचा रही है और कोरोनकाल में शिक्षा के नजदीक ला रही है। मेरा मोहल्ला क्लास गांव के लम्बी गलियों के बीचों बीच संचालित होता है जो चारों ओर से खुला है। बारिश हो या आंधी, बच्चे अपने घरों के बहार झज्जे के नीचे बैठ कर पढ़ते हैं और मैं छाते के नीचे खड़े हो कर पढ़ाता हु। यह छतरी मुझे धूप - बारिश से बचाता है और ग्रामीणों सहित बच्चों को मेरा यह अनोखा तरीका बेहद पसंद आता हैं।


जितेंद्र कुमार गुप्ता विकास खण्ड मॉनिटरिंग अधिकारी खड़गवां ने तारीफ करते हुए बताया कि नित नए नवाचार किए जाते है इनके द्वारा बच्चों के सामने एक आकर्षक शाला प्रस्तुत की जाती है। इनके द्वारा बेहतर पढ़ाई का एक बेहतर माहौल बनाया गया है। इस तरह के शिक्षा को देख कर अन्य और भी शिक्षक जरूर जागरूक होंगे ऐसा आशा मैं करता हु।

कुछ दिन पहले हमनें आपको सिनेमा वाले बाबू अशोक लोधी के बारे में बताया था जिन्होंने अपनी मोटरसाइकिल में LED TV बांध कर मोहल्ला क्लास में बच्चों को पढ़ाते दिखाया था।

कोरिया जिला मुख्यालय से सटे सलका संकुल क्षेत्र के ग्राम पंचायत सारा, गदबदी, रटन्गा, ढोड़ी बहरा, जलियांढांड में सिनेमा वाले बाबू यानी अशोक लौधी रौजाना सुबह अपनी मोटरसाइकिल में LED TV बांध कर बच्चों के पढ़ाई के लिए निकल जाते है और मौहल्ला - मौहल्ला जा कर घरों में एकत्र हुए ग्रामीण बच्चों को मोबाईल से वाई फाई कनेक्ट कर TV पर कार्टून, संगीत के माध्यम से पढ़ाई कराते है।सिनेमा वाले बाबू अशोक लौधी शासकीय प्राथमिक शाला फाटपानी के शिक्षक हैं जिन्होंने बताया कि मोटरसाइकिल चलित वाहन पर एलईडी टीवी बांधकर चौराहे-चौराहे एवं मोहल्ले में सिनेमा दिखा कर बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने का एक छोटा सा प्रयास मेरे द्वारा किया जा रहा हैं।

छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले में एक शिक्षक की ऐसा तस्वीर,अशोक लौधी शिक्षक सिनेमा वाले बाबू कहे जाने वाले,बाईक में LEDTV बांध कर पहुंच रहे जहा छात्र-छात्राओं के पास

कोरिया से सरवर अली की रिपोर्ट

कोरिया:-छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले में एक शिक्षक की ऐसा तस्वीर .... अशोक लौधी शिक्षक सिनेमा वाले बाबू कहे जाने वाले... बाईक में LEDTV बांध कर पहुंच रहे जहा छात्र-छात्राओं के पास पहुंचकर शिक्षा दे रहे हैं .. बच्चे इन्हें सिनेमा वालेे गुरु जी कहते हैं।

देश में कोरोना महामारी के दस्तक एवं खतरे को भांपते हुए शासन के द्वारा जैसे ही लॉकडाउन की घोषणा हुई, शहर, गांव, देश सब रूक से गए थे और कोरोना संक्रमण के बीच लंबे समय से स्कूलों की छुट्‌टी कर दी गई थी। बच्चे कई माह पढ़ाई से वंचित रहे। बच्चों की होने वाली पढ़ाई बाधित होते देखकर शिक्षा विभाग ने पढ़ई तुंहर दुआर नामक शिक्षा की शुरुआत की। अब शिक्षकों द्वारा प्रतिदिन छात्र-छात्राओं को मोहल्ला क्लास लगा कर शिक्षा दी जा रही है।

सुनने में जरूर यह थोड़ा अजीब लगा हो पर वाकई शिक्षक हो तो ऐसा, जिन्होंने कोरोना काल मे बच्चों को बेहतर शिक्षा उनके घरों मुहल्लों में देने की तरकीब क्या खूब निकाली है।

इसी कड़ी में छत्तीसगढ़ के कोरिया जिला मुख्यालय से सटे सलका संकुल क्षेत्र के ग्राम पंचायत सारा, गदबदी, रटन्गा, ढोड़ी बहरा, जलियांढांड में सिनेमा वाले बाबू यानी अशोक लौधी रौजाना सुबह अपनी मोटरसाइकिल में lED TV बांध कर बच्चों के पढ़ाई के लिए निकल जाते है और मौहल्ला - मौहल्ला जा कर घरों में एकत्र हुए ग्रामीण बच्चों को मोबाईल से वाई फाई कनेक्ट कर TV पर कार्टून, संगीत के माध्यम से पढ़ाई कराते है। सिनेमा वाले बाबू अशोक लौधी शासकीय प्राथमिक शाला फाटपानी के शिक्षक हैं जिन्होंने बताया कि मोटरसाइकिल चलित वाहन पर एलईडी टीवी बांधकर चौराहे-चौराहे एवं मोहल्ले में सिनेमा दिखा कर बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने का एक छोटा सा प्रयास मेरे द्वारा किया जा रहा हैं। मुझे और मेरे इस गतिविधि को सिनेमा वाले बाबू के नाम से लोग अब पहचान मिलने लगी है। यह गतिविधि अब स्कूल तक ही सीमित नहीं है अपितु संकुल के अन्य स्कूल ग्राम पंचायत के मोहल्लों में जाकर बच्चों को वीडियो दिखा कर शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास कर रहा हु और सिनेमा वाला बाबू एलईडी टीवी के द्वारा वीडियो दिखाकर 1 से 5 कक्षा के विभिन्न विषयों को वीडियो के माध्यम से दिखाने से बच्चों में उत्सुकता बढ़ गई। बच्चे बहुत ही मनोरंजक ढंग से विषय वस्तु को सीख रहे हैं। नियमित उपस्थित होकर विभिन्न गतिविधियों में भी भाग भी ले रहे है। मुझे खुशी हैं कि बच्चों को सिनेमा वाले बाबू का इंतजार समयानुसार रहता है वे मेरे आने का रास्ता देखते है जिससे मुझे काफी खुशी हैं।

आपको बता दे कि 5 माह से स्कूल बंद है और बच्चे पढ़ाई से दूर होते जा रहे हैं। ऐसे में सरकार बच्चों को पढ़ाई से जोड़े रखने के लिए कई योजनाएं लागू कर रखी है। ऑनलाइन और वर्चुअल क्लास के साथ अब सरकार बिना स्कूल खोले ऑफलाइन क्लास लेने मोहल्ला क्लास का फैसला ली है। जो कोरिया में सही और सफल साबित होते दिखाई दे रही है।LED TV के माध्यम से पढ़ाई का बच्चों में खासा प्रभाव दिख रहा है। बच्चों को उनके मौहल्लों और घरों में पढ़ाई वो भी इस हाईटेक तरीके से बेहद पसंद आ रहा है। बच्चें किताबों के पाठ्यक्रम के साथ कार्टून के माध्यम से बेहतर शिक्षा ग्रहण कर रहें है जिनसे बच्चों में खुशी है।

शिक्षा विभाग की ओर से जारी निर्देशों के अनुसार प्रत्येक गांव मोहल्ला में संक्रमण के खतरे को देखते हुये सोशल डिस्टेंसिंग में कक्षा लगाई जा रही है। यह क्लास ब्लाक के लगभग स्कूलों में लगाई जा रही है। बच्चें कम जगह होने के वावजूद एकदूसरे से दूर बैठ कर चेहरे पर मास्क लगा पढ़ाई कर रहे है।

हाल ही में छत्तीसगढ़ प्रमुख शिक्षा सचिव डॉ आलोक शुक्ला का कोरिया दौरा हुआ, उन्होंने भी सिनेमा वाले बाबू अशोक लौधी के इस कार्य की सराहना करते हुए जिला प्रशासन की भी तारीफ की थी। उन्होंने इस दौरान कहा कि कोरोना काल मे भी कोरिया में शिक्षा की रफ्तार कम नही हुई है शिक्षा के अलख जगाने वाले शिक्षक अलग - अलग पद्धति से शिक्षा दे रहे हैं। बच्चों को ऐसी विषम परिस्थिति में शिक्षा से जोड़कर रखे हैं इस दौरान अशोक लौधी शिक्षक की तारीफ करते नही थके जो बाइक में घुमघुमकर LED TV के माध्यम से मोहल्ले मोहल्ले में जाकर पढ़ाने का काम कर रहे हैं।

ये कोई कहानी नहीं बल्कि ऐसे जाबांज और हुनरमंद और खेल भावना से ओतप्रोत जवान की सच्ची गाथा है, जिन्होंने वनांचल के गरीब,वनवासी बच्चों को शून्य से शिखर पर पहुंचाने में अपना जीवन समर्पित कर दिया है

छात्तीसगढ़ पुलिस के (विशेष टास्क फ़ोर्स ) जवान मनोज प्रसाद। जो छत्तीसगढ़ के खेलजगत और मलखम्ब खेल के इतिहास को अमिट स्वर्ण अकक्षारों में लिख दिया है..

जगदलपुर:- नरायनपुर में मालखम्ब खेल शुरुआत करना आसान नही था।। जिन बच्चों को मलखम्ब खेल सिखाया गया वह सभी बच्चे *अबुझमाड़* ,के, दुर्गम,इलाके के रहने वाले है उन्हें मलखम्ब की *म* भी नही आता था ।। मगर इनकी ताकत को पहचान और उनको राष्ट्रीय स्तर में *गोल्ड* मेडलिस्ट खिलाड़ी बनाया।

मनोज प्रसाद ने अपने जीवन में सबसे ज्यादा रिक्स लिया है तो वह इन बच्चे के प्रतिभा को दुनिया तक पहुचाने में।। आज चार वर्षों से लगातार छुट्टीयो के दिन घर नही जाकर उनको सुबह और शाम बिना किसी लाभ के बच्चों को तैयार करना।। सप्ताह भर जंगलो में डयूटी के साथ ,लड़ कर बारिश ,तूफान, सड़ा हुआ खाना,हजारो पहाड़ियों को मापडाला ।। बाथरूम लैटरिंग साफ करना पड़ा सिर्फ कुछ वक्त ज्याद मिल जाये अभ्याश करने के लिए ।। सुबह 4 बजे उठना 10 किलो मीटर दिन भर में 8 से 10 बार अपने खिलाड़ियो को प्रशिक्षण देना उनके पास जाना उनकी कमियों को पूरा करना मल्लखम्ब खेल के बेहतरीन तरकीब शिखलाई देना। बर्थडे ना किसी प्रकार का पार्टी ना शादी ना त्योहार यहां तक कि कैम्प से बाहर नही निकलने देने से।। नारायणपुर की ही लड़की से शादी भी कर लिया ताकि फैमली रखने की अनुमति मिल जाये कुछ बिना सोचे समझे सिर्फ कैम्प से बाहर निकलने के लिए माँ बाप का सपनो को हमेसा के लीये दफन कर दिया।। ना ही किसी प्रकार का प्रशासनिक मदद के बिना 400 बालक और बलिकयो को मल्लखम्ब खेल सीखना बच्चों को , दिल्ली,मुम्बई,गुजरात,आंध्रप्रदेश,तमिलनाडु जैसे बड़े शहरों में प्रतियोगिता के लिए लेजाना और ओ भी रिज़र्वेशन करवा कर खाना, पीना,भी अपने हाथों से बनाकर खिलाया कपड़े ,लाते ,जूते ,पढ़ाई के साथ साथ आगे बढ़ाना फिर महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश जैसे राज्यो के खिलाड़ियो को हरा कर स्वर्ण पदक जितना आसान नही था।। 5,6,7मार्च 2020 को 32वी राष्ट्रीय मलखम्ब प्रतियोगिता में 8 स्वर्ण 3 कास्य के साथ बिजय घोषित हुआ ।। इस कार्य मे रामकृष्ण मिशन आश्रम*पोर्टा केबिन देवगांव,असीम महाराज, हिमान्द्री महाराज ,आकाश जैन ,आर पी.मीरे ,उदय देशपांडेय ,सुजीत सेगड़े,* और लोगो ने आर्थिक मद्त किया।

आज भारत सरकार द्वारा इन बच्चों को 13लाख 20000 हजार का स्कोलर शिप मिल रहा है ।। उनका मकसद था कि इन बच्चों को खेल के माध्यम से *बीपीएड* एमपीएड जैसे डिग्री प्राप्त कर खेल जगत में फ्रोफेशर बनाना ताकि खेल में विकास हो।।

मगर आज वह जवान जंगलो में भटकने के लिए मजबूर है।। प्रशासनिक मदद का इन्तेजार में ।।जिला नारायणपुर को पूरे भारत मे एक पहचान दिलाया ।। नारायणपुर को एक नए मुकाम पर पहुचाया आज वह जवान जंगलो में भटकने को मजबूर है।।

सावधान : जोखिम भरा है गड्ढों में तब्दील ... अर्जुनी,लाफार्ज पहुच मार्ग

सुबोध थवाईत-BBN24NEWS

BBN_24-NEWS अकलतरा। अकलतरा जनपद पंचायत के ग्राम अर्जुनी में फ़ोरलेन सड़क से ग्राम बूटरा भवँर तंक बने प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के अंतर्गत सड़क में गड्ढे ही गड्ढे है यहां से गुजरने वाले लोगों को बरसात आते हु परेशानियों से झूझना पड़ता है अर्जुनी बाजार पारा से लाफार्ज पहुच मार्ग की सड़क तो बद बत्तर हो चुकी है ग्राम पंचायत द्वारा वैकल्पिक व्यवस्था करने मुरुम,डस्ट डाला गया था उसके बाद भी कीचड़ का साम्राज्य स्थापित हो चूका है इस सड़क से प्रतिदिन सीमेंट फैक्ट्री में काम करने वाले कर्मचारियो का आना जाना लगा रहता है इसके साथ ही  गांव के ह्दय स्थल का सड़क जर्जर हालत में हो चूका है।सड़क किनारे निर्माण की करने की अतिआवश्यक है जिससे पानी ठहराव का समस्या से छुटकारा मिल सकता है।यह सड़क की समस्या लम्बे समय से बनी हुई है।अर्जुनी के ग्रामीणों का कहना है कि वोट मांगने के समय क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों द्वारा बड़े बड़े वादे किए जाते है परंतु चुनाव जीतने के बाद संस्याओ को नजरअंदाज कर दिया जाता है। जल्द ही सड़क की व्यवस्था सुधारने ग्रामीणों द्वारा मांग की गई है।

बोध घाट सिंचाई परियोजना : आदिवासियों में आक्रोश, इसके खिलाफ कर सकते हैं आंदोलन

रायपुर :  छत्तीसगढ़ का बहुउद्देशीय बोध घाट सिंचाई परियोजना के काम को आगे बढ़ने से पहले ही ब्रेक लगता दिखाई दे रहा है। तकरीबन 22 हजार करोड़ की लागत वाली इस बहुचर्चित परियोजना से प्रदेश में सिंचाई और बिजली व्यवस्था को सुदृढ़ किये जाने की योजना है। लेकिन इस विकास में एक वर्ग विशेष को अनदेखा किये जाने की बात सामने आ रही है। ये वो वर्ग है जिसने पेड़-पौधों-नदियों को परिवार का सदस्य माना और पर्यावरण को धरोहर की तरह संजोकर रखा। ये वर्ग हैं आदिवासी, जिनपर विस्थापन का खतरा मंडराने लगा है।

इंद्रावती नदी पर बनने वाली इस परियोजना को लेकर छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के प्रमुख और शांतिदूत डॉ. उदयभान सिंह चौहान​ ने जमीनी हकीकत जानने के लिए इस परियोजना से प्रभवित होने वाले बस्तर संभाग के सुदूर गांवों जंगलों में रह रहे आदिवासियों से बात की। उन्होनें इस सम्बन्ध में इससे होने वाले फायदे-नुकसान का अध्ययन किया। अपने दौरे को लेकर डॉ उदयभान ने BBN24 NEWS.com से कैलाश जयसवाल के प्रश्नो का खुलकर जवाब दिया। प्रस्तुत हैं बातचीत के कुछ अंशः-

BBN24 : डॉ साहब बोधघाट परियोजना कि जमीनी हकीकत क्या है?

डॉ. उदयभानः मैंने जब बस्तर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष व विधायक लाखेश्वर बघेल, सर्व आदिवासी समाज के संरक्षक व पूर्व केंद्रीय मंत्री अरविन्द नेताम, बस्तर विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष व बीजापुर विधायक विक्रम मंडावी और सर्व आदिवासी समाज के अन्य सदस्यों से इस सम्बन्ध में बात की। उनका जवाब यही मिला कि जब तक व्यवस्थापन की स्थिति स्पष्ट नहीं होगी तब तक बोध घाट परियोजना का सुचारु होना संभव नहीं है। दूसरी बात ये निकल कर आई कि इस परियोजना से जो गांव प्रभावित होगा उन ग्रामवासियों कि राय लेना आवश्यक है। जब तक प्रभावित होने वाले ग्रामवासी नहीं चाहेंगे तब तक ये आसान नहीं होगा।

BBN24 : इस परियोजना के सम्बन्ध में प्रभावित होने वाले स्थानीय लोगों और सरकार के बीच कोई बात हुई?
डॉ. उदयभानः जब मेरी बात मनीष कुंजाम (Ex MLA, CPI) से हुई तो उन्होंने कहा कि 1987-89 में इस परियोजना को लेकर आंदोलन हुआ था। तब तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी और मुख्यमंत्री मोतीलाल वोरा की सरकार के समय ये परियोजना रिजेक्ट हुई थी। फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि अनुसूचित जाति और जनजाति की बैठक की जानकारी के बगैर इस परियोजना को पुनः आरम्भ करने की अनुमति दे दी गयी? आदिवासियों को इस प्रश्न का जवाब न मिलने के कारण उनमे आक्रोश है। ये स्थानीय आदिवासी अपना जल, जंगल, जमीन आसानी से नहीं छोड़ेंगे।

 

BBN24 : क्या प्रभावित लोगों ने बोध घाट परियोजना के सम्बन्ध में अपनी शिकायत प्रशासन को बताई? 
डॉ. उदयभानः इस परियोजना को लेकर जब प्रभावित होने वाले ग्रामवासियों को इस परियोजना की पुनः आरम्भ होने की जानकारी मिली तो उन्होंने बीजापुर के कलेक्टर को इस सम्बन्ध में एक ज्ञापन सौंपा। उसके बाद कलेक्टर ने उन आदिवासियों को ‘ऐसा कुछ नहीं है’ कहकर गुमराह किया और वापस भेज दिया। 

BBN24 : जिलाधिकारी के इस रवैये पर लोगों की क्या प्रतिक्रिया रही?
डॉ. उदयभानः जिलाधिकारी द्वारा टालमटोल करने के बाद, आदिवासियों ने इस सम्बन्ध में बेल्लूर में एक बैठक की, जिसमे स्थानीय प्रशासन द्वारा कोरोना काल में सोशल डिस्टेंसिंग के नाम पर बैठक जारी रखने को मना कर दिया। जिसके बाद, स्थानीय समाचार पत्र ने इस परियोजना के सम्बन्ध में आदिवासियों की सहमति की खबर लगाकर छापी गई। जबकि ऐसा कुछ भी नहीं था, सच्चाई ये है की इस सम्बन्ध में न तो प्रभावित होने वाले आदिवासी समाज से बात हुई, न ही इस परियोजना को लेकर पूर्व के आंदोलनकारियों से बात हुई। 

BBN24 : परियोजना वाली भूमि किसकी है, अब इसको लेकर लोगों की आगे की योजना क्या होगी?

डॉ. उदयभानः मुख्य बात ये है कि यहां कोई राजस्व भूमि नहीं है। यहां सारी भूमि वन विभाग की है। इस तरह राजस्व के चक्कर में पूरा वन सम्पदा नष्ट होगी। दूसरी तरफ जंगली इलाका होने के कारण कोई बंदोबस्त भी नहीं है। तीसरी बात ये है कि बस्तर में प्रचूर मात्रा में खनिज है, जिसके खनन के लिए पानी की जरुरत होगी। अगर ऐसे में पानी का इस्तेमाल कहीं और होता है, तो खनन का काम अवरुद्ध होगा। आदिवासी इस परियोजना को लेकर सहमत नहीं है, वो कभी भी इस परियोजना को लेकर आंदोलन शुरू कर सकते हैं।  

सरकार की इसी लचर व्यवस्था के कारण बहुउद्देशीय बोध घाट सिंचाई परियोजना पिछले 40 सालों से लंबित है। वर्ष 1992-93 में इस परियोजना के खिलाफ एक बड़ा जनांदोलन यहां के स्थानीय आदिवासियों द्वारा किया गया। उस समय की तत्कालीन केंद्र और राज्य सरकारों ने इस परियोजना पर आगे काम करने पर रोक लगा दी थी। इस परियोजना को लेकर अभी तक सरकार और आदिवासी समाज के बीच सामंजस्य ना बन पाना चिंता का विषय है। सरकार अगर स्थानीय आदिवासियों को गंभीरता से लेती, उनकी समस्याओं पर गौर करती, तो यहां का परिदृश कुछ और ही होता।

 

 

अकलतरा : शराब दुकान पर नियमो की उड़ाई जा रही धज्जियां यहाँ सैल्समैन द्वारा नहीं किया जा रहा मास्क का उपयोग ...कोरोना संक्रमण फैलने का अंदेशा ... अधिकारी बेखबर

कोरोना संक्रमण को रोकने के लिए सरकार द्वारा शराब की दुकानों पर सामाजिक दूरी बनाए रखने एवं ग्राहकों को मास्क लगे होने पर ही शराब बेचे जाने की अनुमति दी गई है। लेकिन आबकारी विभाग की अनदेखी के चलते अकलतरा मेन रोड पर स्थित शराब की दुकान पर नियमो  की धज्जियां उड़ाई जा रही है। यहाँ सैल्समैन द्वारा मास्क नहीं लगाया जा रहा है। यहीं नहीं सामाजिक दूरी बनाए रखने के लिए गोले तो बनाए गए है। लेकिन उनकी पालना नहीं की जा रही है। जिसके चलते कोरोना संक्रमण फैलने का अंदेशा बना हुआ है। ऐसे में आबकारी विभाग की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लग रहा है। 

मिडिया के माध्यम से हमें जानकारी प्राप्त हुई है उक्त अधिकारी से बात करके कार्यवाही कि जाएगी 
मेनका प्रधान ( एस डी एम जांजगीर )

 

प्रभु श्रीराम ने छत्तीसगढ़ में वनगमन के दौरान लगभग 75 स्थलों का किया भ्रमण इनमें से 51 स्थल ऐसे हैं, जहां प्रभु राम ने भ्रमण के दौरान रुककर कुछ समय व्यतीत किया ....पढ़े ये विशेष रिपोर्ट

कोरिया/छत्तीसगढ़ सरवर अली...

छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले के भरतपुर तहसील के जनकपुर में सीतामढ़ी हर चौका स्थित है यह मवाई नदी के तट पर स्थित है जो कि मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के बॉर्डर पर स्थित है यह एक पुरातात्विक स्थल है यहां एक प्राकृतिक गुफा स्थित है

रामायण काल से मान्यता है कि भगवान श्री राम जब वनवास के लिए चित्र कूट से निकले थे तब सतना ,सीधी होते हुए यहां रुके थे यहीं से छत्तीसगढ़ प्रांत मैं प्रवेश हुए थे यहां शिलाखंड मौजूद है जिसे लोग भगवान श्री राम के पद चिन्ह मानकर पूजा करते हैं हरचौका मवाई नदी के तट पर स्थित गुफा को काटकर 17 कक्ष बनाए गए हैं जिनमें शिवलिंग स्थापित है इस स्थान को हर चौका (सीता रसोई) के नाम से जाना जाता है जानकारों की माने माने तो रामायण काल में जब भगवान श्री राम माता सीता जी लक्ष्मण जी को वनवास के लिए जाना पड़ा था हर चौका माता सीता एक रात जो कि मवाई नदी के तट पर स्थित है यहां रुके थे इसी से इनका नाम सीतामढ़ी राम गमन मार्ग पड़ा!

हर चोका से निकलकर अरपा नदी के तट पर सीतामढ़ी घागरा पहुंचे माना जाता है यह नदी तट से करीब 20 फीट ऊपर 4 कक्षाओं वाली गुफा मौजूद हैं जिसके बीच शिवलिंग स्थापित है ।

राम वनगमन स्थल पर फिलहाल किसी भी तरह की सुविधा नहीं है।राम वन पथ गमन में छत्तीसगढ़ सरकार ने 8 जिलो का तेजी से विकास होगा इसके लिए सरकार ने घोषणा कर दिया है। इनमें कोरिया जिले के सीतामढ़ी-हरचौका भी शामिल है । वहां अब सरकार पर्यटक सुविधा केंद्र, वैदिक विलेज, पगोड़ा, वेटिंग शेड, पेयजल, शौचालय, ठहरने की सुविधा, रेस्टोरेंट, कॉटेज सुविधा के साथ विद्युतीकरण कार्य होगा।

मिरतुर में ब्रह्मा जी का मंदिर की खोज डॉ राम विजय शर्मा ने किया

चांपा:-शोधकर्ता, इतिहासकार, पुरातत्वविद, तहसीलदार, डॉक्टर राम विजय शर्मा ने मिरतुर में ब्रह्मा जी के मंदिर का खोज किया है | यह मंदिर आदिवासी परंपरा के अनुसार है | ब्रह्मा जी के मंदिर का पुजारी बैसाखू राउत है | इस मंदिर की खोज डॉक्टर शर्मा द्वारा भैरमगढ़ जिला बीजापुर छत्तीसगढ़ के तहसीलदार पद पर रहते हुए किया था | गांव जगदलपुर भोपालपटनम मार्ग पर नेसलनार से उतरकर 16 किलोमीटर की दूरी पर है | इस गांव में मुरिया जनजाति के लोग निवास करते हैं| ब्रह्मा जी सृष्टि का निर्माण किए हैं | इस कारण से यह सभी देवताओं में प्रथम स्थान पर माने जाते हैं |ब्रह्मा जी स्वयंभू, वागीश, वेदनाथ, ज्ञानेश्वर, चतुर्मुख, वीर`ची तथा आदि प्रजापति आदि नामों से भी जाने जाते हैं | ब्रह्मा जी के बारे में विस्तृत विवरण तथा सृष्टि की रचना की कथा ब्रह्म पुराण में विस्तृत रूप से बताया गया है | ब्रह्म पुराण सभी अठारह पुराणों में प्रथम स्थान पर है |अतः इसे आदि पुराण भी कहा जाता है| सूतजी ने ब्रह्म पुराण की कथा को लोगों के बीच तथा साधु-संतों के बीच लखनऊ के पास सीतापुर में नैमिषारण्य में सुनाई थी| चारों वेदों की उत्पत्ति ब्रह्मा जी चार अलग-अलग मुख से हुई है |अतः उन्हें वेदनाथ भी कहा जाता है | ब्रह्मा जी ब्रह्मा लोक अथवा सत्य लोक में निवास करते हैं | इनके चार प्रतीक हैं, जिससे वे पहचाने जाते हैं | यथा -पदम, वेद, जपमाला और कमंडल, हंस भी बगल में रहता है |उनके बाल बच्चे के रूप में मनु, सतरूपा, मनुष्य, चार कुमार, नारद, दक्ष, मारीyची, अत्रि, पुलसत्य, वशिष्ठ, चित्रगुप्त, मृत्यु, बाला, एवं अतिबाला, रूद्र, अंगीरा, आदी माने जाते हैं | पुराणों में उनकी उत्पत्ति कमल से मानी जाती है | वे सभी प्रजापतियों के पिता माने जाते हैं | उनकी संगिनी के रूप में सरस्वती, सावित्री और गायत्री मानी जाती है |

मिरतुर के मूरिया आदिवासियों का मानना है कि मिरतुर के ब्रह्मा जी के मंदिर में जो व्यक्ति दर्शन और पूजा अर्चना सच्चे मन से करता है उसके घर में पति-पत्नी में मेलजोल बढ़ता है तथा पति पत्नी में झगड़ा नहीं होती | यदि युवक युवती के विवाह में बाधा आ रही हो तो ब्रह्मा जी के मंदिर में पूजा अर्चना करने से विवाह निश्चित हो जाता है तथा बाधा दूर होती है | ब्रह्मा जी की पूजा अर्चना से संतान हीन व्यक्ति को संतान की प्राप्ति होती है तथा वंश वृद्धि होती है.

इस प्रकार डॉ राम विजय शर्मा के मिरतुर में ब्रह्मा जी के मंदिर की खोज से छत्तीसगढ़ के पुरातत्व एवं धार्मिक इतिहास में एक पन्ना जुड़ गया है | इससे छत्तीसगढ़ का नाम देश दुनिया में जाना जावेगा | ब्रह्मा जी के हाथों में कोई हथियार नहीं है| अतः वे शांति के देवता माने जाते हैं तथा ब्रह्मा जी के एक हाथ में वेद है जो ज्ञान का प्रतीक है | अतः आज के विश्व में शांति और ज्ञान की बहुत आवश्यकता है | अतः इस दृष्टि से ब्रह्मा जी का अत्यधिक महत्व है| डॉ विजय शर्मा ने मिरतुर में कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर ब्रह्मा जी का मेला लगाने के लिए छत्तीसगढ़ के संस्कृति मंत्री माननीय अमरजीत भगत से निवेदन करेंगे तथा प्रस्ताव भेजेंगे ताकि इस मंदिर का प्रचार प्रसार देश दुनिया में हो सके.

यक्ष प्रश्नों के साथ गोधन न्याय योजना उम्मीद की नई किरण

रायपुर जिस समय पूरा विश्व कोरोना महामारी और उससे उपजे आर्थिक संकट से जूझ रहा है तब छत्तीसगढ़ सभी मोर्चों पर विशेषकर आर्थिक मोर्चे पर विन विन सिचुएशन में है। यहां यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि यह सब कैसे संभव हुआ? इसका एक सामान्य सा जवाब है प्रदेश की कमान ऐसे व्यक्ति के हाथ में है जिसकी पृष्ठभूमि कृषि कर्म और छत्तीसगढ़िया संस्कारों से पगी हुई है। प्रदेश के मुखिया भूपेश बघेल ने कई मोर्चों पर अपनी सोच को अपनी ज़मीन पर उतारने के लिए सत्ता को माध्यम बनाया है। प्रदेश, किसानों और छत्तीसगढ़ के संस्कारों को आगे बढ़ाना उनकी पहली प्राथमिकता है। इसी प्राथमिकता के कारण वे खेती-किसानी और यहां के संस्कारों को आर्थिक दिशा में मोड़ते दिखाई देते हैं। संपूर्ण भारतीय व्यवस्था में कृषि सर्वोच्च है। ग्रामीण व्यवस्था में कृषि, पशुधन और उनसे मनुष्य को प्राप्य भारत के संस्कारों का निर्माण करते हैं। जिसने पशु और पशुधन संस्कारों को समझ लिया, उसके लिए समृद्धि और वैभव सुलभ हो जाएगा।

सर्वविदित है कि कोरोना लॉकडाउन की प्रारंभिक स्थिति में सरकारी प्रयासों के कारण काफी कुछ नियंत्रण में रहा। लॉकडाउन खुल जाने के बाद से छत्तीसगढ़ में भी कोविद महामारी की स्थिति बिगड़ी है लेकिन आर्थिक मोर्चे पर प्रदेश सम गति से आगे बढ़ता रहा है। ग्रामीण व्यवस्था से जुड़े पशुधन और किसानी को समृद्ध बनाने के लिए प्रदेश के मुखिया भूपेश बघेल की नवीनतम योजना है गोधन न्याय योजना जिसमें सरकार ने प्रदेश में गोबर खरीदी का निर्णय लिया है। यह उत्कृष्ट पहल की सफलता इस बात में है कि जब इससे जैविक खाद का निर्माण पूरी गति पकड लेगा और गोबर के कंडे और लकड़ी का प्रयोग आम होगा। यह कहने में भी कोई गुरेज नहीं कि पशुपालकों और किसानी के काम से जुड़े लोगों के लिए एक सहायक आर्थिक उपार्जन का बड़ा स्रोत बन सकता है। यहां यब बात गौरतलब है कि मुख्यमंत्री बघेल ने गोधन न्याय योजना की घोषणा तो कर दी है लेकिन अभी गोबर क्रय की कीमतें क्या होंगी इसका निर्णय होना शेष है।

स्वाभाविक है शिक्षा के विस्तार के कारण पहले ही युवा शक्ति कृषि कर्म की बजाय नौकरी को दे रहे हैं। रोजगार और आय की फिक्र में गांवों से शहरों की ओर पलायन यक्ष प्रश्न है। ग्रामीण क्षेत्रों में चारागानों की कमी है, ऐसे में गोधन न्याय योजना का क्रियान्वयन गौठानों पर निर्भर रह जाएगा। गोबर संग्रहण के लिए क्या सरकार तकनीकी तौर तरीकों के विकास का काम करेगी या फिर ग्रामीण ही गोबर संग्रहण करेंगे? यदि ऐसा नहीं है तो गोबर संग्रहण का काम किस तरह से होगा। प्रशासनिक मशीनरी को ऐसे ही सवालों से जूझना होगा।

अब इसके आर्थिक पक्ष पर जाएं तो गोबर क्रय की कीमतें क्या होंगी? कीमत तय करने के लिए किन बातों को प्राथमिकता दी जाएगी और सबसे बड़ी बात इससे तैयार होने वाले उत्पाद, जैसे जैविक खाद, गोबर के कंडे तथा दाह संस्कार के लिए तैयार की जाने वाली लकड़ी उनके बिक्री के लिए कैसा नेटवर्क होगा और उनकी कीमतें क्या होगी? महासमुंद से गोबर की खाद निर्माण से जुड़े एक शख्स ने इस व्यवस्था पर जो अनुमान प्रस्तुत किए हैं, वे महत्वपूर्ण हैं।

इन आंकड़ों के अनुसार प्रदेश भर से संकलित गोबर की खरीदी दर सरकार मात्र 1 रुपए तय करती है तो प्रदेश में सरकार को लगभग 22 अरब रुपयों की आवश्यकता होगी। गोबर से निर्मित उत्पादों की दर यदि 5 रु. निर्धारित की जाती है तो लगभग 110 अरब रुपयों की आय होगी। इस तरह गोधन न्याय योजना ग्रामीण व्यवस्था तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सहायक होगा इसमें संदेह नहीं। ग्राम सुराज के लिए एक नई उम्मीद तो बनती ही है, साथ ही यह प्रदेश में पलायन रोकने में योजना भी सहयोगी साबित होगी। योजना किसानों तथा ग्रामीण जनों में उम्मीद की एक नई किरण तो है ही।

अंततः सवाल वहीं पर आ कर रुक जाता है कि सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन का अब तक का जो दृश्य है उसमें यह कहना जल्दबाजी ही होगी कि योजना को जमीन पर साकार होने में कितना वक्त लग जाएगा।

"दुसरा जन्म” वर्षा गल्पांडे की कलम से.......

“दर्द से कर्राती है एक औरत
 अपनी नाल से बंधे एक शुशु को
जन्म देकर एक औरत से बन जाती है माँ
शिशु के जन्म के साथ ही जन्म लेता है एक
नया रिश्ता और एक पुरुष बन जाता है एक पिता”
 

आज हम बाजार में बहुत सारी शौपिंग में व्यस्त थे हाथों में बहुत से खिलौने और कुछ टॉय के कैरी बैग हमने हाथों में पकड़ रखे थे एक दूकान से निकलते ही माँ ने कहाँ अरे हमने अभी तो कुछ सोने की चीजें ली ही नहीं मैंने माँ से कहाँ इतना सब तो ले लिया अब सोने का क्या लोगी मैं बहुत थक चुकी हूँ हो गया अब घर चलों ना मेरी बात सुनकर माँ थोड़ी नाराज होकर बोली थक मैं भी गई हूँ मगर कुछ रस्में होती है जो लड़की वालों के मायके वालों को पूरी करनी होती है माँ की बाते सुनकर मैं चलते हुए रुक गई और माँ से बोली एसी कौन सी रस्म बच गई है जो हमनें पूरी नहीं की है वैसे भी दीदी तो ससुराल में खुश है और जीजू तो इतने सीधे है कभी कुछ कहते ही नहीं और आज तक दीदी के ससुराल वालों ने कोई भी शिकायत नहीं की और वैसे मुझे याद है माँ हमनें शायद ही कोई रस्म हो जिसे हमनें पूरी न की हो| माँ ने कहाँ हाँ हमनें सारी रस्में पूरी की थी मैंने कहाँ तो फिर किस लिए सोना लेना है मैंने माँ से पूछा ?

माँ ने कहाँ ये तुम्हारी दीदी का पहला बच्चा है और उस बच्चे का ये पहला जन्म दिन है और ऊपर से लड़का है ।अक्सर हमारा समाज जब भी ऐसे कुछ कार्यक्रम होतो उनकी नज़रे मायके के घरवालों पर ज्यादा होती है की उन लोगों ने क्या दिया है उनकी उम्मीद होती है की वो अपने नाती के जन्म दिन पर कुछ सोने की वस्तु भेट करें ऐसा नहीं है की मायके से ही अपेक्षा की जाती है ये अपेक्षा ससुराल वालों से भी की जाती है की दादा-दादी ने अपने पोते को क्या दिए है भेट में |माँ की बातें मुझे अच्छी नहीं लगी भला दादा-दादी और नाना-नानी के आशीर्वाद के सामने इन अपेक्षाओं का क्या ज़्यादा महत्व है?जब ससराल के लोग अपनी बहुओं को प्रताड़ित करते है तो हम उन्हें ही बुरा भला कहते है असल में हम ही उसके जिम्मेदार होते है ऐसी रिवाजों को पूरा करके फिर भला हमें बुरा भी नहीं लगना चाहिए अपनी लड़कियों को तकलीफ में देखकर।माँ ने आवाज़ लगाई कहाँ खो गई माँ ने अपनी बात आगे जारी रखते हुए कहाँ इसलिए अब हम किसी ज्वेलरी शॉप चलते है और वहां से कुछ ले लेते है गर्मी बहुत है वो देख सामने एक जूस की दूकान है वहां से मैं नीबू शरबत पी लुंगी और तुम नारियल पानी पी लेना माँ ने कहाँ और हम जूस दूकान की तरफ चल पड़े|

हम ज्वेलरी शॉप पहुचें तो शॉप की दूकान में खड़ी लड़की ने एक अच्छी सी मुस्कान के साथ हमारा स्वागत किया और कहाँ आप लोगों को क्या दिखाऊं माँ ने कहाँ आपके पास एक साल के बच्चे के लिए क्या है वो क्या है ना मेरे नाती का पहला जन्म दिन है तो उसे उपहार देना है ऐसा माँ ने उस लड़की से कहां उसने भी झट से कहाँ हमारे पास बहुत सुन्दर पैंडल है और वो एक लाल कपड़ा बिछाकर सोने के पैंडल को एक-एक करके हमें दिखाने लगी उसमें से कुछ पैंडल माँ ने अलग कर दिए जो माँ को पसंद आये थे ऐसे ही उसने और भी बहुत सी चीजें हमें बता चली गई लास्ट में सब देखने के बाद माँ ने एक पैंडल और चांदी की एक गिलास ली और हम वहां से निकल ही रहे थे तो फिर उस लड़की ने प्यारी सी मुस्कान के साथ हमें फिर से आइयेगा आपलोग बोल के हमें विदा किया|आखिर कार सब कुछ खरीदकर हम घर तो पहुच चुके थे पर अभी भी काम ख़त्म नहीं हुए थे सुबह की ट्रेन थी जिससे हमें दीदी के ससुराल यानी बैंगलौर के लिए रवाना होना था और अभी जो हमने इतनी खरीदारियां की थी उसे और खुद के सामान की पैकिंग भी करनी अभी बची थी|
पुरे एक दिन के सफ़र के बाद आखिरकार हम दीदी के ससुराल पहुचें|हमें देखकर दीदी के ख़ुशी का ठिकाना न था हाँ भई हर लड़की को मायके के लोगों से एक अलग की तरह का स्नेह होता है| दीदी ने हमें हमारा रूम दिखाया और कुछ देर आराम करने को कहाँ माँ ने दीदी से कहाँ हाँ पर पहले तुम्हारी सास से मिल लूँ कहकर वो उनसे मिलने चली गई और मैं तो अपने शहजादे को गोदी पे लिए उससे खूब प्यार और दुलार करने में व्यस्त हो गई | उसके गालों को स्पर्श मानो नाजुक फुल को छूने जैसा था वो भी हमें देख कर प्यारी सी मुस्कान से हमारा दिल जित रहा था और न जाने अपनी तोतली भाषा में क्या-क्या हमें कह रहां था शायद वो हमें देख ख़ुशी का इज़हार कर रहां हो|शाम हो चुकी थी सब मेहमानों का आना शुरू हो चुका था मेहमानों में नन्हें-नन्हें बच्चे ज्यादा दिख रहें थे और उनके शोर से पूरा हौल गूंज रहा था और उन बच्चों के माता-पिता उनकी बदमाशी को देख परेशान होकर उन्हें शांत रहने की सलाह दे रहे थे दीदी भी हौल में पहुच चुकी थी |

दीदी-जीजू और उनका शहजादा तीनों ने पिक कलर के मैचिंग कपडे पहन रखे थे जिसमें वे लोग काफी अच्छे लग रहे थे कुछ देर बाद केक कटिंग किया गया माँ ने मुझे आवाज लगाईं की चलों हम भी भी गिफ्ट दे देते है मैं और माँ दीदी के पास जाकर वो सारी चीजें उसे दी जो हमनें शहजादे के लिए खरीदी थी |इतना सब देख कर जीजू ने माँ से कहाँ मम्मी इसकी क्या जरूरत थी आप आ गई आपने आशीर्वाद दे दिया इतना ही काफी है इसकी जरूरत नहीं थी अगली बार से ये सब लाने की जरूरत नहीं घर वालों का प्यार ही सबसे बड़ा उपहार होता है उनके बच्चों के लिए उनकी बातें सुनकर माँ ने भी उनके सर पर आशीर्वाद का हाथ फेरा|
मैं सब कुछ खड़ी देख रही थी पर मन मेरा उदास हो रहा था कुछ था जिसकी कमी मुझे खल रही थी हौल की साजसजा बहुत ही सुन्दर थी खाना भी काफी अच्छा बना था सब बिलकुल परफैक्ट था पर फिर भी कुछ कमी लग रही थी एक प्रशन था जो मुझे काफी देर से परेशान कर रहा था वो ये की हमनें सब कुछ उस बच्चे के पहले जन्म दिन की ख़ुशी के उपलक्ष में किया और काफी खुश थे सब लोग यहाँ तक की हमनें भी उस बच्चे के लिए न जाने क्या कुछ नहीं खरीदा पर हम एक बात भूल गये की एक बच्चे के जन्म के साथ एक माँ का भी दुसरा जन्म होता है |वो नौ महीने बच्चे को अपने पेट में रखती और एक असहनीय दर्द सहकर उसे जन्म देती है हम उस माँ को क्यूँ भूल जाते है वो भी तो उस दिन माँ बनती है,उसका भी उस दिन नया जन्म होता है तो हमें उसे भी तो बधाइयां देनी चाहिए उसके दुसरे जन्म की ख़ुशी में उसके माँ बन्ने की ख़ुशी में उसे भी हर साल उपहार देना चाहिए माँ के साथ-साथ पीता भी उतना ही हकदार इन सब चीजों का हाँ वो बच्चे को जन्म भले ही न दे पर वो भी बच्चे के जन्म के बाद पिता बनता है इसलिए वो भी बधाई का पत्र है पर अक्सर हम इन बातों को भूल जाते है केवल हमें याद रहता है तो केवल बच्चे का जन्म दिन|

मैं दीदी और जीजू के पास गई और उन्हें भी हैप्पी बर्थडे कहाँ सब लोगो मुझे आश्चर्य भरी नज़रों से देखने लगे उन्हें लगा की बच्चे के साथ कही दीदी या जीजू का भी जन्म दिन तो नहीं और वो लोग भूल गये हों ।दीदी और जीजू ने मुझे कहाँ अरे आज भला हम दोनों का जन्म दिन कहाँ है जो तुम हमें बधाइयां दे रही हो मैंने कहाँ एक बच्चे का जन्म होता है तो माता-पिता का भी एक नया जन्म होता है साथ ही एक नया नाम भी उनके साथ जुड़ जाता है और एक नया रिश्ता भी तो हुआ ना इस हिसाब से आप लोगों को भी जन्म दिन तो बधाई देना तो बनता है मेरी ये बातें सुनकर दीदी और जीजू के साथ ही हौल के सारे लोग भावुक हो गये और पूरा हौल तालियों के शोर से गूंजने लगा|

वर्षा गल्पांडे

कुत्ते पाल रहे हैं तो हो जाएं सावधान, हो सकता है गंभीर बीमारी हाईडैटिड सिस्ट का खतरा

रायपुर. 23 जून 2020 जी हां, आपने सही सुना फेफड़े एवं पेट के हाइडैटिड सिस्ट का सफल ऑपरेषन डॉक्टरों द्वारा एक ही बार में किया गया जिससे कि मरीज को बार-बार बेहोशी (एनेस्थेसिया) देने की जरूरत नहीं पड़ी। कार्डियोथोरेसिक सर्जन डॉ. कृष्णकांत साहू एवं गैस्ट्रोसर्जन डॉ. रोमिल जैन ने मिलकर एक साथ कुत्तों के जरिये फैलने वाली इस गंभीर बीमारी का सफल ऑपरेशन किया। लिवर एवं फेफड़े में एक साथ हाइडैटिड सिस्ट होना बहुत ही दुर्लभ होता है। 

पं. जवाहर लाल नेहरु स्मृति चिकित्सा महाविद्यालय रायपुर से संबद्ध डॉ. भीमराव अम्बेडकर स्मृति चिकित्सालय के एडवांस कार्डियक इंस्टीट्यूट (एसीआई) में कार्डियोथोरेसिक सर्जन एवं विभागाध्यक्ष डॉ. के. के. साहू एवं डीकेएस अस्पताल के गैस्ट्रोसर्जन डॉ. रोमिल जैन ने मिलकर 42 वर्षीय युवक के फेफड़े एवं लिवर के हाईडैटिड सिस्ट का एक साथ ऑपरेशन करके मरीज को नया जीवन दिया। एक साथ दो ऑपरेशन होने से मरीज को बार-बार बेहोश करने की आवश्यकता नहीं पड़ी। मरीज का ऑपरेशन 15 दिन पहले हुआ एवं आज मरीज डिस्चार्ज होकर घर जाने को तैयार है।  

हाईडैटिड सिस्ट नामक बीमारी लिवर (यकृत) में कॉमन होता है। लिवर में इसके होने की संभावना लगभग 65 प्रतिशत तक होती है। वहीं फेफड़े में 10-15 प्रतिशत एवं मस्तिष्क व हृदय में कहीं पर भी हो सकता है लेकिन एक साथ फेफड़े एवं लिवर में होने की संभावना लगभग 4 प्रतिशत तक ही होती है। कृमि जिसको इकाइनोकोकस ग्रेन्युलोसस ( echinococcus granulosus ) कहा जाता है उसके संक्रमण से हाइडैटिड सिस्ट होता है। कुत्ते के मल के जरिये यह लोगों में फैलता है। 

खरोरा थानांतर्गत सारागांव निवासी 40 वर्षीय व्यक्ति खांसी, सांस फूलने एवं पेट दर्द की शिकायत से एसीआई के हार्ट, चेस्ट एवं वैस्कुलर सर्जन डॉ. कृष्णकांत साहू के पास मार्च के महीने में आया। उस समय कोरोना के कारण सब जगह लॉडाऊन था। एक्स-रे, सोनोग्राफी एवं छाती एवं पेट का सीटी स्कैन कराने पर पता चला कि उसके बायें फेफड़े एवं लिवर के बायें लोब में बहुत ही बड़ा सिस्ट हो गया है जिसको मेडिकल भाषा में हाइडैटिड सिस्ट कहा जाता है जो कि कुत्तों से संपर्क मे आने पर फैलता है परंतु इस व्यक्ति के घर में कोई कुत्ता नहीं था। हो सकता है कि गली के कुत्तों के संपर्क में आने पर या कच्ची एवं अधपकी सब्जी, सलाद खाने पर या फिर ठीक से हाथ न धोने पर कुत्ते के मल से निकला कृमि इकाइनोकोकस ग्रेन्युलोसस ( echinococcus granulosus   ) उसके पेट में चला गया हो। कोरोना की वजह से अस्पताल में नॉनइमर्जेंसी ऑपरेशन बंद होने के कारण मरीज को फौरी राहत के लिए कृमि की दवाई एलबेन्डाजॉल (albendazole) देकर घर भेज दिया गया। मरीज को कोरोना नियंत्रण के बाद आने को कहा गया परंतु मरीज के सांस फूलने की शिकायत बढ़ने लगी जिसके कारण मरीज को इमर्जेंसी में भर्ती करना पड़ा। चूंकि मरीज को फेफड़े के साथ-साथ लिवर में भी बहुत बड़ा सिस्ट था इसलिए पहले सिर्फ फेफड़े के ऑपरेशन के लिए प्लान किया गया क्योंकि सांस फूलने की शिकायत बहुत अधिक थी परंतु ऐसा करने से मरीज को दूसरी बार पेट (लिवर) का ऑपरेशन करवाना पड़ता जिससे उसको ज्यादा खतरा हो सकता था इसलिए दो ऑपरेशन से बचने के लिये डॉ. कृष्णकांत साहू ने डॉ. रोमिल जैन से सम्पर्क किया एवं एक साथ फेफड़े एवं लिवर की सर्जरी की प्लानिंग की जिससे मरीज को एक ही बेहोशी में दोनों ऑपरेशन हो जाये। 

ऐसे हुआ ऑपरेशन
एसीआई के ऑपरेशन थियेटर में सर्जरी की प्लानिंग करके सबसे पहले मरीज को डबल ल्युमेन एन्डोट्रेकियल ट्यूब ( double lumen endotracheal tube ) की सहायता से बेहोश किया। इस ट्यूब का फायदा यह होता है कि एक तरफ के फेफड़े को जिसमें ऑपरेशन हो रहा है उसका वेन्टीलेशन बंद करके दूसरे स्वस्थ्य फेफड़े को वेन्टीलेशन किया जाता है जिससे सर्जन आसानी से फेफड़े का ऑपरेशन कर सकता है एवं मरीज को बराबर ऑक्सीजन प्राप्त होता रहता है। 

मरीज के बेहोश होते ही डॉ. कृष्णकांत साहू ने बायीं छाती में चीरा लगाकर फेफड़े के सिस्ट को सावधानी पूर्वक ऑपरेशन करके निकाला एवं पुनः फेफड़ों को रिपेयर किया जिससे भविष्य में ब्रोन्कोप्लुरल फिस्चुला ( bronchopleural fistula ) न बने। सिस्ट को अन्य जगह फैलने से रोकने के लिए कृमिनाशक (Scolicidal) का उपयोग किया एवं छाती के घाव को बंद किया। उसके बाद गैस्ट्रोसर्जन डॉ. रोमिल जैन ने पेट में चीरा लगा कर लिवर के सिस्ट को निकाला। 

फेफड़े के सिस्ट का आकार 15x12 सेंटीमीटर एवं लिवर के सिस्ट का आकार 25x5 सेंटीमीटर था। यह ऑपरेशन चार घंटे चला। मरीज का इलाज डॉ. खूबचंद बघेल स्वास्थ्य सहायता योजना के अंतर्गत हुआ।

ऑपरेशन में शामिल टीम
डॉ. कृष्णकांत साहू (विभागाध्यक्ष- हार्ट, चेस्ट एवं वैस्कुलर सर्जरी), डॉ. रोमिल जैन (गैस्ट्रो सर्जन डीकेएस), डॉ. निशांत चंदेल (हार्ट, चेस्ट एवं वैस्कुलर सर्जन), डॉ. अश्विन (रेजीडेंट), एनेस्थेटिस्ट एवं क्रिटिकल केयर - डॉ. अरूणाभ मुखर्जी एवं टीम, नर्सिंग स्टॉफ - राजेन्द्र, चोवा राम। 

क्या होता है हाइडैटिड सिस्ट एवं कैसे फैलता है
हाइडैटिड सिस्ट इकाइनोकोकस ग्रेन्युलोसस नामक कृमि से कुत्तों से इंसानों में फैलता है। इस कृमि को जिन्दा रहने के लिए दो जीवों, कुत्ता एवं भेड़/बकरी का सहारा लेना पड़ता है जिससे इसका जीवन चक्र (  life cycle ) संपूर्ण होता है। यह कृमि सामान्यतः कुत्ते या लोमड़ी में पाया जाता है एवं यही उसका घर होता है। कुत्ते के मल के जरिये ये खुले में पहुंचते हैं। मल, धूल व मिट्टी में मिलता है फिर घास-फूस खाते हुए भेड़ बकरी में पहुंच जाता है। फिर मरी हुई भेड़ बकरी को कुत्ते खा जाते हैं एवं इसी प्रकार इनका जीवन चक्र चलता रहता है। 

इंसानो में कैसे पहुंचता है यह कृमि
ये कृमि (वार्म) कुत्ते के मल के साथ सिस्ट के रूप में बाहर निकलता है एवं मल सूख कर मिट्टी में मिल जाता है। ये सिस्ट (कृमि का अंडा) जिसका बाहरी खोल बहुत ही सख्त होता है एवं यह बहुत दिनों तक मिट्टी एवं हवा में जिंदा रह सकता है। सांस के जरिये, फल, सब्जी, सलाद के माध्यम से या गंदे हाथों से खाना-खाने पर यह इंसानों में प्रवेश कर जाता है। जब हम ऐसे कुत्तों के साथ रहने लगते हैं या खेलने लग जाते हैं तो उसके शरीर में चिपक कर सिस्ट इंसानों में प्रवेश कर जाता है। 

कुत्ते पाल रहे हैं तो क्या सावधानी बरतें:
कुत्तों को नियमित वेटनेरी डॉक्टर की सहायता से डिवर्मिंग करवायें।
अधपकी कच्ची सब्जी न खायें। अच्छे से धोकर सब्जी पकायें।
गंदे हाथों से खाना न खायें विशेषकर बच्चे ।
कुत्तों से नजदीकियां रखने पर मास्क लगायें और खेलने के बाद हाथ अच्छे से धोयें।

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