विशेष

लग रहा बेचैनी का माहौल क्यों रो रहा है समाज ईश्वर उस बच्चे को दे परम् शांति :लेखक- ज्ञानेन्द्र पांडेय, वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर

स्कूली बच्चों की असामयिक मौत से पूरे समाज का दिल रो रहा है, पालकों पर क्या बीतती होगी यह सोचकर ही बेचैनी होने लगती है। ईश्वर बच्चों की परम शांति प्रदान करें और परीजनों को इस दुख की घड़ी में संबल प्रदान करे ऐसी प्रार्थना करता हूं।

स्कूली बच्चों के लिए पिकनिक तथा खेलकूद संबंधी अन्य गतिविधियां सस्ते और ढर्रे पर चलने वाली दुकान बन कर रह गई हैं। ऐसे किसी भी कार्य के लिए विशेषज्ञों की राय लेना जरुरी न होकर चंद रूपयों के बंदरबांट से सब खेल हो जाता है। जिम्मेदार अपना पल्ला झाड़कर कभी पालकों से अनापत्ति प्रमाण पत्र का खेल खेलते हैं और कभी कभी मुआवजा देकर। शैक्षणिक संस्थाओं को इस पर विचार करना चाहिए क्योंकि मुआवजा हर मर्ज की दवा नहीं होती और न ही इन पर रोक लगाना किसी समस्या का हल है। जरूरत सिर्फ थोड़ी सी इमानदार कोशिश करने की है।

शैक्षणिक संस्थाओं को विशेषज्ञों की राय तथा सेवाएं लेनी चाहिए और उनकी ही अगुआई में सभी खेलकूद, पिकनिक तथा एडवेंचर स्पोर्टस आयोजित किया जाना चाहिए।

आसानी से पैसा कमाने के चक्कर में लोग इसे व्यवसाय बनाकर काम कर रहे हैं, बिना किसी मापदण्ड और सुरक्षा मानकों के धड़ल्ले से यह धंधा चल रहा है। सरकार को भी तभी होश आता है जब कोई दुर्घटना होती है। कागजों पर चल रहे खेल संघ एवं विभाग का अस्तित्व महज अखबार में फोटो छपवाने के लिए रह गया है,ऐसा लगता है।

रेडी टू इट के पैकेट में निकल रहे कीड़े,,पोषण के नाम पर परोसा जा रहा जहर,,

नीलकमल सिंह ठाकुर मुंगेली- कुपोषण दूर करने के नाम पर सरकार किस तरह बच्चों और महिलाओं को जहर परोस रही है इसका खुलासा मुंगेली क्षेत्र के ग्राम बांकी में हुआ। महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा कुपोषण- सुपोषण कार्यक्रम के तहत खाद्य विभाग के साथ रेडी टू ईट मिल के पैकेट बांटे जा रहे हैं। मुंगेली के बाक़ी गांव में वाले हरिओम सिंह के घर भी इसी तरह के कुछ पैकेट दिए गए जिसमें निर्माण तिथि अक्टूबर और अगस्त 2019 अंकित है। सील बंद पैकेट को जब उन्होंने देखा तो उनके होश उड़ गए क्योंकि रेडी टू ईट मिल में बेहिसाब कीड़े मौजूद थे। उन्होंने इसे खोल कर देखा तो पाया कि रेडी टू ईट मिल के नाम पर जो पोषक आहार उन्हें दिया गया है उसमें कीड़े घूम रहे हैं । जाहिर है महिला एवं बाल विकास विभाग और खाद्य विभाग लोगों की सेहत से खुला खिलवाड़ कर रहा है। उन्हें दोयम दर्जे का रेडी टू ईट मिल प्रदान कर यह तसल्ली की जा रही है कि प्रदेश से कुपोषण दूर होगा। उल्टे इन्हें खाकर लोग बीमार पड़ेंगे। हरिओम सिंह तो जागरूक थे जिन्होंने इन्हें इस्तेमाल करने से पहले खोल कर देख लिया लेकिन कई ग्रामीण ऐसे भोले भाले और मासूम है जिन्हें सरकारी योजनाओं पर पूरा भरोसा होता है इसलिए पता नहीं ऐसे दूषित पोषाहार कितने ग्रामीणों ने ग्रहण भी कर लिया होगा। सरकारी योजनाओं को इसी तरह अधिकारी पलीता लगाते हैं, जिससे उनका मूल उद्देश्य पूरा नहीं होता। जाहिर है इसके पीछे विभागीय गफलत है । इसलिए शासन को तुरंत संज्ञान लेकर दोषी व्यक्तियों पर कार्यवाही करनी होगी , नहीं तो फिर लोग रेडी टू ईट मिल को खाने तक से इंकार कर देंगे और प्रदेश में कुपोषण हटाने की मुहिम खतरे में पड़ जाएगी। इस गंभीर मसले पर तत्काल कार्यवाही की आवश्यकता है।वही इस मामले की शिकायत सम्बन्धी अधिकारी से की गई तो उस अधिकारी के द्वारा शिकायत करता पर ही आरोप लगाने लगे कि तुम्हारे द्वारा ही पैकेट में कीड़ा डाल कर लाये हो,,,वही अधिकारी की भी इस मालमे में कार्यवाही करने से बचते नजर आ रहे हैं,,जानकारी के मुताबिक जो समूह के द्वारा ये रेडी टू इट का निर्माण कराया जा रहा है वो भाजपा पार्टी से सम्बंधित है जिसके चलते कार्यवाही करने से बचते नजर आ रहे हैं,,, ये पहला मामला नही है कि इस समूह के पोषण आहार में कीड़े नही मीले है इससे पहले भी मिला था और इसकी शिकायत किया भी गया था पर उस समय भाजपा का शासन था तो उस समय भी कार्यवाही नही हुए,,पर आज कांग्रेस की सरकार बन जाने के बाद भी उस समूह के खिलाफ कोई भी कार्यवाही होगी कि नही ये संसय बना हुआ है,,,

विशेष : मुंगेली के सीताफल की प्रसिद्धि छत्तीसगढ़ में ही नही अपितु दूसरे राज्य के लोग भी हैं इसके स्वाद के दीवाने,,

नीलकमल सिंह ठाकुर

मुंगेली- सीताफल का नाम आते ही मुह में पानी आ जाता है और कही मुंगेली का सीताफल हो तो बात ही कुछ ओर…. मुंगेली क्षेत्र का सीताफल पुरे प्रदेश में प्रसिद्ध है। यहाँ के सीताफल की सुगंध , सइज और स्वाद लोगो का मन मोह लेती है ,, क्षेत्र के सीताफल साइज में बड़े होने के कारण लोगो की पहली पसंद है ,, इसकी बाज़ार में आवक् दशहरा दिवाली के समय देखने को मिलती है,मुंगेली क्षेत्र के लोगो का आय का यह एक अच्छा जरिया है जिससे किसान त्यौहार के समय लाभान्वित होते है ।

मुंगेली जिले के किसान अब आधुनिक खेती में जुट गए है. अब किसानो का नगदी फसलो की तरफ झुकाव अधिक हो रहा है ! छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है क्योकि छत्तीसगढ़ की मुख्य फसल धान रही है और अधिकतर इलाके में धान की फसल ही बोई जाती है लेकिन कुछ वर्षो से किसानो का रुझान नगदी फसलो की तरफ बढ़ गया है ! आधुनिक खेती से जहा किसानो को पानी पर ज्यादा निर्भर नहीं होना पड़ता वही इस तकनीक से किसानो की आमदनी में बढ़ोत्तरी हुई है और किसान शासन की योजनाओ का भी लाभ लेते नजर आ रहे है ......

1 - मुंगेली क्षेत्र के किसान लगभग दो सो सालो से सीताफल की बाड़ी लगाते आ रहे है

2 -सीताफल की बाड़ी यहाँ की परंपरा बन गयी है

3 - क्षेत्र की कछारी जमीन सीताफल के लिए वरदान साबित हो रही है

मुंगेली जो की एक कृषि प्रधान जिला है , यहाँ के लोगो की मुख्य आमदनी कृषि से ही है ,ज्यादातर लोग कृषि पर आधारित है जैसा की प्रदेश में धान की अधिक खेती ली जाती है मुंगेली अंचल में भी किसान धान की फसले लेते है लेकिन कृषि प्रधान जिले मुंगेली में अब किसान आधुनिक किस्म की खेती में जुट गए है ! ऐसा ही एक नजारा मुंगेली विकासखंड के ग्राम बरईदहरा में देखने को मिला जहा के किसान नागेश्वर सिंह ने आधुनिक खेती करने की मिसाल पैदा की ! उन्होंने सीताफल की बाड़ी में पेड़ के निचे सोयाबीन , हल्दी , अदरक, आलू लगाकर अच्छी आमदनी अर्जित की वही एक मिसाल दुसरे किसानो के सामने पेश किया !

किसान की सफलता से अधिकारी भी गदगद है उन्होंने किसान नागेश्वर सिंह के कार्य की प्रशंशा करते हुए कहा की दुसरे किसानो को भी धान के फसलो पर निर्भर नहीं रहना चाहिए और नगदी फसलो की तरफ ध्यान देना चाहिए जैसे सीताफल केला, गन्ना, पपीता अनानस , हल्दी अदरक ,,सब्जी में घोभी आलू, करेला , मिर्ची, प्याज या जिनकी बाजार में जरुरत हो

सीताफल के फायदे

सीताफल स्वास्थवर्धक होता है , इसमें प्रोटीन विटामिन की बहुतयात रहती है , सीताफल पेट को ठण्डकता पहुचाता है / बाज़ार में इसकी मांग और इसका अच्छा रेट किसानो को मिलता है

! अधिकारी ने यह भी बताया की सीताफल की खेती बाड़ी जिले में बरदान साबित हो रही है मुंगेली और आसपास के क्षेत्रो की मिटटी कछारी होने के कारण सीताफल के किये एकदम उपयुक्त हैं, अधिकारी की माने तो सीताफल की खेती में दो महीने में ही एक लाख से भी अधिक की आमदनी हो सकती है क्षेत्र में दस से बारह किसानो को सिताफल की फसल के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है जिनकी जमीन कछारी है ,

शासन नगद फसल लगाने वाले किसानो को अनुदान,पौधा,दवा,खाद,हाइब्रिड बीज और लघु सिंचाई योजना के अंतर्गत स्प्रिकलर सेट और ड्रिप सिस्टम में छूट देती है !

सीजन -

जून जुलाई में सीताफल की बहार आ जाती है और अगस्त सितम्बर में फल लगने लगते है और अक्टूबर नवम्बर में फल बाज़ार में आ जाते है

आंगनबाड़ी केंद्रों में मिलीभगत से हो रहे भ्रष्टाचार ...

एक तरफ छत्तीसगढ़ शासन महिला बाल विकास विभाग को कुपोषण दूर करने के लिए बड़ी-बड़ी योजनाएं चला रही है तो दूसरी तरफ उसके ही देखरेख मैं लगे अधिकारी उसकी बंदरबांट करने में लगे हुए हैं लोगों को अपने कमीशन खोरी से ही मतलब है चाहे वह महिला बाल विकास के परियोजना अधिकारी हो या फिर सुपरवाइजर या फिर सहायिका व कार्यकर्ता क्यों ना हो मस्तूरी में महिला बाल विकास विभाग पहले से ही विवादित एवं बड़े-बड़े घोटाले से चर्चित है लेकिन इसमें सुधार कहीं भी नहीं होता मस्तूरी क्षेत्र के 75 परसेंट आंगनबाड़ी सही समय पर नहीं खुलता और नहीं किसी भी आंगनबाड़ी में पोषण युक्त बच्चों को भोजन मिलता है कई आंगनबाड़ियों में तो बच्चे आंगनवाड़ी केंद्र ही नहीं आते लेकिन उनकी नाम से आए हुए राशि बराबर समय पर आरण हो रही है मस्तूरी क्षेत्र में महिला बाल विकास के जितने भी जवाबदार अधिकारी बनकर आए हैं सभी अपनी मुख्यालय में बैठकर कुर्सी तोड़ने में ही मस्त रहते हैं क्षेत्र में कभी भी दौरा कर आंगनबाड़ियों के चरमर आए हुए व्यवस्था को सुधारने में दिलचस्पी नहीं लेते. मस्तूरी ब्लाक के पचपेड़ी क्षेत्र के ग्राम पंचायत चिल्हाटी में आंगनबाड़ी क्रमांक 5 में कार्यकर्ता भगवती केवट और सहायिका रेखा पांडे देखरेख व संचालित करती है पर आसपास के लोगों ने बताया एवं गांव के कुछ जनप्रतिनिधियों ने उच्च अधिकारियों को लिखित में सूचना दी है कि ग्राम पंचायत चिल्हाटी के आंगनवाड़ी क्रमांक 5 कभी भी समय पर नहीं खुलता और ना ही कोई बच्चे वहां पढ़ने आते हैं शासन के पैसा को हजम करने के लिए एवं शासन को गुमराह करने के लिए वहां के आंगनबाड़ी के रजिस्टर्ड में लिखा पूछा घर बैठकर कंप्लीट करके पैसा आहरण कर लिया जाता है लेकिन वहां कभी भी आंगनबाड़ी जाकर खोल कर नहीं बैठते और ना ही वहां किसी भी प्रकार के बच्चों का पढ़ाई लिखाई होता है वहां की कार्यकर्ता भगवती केवट चिल्हाटी बस स्टैंड में अपनी फलों की दुकान वह फैंसी दुकान चलाती है और सहायिका रेखा पांडे बरोबर रजिस्टर्ड मेंटेन करके रखती है और ग्राम पंचायत चिल्हाटी में उसकी बेटी आवास मित्र का काम करती है और उसकी मां रेखा पांडे स्वयं आवास ठेकेदार बनती फिरती है रोजाना वह आवास बनवाने को लेकर अपने काम धाम में व्यस्तता है करके बिजी रहती है पर आंगनबाड़ी कभी नहीं जाती लेकिन उनकी रजिस्टर में सिग्नेचर बरोबर रहती है. इनके नाम पर कई आवास के हितग्राहियों ने भी लिखित में शिकायत कर चुके हैं कि कई लोगों के घर को अभी भी कंप्लीट नहीं किए हैं ग्राम पंचायत चिल्हाटी के आंगनबाड़ी क्रमांक 5 एक प्राइवेट भवन में संचालित होती है जिसे दिखावे के लिए बस रखे हैं यहां कोई भी प्रकार की आंगनबाड़ी जैसी सुविधा नहीं है और नहीं वह बच्चों की पढ़ाई होती है यह जानकारी स्वयं मकान मालिक ने दिया है मकान मालिक ने यह भी बताया है कि कई महीनों से आंगनबाड़ी के नाम से लिए हुए किराए के मकान का पैसा भी नहीं मिल पाया है. ग्राम पंचायत के रमेश वर्मा .बुद्धदेव वर्मा .हरि शंकर केवट .एवं मंजू वर्मा ने जानकारी दिया कि चिल्हाटी के आंगनबाड़ी क्रमांक 5 में कभी भी कोई प्रकार की उच्च अधिकारी कभी निरीक्षण करने नहीं आए हैं आंगनबाड़ी की कार्यकर्ता एवं सहायिका और मस्तूरी मुख्यालय के कुछ कर्मचारी अधिकारी की की मिलीभगत के कारण यहां की आंगनबाड़ी की दैनिक स्थिति हुई है इन सभी लोगों की लापरवाही के ही चलते यहां के आंगनबाड़ी में कोई प्रकार की सुधार नहीं हो पाई है और न ही सुचारू रूप से यहां आंगनबाड़ी चल पा रही है l

वर्जन

वहां की सुपरवाइजर उत्तरा साहू का कहना है कि मुझे एक हफ्ता ही हुआ है वहां की प्रभार मिले बहुत जल्द वह निरीक्षण कर आंगनबाड़ी की कार्यकर्ता एवं सहायिका पर गड़बड़ी पाए जाने पर उचित करवाही करूंगीl

परियोजना अधिकारी उषा श्रीवास्तव का कहना है कि आंगनबाड़ियों के आए दिन निरीक्षण करने के लिए एवं समय-समय पर कई क्षेत्रों के आंगनबाड़ियों की व्यवस्था एवं कमियों को बताने के लिए शासन के द्वारा सुपरवाइजर नियुक्त किए गए हैं चिल्हाटी आंगनबाड़ी में मैं खुद जाकर या फिर तत्काल मैं सुपरवाइजर को बोलकर निरीक्षण करवाएगी गलती पाए जाने पर उचित कार्रवाई करेंगे l

छत्तीसगढ़ के गोठानों से निकले गोबर के दीये से दीवाली में रौशन होंगी दिल्ली की गलियां : दीपावली में गाय और गोबर का होता है खास महत्व

रायपुर : छत्तीसगढ़ के गोठानों से निकले गोबर के दीये से दीवाली में रौशन होंगी दिल्ली की गलियां : दीपावली में गाय और गोबर का होता है खास महत्व

 

ईकोफ्रेण्डली होने की वजह से दिल्ली से मिला दो लाख दीये का आर्डर

    

इधर गोबर हैं। थोड़ा देख के चलो। उधर गोबर है थोड़ा बच के चलो। तुम्हारें दिमाग में तो गोबर भरा है। कुछ ऐस शब्दों और वाक्यों के साथ अक्सर कुछ लोग गाय की गोबर का इस तरह तौहीन उड़ाते है जैसे यह बहुत गंदी हो। पर यह गोबर कितना कीमती हो सकता है, कितना उपयोगी हो सकता है, यह बात तो शायद इस प्रदेश के मुख्यमंत्री को और गाँव में रहने वाली महिलाओं को मालूम है। तभी तो, कल तक सिर्फ कण्डे और खाद बनाने के लिए काम आने वाला यह गोबर अब इतना महत्व का हो गया है कि इससे बने उत्पादों का आर्डर देश की राजधानी दिल्ली से मिलने लगा है। यहा के गोठानों से निकलने वाले गोबर से तैयार पूजन सामग्री और उत्पाद की मांग दिन ब दिन बढ़ती जा रही है। दिल्ली जैसे महानगर में जहां दीपावली त्यौहार के समय चाइनीज दीये,मोमबत्ती व झालर का बोलबाला रहता है ऐसे में पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिये उपयोगी छत्तीसगढ़ के गोबर से बने बायो दीये प्रदूषण की मार झेल रहे दिल्लीवासियों के लिये एक राहत जैसा है। ईकोफ्रेण्डली होने के साथ-साथ लक्ष्मी पूजन,दीवाली में गाय के गोबर का खास महत्व होता है। इन्हीं खास महत्व की वजह से ही गाय के गोबर से बने दीये की मांग दिल्ली और नागपुर से आई है। पहला आर्डर दो लाख दीये का है। जिसे स्वसहायता समूह की महिलाओं द्वारा तैयार किया जा रहा है।
      यह शासन द्वारा नरवा,गरूवा,घुरवा और बाड़ी विकास योजना की दिशा में उठाये गये कदम का ही परिणाम है कि गोठान के माध्यम से आरंग विकासखंड के ग्राम बनचरौदा की स्व सहायता समूह की महिलाओं द्वारा गोबर से बनाई गई कलाकृतियां दिन ब दिन प्रसिद्धि प्राप्त कर रही है। लाल, पीला हरा एवं सुनहरे सहित आकर्षक रंगों से सजे दीये, पूजन सामग्री के रूप में ओम,श्री,स्वास्तिक,छोटे आकार की मूर्तिया, हवन कुंड,अगरबत्ती स्टैण्ड, मोबाइल स्टैण्ड, चाबी छल्ला सहित अनेक उत्पाद देखने वालों को लुभा रही है। कीमत और अहमियत बढ़ने से गाय के गोबर की डिमांड तो बढ़ ही गई, गांव में आवारा घूमने वाले पशुओं का भी सम्मान बढ़ गया है। खासकर गोठान जहां गांव की सभी गाय इकट्ठी होती है वहा से निकलने वाला गोबर अब जैविक खाद और उपयोगी उत्पाद के रूप में गांव की बेरोजगार बैठी अनेक महिलाओं को रोजगार से जोड़ने के साथ-साथ आत्मनिर्भरता की राह पर ले जा रही है।

ग्राम बनचरौदा की स्व-सहायता समूह से जुड़ी महिलाओं द्वारा गोठान में आने वाले पशुओं के गोबर से कलाकृतियां बनाने का कार्य किया जा रहा है। लगभग 46 महिलाएं है जो गाय के गोबर से दीया, हवनकुंड,गमले,फ्रेण्डशिप बैण्ड, राखी एवं पूजन सामग्री बनाने की कला में निपुण हो गई है। समूह से जुड़ी श्रीमती टुकेश्वरी चंद्राकर ने बताया कि समूह की महिलाओं का अलग-अलग दायित्व है। गोबर लाने से लेकर गोबर का पाउडर तैयार करने और अन्य सामग्री के साथ मिश्रण कर एक आकर्षक उत्पाद तैयार करने की जिम्मेदारी है। उन्होंने बताया कि आकृति तैयार होने के बाद उसे फिनिशिंग टच देने और अलग-अलग रंगों के माध्यम से सही रूप देने में महिलाओं का योगदान होता है। इसकी पैकेजिंग और मार्केटिंग की जिम्मेदारी भी है। हाल ही में सांचा आदि तैयार कर काम शुरू किया गया है। अभी दो हजार का आर्डर जिला स्तर पर पूरा किये है। उन्होंने बताया कि दिल्ली से दो लाख दीयें का आर्डर मिला है। जिसे पूरा करने महिलाएं लगी हुई है। समूह की सदस्य श्रीमती हेमीन बाई और ममता चंद्राकर ने बताया कि सुबह 10 बजे से शाम 4 बजे तक सभी महिलाएं कुछ न कुछ काम करती है। एक दिन में एक महिला 300 तक दीये तैयार कर सकती है। दीया तैयार करने के बाद उसे मूर्त रूप देने का काम भी किया जाता है।
पांच रूपये के है एक दीये
गोठानों से निकलने वाले गाय के गोबर से तैयार डिजाइन किये दीये की कीमत फिलहाल पांच रूपये और छोटे दीये की कीमत दो रूपये रखी गई है। यह दिखने में भी बहुत आकर्षक है। स्वास्तिक, श्री, ओम की कलाकृति की कीमत पांच रूपये, शुभ लाभ, मोबाइल स्टैण्ड की कीमत 100 रूपये, गणेश भगवान की प्रतिमा की कीमत 101 रूपये रखी गई है। इनमें से दीया सहित अन्य उत्पादों का उपयोग तो जरूरत के हिसाब से किया ही जा सकता है साथ ही घरों एवं दफ्तरों में सजावट के लिये भी गोबर के इस उत्पाद का उपयोग सुदंरता बढ़ाने के लिये लिये किया जा सकता है।


पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिये है लाभदायक
गाय के गोबर से बने उत्पाद अनेक दृष्टिाकोण से उपयोगी है। मिट्टी की कटाई रोकने में मददगार और मिट्टी को दीये का रूप देकर उसे आग में पकाने जैसी प्रक्रियाओं से दूर गोबर के दीये को धूप में सूखाकर तैयार किया जाता है। इस प्रकार के दीये एवं सामग्री को आसानी से नष्ट करने के साथ खाद के रूप में किया जा सकता है। यह पर्यावरण के साथ स्वास्थ्य के लिये भी लाभदायक है।
राजस्थान के मुख्यमंत्री ने भी की तारीफ
गाय के गोबर से बने दीये सहित अन्य कलाकृतियां देखने वालों का ध्यान अपनी ओर खींच लेती है। बनचरौदा में आदर्श गोठान देखने आये राजस्थान के मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत और वहा के मंत्रियों ने जब स्व-सहायता समूह की महिलाओं द्वारा तैयार उत्पादों को देखा तो गोबर से बने इन उत्पादों की जमकर प्रशंसा की। प्रतीक चिन्ह के रूप में उन्हें जब गोबर से बना उत्पाद और अपनी नाम लिखी सामग्री मिली तो उनकी खुशी दुगनी हो गई। उन्होंने अपने प्रदेश में में नंदी गौशाला प्रारंभ करने और गोबर से उत्पाद तैयार करने के इस तरह के नवाचार को अपनाने की बात कही।

विशेष : यहाँ शरद पुर्णिमा की रात माँ पाताल भैरवी मंदिर मे जडी-बुडी युक्त खीर प्रसाद का किया गया वितरण ,,,पढ़े ये है मान्यता

सूर्यकान्त यादव -

राजनांदगांव-- राजनांदगाँव के बर्फानी आश्रम मे शरद पुर्णिमा की रात माँ पाताल भैरवी मंदिर मे जडी-बुडी युक्त खीर प्रसाद का वितरण किया गया...जिसमे देश भर से लगभग 30 हजार से अधिक लोग यहा पहुकर खिर प्रसाद ग्रहण किया....ये मान्यता है,कि यहा जो प्रसाद वितरण किया जाता उसमे अस्थामा और दमा के रोगीयो के लिए लाभ दाई माना जाता है...साथ ही अन्य रोगो के लिए भी हितकारी माना जाता है...पाताल भैरवी मंदिर मे यह परंपरा पिछले 22 सालो से निरंतर चली आ रही है....हजारो की संख्या मे पहुचे यह भक्त रात भर जाग कर भजन किर्तन करते रहते है...उसके बाद सुबह चार बजे से प्रसाद का वितरण किया जाता है...और लोग प्रसाद लेते है...यह सिलसिला सुबह 10 बजे तक चलता रहा है....पाताल भैरवी मंदिर मे भक्तो का ताता देखा जा सकता है...लोगो को इस प्रसाद से लाभ मिलता है...और सैकडो कि संख्या मे लोग यह प्रसाद लेने आते है...मंदिर समिती द्वारा यह प्रसाद निशुल्क वितरण किया जाता है... छत्तीसगढ़ के अलावा, महाराष्ट्र,उड़ीसा,वेस्ट बंगाल, मध्यप्रदेश से लोग खीर ग्रहण करने पहुंचे है, इस जड़ीबूटी युक्त खीर से दमा, अस्थमा,सांस जैसी बीमारी से ग्रसित लोग खीर का सेवन कर रहे है, आज के दिन का इंतजार लोग पूरा साल इंतजार करते है। 

विश्व बालिका दिवस पर साइबर फोरेंसिक एक्सपर्ट मोनाली गुहा ने दीं सिक्योरिटी टिप्स

न सिर्फ भारत मे बल्कि पूरे विश्व मे सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने वाले यूज़र्स की संख्या दिन पे दिन बढ़ती ही जा रही है । इसमें एक बड़ा वर्ग बालिकाओं और किशोरी युवतियों का भी है जो इन पर अकाउंट्स तो बना लेती हैं मगर सुरक्षा उपायों के बारे में जानकारी न होने के कारण अपने आप को साइबर अपराधों से सुरक्षित नहीं रख पातीं ; उन्ही की सुरक्षा के लिए पेश हैं साइबर फोरेंसिक एक्सपर्ट मोनाली गुहा द्वारा बताए गए ये खास सोशल मीडिया सिक्युरिटी टिप्स : *रखें स्ट्रांग पासवर्ड* आपका पासवर्ड जितना कठिन होगा उतना ही सुरक्षित आपका सोशल मीडिया अकाउंट होगा ,इसके लिए स्ट्रांग पासवर्ड का इस्तेमाल करें जिसमे स्पेशल कैरेक्टर , न्यूमेरिक और स्मॉल कैपिटल अल्फाबेट का यूनिक कॉम्बिनेशन हो , उदाहरण के लिए - 9io0k*%@ddH*7÷} एक स्ट्रांग पासवर्ड कहा जा सकता है जिसकी लेंथ 8 से 15 या उससे अधिक कैरेक्टर्स तक रखना सुरक्षित कहा जाएगा । *लेवल टू वेरिफिकेशन* केवल पासवर्ड अच्छा होना ही ज़रूरी नहीं ,अगर सुरक्षित पासवर्ड भी किसी को पता चल जाए तो ऐसे में एक और सिक्योरिटी लेयर का होना ज़रूरी है , जो हर भारतीय सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर आपको मिलेगा , इसे लेवल टू वेरिफिकेशन के नाम से जाना जाता है । अपने सोशल मीडिया अकाउंट की प्राइवेसी सेटिंग्स में जा कर आप इसे सेटअप कर सकते हैं । इसमें आपको एक ईमेल आईडी और फ़ोन नंबर रजिस्टर करना होता है ,जिसके बाद हर बार जब भी आप अपना अकाउंट लॉगिन करेंगे आपको इसी रेजिस्टर्ड ईमेल या फोन नंबर। पर ओटीपी यानी वन टाइम पासवर्ड आएगा ,जिसे डाले बिना आपका अकाउंट लॉगिन नहीं होगा । *निजी जानकारी साझा न करें* महिलाएं विशेषकर अपनी निजी जानकारी जैसे फोन नंबर ,ईमेल आईडी या लोकेशन शेयर करने से बचें । किसी भी व्यक्ति से अपनी निजी जिंदगी की परेशानियां या राज़ शेयर न करें । इससे वे फेक अकाउंट के ज़रिए आपकी मजबूरी का फायदा उठा सकते हैं । *सोशल मीडिया से जीवनसाथी ढूंढने से बचें* फेसबुक जैसे बहुत से ऐसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म हैं जिनसे लोग आपस मे जुड़ते हैं , कई बार बात शादी तक भी पहुँच जाती है , ज़रूरी नहीं कि हर शादी विफल हो मगर ध्यान रखें कि सोशल मीडिया पर डाली गई जानकारी सही हो ये ज़रूरी नहीं । कई बार अपराधी लड़कियों को अपने जाल में फांसने के लिए भी अच्छी तस्वीरों और स्टेटस को प्रदर्शित कर अपराध को अंजाम देते हैं ,जिन लोगो को आप पर्सनली नहीं जानते ,उन्हें ऐड करने से बचें । *फेस रिकॉग्निशन बताएगा किसने अपलोग की आपकी तस्वीर* फेस रिकॉग्निशन एक ऐसी सेटिंग है जो आपको यह बताएगी कि किसने कब और कहां स आपकी तस्वीर फेसबुक पर अपलोड की । यानी अगर कोई आपका फेक अकाउंट बनाता है और आपने अपने अकाउंट में यह सेटिंग की हुई है तो आपको तुरंत नोटिफिकेशन आजाएगा की आपकी तस्वीर किसी ने अपलोड की है । अब आप चाहें तो उसे तुरंत रिपोर्ट करके ब्लॉक कर सकते हैं या कानूनी कार्रवाई भी कर सकते हैं । *अपनी तस्वीरों को रखें सुरक्षित* आप अपनी जितनी भी तस्वीरें डालें ,लिमिटेड ऑडियंस को ही डालें ,साथ ही प्रोफ़ाइल पिक्चर को पिक्चर गार्ड से प्रोटेक्ट करना न भूलें ,जिससे कोई भी आपकी तस्वीर का स्क्रीनशूट नहीं ले पाएगा । *अगर कोई साइबरअपराधी परेशान करे ,तो क्या करें?* यदि कोई आपको बार बार कॉल करता है , अभद्र मेसेज या ईमेल के ज़रिए धमकियां देता है या आपको किसी भी तरह से परेशान करने की कोशिश करता है तो घबराएं नहीं ,अपने नजदीकी साइबर सेल जाकर तुरंत एफआईआर दर्ज कराएं। इसके लिए एविडेन्स हमेशा सहेज कर रखें जैसे मेसेज और कॉललॉग्स का स्क्रीनशूट ,कॉल रेकॉर्डिंग ,अगर कोई फेक प्रोफ़ाइल है तो उसका स्क्रीन शूट आदि । यदि आप पुलिस के पास जाने में असमर्थ हैं या किसी भय से नहीं जा सकतीं तो अपने नजदीकी साइबर एक्सपर्ट्स से तुरंत संपर्क करें , आपके कानूनी अधिकारों की जानकारी एवम मार्गदर्शन के लिए परामर्श लें । *विषम परिस्थिति में करें गुहा साइबर एक्सपर्ट्स से संपर्क* हेल्पलाइन नम्बर 07714020055 पर कॉल करके आप साइबर फोरेंसिक एक्सपर्ट मोनाली गुहा ,सोनाली गुहा अथवा आयुष गुहा किन्ही से भी मिलने का आग्रह कर सकते हैं । इसके अलावा अगर आपके साथ किसी ने साइबर अपराध किया भी है तो उस अपराधी के खिलाफ आगे कैसे बढ़ा जाए औऱ कैसे अब खुद को सुरक्षित रखा जाए आदि विषयों पर अधिक जानकारी के लिए भी आप इनसे संपर्क कर सकते हैं ।

BBN24 विशेष : छत्तीसगढ़ का पहला ऐसा गांव जहाँ ...दशहरे में मेला लगेगा... राजा आएँगे.. पर रावण नहीं मरेगा..जानिए क्या है कारण,,

नीलकमल सिंह ठाकुर 【विशेष】

मुंगेली- जिला मुख्यालय से महज दस किलोमीटर की दूरी पर स्थित ग्राम पंचायत कन्तेली में 16वीं सदी से चली आ रही है एक अनोखी परंपरा है। यहां राजा की सवारी निकलती है लेकिन रावण का दहन नहीं होता है। राजा के दर्शन के लिए 44 गांवों से ग्रामीण एकत्रित होते हैं। राजा कुल देवी मां महालक्ष्मी, महासरस्वती और महाकाली की पूजा कर पूरे क्षेत्र में खुशहाली की कामना करते हैं। 


छत्तीसगढ़ का पहला ऐसा गांव

जिस प्रकार केरल में मान्यता है कि दशहरे के दिन राजा बली अपनी प्रजा का हाल जानने के लिए पाताललोक से बाहर आते हैं और प्रजा उन्हें सोनपत्ती देकर उनका आशीर्वाद प्राप्त करती है। कुछ ऐसी ही परंपरा मुंगेली जिले के कन्तेली गांव में है, जो दशको से चली आ रही है। यह छत्तीसगढ़ का पहला ऐसा गांव है, जहां दशहरा में मेला तो लगता है लेकिन रावण का दहन नहीं होता है।

44 गांव के लोग होते है एकत्रित

16वीं सदी से चली आ रही यह परंपरा दशहरे के दिन होता है। मेले में आस-पास के करीब 44 गांव के लोग शामिल होते है। यहां के राजा यशवंत सिंह के महल से एक राजा की सवारी निकलती है, जिसमें लोग शामिल होकर नाचते-गाते कुल देवी के मंदिर तक पहुंचते हैं। राजा यशवंत सिंह के सुपुत्र राजा गुनेंद्र सिंह के द्वारा कुल देवी मां महालक्ष्मी, महासरस्वती और महाकाली की पूजा कर पूरे क्षेत्र की खुशहाली की कामना करते हैं। इतना ही नहीं इसके बाद राजमहल में एक सभा का आयोजन किया जाता हैं, जहां ग्रामीणों के द्वारा राजा को सोनपत्ती भेंट कर उनका आशीर्वाद लिया जाता है।

लुप्त होती 140 वर्ष पुरानी रतनपुरिहा भादो गम्मत ...पढ़े ये रिपोर्ट

कोटा -- फिरोज खान

रतनपुर को प्राचीन छत्तीसगढ़ के राजधानी होने का गौरव हासिल है यहां कई प्राचीन परंपराओं के साथ साथ प्राचीन धरोहर आज भी मौजूद है जिसमें से कई विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुके है उन्हीं में से एक है भादो गम्मत जिसकी रचना आज से करीब 140 वर्ष पूर्व यहां के कवि बाबुरेवा राम ने की थी जिसमें श्री कृष्ण की लीलाओं को बड़े ही मोहक अंदाज में प्रस्तुत किया गया है वर्षों पहले रतनपुर के हर गली मोहल्ले में इस भादों गम्मत का आयोजन होता था और लोगों के मनोरंजन और मेल मिलाप का यही एक साधन भी हुआ करता था लेकिन आज के इस डिजिटल यूग में यह विलुप्ति के कगार पर पहुच गया है जिसे रतनपुर करहैयापारा के कुछ युवा और बुजुर्ग बचाने में लगे हुए है उनके द्वारा प्रतिवर्ष भादों महीने में इस भादो गम्मत का आयोजन किया जाता है इस आयोजन में इन कलाकारों के द्वारा पारंपरिक वाद्य यंत्र जैसे तबला, हारमोनियम और मजीरा का ही उपयोग किया जाता है साथ ही प्राचीन 140 से चले आ रहे परंपरा के अनुरूप ही इस रतनपुरिहा भादों गम्मत का मंचन भी किया जाता है छत्तीसगढ़ सरकार को भी इस प्राचीन परंपरा को आगे आकर बचाने के लिए प्रयास किए जाने की जरूरत है नहीं तो यह 140 वर्ष पुरानी रचना और परंपरा केवल किताबों में ही सिमटकर रह जाएगी।


गणेश “विसर्जन” क्या सिखाता है हमें ?

“जन्म होता है हमारा माँ की कोख से और “विसर्जन” भी होता है हमारा माँ की गोद में |”

हम गणेश जी को हर साल बड़े हो धूमधाम से अपने घर में लेकर आते है|गणेश जी कहीं एक,तीन,पांच या दस दिनों तक बैठाया जता है|गणेश जी को हम बिलकुल अपने घर के सदस्य की तरह सेवा करते है गणेश जी को कोई अपना बेटा मानता है, कोई उसे अपना छोटा भाई और कोई उसे अपना दोस्त कहता है ये सब लोगों की उनके प्रति उनकी श्रद्धा होती है रिश्ता चाहे कोई भी गणेश जी का उनके साथ पर वो सबका मंगल ही करते है |उनके बहुत से नाम है पर हम उन्हें प्यार से “बप्पा” कहते है | इस दौरान दस दिनों तक गणेश पंडालों में काफी रौनक होती है इसी बहाने सब लोग एक जगह मिलते है और साथ में मिलकर इस त्यौहार को मनाते है | इन दस दिनों में पूरे शहर का वातावरण भक्तिमय हो जाता है |

गणेश उत्सव मनाने की शुरुवात:-

जैसा की हम सब जानते है की गणेश जी हिन्दुओं के अराध्य देव है |कोई भी धार्मिक उत्सव,पूजा हो या फिर विवाह उत्सव हो या किसी भी शुभ अवसर सबसे पहले गणेश जी की ही पूजा सर्व प्रथम की जाती है |कहा जाता है की महाराष्ट्र में सात वाहन,राष्ट्र कूट,चालुक्य आदि राजाओं ने गणेश उत्सव की प्रथा चलाई थी |छत्रपति शिवाजी महाराज गणेश जी की उपासना करते थे|इतिहास में ये वर्णन मिलता है की बाल्यकाल में उनकी माँ जीजाबाई ने पुणे के ग्रामदेवता कसबा गणपति की स्थापना की थी |तभी से यह परम्परा चली आरही है |उसके बाद पेशवाओं ने यह परम्परा को आगे बढाया|

पहले सिर्फ घरों में होती थी गणेश पूजा:-

ब्रिटिश काल में लोग किसी भी संस्कृत कार्यक्रमों या उत्सवों को साथ में मिलकर या एक जहग इकठा होकर नहीं मना सकते थे |इसलिए लोग घरों में ही गणेश जी पूजा किया करते थे|लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने पुणे में पहली बार सार्वजनिक रूप से गणेश उत्सव मनाया |आगे चलकर उनका यह प्रयास एक आन्दोलन बना और स्वतंत्रता आन्दोलन में इस गणेश उत्सव ने लोगों को एक जुट करने में अहम् भूमिका निभाई है |इस तरह गजानन राष्ट्रिय एकता के प्रतिक बन गये | पूजा को सार्वजनिक महोत्सव का रूप देते समय उसे केवल उसे धार्मिक कर्म कांडों तक ही सिमित नहीं रखा गया बल्कि गणेश उत्सव को आजादी की लड़ाई,छुआछुत दूर करने और समाज को संगठित करने तथा आप आदमी का ज्ञानवर्धन करने का जरिया भी बनाया गया |गंगाधर तिलक ने १८९३ में गणेश उत्सव का सार्वजनिक पौधारोपण किया था जो आज एक विराट वत वृक्ष का रूप ले चुका है |

गणेश जी मूर्ति कैसी होनी चाहिए और क्यूँ ?

चलिए हमने गणेश उत्सव की शुरुवात कैसे और कब हुई ये तो जान गये अब दिमाग में ये सवाल है की गणेश की मूर्ति किसकी बनाई जाए क्यूँ की मंदिरों में जो मूर्तियाँ स्थापित की जाती है वो पत्थरों की बनी होती है इस तरह की मूर्तियों को तो हम गणेश उत्सवों में नहीं विराजित कर सकते क्यूँ की इन उत्सवों में हम दस दिनों तक ही गणेश जी की पूजा करते है और फिर उसका विसर्जन करते है इसलिए इस समय जो गणेश जी की मूर्तियाँ बनाइ जाती है वो मिटटी की होती है ताकि उसे जब हम विसर्जित करे तो वो आराम से पानी में घुल जाए | लेकित आजकल मिटटी की जगह प्लास्टर ऑफ़ पैरिस की मूर्तियाँ बनाई जा रही है इसकी बनी मूर्तियाँ पानी में नहीं घुलती जिसके कारण पानी प्रदूषित होता है और मूर्तियाँ जैसी की वैसी ही रह जाती जो जो बहकर हमारे पैरों के निचे तो कभी बहकर गंदें पानी में चली जाती है और इस तरह भगवान् का अपमान होता है| इस तरह की मूर्तियाँ काफी कीमती होती है साथ ही परियावर्ण को नुकसान भी पहुचाती है |इसलिए हमें हमेशा मिटटी से बनी मूर्तियाँ ही खरीदनी या बनानी चाहिए ताकि वो पानी में आसानी से घुल जाए और कोई नुकासान भी न हो |इस बार कई जगहों पर फिटकरी से बनी गणेश जी की प्रतिमायें भी बनाई गई है |फिटकरी से गणेश जी प्रतिमा बनाने का उद्देश्य ये था की जब इन मूर्तियों का विसर्जन हम पानी में करेंगें तो वो पानी को साफ़ करेगा और इससे कोई नुकसान भी नहीं होगा |

विसर्जन शब्द का अर्थ :-

हमने जान लिया की गणेश उत्सव की शुरुवात कैसे हुई और किस तरह मिटटी की बनी गणेश जी की प्रतिमायें प्रकृति के लिए अच्छी होती है|पर कभी हमने इस बात पर गौर किया है की विसर्जन शब्द का वास्तविक क्या अर्थ होता है,

हम पानी में ही मूर्तियों को क्यूँ विसर्जित करते है ?

ये धर्म और विश्वास की बात है की हम गणेश जी को अकार देते है लेकिन ऊपर वाला तो निराकार है और सब जगह व्याप्त है लेकिन आकार को समाप्त होना ही पड़ता है इसलिए विसर्जन होता है |जन्म का त्याग करना पडेगा विसर्जन हमें ये सिखाता है की इंसान को अगला जन्म पाने के लिए इस जन्म में अपने इस शारीर का त्याग करना पडेगा | गणेश जी मूर्तियाँ बनती है,पूजा होती है फिर उसका विसर्जन कर दिया जाता है ताकि अगले बरस आने के लिए उनको इस साल विसर्जित होना होता है | जीवन भी यही है इस जन्म में अपनी जिम्मेदारियां पूरी कीजिये और समय समाप्त होने पर अगले जन्म के लिए इस जन्म को छोड़ दीजिये |

इस उत्सव को और उपयोगी कैसे बनाए ?

दस दिनों तक ये उत्सव हम बड़े ही धूमधाम से मनाते है काफी सारे रंगारंग कार्यक्रमों का भी आयोजान करते है |हम इस उत्सव को और भी कैसे उपयोगी बना सकते है ?हमें इस बात पर भी जोर देना चाहिए |हम इस उत्सव में जरूरत मंदों को उनके जरूरत की वस्तुएं दान दे सकते है,मिटटी की मूर्तियों को किस तरह अपने घर में कैसे विसर्जित करे?हमें तालाबों या नदियों में मूर्तियों को विसर्जित करने की अपेक्षा कृतिम तालाब बनाकर उसमे विसर्जन की प्रकिया शुरू करनी चाहिए |इस समय काफी झाकियों का भी जगह–जगह आयोजन होता है उन झाकियों में रामयण की कथा आदि बताने से अच्छा ज्ञान वर्धक कहानियां या साफसफाई से जुडी बातें शिक्षा,खेल या विज्ञान से जुडी उपलब्धियों को इन में प्रदर्शित किया जाए ताकि बच्चों और लोगों को जानकारी मिल सके |हम सब जानते है मुंबई में लालबाग के गणपति काफी फेमस है इस बार यहाँ पंडाल में चन्द्रयान-२ के बारे लोगों को जानकारी मिल सके इस तरह यहाँ इस पंडाल को सजाया गया है |हमें विसर्जन बहुत शालीनता के साथ करना चाहिए इस वक्त शराब आदि का सेवन नहीं करना चाहिए |इस तरह हम इस उत्सव को और भी बेहतर बना सकते है | जाते-जाते यहीं कहना चाहूँगीं गणपति बप्पा मोरियाँ, अगले बरस तू जल्दी आ |

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