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विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की एक रिपोर्ट में 23 करोड़ भारतीय आय का 10 फीसदी इलाज पर करते हैं खर्च:

 नई दिल्ली  विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि आधे भारतीयों की आवश्यक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच नहीं है, जबकि स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ उठाने वाले लोग अपनी आय का 10 फीसदी से ज्यादा इलाज पर ही खर्च कर रहे हैं।

डब्ल्यूएचओ की वेबसाइट पर प्रकाशित विश्व स्वास्थ्य सांख्यिकी 2018 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत की आबादी का 17.3 फीसदी या लगभग 23 करोड़ नागरिकों को 2007-2015 के दौरान इलाज पर अपनी आय का 10 फीसदी से अधिक खर्च करना पड़ा।
भारत में इलाज पर अपनी जेब से खर्च करनेवाले पीड़ित लोगों की संख्या ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी की संयुक्त आबादी से भी अधिक है। भारत की तुलना में, इलाज पर अपनी आय का 10 फीसदी से अधिक खर्च करने वाले लोगों का कुल देश की कुल जनसंख्या में प्रतिशत श्रीलंका में 2.9 फीसदी, ब्रिटेन में 1.6 फीसदी, अमेरिका में 4.8 फीसदी और चीन में 17.7 फीसदी है।

डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक ट्रेडोस एडहानोम गेबेरियस ने एक विज्ञप्ति में कहा, 'बहुत से लोग अभी भी ऐसी बीमारियों से मर रहे हैं, जिसका आसान इलाज और बड़ी आसानी से जिसे रोका जा सकता है। बहुत से लोगों केवल इलाज पर अपनी कमाई को खर्च करने के कारण गरीबी में धकेल दिए जाते हैं और बहुत से लोग स्वास्थ्य सेवाओं को ही पाने में असमर्थ हैं। यह अस्वीकार्य है।'

डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट ने आगे बताया गया की देश की आबादी का 3.9 फीसदी या 5.1 करोड़ भारतीय अपने घरेलू बजटा का एक चौथाई से ज्यादा खर्च इलाज पर ही कर देते हैं। जबकि श्रीलंका में ऐसी आबादी महज 0.1 फीसदी है, ब्रिटेन में 0.5 फीसदी, अमेरिका में 0.8 फीसदी और चीन में 4.8 फीसदी है।

इलाज पर अपनी आय का 10 फीसदी से ज्यादा खर्च करने वाली आबादी का वैश्विक औसत 11.7 फीसदी है। इनमें 2.6 फीसदी लोग अपनी आय 25 फीसदी से ज्यादा हिस्सा इलाज पर खर्च करते हैं और दुनिया के करीब 1.4 फीसदी लोग इलाज पर खर्च करने के कारण ही अत्यंत गरीबी का शिकार हो जाते हैं। sabhar 

संयुक्त राष्ट्र ने उत्तर कोरिया की मदद करने पर शिपिंग कंपनियों को किया ब्लैकलिस्ट

अमेरिका। संयुक्त सुरक्षा परिषद ने 27 जहाजों, 21 शिपिंग कंपनियों और एक व्यक्ति को इसलिए ब्लैकलिस्ट कर दिया क्योंकि उन्होंने उत्तर कोरिया पर लगे प्रतिबंधों को ताक पर रखते हुए उसकी सहायता की और कारोबार किया। इन कारोबारियों ने उत्तर कोरिया को उस पर लगे प्रतिबंधों से बचाने का भी प्रयास किया। इसे लेकर फरवरी 2018 में अमेरिका ने इन कारोबारियों पर प्रतिबंध लगाने की संयुक्त राष्ट्र से मांग की थी। साथ ही तेल और कोयले जैसे कोरियाई माल की तस्करी पर भी चिंता जताई थी। संयुक्त राष्ट्र ने मांग मानते हुए उत्तर कोरिया के साथ कारोबार करने वालों को ब्लैकलिस्ट कर दिया है।
संयुक्त राष्ट्र ने अभी तक उत्तर कोरिया पर कई बार प्रतिबंध लगाया है, बावजूद इसके वह बाज नहीं आ रहा है। बीबीसी में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, शुक्रवार को जारी किए गए नए प्रतिबंधों के जरिए न सिर्फ उत्तर कोरिया के शिपिंग ऑपरेशन को निर्देश दिए गए थे, बल्कि चीन की उन कंपनियों को भी निर्देश जारी किए गए थे, जो प्योंगयांग के साथ व्यापार कर रही हैं। 

जिन कंपनियों को ब्लैकलिस्ट किया गया है, उनमें से 16 उत्तर कोरिया में हैं, जबकि 5 हॉन्ग कॉन्ग में, 2 चीन में, दो ताइवान में हैं, जबकि 1 पनामा और एक सिंगापुर में है। संयुक्त राष्ट्र में भारतीय मूल की अमेरिकी राजदूत निकी हेली ने कहा कि हालिया कदम से साफ संदेश दिया जा रहा है कि उत्तर कोरिया पर दबाव बनाने के लिए पूरा अंतरराष्ट्रीय समुदाय एकजुट है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्योंगयांग पर लगाए गए अब तक के प्रतिबंधों में यह सबसे बड़ा प्रतिबंध है। बता दें कि उत्तर कोरिया पर 2006 से लेकर अभी तक कई प्रतिबंध लगाए जा चुके हैं। इनकी वजह से उत्तर कोरिया के निर्यात में काफी कटौती भी हुई है।

इजरायली सेना और फिलिस्तीनी नागरिकों में झड़प, 16 की मौत, 2000 से ज्यादा जख्मी

येरुशलम। गाजा-इजरायल बॉर्डर पर हजारों फिलिस्तीनी नागरिकों ने प्रदर्शन किया। ग्रेट मार्च ऑफ रिटर्न कहे जाने वाले 6 हफ्ते के विरोध प्रदर्शन के पहले दिन इजरायली सेना से झड़प में करीब 16 फिलिस्तीनी नागरिकों की मौत हो गई। साथ ही करीब 2000 से ज्यादा लोग घायल बताए गए हैं। घटना के सामने आने के बाद यूएन सिक्युरिटी काउंसिल ने इजरायल से संयम बनाए रखने की अपील की है।


तीन पॉइंट्स में जानिए पूरा मामला?
1. बॉर्डर पर क्या हुआ?

- इजरायली डिफेंस फोर्स (आईडीएफ) के मुताबिक, जमीन दिवस के दिन करीब 17 हजार फिलिस्तीनी नागरिक बॉर्डर स्थित पांच स्थानों पर जुटे थे। ज्यादातर लोग अपने कैंप्स में ही थे हालांकि, कुछ युवा इजरायली सेना की चेतावनी के बावजूद सीमा पर ही हंगामा करने लगे। उन्होंने बार्डर पर पेट्रोल बम और पत्थरों से हमला किया। जिसके बाद आईडीएफ ने भीड़ को हटाने के लिए फायरिंग कर दी। 
- इजरायल के अखबार येरुशलम पोस्ट के मुताबिक, सेना की गोलीबारी में मारे गए लोग सीमा पर स्थित बाड़े को लांघने की कोशिश कर रहे थे। फिलिस्तीनियों की भीड़ को देखते हुए इजरायल ने टैंकों और स्नाइपर्स का भी सहारा लिया। चश्मदीदों के मुताबिक, उन्होंने आंसू गैस के गोले गिराने के लिए ड्रोन का इस्तेमाल होते हुए भी देखा।

2. गोलीबारी पर इजरायल का पक्ष?
- इजरायल की सेना सुरक्षा को देखते हुए गाजा बॉर्डर पर नो-गो जोन की रखवाली करती है। सेना को फिलिस्तीन के जमीन दिवस में हजारों नागरिकों के जुटने की आशंका थी। इसी लिए यहां सेना को बढ़ाया गया था, ताकि फिलिस्तिनियों की ओर से बॉर्डर पार करने जैसी घटनाओं को रोका जा सके। 
- इजरायल के विदेश मंत्रालय ने इसे इजरायल से जानबूझकर टकराव बढ़ाने का प्रयास बताया। साथ ही इसके लिए फिलिस्तीन के संगठन हमास को जिम्मेदार बताया।

3. क्यों हो रहा टकराव?
- इजरायल-गाजा बॉर्डर पर विरोध प्रदर्शन के लिए फिलिस्तीन की ओर से 5 कैंप्स लगाए गए हैं। इन्हें ‘ग्रेट मार्च ऑफ रिटर्न’ नाम दिया गया है। 
- विरोध प्रदर्शन 30 मार्च से शुरू हुए हैं। इस दिन फिलिस्तीन जमीन दिवस मनाता है। कहा जाता है कि इसी दिन 1976 में फिलिस्तीन पर इजरायल के कब्जे के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले 6 नागरिकों को इजरायली सेना ने मार दिया था। 
- ये विरोध प्रदर्शन 15 मई के आसपास खत्म होंगे। इस दिन को फिलिस्तीन में नकबा (कयामत) के तौर पर मनाया जाता है। 1948 में इसी दिन इजरायल बना था, जिसके चलते हजारों फिलिस्तीनियों को अपने घर छोड़ने पड़े थे।

गाजा में और बिगड़ सकते हैं हालातः यूएन
- यूएन सिक्युरिटी काउंसिल ने न्यूयॉर्क में बैठक के दौरान मामले में जांच की बात कही। यूएन में राजनीतिक मामलों के डिप्टी चीफ ताए ब्रूक ने काउंसिल को बताया कि गाजा में आने वाले दिनों में हालात ज्यादा बिगड़ सकते हैं। उन्होंने मानवाधिकार मामलों में इजरायल से अपनी जिम्मेदारी समझने की अपील की। साथ ही उन्होंने कहा औरतों और बच्चों को निशाना ना बनाए जाने की भी मांग की।

जासूस हत्याकांडः अमेरिका के 60 राजनयिकों को रूस से निकालने का फरमान

मॉस्को। इंग्लैंड में रूस के पूर्व जासूस को जहर देने के मामले में उसका अमेरिका के साथ टकराव बढ़ता जा रहा है। अब रूस ने अमेरिका के 60 राजनयिकों को देश छोड़कर जाने का फरमान सुनाया है। उन्हें 5 अप्रैल तक का वक्त दिया है। इसके साथ ही सिएटल में अमेरिका वाणिज्य दूतावास बंद करने के लिए कहा है। सेंट पीटर्सबर्ग का दूतावास वह पहले ही बंद कर चुका है। इससे पहले अमेरिका ने रूस के 60 राजनयिकों को खुफिया अफसर करार देते हुए बाहर निकाल दिया था। रूस की कार्रवाई पर अमेरिका ने आपत्ति जताई है। उसने कहा है कि यह उसकी उचित कार्रवाई के बदले की गई गलत कार्रवाई है। रूस ने धमकी दी है कि वह उस पर आरोप लगाने वाले और ब्रिटेन-अमेरिका का साथ देने वाले दूसरे देशों के राजनयिक को भी निकालेगा।

अमेरिका ने कहा- हम रूस से निपट लेंगे
अमेरिका के राष्ट्रपति कार्यालय व्हाइट हाऊस ने कहा- रूस के इस फैसले से अमेरिका-रूस के रिश्ते और अधिक खराब होंगे। रूस का यह कदम अप्रत्याशित नहीं है और अमेरिका इससे निपट लेगा। अमेरिका ने उसके 60 राजनयिकों को निकालने के रूस के फैसले को गलत बताया। अमेरिका के मुताबिक, ब्रिटेन में रूस के पूर्व जासूस को जहर दिए जाने के मामले में मास्को की यह कार्रवाई ठीक नहीं है। अमेरिका के स्टेट स्पोक्सपर्सन हीदर नौअर्ट ने कहा कि रूस की यह कार्रवाई अमेरिका की उचित कार्रवाई के बदले की गई गलत कार्रवाई है।

यूलिया की तबीयत में हो रहा है सुधार
रूस के पूर्व जासूस सर्गेई स्क्रिपल और उनकी बेटी यूलिया 2010 से इंग्लैंड में रह रहे थे। ये दोनों 4 मार्च को विल्टशर के सेल्सबरी सिटी सेंटर के बाहर बेहोश मिले थे। दोनों अस्पताल में भर्ती हैं और उनकी सेहत में तेजी से सुधार हो रहा है। ब्रिटिश मीडिया के मुताबिक, जासूस और उसकी बेटी को बेहोशी से उठाने गए पुलिसकर्मी डिप्टी सार्जेन्ट निक बेली भी जहर के असर में हैं और गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती हैं। इंग्लैंड और अमेरिका का आरोप है कि रूस ने स्क्रिपल और उनकी बेटी यूलिया को जहर दिया था। इसी के बाद से ये टकराव शुरू हुआ।

20 से ज्यादा देश ब्रिटेन के साथ
अमेरिका के स्टेट स्पोक्सपर्सन हेथर नुअर्ट के मुताबिक, रूस उन सभी देशों पर भी ऐसी ही गलत कार्रवाई करने के बारे में सोच रहा है, जिन्होंने ब्रिटेन का साथ दिया है। उन्होंने कहा कि रूस ने अमेरिका के राजनयिकों को देश छोड़ने के लिए 7 दिन का वक्त दिया है।

अमेरिका ने कहा- जासूस के जहर देने के पीछे रूस
अमेरिका ने ब्रिटेन में पूर्व जासूस और उसकी बेटी को जहर देने के मामले में रूस को जिम्मेदार ठहराया था। यूनाइटेड नेशंस सिक्युरिटी काउंसिल के इमरजेंसी सेशन में बुधवार को अमेरिका की एंबेसडर निकी हेली ने कहा था, ब्रिटेन में दो लोगों को जहर देकर मारने के पीछे अमेरिका रूस को जिम्मेदार मानता है। अगर हमने ऐसी घटनाएं रोकने के लिए मजबूत कदम नहीं उठाए तो सैल्सबरी आखिरी जगह नहीं होगी, जहां रासायनिक हमला किया गया है।

कश्मीर मुद्दे पर रूस का पाकिस्तानी नजरिए को समर्थन, अब चीन से भी बढ़ी नजदीकियां

नई दिल्ली। कभी भारत का पक्का दोस्त रहा रूस अब चीन और पाकिस्तान के करीब होता जा रहा है. अगले कुछ साल भारत और रूस की दोस्ती के लिए परीक्षा वाले वर्ष साबित होंगे. आखिर ऐसा क्या हो गया कि अब रूस हमारे देश से दूरी बना रहा है, आइए जानते हैं इसकी वजहें.

माना जा रहा है बकि हाल में रूस में हुए राष्ट्रपति के चुनावों में पुतिन फिर से छह साल के लिए राष्ट्रपति चुने गए हैं. वह स्टालिन के बाद सबसे लंबे अवधि तक सत्ता में रहने वाले रूसी नेता बन गए हैं. दूसरी तरफ, चीन में शी जिनपिंग को आजीवन राष्ट्रपति बने रहने का कानून पारित हो गया है. इस तरह दो बड़े देशों में एक तरह के अधिनायकवादी सत्ता का मजबूत होना, दुनिया की उदार व्यवस्था के लिए चिंता की बात है.

बदल रही हैं दोनों की नीतियां

भारत लंबे समय तक रूस का दोस्त रहा है, लेकिन तेजी से बदलती भू-राजनीतिक सच्चाई में अब भारत भी अपनी नीतियों में बदलाव ला रहा है. ऐतिहासिक रूप से देखें तो रूस ने हमेशा संयुक्त राष्ट्र में भारत का समर्थन किया है और उसने लगातार कश्मीर मसले पर आने वाले प्रस्तावों पर वीटो लगाए हैं. लेकिन अब दक्षिण एशिया में रूस की प्राथमिकताएं बदल रही हैं.

कश्मीर पर पाकिस्तानी नजरिए का किया समर्थन

पिछले साल दिसंबर में इस्लामाबाद में छह देशों के स्पीकर्स का पहली बार सम्मेलन हुआ जिसके संयुक्त घोषणापत्र में कश्मीर पर पाकिस्तान के नजरिए का समर्थन किया गया. इस घोषणापत्र पर अफगानिस्तान, चीन, ईरान, पाकिस्तान, रूस और टर्की ने हस्ताक्षर किए थे. इसमें कहा गया था कि, वैश्वकि एवं क्षेत्रीय शांति एवं स्थरिता के लिए भारत और पाकिस्तान को जम्मू-कश्मीर मसले का संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों के मुताबिक शांतिपूर्ण समाधान करना चाहिए. 

चीन के ओबीओआर से जुड़ने की नसीहत

दिसंबर में ही नई दिल्ली की अपनी यात्रा के दौरान रूसी विदेश मंत्री सर्जेई लावरोव ने सार्वजनिक तौर पर कहा कि भारत को चीन के वन बेल्ट, वन रोड पहल में शामिल होना चाहिए. इसी तरह उन्होंने अमेरिका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया के एक ब्लॉक बनाने पर भी नाखुशी जाहिर की. इस तरह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जो संरचनात्मक बदलाव हो रहे हैं, उससे भारत और रूस में अब दूरी बनने लगी है.

रूस को जहां अमेरिका और कई यूरोपीय देशों से दिक्कत है, वहीं भारत के लिए चिंता का मसला अलग है. भारत को अपने उत्तरी पड़ोसी चीन की नकारात्मक सक्रियता से निपटना है. दक्षिण एशिया और हिंद महासागर में परंपरागत तौर पर भारत का प्रभुत्व रहा है, लेकिन अब इसमें चीन दखल देने लगा है. भारत और चीन के बीच सत्ता संतुलन बिगड़ने से सीमा पर स्थिित ज्यादा अस्थिर हो रही है. दूसरी तरफ, चीन-पाकिस्तान गठजोड़ बढ़ने का मतलब है कि भारत को दोहरे मोर्चे पर चुनौती का सामना करना पड़ रहा है. भारत की रूस से करीबी ज्यादातर प्रतिरक्षा के मोर्चे पर रही है और इसमें आर्थिक मोर्चा कम महत्व का रहा है. रूस खुद पश्चिम से मिल रही चुनौतियों की वजह से चीन के साथ पींगे बढ़ा रहा है. ऐसे में भारत की यह मजबूरी है कि भारत-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए वैकल्पिक मंच तैयार करे और नए दोस्त बनाए।

जेल से भागने कैदियों ने बिस्तर में लगाई आग, 68 लोग जलकर मरे

काराकास। वेनेजुएला में कैदियों ने कथित तौर पर जेल से भागने की कोशिश में गद्दों में आग लगा दी, जिसने विकराल रूप धारण कर लिया और उसकी चपेट में आकर 68 लोगों की मौत हो गई। देश के शीर्ष अभियोजक और कैदियों के अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठन ने यह जानकारी दी। बता दें कि वेनेजुएला की जेलों में क्षमता से अधिक कैदी भरे हैं। काराबोबो की जेल में लगी आग की घटना यहां की जेलों में होने वाली कई भयावह घटनाओं में से एक है।
मुख्य अभियोजक तारेक विलियम साब ने ट्विटर पर बताया, ‘काराबोबो के पुलिस मुख्यालय में हुई भयावह घटनाओं के मद्देनजर हमने चार अभियोजकों को नियुक्त किया है ताकि उसकी जांच की जा सके। वहां लगी आग में 68 लोगों की मौत हुई है। ’उना वेनताना अ ला लिबरटाड नाम के संगठन के अध्यक्ष कार्लोस निएटो ने बताया कि कुछ की मौत जलने के कारण हुई तो कुछ की दम घुट जाने की वजह से। उन्होंने बताया कि मृतकों में दो महिलाएं भी शामिल हैं जो घटना के वक्त संभवतः जेल में किसी से मिलने आई होंगी। 

कैदियों ने जेल से भागने की कोशिश के लिए गद्दे में आग लगा दी थी और सुरक्षा कर्मी की बंदूक चुरा ली थी। एक खबर के मुताबिक घटना से गुस्साए कैदियों के रिश्तेदारों ने जेल के बाहर पुलिसकर्मियों के साथ मारपीट की। अंत में पुलिस को भीड़ को भगाने के लिए आंसू गैस के गोले दागने पड़े। कैदियों के रिश्तेदार वहां हुई घटना के बाद अपने प्रियजनों की स्थिति जानने के लिए वहां इकट्ठे हुए थे।

हॉकिन्स व्याख्यान और किताबें कैसे आसानी से पढ़ सकते थे ? कभी सोचा है आपने नहीं आइये जानते हैं उस रहस्य को....

हम सभी ने स्टीफन हॉकिन्स के बारे में सूना है जो कि महान भौतिक विज्ञानी थे जिनको अन्तरिक्ष और टाइम पर काम करने के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है | लेकिन क्या आप जानते है की कैसे एक व्हीलचेयर पर जिंदगी बिताने वाला आदमी जो मुश्किलों से अपनी मास पेशियों को इधर उधर ले जा सकता था तो कैसे वो व्याख्यान और किताबें आसानी से पढ लेता था ?चलिये आप को बताते है की कैसे हॉकिन्स किसी से बात करते थे |

आपको बता दे की कि 22 साल की उम्र में हॉकिन्स को एमीट्रौफिक लेटरल कैंसर से ग्रसित बता दिया गया था जो की एक इस तरह की बिमारी है जिसमे किसी व्यक्ति के दिमाग में पाए जाने वाले न्यूट्रोंस ख़त्म होते रहते हैं |

जिसकी वजह से मस्पेशियाँ का हिलना डूलना बंद हो जाता है और किसी चीज को निगलने ,बात करने और अंत सांस लेने में कठिनाई होने लगती है | हॉकिंग को इस बिमारी से पीड़ित होने के बाद जीवित रहने के लिए 2 साल का की समय बताया गया था लेकिन वह आधे से ज्यादा सदी तक जीवित रहे |

हॉकिन्स बोलने और किसी से बात करने के लिए इंटेल कम्पनी के द्वारा बनाया गया ऐसा डिवाइस काम में लेते थे ,जिसे स्पीच जनरेटिंग डिवाइस कहा जाता है |किसी सुचना को अपने कम्प्यूटर में रखने के लिए हॉकिन्स अपने चश्मे में लगा एक स्विच काम में लेते थे जो की उनके गाल के सहारे औपरेट किया जाता था |

इस सौफ्टवेयर में रो और कॉलन के अनुसार एक कर्सर मूव होता है फिर हॉकिंग अपने गाल के सहारे से किसी भी लैटर का चयन कर सकते थे |अलग –अलग अक्षरों का चयन इस प्रकार किया जाता था कि जिससे वो क्या कहना चाह रहे हैं उसका एक पूरा एक वाकय बनाया जा सके |

इसके साथ ही सौफ्टवेयर को कुछ इस तरह से डीसाइन किया गया था कि वे अक्सर जो शब्द इस्तेमाल करते थे उनको मिलकर वो खुद ही एक वाक्य बना लेते थे जिससे कि उनका आवश्यक समय और प्रयास कम हो जाता था |बात करने और लिखने के साथ-साथ इस सौफ्टवेअर की मदत से अपना ईमेल जांचना ,अन्तर ब्राउज करना और नोट्स बनाने जैसे कई काम कर सकते थे |

इस तरह इस सौफ्टवेअर की मदत से और इंटेल की टीम के सहयोग से मासपेशियों पर नियंत्रण रखने के साथ ही वे हर तरह की समस्या से निपटने में कामयाब रहे |    

श्रीलंका में 10 दिन के लिए इमरजेंसी, टीम इंडिया कोलंबो में मौजूद

भारत के पड़ोसी मुल्कों में हालात इस समय अच्छे नहीं दिख रहे हैं. मालदीव में पहले से ही आपातकाल चल रहा है और अब शांत राज्य कहे जाने वाले श्रीलंका में भी आपातकाल लगा दी गई 

कोलंबो श्रीलंका में बौद्धों और मुस्लिमों के बीच लगातार हिंसा के बाद दस दिनों के लिए आपातकाल लगा दिया गया है। बताया जा रहा है कि पिछले कुछ समय से बौद्ध और मुस्लिम समुदाय के बीच तनाव के चलते श्रीलंका के हालात काफी खराब हो गए हैं।
टी वि खबरों के मुताबिक, एक कैबिनेट नोट के बाद इमरजेंसी लगाने की घोषणा की गई है। चिंता का विषय यह है कि इस समय भारतीय क्रिकेट त्रिकोणीय सीरिय खेलने के लिए श्रीलंका में ही है। हालांकि बताया जा रहा है कि खिलाड़ियों की सुरक्षा बढ़ा दी गई है।

ईरान-इराक सीमा पर भीषण भूकंप ... 140 लोगों की मौत कई गंभीर रूप से घायल

ईरान-इराक सीमा पर आए भीषण भूकंप में कम से कम 140 लोगों की मौत हो गई और सैकड़ों लोग घायल हो गए. अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के मुताबिक, 7.3 तीव्रता वाले इस भूकंप का केंद्र इराकी शहर हलबजा से 31 किलोमीटर दूर था. स्थानीय मीडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, स्थानीय समयानुसार रात 9.20 बजे आए इस भूकंप के झटके कई इरानी शहरों में भी महसूस किए गए और कम से कम आठ गांव तबाह हो गए. इस कारण कई स्थानों में शहर मलबे में तब्दील हो गए और कई जगहों पर भूस्खलन की भी खबर है, जिससे राहत और बचाव कार्यों में खासी दिक्कतें आ रही हैं. ट्विटर पर कई लोगों ने इस भूकंप से जुड़े कई वीडियो डाले हैं, जिसमें हिलती इमारतों से भागते लोग और कई मलबे में तब्दील हो चुकी इमारतें दिख रही हैं. पहला वीडियो कुवैत का है, जहां एक रेस्त्रां में बैठे लोग घबराकर वहां से निकलते दिख रहे हैं. वहीं इजरायली मीडिया ने भी देश के कई हिस्सों में भूंकप महसूस होने की खबर दी है. ईरान में हाल के वर्षों में आया यह सबसे भयानक भूकंप है. इससे पहले वर्ष 2003 में दक्षिण पूर्वी कर्मन प्रांत के बाम में ऐसे ही तेज भूकंप आया था, जिसमें कम से कम 31,000 लोगों की मौत हो गई और पूरा शहर ढह गया था.

सऊदी अरब के एक शहजादे की हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मौत।

सऊदी अरब के एक शहजादे की आज एक हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मौत हो गई। शहजादे के साथ अन्य कई अधिकारियों को ले कर जा रहा यह हेलीकॉप्टर सऊदी अरब की यमन से लगने वाली दक्षिणी सीमा के निकट दुर्घटनाग्रस्त हुआ। समाचार चैनल अल-इखबरिया ने असीर प्रांत के उप गवर्नर और पूर्व वली अहद (क्राउन प्रिंस) के बेटे शहजादे मंसूर बिन मोकरेन की मौत की घोषणा की है। समाचार चैनल ने हेलीकॉप्टर के दुर्घटनाग्रस्त होने के पीछे की वजह या हेलीकॉप्टर पर सवार अन्य अधिकारियों की स्थिति के बारे में कोई जानकारी नहीं दी है। दुर्घटना की खबर ऐसे समय में आई है जब सऊदी अरब ने प्रशासन के शीर्ष स्तर पर बडी फेरबदल की है। शहजादे मोहम्मद बिन सलमान ने सत्ता पर पकड मजबूत की है और दर्जनों शहजादों, मंत्रियों तथा करोडपति उद्योगपतियों को गिरफ्तार किया गया है। शहजादे मोहम्मद बिन सलमान को पहले ही अघोषित शासक के तौर पर देखा जा रहा है जो सरकार में रक्षा से ले कर आर्थिक क्षेत्र तक को नियंत्रित कर रहा है। ऐसा लगता है कि वह अपने 81 वर्षीय पिता शाह सलमान से सत्ता हासिल करने से पहले अंदरुनी विद्रोह को समाप्त करने में कोई कसर नहीं छोडना चाहते। इस हेलीकॉप्टर दुर्घटना से पहले कल सऊदी अरब ने यमन द्वारा दागी गई मिसाइल को रियाद के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के निकट नष्ट किया था। Source (आईएएनएस)