कृषि

छत्तीसगढ़ में इस साल 15.61 लाख हेक्टेयर से अधिक रकबे में बोई गई रबी फसलें

रायपुर छत्तीसगढ़ में इस वर्ष रबी फसलों की बोनी लगभग पूरी हो चुकी है। राज्य शासन के कृषि विभाग द्वारा चालू रबी मौसम में लगभग 18 लाख 51 हजार हेक्टेयर में अनाज, दलहन, तिलहन और साग-सब्जी की बोनी की तैयारी की गई थी। अभी तक किसानों ने 15 लाख 61 हजार 390 हेक्टेयर क्षेत्र में धान, गेहूं, मूंग, मटर, चना, तिवरा, कुलथी, अलसी, तिल, सूरजमुखी, मूंगफली, राई-सरसो सहित अन्य फसलों की बोआई पूरी कर ली है। इस प्रकार इस साल निर्धारित लक्ष्य के विरूद्ध 84 प्रतिशत रकबे में रबी फसलों की बोनी हुई है।
 कृषि मंत्री   बृजमोहन अग्रवाल ने बताया कि प्रदेश में इस रबी मौसम में एक लाख 80 हजार 380 हेक्टेयर में गेहूं, 46 हजार हेक्टेयर में धान, 71 हजार हेक्टेयर में मक्का और 6 हजार हेक्टेयर में अन्य अनाज फसलों की बोनी हो चुकी है। उन्होंने बताया कि दलहनी फसलों के अंतर्गत तीन लाख 47 हजार हेक्टेयर में चना, 55 हजार हेक्टेयर में मटर, 29 हजार हेक्टेयर में मसूर,  26 हजार हेक्टेयर में मूंग के साथ-साथ लगभग तीन लाख हेक्टेयर में तिवरा की उतेरा बोनी पूरी हो गई है। इस रबी मौसम में 2 लाख 56 हजार हेक्टेयर में तिलहनी फसलें भी लगायी गई है। किसानों ने तिलहनी फसलों में सबसे ज्यादा एक लाख 58 हजार हेक्टेयर में राई-सरसो और तोरिया की बोआई की है। उनके अलावा तिल, सूरजमुखी, कुसुम, मूंगफली भी किसानों ने लगायी है। लगभग 23 हजार हेक्टेयर में गन्ना लगाने का काम पूरा हो गया है। बागवानी किसानों ने एक लाख 83 हजार हेक्टेयर में साग-सब्जियां लगायी है।

जाज्वल्य देव लोक महोत्सव एवं एग्रीटेक कृषि मेला 2018 किसानो की आय बढ़ाने और नई तकनीक के उपयोग के बारे में जानकारी दी

जांजगीर-चांपा, :-जाज्वल्य देव लोक महोत्सव एवं एग्रीटेक कृषि मेला में आज कृषक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कृषक संगोष्ठी में कृषि से संबंधित विभिन्न विषयों के विशेषज्ञों ने कृषकों को नवीन तकनीकी की जानकारी दी। वैज्ञानिकों ने 2022 तक किसानों की आय को दुगुना करने तथा फसल अवशिष्ट के उचित प्रबंधन के बारे में बताया। रायपुर के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. के. पी. वर्मा ने फसल अवशिष्ट प्रबंधन की जानकारी देते हुए बताया कि खेत में पुआल (पैरा) जलाने से वायु प्रदूषण होता है, जो मानव स्वास्थ्य के प्रतिकुल है। वरिष्ठ वैज्ञानिक बिलासपुर डॉ. जे. आर. पटेल ने रबी फसलों पर शस्य क्रियाएं की विस्तृत जानकारी दी। इसी प्रकार इंजीनियर देवेश पांडेय द्वारा रबी फसलों में जल प्रबंधन की जानकारी दी गई। उन्होंने बताया कि ग्रीष्मकाल में धान के स्थान पर दलहन, तिलहन लगाना उचित है। कम पानी में यह फसल तैयार हो जाता है। मिट्टी की उर्वरा बनी रहती है। वरिष्ठ वैज्ञानिक बिलासपुर के डॉ. ए. के. अवस्थी रबी मौसम में विभिन्न फसलों में कीट व्याधि की रोक थाम के लिए कृषि विभाग के मैदानी अमलों से सम्पर्क कर दवा का छिड़काव करने की सलाह दी। वरिष्ठ वैज्ञानिक रायपुर डॉ. शशि ने बताया कि पशुपालन कर कृषक अपने आय मंे वृद्धि कर सकते है। दुधारू पशु के रखरखाव तथा दुग्ध उत्पादन बढ़ाने के संबंध में तकनीकी जानकारी दी। कृषि महाविद्यालय तथा कृषि विज्ञान केन्द्र के वैज्ञानिकों ने भी तकनीकी जानकारी दी। संगोष्ठी में राज्य के प्रगतिशील कृषकों ने अनुभव के बारे में बताया। प्रगतिशील कृषक श्री ईश्वर बघेल के द्वारा कन्द वर्गीय फसलों के उत्पादन वृद्धि की तकनीकी जानकारी दी गई। उन्होंने सब्जी वर्गीय फसलों के उत्पादन की तकनीकी जानकारी दी। छोटी जगह में सब्जी वर्गीय तथा शोभायमान पौधे लगाने की जानकारी दी। हरियाली दीदी के नाम से विख्यात श्रीमती पुष्पा साहू के द्वारा अपने घर की छत को पूरी तरह से हरियाली में बदल दी है। उन्होंने घर की छत में सब्जी वर्गीय पौधे लगाकर अतिरिक्त आय प्राप्त करने के संबंध में बताया।

30 डिसमिस से सब्जी की खेती शुरू आज दे रहा दर्जनों मजदूरों को काम ...जिले का हो रहा नाम रोशन

BBN24@भूपेंद्र गबेल

जांजगीर/मालखरौदा :- ग्राम चिखली के किसान कार्तिक राम चन्द्रा जो कि पिछले 2 वर्षों से टमाटर , भाटा , मिर्ची की खेती से कई जिलों में अपनी सब्जियों की छाप छोड़ रहे है । दरसल मालखरौदा ब्लॉक के ग्राम चिखली के किसान कार्तिक राम समीपस्त ग्राम नवागांव के कछार में 10 एकड़ में पिछले दो वर्षों से बाड़ी में लगातार सब्जियों की खेती करते आ रहे हैं । वे पहले अपने गांव चिखली में 30 डिसमिल से सब्जियां लगाना शुरू किए जिसमे टमाटर , भांटा , मिर्ची , गोभी आदि सब्जियां लगाई । फिर 2016 में ग्राम नवागांव में 10 एकड़ में बाड़ी लगाकर ड्रीप फसल से सब्जियों की खेती में लगा है । जिसमे 6 एकड़ में हाइब्रिड टमाटर की और 1 एकड़ में मिर्ची लगा है । बाकी 3 एकड़ में धनिया , गोभी , लौकी , भांटा , बरबट्टी लगाया गया है । मिर्ची एक सप्ताह में 20 क्विंटल 100 बोरी तक टूटता है । वहीं टमाटर अभी शुरुआती दौर है जिससे अंदाजा में किसान कार्तिक राम का कहना है कि इस सीजन में करीब 10 हजार कैरेट तक टमाटर टूटेगा । लगाए गए सब्जियों की डिमांड इतनी ज्यादा है कि रायगढ़ , सक्ती , बिलासपुर , मुंगेली , तखतपुर तक अपनी छाप छोड़ रहे हैं ।

= 20 मजदूरों को रोजगार

सब्जी बाड़ी में प्रतिदिन आसपास के गावों से 20 मजदूर कार्य करते हैं । जिसमे 10 पुरुष और 10 महिलाएं शामिल हैं । जिनके परिवार के लिए भी महीने के खर्चे निकल जाते है और भरण पोषण भी हो जाता है । मजदूर प्रतिदिन देखरेख , साफसफाई , दवाई छिड़काव , खाद्य पदार्थों का छिड़काव किया जाता है ।

= रासायनिक खाद के साथ जैविक खाद व दवाइयों का प्रयोग

किसान कार्तिक राम के द्वारा स्वयं जैविक खाद बनाया जाता है । जिसमे खाद बनाने के लिए गोबर , गौमूत्र , गुड़ , बेसन , बरगद पेड़ नीचे की मिट्टी का मिश्रित का प्रयोग किया जाता है । वही दवाई भी जैविक कीटनाशक बनाया जाता है जिनमे छाछ का विशेष प्रयोग किया जाता है। वही मिर्च , लहसुन , गुड़ , गौमूत्र , आंख पेंड की डोंडे , धतूरे , बेशरम के पत्ते आदि को मिलाकर जैविक कीटनाशक प्रयोग कर सब्जियों को स्वस्थ्य तरीके से उत्पादन किया जा रहा है । जिससे पौधे , फल व फूल अच्छे ग्रोथ करते है ।

= आने वाले गर्मी में सब्जी फसलों की तैयारी

कार्तिक राम चन्द्र ने बताया कि अभी विंटर सीजन का सब्जी अब लगभग खत्म होने को है वही अब गर्मी सीजन का सब्जी का थरहा लगाने का कार्य प्रारम्भ किया जाएगा जिसमे कुंदरू , परवल , करेली , बरबट्टी , तरबूज ,मखना आदि 5 एकड़ में लगाया जाएगा । वही आने वाली दिनों में अच्छे दाम के आसार नजर आ रहे है । जिससे आमदनी अच्छी होगी ।

30 डिसमिस से सब्जी की खेती शुरू आज दे रहा दर्जनों मजदूरों को काम ...जिले का हो रहा नाम रोशन

BBN24@भूपेंद्र गबेल

जांजगीर/मालखरौदा :- ग्राम चिखली के किसान कार्तिक राम चन्द्रा जो कि पिछले 2 वर्षों से टमाटर , भाटा , मिर्ची की खेती से कई जिलों में अपनी सब्जियों की छाप छोड़ रहे है । दरसल मालखरौदा ब्लॉक के ग्राम चिखली के किसान कार्तिक राम समीपस्त ग्राम नवागांव के कछार में 10 एकड़ में पिछले दो वर्षों से बाड़ी में लगातार सब्जियों की खेती करते आ रहे हैं । वे पहले अपने गांव चिखली में 30 डिसमिल से सब्जियां लगाना शुरू किए जिसमे टमाटर , भांटा , मिर्ची , गोभी आदि सब्जियां लगाई । फिर 2016 में ग्राम नवागांव में 10 एकड़ में बाड़ी लगाकर ड्रीप फसल से सब्जियों की खेती में लगा है । जिसमे 6 एकड़ में हाइब्रिड टमाटर की और 1 एकड़ में मिर्ची लगा है । बाकी 3 एकड़ में धनिया , गोभी , लौकी , भांटा , बरबट्टी लगाया गया है । मिर्ची एक सप्ताह में 20 क्विंटल 100 बोरी तक टूटता है । वहीं टमाटर अभी शुरुआती दौर है जिससे अंदाजा में किसान कार्तिक राम का कहना है कि इस सीजन में करीब 10 हजार कैरेट तक टमाटर टूटेगा । लगाए गए सब्जियों की डिमांड इतनी ज्यादा है कि रायगढ़ , सक्ती , बिलासपुर , मुंगेली , तखतपुर तक अपनी छाप छोड़ रहे हैं ।

= 20 मजदूरों को रोजगार

सब्जी बाड़ी में प्रतिदिन आसपास के गावों से 20 मजदूर कार्य करते हैं । जिसमे 10 पुरुष और 10 महिलाएं शामिल हैं । जिनके परिवार के लिए भी महीने के खर्चे निकल जाते है और भरण पोषण भी हो जाता है । मजदूर प्रतिदिन देखरेख , साफसफाई , दवाई छिड़काव , खाद्य पदार्थों का छिड़काव किया जाता है ।

= रासायनिक खाद के साथ जैविक खाद व दवाइयों का प्रयोग

किसान कार्तिक राम के द्वारा स्वयं जैविक खाद बनाया जाता है । जिसमे खाद बनाने के लिए गोबर , गौमूत्र , गुड़ , बेसन , बरगद पेड़ नीचे की मिट्टी का मिश्रित का प्रयोग किया जाता है । वही दवाई भी जैविक कीटनाशक बनाया जाता है जिनमे छाछ का विशेष प्रयोग किया जाता है। वही मिर्च , लहसुन , गुड़ , गौमूत्र , आंख पेंड की डोंडे , धतूरे , बेशरम के पत्ते आदि को मिलाकर जैविक कीटनाशक प्रयोग कर सब्जियों को स्वस्थ्य तरीके से उत्पादन किया जा रहा है । जिससे पौधे , फल व फूल अच्छे ग्रोथ करते है ।

= आने वाले गर्मी में सब्जी फसलों की तैयारी

कार्तिक राम चन्द्र ने बताया कि अभी विंटर सीजन का सब्जी अब लगभग खत्म होने को है वही अब गर्मी सीजन का सब्जी का थरहा लगाने का कार्य प्रारम्भ किया जाएगा जिसमे कुंदरू , परवल , करेली , बरबट्टी , तरबूज ,मखना आदि 5 एकड़ में लगाया जाएगा । वही आने वाली दिनों में अच्छे दाम के आसार नजर आ रहे है । जिससे आमदनी अच्छी होगी ।

जानिए क्या है मल्टी कट धनिया जल्द ही आ रहा है ’पंत हरीतिमा’आपके बिच

पत्तियां बेचने के बाद लीजिए बीज का भरपूर उत्पादन
इंदिरा गांधी कृषि विष्व विद्यालय के सब्जी वैज्ञानिको ने तैयार की धनिया की नई प्रजाति नाम दिया ’पंत हरीतिमा’
बिलासपुर। अब पत्तियांे और बीज के लिए अलग-अलग धनिया बीज की जरुरत नही पड़ेगी। पहली बार सब्जी वैज्ञानिकों ने धनिया की ऐसी प्रजाति तैयार करने में सफलता हासिल कर ली है जिसकी पत्तियां तेज खुष्बू देती है और भरपूर बीज भी मिलते हैं। एक ही पौधे में दोनेां गुणों के एक साथ मिलने वाली इस प्रजाति को मल्टी-कट पंत हरीतिमा नाम दिया गया है।
    धनिया उत्पादक किसानों के लिए यह नई रिसर्च नि;संदेह राहत देने वाली कही जा सकती हैै। जिस तरह मसालों की खेती को प्रोत्साहन दिया जा रहा है और किसान रुझान भी दिखा रहे हैं उसके बाद हर जिले  में धनिया की खेती का रकबा हर साल बढ़त ले रहा है। अभी तक  किसान बाजार में उपलब्ध धनिया की दो अलग प्रजाति के बीज की कीमत और उत्पादन को लेकर परेषान रहे है। वे किसान जो सब्जी के लिए पत्तियों वाली धनिया की फसल लेते है उनके लिए अलग बीज आते है। वही बीज उत्पादक किसानों के लिए बीज की अलग प्रजाति है। इस तरह एक ही फसल की दो अलग-अलग प्रजाति की खेती पर खर्च अधिक आता है। उत्पादन के आंकड़े भी भिन्न-भिन्न होते हैं। इन्ही दिक्कतों को ध्यान में रखते हुए इंदिरा गांधी कृषि विवि ने इस पर अनुसंधान की योजना बनाई। एक और वजह यह थी कि प्रदेष में धनिया की आपूर्ति महाराष्ट्र से होती है। इस निर्भरता को भी खत्म करना था। इस पर हुई कोषिष ने पंत नगर स्थित कृषि विवि से ऐसे बीज मंगवाए गए जो छत्तीसगढ़ की जमीन और जलवायु के अनुकूल हों। दो साल के प्रयास के बाद धनिया के ऐसे बीज तैयार करने में सफलता मिल गई जिसे पंत हरीतिमा नाम दिया गया है। आगामी अप्रैल माह से इसके बीज किसानों को मिलने लगेंगे।
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ऐसी है मल्टी-कट पंत हरीतिमा
विष्वविद्यालय के सब्जी वैज्ञानिको ने धनिया की जो नई प्रजाति विकसित की है उसमें इसकी पत्तियां गहरे हरे रंग की हैं साथ ही इसकी पत्तियां तेज सुगंध देती हैं। पत्तियां बेची जाने के बाद इन्ही पौधों में धनिया के बीज तैयार होंगे याने एक ही पौधे से पत्तियां और बीज एक साथ। इस तरह किसानों को पत्ती और बीज वाले अलग-अलग धनिया बीज की खरीदी नही करनी पड़ेगी।
 
75 दिनोें में तैयार 
प्ंात हरीतिमा मल्टी-कट धनिया की बुवाई नवंबर माह में की जाने के बाद फसल फरवरी मध्य तक आएगी। बीच-बीच में स्थिति देखकर पत्तियों की तोडाई की जा सकेगी। रिसर्च में प्रति एकड़ 10 से 12 क्विंटल उत्पादन का होना पाया गया है। पंत हरीतिमा मल्टी कट धनिया की खेती  हर जिले की जमीन और जलवायु में की जा सकती है। 
 
इन्होनें किया रिसर्च 
इंदिरा गांधी कृषि विवि ने इस महत्वपूर्ण योजना की कमान सब्जी विज्ञान के प्रमुख वैज्ञानिक डा. धनंजय षर्मा को सौपीं। वरिष्ठ सब्जी वैज्ञानिक डा. जितेन्द्र सिंह और डा. अमित दीक्षित की टीम ने योजना को सफलता के मुकाम तक पहुंचाया।
 
मल्टी कट पंत हरीतिमा के बीज से तैयार पौधांे से पत्ती और बीज दोनों मिलेंगें। किसान अब इस तरह रिसर्च के बाद बीज और पत्ती के लिए दो अलग खर्चे से बच सकेंगें। भरपूर उत्पादन देने वाली धनिया का यह बीज अगले माह से कृषि विवि के सब्जी विभाग से मिलेंगें।
-डा. अमित दीक्षित,सीनियर साइंटिस्ट, वेजिटेबल साइंस, इंदिरा गांधी विवि रायपुर

तैयार हुआ बाॅटनिकल पेस्टीसाइड्स‘ किसान अपने घर पर ही बिना किसी लागत के कर सकेंगे तैयार। जीवाणु और फफूंदजनित रोग से फसलों को मिलेगी निजात

भाटापारा।फसलों में कीट प्रकोप की बढ़ती षिकायत और बचाव के लिए कीटनाषक दवाओं के उपयोग के बाद धान और सब्जी पर पड़ते प्रतिकूूल असर से बचाव के उपाय के बीच खरपतवार की ऐसी 144 प्रजातियां मिली है।जिनमे जीवाणु और फफूदजनित रोग खत्म करने के गुण मिले हैं। इन गुणों के खुलासे के बाद इन खरपतवारों की मदद से ‘बाॅटनिकल पेस्टीसाइड्स‘बना सकते हैं।
धान की खेती और सब्जी उत्पादन में कीट प्रकोप अब व्यापक समस्या बनती जा रही हैै। फसल बचाने के उपाय पर किसानों को काफी रकम खर्च करनी पड़ती है। जो दवाएं बाजार में उपलब्ध हैं वे काफी महंगे हैं। इसके साथ ही इस बात की कोई गारंटी नहीं कि कीट प्रकोप से पूरी तरह छुटकारा मिल ही जाएगा। ऐसे में फसल को बर्बाद होता देखने के सिवाए कोई उपाय नहीं। जैविक खेती को लेकर किसानेां के बढ़ते रुझान के बीच अब कीट प्र    कोप से बचने के लिए एक ऐसा उपाय खोज निकाला गया है जिसे ‘बाॅटनिकल पेस्टीसाइड्स‘ के नाम से जाना जाएगा। यह ‘बाॅटनिकल पेस्टीसाइड्स‘ प्रदेष के जंगलों में खोजे गउ ऐसे 144 खरपतवार से ेबनाए जा सकेंगे जिनसे जीवाणु जनित और फफंूद जनित रोगों से फसलों को बचाया जा सकेगा।सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह ‘बाॅटनिकल पेस्टीसाइड्स‘ किसान अपने घर पर ही बिना किसी लागत के तैयार कर सकेंगे। इस सफलता के बाद अब इससे बीज उपचार की कोषिष की जा रही है ताकि स्वस्थ बीज किसानों तक पहुंच सके।    
 इन खरपतवार से ‘बाटनिकल पेस्टीसाइड्स‘
ऐसा कोई जिला नहीं होगा जहां के खेतों की मेड़ में ‘बनतुलसा‘ ‘चिरचिरा‘ ‘गोरखमुंडी‘, ‘भेंभरा‘ और ‘अकरकरा‘ नजर नहीं आते । इसके अलावा 139 ऐसे और खरपतवार की पहचान हुई है जिनमें से कुछ के पत्तों में तो कुछ में पूरे पौधे ही ऐसे औषधिय गुणों से भरपूर है जिनकी मदद से कीट प्रकोप पर नियंत्रण पाया जा सकता है।
 ऐसे बनाएं ‘बाॅटनिकल पेस्टीसाइड्स‘
इन खरपतवारों की पत्तियों और पूरे पौधे को एक लीटर गौ-मूत्र के साथ मिट्टी के मटके में मिलाएं। एक पखवाड़े के बाद इससे जो ‘बाॅटनिकल पेस्टीसाइड्स‘ तेैयार होगा वह 100 लीटर कीटनाषक दवा के बराबर क्षमतावान होगा। गौ-मूत्र और खरपतवार की मात्रा बढ़ाने पर आनुपातिक रुप से ऐसे कीटनाषक ‘बाॅटनिकल पेस्टीसाइड्स‘ तैयार होगा जो सब्जी ओैर धान की फसल पर कीट प्रकोप से छुटकारा दिला सकेगा।
 
प्रदेष के जंगलों से मेडिषनल वैल्यू रखने वाले ऐसे 144 खरपतवार संग्रहित किए गए हैं जिनमें जीवाणु और फफंूद जनित रोग से छुटकारा दिलाने के गुण हैं। रिसर्च में मिली सफलता के बाद इससे ‘बाॅटनिकल पेस्टीसाइड्स‘ तैयार किया जा सकता है।
-डा. आर. के. एस. तिवारी,प्रो.सांइटिस्ट, टीसीबी काॅलेज आॅफ एग्री.रिसर्च स्टेषन, बिलासपुर

 

अब छत्तीसगढ़ के हर जिले में होगा अजवाईन महाराष्ट्र से निर्भरता होगी खत्म

भाटापारा। अब अजवाईन के लिए महाराष्ट्र पर से निर्भरता खत्म होने जा रही है। इसी बरस के अगले माह  से किसानों को अजवाईन के ऐसे बीज मिलने जा रहे है। जो हर जिले की मिट्टी के अनुरुप है। किसानो को इसकी उपलब्धता सुनिष्चित करवाने के लिए इंदिरा गांधी कृषि विष्वविद्यालय के फार्म हाउस में इसके बीज उत्पादन का काम आखिरी चरण मे पहुंच चुका है।
उद्यानिकी फसलों को बढ़ावा देने की सरकार की कोषिष लगातार रंग ला रही है।फल- फूल और सब्जी के बाद अब ध्यान मसालो की खेती पर है। इसके लिए पहली बार एक ऐसा मसाला चुना गया जिसकी खेती कम से कम छत्तीसगढ़ में तो संभव ही नही है। इंदिरा गांधी कृषि विष्वविद्यालय के वैज्ञानिको की एक टीम ने इसे चुनौती के रुप में लेते हुए सबसे पहले अजवाईन को लिया।औषधिय गुणों से भरपूर होने  तथा लगभग पूरे साल मांग में बने रहने की वजह से इसकी कीमत मसाला बाजार में हमेषा से ंऊंची रही है। इसे ध्यान में रखते हुए उत्पादक क्षेत्र महाराष्ट्र में अकोला से इसके ऐसे बीज कलेक्ट किए गए जिसे संषोधित किया जाए। छत्तीसगढ़ की मिट्टी के अनुरुप बनाया जा सके। रिसर्च हुए। सफलता भी मिली।
 
ऐसी खेती, ऐसा उत्पादन 
इ्रंदिरा गांधी कृषि विष्वविद्यालय के फार्म हाउस मे इसके जो बीज तैयार गए है उसकी मदद से हर जिले में अजवाईन की फसल की जा सकती है क्योंकि रिसर्च के बाद जो बीज तैयार हुए है उनमें मिट्टी की हर किस्म में इसकी खेेती के गुण है। खासकर मैदानी इलाकों के लिए तो यह वरदान है।धान कटाई के बाद नवंबर माह से इसकी बोनी करें । मार्च में फसल तैयार। उत्पादन का आंकड़ा 5 क्विंटल प्रति एकड़ के आसपास अनुमानित है।
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कस्तूरी मेथी के बीज भी मार्च में 
अजवाईन की तरह अब कस्तूरी मेथी की भी खेती अपने यहां ही की जा सकेगी। फिलहाल डिब्बाबंद पैक में उपलब्ध कस्तूरी मेथी जमकर बिक रही है।बाजार में निरंतर वृ़िद्ध के बाद इस पर रिसर्च हुआ है। इसके भी बीज मार्च माह से किसानों को मिलने लगेंगे।
ऐसी है कीमत 
मसाला बाजार में इस वक्त अजवाई्रन की कीमतें काफी बढ़ी हुई है। थोक में बाजार 1500 से 2000 रुपए क्विंटल हेै तो चिल्हर में 225 से 300 रुपए किलो पर मिल रहा हेै। मूलत; जावरा मध्यप्र्रदेष और ऊंझा गुजरात की अजवाईन हमेषा से छत्तीसगढ़ में मांग में रहती आई है। इसी तरह कस्तूरी मेथी चिल्हर में 40 से 400 रुपए किलो और पैिकग  में 200 से 400 रुपए किलो पर बेची जा रही है। थोक बाजार 100 से 150 रुपए किलो पर उपलब्ध है।
वर्जन
बीज तैयार  
अजवाइ्र्रन के बीज तैयार हो चुके है। रिसर्च के बाद ये बीज हर जिले की मिट्टी के अनुरुप पाई गई ।आगामी माह से ये किसानों को मिलने लगेंगे।
-डा. अमित दीक्षित ,कृषि वैज्ञानिक,(वेजिटेबल), इंदिरा गांधी कृषि विवि., रायपुर
 
जिले में बन रही कार्ययोजना
जिले में इस वक्त धनिया, अदरक ,मिर्च और लहसुन की खेती की जा रही है।उद्यानिकी विभाग लगातार मसालों की खेती को प्रोत्साहन दे रहा है। यह विभाग की ही मेहनत का ही परिणााम है कि अकेले धनिया की खेती 100 हैक्टेयर रकबे में ली जा रही है। विष्वविद्यालय के परिसर से प्रोत्साहित विभाग ने इसके लिए अभी  से अजवाईन की खेती की कार्ययोजना बनाने की तैयारी षुरु की दी है।
वर्जन 
योजना बना रहे
मसाला की खेती को लेकर जिले में जिस तरह रुझान बढ़ रहा है उसे देखते हुए अब अजवाईन के लिए भी कार्ययोजना बनाई जा रही है।
-रामजी चतुर्वेदी सहा.संचालक (उ्रद्यानिकी) बलोैदाबाजार