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सांसदों का वेतन जल्द हो जाएगा दोगुना, जानें कितना होगा मूल वेतन

 

केंद्र की मोदी सरकार के सांसदों के मूल वेतन में 100 फीसदी वृद्धि करने के फैसले के बाद सांसदों को जल्द ही खुशखबरी मिल सकती है। उनका मूल वेतन 50 हजार से बढ़कर जल्द ही 1 लाख रुपए हो सकता है।

मीडिया में चल रही खबरों के अनुसार, पीएमओ भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ की समिति की सिफारिशों को लागू करने के लिए सहमत हो गया है। पीएमओ न केवल सांसदों के मूल वेतन में बढ़ोत्तरी करने के पक्ष में है बल्कि वह सांसदों के भत्तों को बढ़ाने के लिए भी सहमत है।

सरकार राष्ट्रपति का वर्तमान वेतन डेढ लाख रुपए से बढ़ाकर 5 लाख रुपए और राज्यपालों का वेतन एक लाख 10 हजार से बढ़ाकर ढाई लाख रुपए करने पर भी राजी हो गई है।

कैबिनेट सचिव से कम है राष्ट्रपति की सैलरी, अब होगी 5 लाख रुपए महीना

गौरतलब है कि भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता वाली समिति ने सांसदों का वेतन 50 हजार से बढ़ाकर एक लाख और संसदीय क्षेत्र से संबंधित भत्ता 45 हजार से बढ़ाकर 90 हजार करने की सिफारिश की थी। सांसद का एक लाख रुपए वेतन होता है तो सरकार को प्रतिवर्ष इसके लिए 250 करोड़ देने होंगे।

पीएम मोदी के वेतन-भत्ते अन्य राष्ट्राध्यक्षों से काफी कम

उस सिफारिश में फर्नीचर के लिए भत्ता डेढ़ लाख रुपए करने की सलाह दी गई है। इसके अलावा सभी सांसदों को 1700 रुपए प्रति माह बीएसएनएल का ब्रॉडबैंड कनेक्शन देने की बात कही गई है।

समिति ने पेंशन में 75 फीसदी की वृद्धि करने की सिफारिश की थी। बता दें कि 6 साल पहले सांसदों का वेतन-भत्ता बढ़ा था।

नरेंद्र मोदी ने बाजार से चीनी सामान को बाहर रखने के लिए अपनाया नया तरीका

भारत अब चीन को उसके सामान पर ड्यूटी फीस में छूट देने में देरी और कटौती कर सकता है। ऐसा चीन के साथ व्‍यापार में कमी के चलते किया जा सकता है।

चीनी सामान की भारत में बिक्री को रोकने के लिए केंद्र सरकार ने नया तरीका अपनाया है। भारत अब चीन को उसके सामान पर ड्यूटी फीस में छूट देने में देरी और कटौती कर सकता है। ऐसा चीन के साथ व्‍यापार में कमी के चलते किया जा सकता है। हालांकि अभी तक ऐसा तय नहीं किया गया है कि कौनसे सामान पर छूट कम की जाएगी। लेकिन बताया जाता है कि एक नेगेटिव लिस्‍ट बनाई जाएगी और इसमें शामिल वस्‍तुओं पर सीमित या ना के बराबर छूट दी जाएगी। वाणिज्‍य मंत्री निर्मला सीतारमण फिलीपींस में तीन-चार नवंबर को रीजनल कॉम्प्रिहेंसिव इकॉनॉमिक पार्टनरशिप(आरसीईपी) की मंत्री लेवल की बैठक में इस पर बातचीत कर सकती हैं। वाणिज्‍य विभाग के एक अधिकारी के अनुसार चीन का व्‍यापार दायरा काफी बड़ा है। जापान भी इससे चिंतित है। जहां तक भारत की बात है तो सभी जानते हैं कि चीन सबसे बड़ी समस्‍या हैं।

सरकार का यह नया कदम चीन के साथ बढ़ते व्‍यापार दायरे को पाटने के लिए उठाया गया है। साल 2015-16 में भारत ने चीन में 9 बिलियन डॉलर का निर्यात किया था। जबकि उसका चीन से आयात 61.7 बिलियन डॉलर का था। इस तरह से भारत के निर्यात और आयात का अंतर 52.7 बिलियन डॉल रहा। अधिकारियों के अनुसार कुछ सामानों की नेगेटिव लिस्‍ट बनाई जाएगी। अभी इस पर फैसला नहीं हुआ है लेकिन विचार चल रहा है। भारत में ड्यूटी रेट की तीन स्‍तरीय ढांचा है और सरकार इसे दुरुस्‍त करना चाहती है। लेकिन चीन के साथ व्‍यापार के दायरे को पाटने के लिए उसके पास यही उम्‍मीद की किरण है।

रीजनल कॉम्प्रिहेंसिव इकॉनॉमिक पार्टनरशिप के तहत 16 देशों के बीच निवेश, व्‍यापार, तकनीकी सहयोग और विवादों के निपटारे को लेकर समझौता है। इसमें दक्षिण पश्चिम एशिया के 10 देशों के अलावा ऑस्‍ट्रेलिया, चीन, भारत, जापान, कोरिया और न्‍यूजीलैंड भी शामिल हैं।

मुठभेड़िये खून पीते हैं, न्याय का खून

भोपाल में हुई मुठभेड़ पर सिर्फ शर्म आनी चाहिए. उसे जायज ठहराना अपने हाथ-पांव काट लेना है क्योंकि मुठभेड़िये खून पीते हैं, न्याय का खून.

2009 में ह्यूमन राइट्स वॉच की एक रिपोर्ट आई थी. उसमें एक सब इंस्पेक्टर का बयान है. कहता है, "(एसपी) साहब लोग तो (फख्र से) बोलते हैं कि मेरे इलाके में इतने एनकाउंटर हुए. हमें तो हुक्म मानना होता है." यही होता है. भारत में मुठभेड़ करने वाला पुलिसवाला हीरो होता है. वह छाती ठोक कर बताता है, अब तक 56. और मुठभेड़ कराने वाला महाहीरो. नेता लोग पुलिस अफसरों को और अफसर लोग मातहतों को आगे बढ़ाकर नायक और महानायक बनते हैं. लेकिन, क्या भारत में कोई पुलिस पर भरोसा करता है? चाय की दुकान से लेकर सजे धजे ड्रॉइंग रूम्स तक में होने वाली आम चर्चाओं में पुलिस की छवि कैसी दिखती है? क्या वे वर्दी वाले गुंडों से ज्यादा कुछ हैं?


इन सवालों के जवाब नहीं में होने के बावजूद भोपाल जैसी मुठभेड़ों का बचाव किया जाता है. सोशल मीडिया पर आप देख सकते हैं कि एक विशाल जनसमूह 'आतंकवादियों को मारा ही जाना चाहिए' जैसे तर्क के साथ इन मुठभेड़ों का समर्थन कर रहा है. और यही तर्क सारी समस्याओं की जड़ है. एक लोकतंत्र की जनता को यह छोटी सी बात समझ नहीं आ रही है कि आतंकवादी को भी मुठभेड़ में मारना गलत है क्योंकि पुलिस का काम सजा देना नहीं है. उसका काम है अपराधियों के खिलाफ सबूत जमा करके अदालत के सामने रखना. फिर अदालत तय करेगी कि इस व्यक्ति का अपराध कितना है और सजा कितनी होगी.

और भोपाल के मामले में तो यह तर्क भी कहीं नहीं ठहरता. वे आठ युवक तो किसी पैमाने पर अपराधी या आतंकवादी नहीं थे. तीन साल से ये लड़के जेल में थे. अब तक उनका दोष साबित नहीं हुआ था और पुलिस ने उन्हें मार दिया. लोकतंत्र की जनता को एक पल दिल पर हाथ रखकर सोचना चाहिए कि अगर उनमें से एक भी मासूम था. एक भी निर्दोष था. तो उसकी मौत को कैसे जायज ठहराया जाएगा?
न्याय का पहला सिद्धांत है, सौ अपराधी छूट जाएं लेकिन एक मासूम को सजा नहीं होनी चाहिए. लेकिन यहां तो ना मुकदमा, ना सुनवाई, सीधे सजा. और सजा देने का अधिकार कुछ वर्दीधारियों को. यह न्यायतंत्र तो नहीं है. यह पुलिस राज है. और पुलिसराज में सिर्फ अन्याय होता है. सबके साथ. क्योंकि पुलिस राज में वर्दीवालों के अलावा सब अपराधी माने जाते हैं. गुलाम माने जाते हैं. ऐसे राज में मुठभेड़िये खून पीते हैं. न्याय का खून.

मृत्‍यु संबंधी पीएफ दावा सात दिन में निपटाने का निर्देश, रिटायरमेंट लेने वालों को भी मिलेगी राहत

कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) ने मृत्यु संबंधी निपटारे के दावों को सात दिन के अंतर निपटाने के दिशानिर्देश जारी किए हैं।

कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) ने मृत्यु संबंधी निपटारे के दावों को सात दिन के अंतर निपटाने के दिशानिर्देश जारी किए हैं। इसी तरह सेवानिवृत्त होने वाले कर्मचारियों का हिसाब-किताब सेवा पूरी होने से पहले ही तय करने को कहा गया है। ईपीएफओ ने मंगलवार को इसे संबंध में अपने अधिकारियों को निर्देश जारी कर दिए। श्रम मंत्रालय ने कहा कि श्रम मंत्री बंगारू दत्तात्रेय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 26 अक्टूबर को हुई बैठक में दिए गए दिशानिर्देशों पर की गई कार्रवाई की  समीक्षा की। इसमें केंद्रीय भविष्य निधि कोष आयुक्त (सीपीएफसी) ने मंत्री को बताया कि प्रधानमंत्री के निर्देश पर ईपीएफओ ने सेवानिवृत्ति और मृत्यु संबंधी दावों के निपटान के बारे में विस्तृत दिशानिर्देश जारी कर दिए हैं। बता दें कि बीमा कवर 3.6 लाख रुपए तक था जिसे अब बढ़ाकर 6 लाख रुपए कर दिया गया है। इस नियम के मुताबिक सदस्य की मृत्यु हो जाने पर उसके परिवार को 6 लाख रुपए मिलेंगे। जीवन बीमा कवर के लिए कर्मचारी को एक साल तक नौकरी करने की अनिवार्यता से मुक्त कर दिया गया है।

मंत्रालय की ओर से कहा गया, ”ये दिशा निर्देश फील्‍ड ऑफिसर्स को भेज दिए गए हैं।” साथ ही सोशल मीडिया के जरिए मिलने वाली शिकायतों पर भी फुरती से काम करने को कहा गया है। ईपीएफओ ने कॉमन सर्विस सेंटर्स केसाथ एक एमओयू किया है। इसके जरिए अधार कार्ड रखने वाले 50 लाख ईपीएफ पेंशनर्स को जीवन प्रमाण पत्र दिए जाएंगे। इससे पहले ईपीएफओ ने पीएफ अकाउंट में पैसे ट्रांसफर करने के नियमों में भी बदलाव किया था। कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) ने पीएफ डिपॉजिट ट्रांसफर के लिए नियमों में कुछ बदलाव किया है।
ईपीएफओ की रिटायरमेंट फंड बॉडी ने पुराने डेक्लरेशन फॉर्म की जगह नया डेक्लरेशन फॉर्म (new Form No 11) जारी किया है। नए जगह नौकरी ज्वाइन करते वक्त इस फॉर्म में व्यक्ति को अपने पूर्ववर्ती संस्थान के बारे में सारी डिटेल्स देनी होगी। इसके आलावा ईपीएफओ ने फॉर्म 13 (एक संस्थान से दूसरे संस्थान में पीएफ के पैसे ट्रांसफर करने संबंधित) में भी बदलाव किया है। इस फॉर्म में पहले यूएएन के जरिए प्रॉविडेंट फंड ट्रांसफर किया जाता था। इसके अतिरिक्त कर्मचारी भविष्य निधि संगठन ने कर्मचारियों की पेंशन स्कीम को बेहतर बनाने और ज्यादा लाभ देने के लिए पीएफ नियमों में बदलाव किए हैं। ऑनलाइन सर्विस, बीमा कवर बढ़ाना, एक साल नौकरी की अनिवार्यता खत्म, मिलता रहेगा ब्याज, न्यूनतम वेतनमान की सीमा बढ़ी व भाग-दौड़ से मिलेगी छुट्टी जैसे बदलाव किए गए हैं।

22 साल पहले स्वीडिश कपल ने लिया था गोद, तब से ढूंढ़ रही थी अपने मां-बाप, अब हुआ सपना पूरा

ज्योति और उसकी छोटी बहन गायत्री को एक स्वीडिश परिवार ने 1994 में बेंगलुरु के एक अनाथालय से गोद लिया था।

स्वीडिश गांव में पली-बढ़ी ज्योति स्वान का सपना एक अनजाने इंसान के घोड़े पर सवारी की तरह था जिसे उसने कई बार देखा। आखिरकार 22 साल के बाद 24 अक्टूबर को उसका यह सपना सच हुआ जब ज्योति अपने बायोलॉजिकल पिता दशरथ से मिली, जोकि बेंगलुरु शहर निगम में एक स्वास्थ्य कर्मचारी के तौर पर कार्यरत हैं। ज्योति, जोकि अपने माता-पिता की तलाश में दूसरी बार भारत दौरे पर आई थी, ने कहा उसने अपने पिता दशरथ को देखते ही तुरंत पहचान लिया। 27 वर्षीय ज्योति के चेहरे पर मुस्कार बिखरी थी, हो भी क्यों न, करीब 20 सालों के दर्द का अंत जो हुआ था। ज्योति और उसकी छोटी बहन गायत्री को एक स्वीडिश परिवार ने 1994 में बेंगलुरु के एक अनाथालय से गोद लिया था, जब वे (ज्योति-गायत्री) क्रमशः 5 और 4 साल के थे। ज्योति उस पल को याद करते हुए ग़मगीन हो जाती है जब उन दोनों को एक महिला ने अनाथालय में छोड़ दिया था। ज्योति की धुंधली यादों में शायद वह महिला उसकी मां थी। स्वीडन के अपने गांव में ज्योति कहती है, ‘यहां वह और गायत्री ही सिर्फ सांवले बच्चे हैं। उन्हें इस बात की जानकारी थी वे अलग हैं और वे हमेशा खुद को दूसरों से अलग ही महसूस करते थे।’ ज्योति कहती है कि उसके इसी अहसास ने उसे इस बात के लिए प्रेरित किया वह अपना वास्तविक वजूद ढूंढे।

2013 में, पहली बार ज्योति और उसकी छोटी बहन गायत्री अपने स्वीडिश माता-पिता के साथ बेंगलुरु के आश्रय अनाथालय पहुंचे जहां से उन्हें गोद लिया गया था। काफी निवेदन के बाद अनाथालय ने उनके (ज्योति और गायत्री) बायोलॉजिकल मां का नाम कमला बाई बताया और कहा उसने रिकॉर्ड कराया था कि वह सिंगल मदर है। ज्योति जो कि एक लेखक भी है, ने कहा, ‘अनाथालय ने मुझे यह भी बताया कि 1996 में हमारी मां दोबारा हमें देखने के लिए आई थी। आश्रय (अनाथालय) ने इसके अलावा हमारी कोई मदद नहीं की।’ 2016 में अक्टूबर महीने के तीसरे सप्ताह में, उसने (ज्योति ने) पुणे के बाल अधिकार ग़ैर-सरकारी संस्था (एनजीओ) सखी और इसके संस्थापक अंजलि पवार से संपर्क किया। जल्द ही वह (अंजलि पवार) अपने फिल्म क्रू के साथ बेंगलुरु पहुंची ताकि वह ज्योति की इस खोज को एक दस्तावेज (डॉक्यूमेंट) के तौर पर ढाल सके।

अपने माता-पिता को खोजने के पक्के इरादे को देखते हुए इस बार अनाथालय ने ज्योति को गोद लेने से जुड़े सारे दस्तावेज (पेपर) मुहैया कराए। पेपर के मुताबिक कमला बाई का एक पति था जिसका नाम रिकॉर्ड में दशरथ दर्ज है और वह (कमला बाई) बेंगलुरु शहर के बाहरी इलाके की रहने वाली थी। अनाथालय द्वारा मुहैया कराए गए फाइल के मुताबिक कमला बाई ने जिस वक्त ज्योति और गायत्री को अनाथालय में छोड़ा, वह बेंगलुरु के चमरजपेट में रहती थी। ज्योति ने आगे कहा, ‘स्थानीय लोगों ने कहा कि वह (कमला बाई) मर गई होगी। उनलोगों ने कहा, कोई दशरथ नहीं है। इसने मुझे अहसास कराया कि मैं एक प्रेतात्मा का पीछा कर रही थी।’ अंजलि पवार ने सुझाया कि वे लोग मारुलुकट्टे गांव जाए। जल्द ही वहीं की एक औरत उन्हें (ज्योति-गायत्री) बताया कि उनकी एक स्कूल की दोस्त थी कमला बाई, जिसके पिता की मौत अस्थमा की वजह से हुई थी। ज्योति को इसी घटनाक्रम से जुड़ा हुआ कुछ याद आया। गांववालों ने उन्हें (ज्योति-गायत्री) दूसरे जगह जाने की सलाह दी, जहां वे अपने माता-पिता को ढूंढने की कोशिश कर सकते थे। 23 अक्टूबर की रात, ज्योति मारुलुकट्टे गांव के नजदीक सुसिवेगुंटे पहुंची। ‘यहां हमें हमारे पिता का बड़ा बेटा मिला। हमारे बिना कुछ कहे ही उसने कहा कि कमला बाई और दशरथ की दो बेटियां थीं, ज्योति और गायत्री।’ अंकल ने दशरथ को बेंगलुरु बुलाया और उसने ज्योति को उसके अगले दिन आने को कहा। 24 अक्टूबर को ज्योति बेंगलुरु में कुमारस्वामी लेआउट के फर्स्ट फ्लोर पर अपने माता-पिता के खोज की यात्रा के आखिरी कदम पर थी। एक-दूसरे से मुलाकात के दौरान ज्योति और उसके पिता दशरथ टूट गए। दशरथ ने ज्योति से कहा कि कमला बाई ने उसके (ज्योति) और गायत्री के साथ घर छोड़ दिया था जिसके बाद वह कभी नहीं लौटी।

ज्योति की मुलाकात मारुति से भी हुई, जिसके बारे वह नहीं जानती थी, जो दशरथ के साथ रहता था। दशरथ को दूसरी पत्नी से एक और बेटी भी थी। ज्योति और दशरथ के बीच रिश्तों की सत्यता जांचने के लिए उनका डीएनए सैंपल ले लिया गया है। लेकिन ज्योति को इस बात में ज़रा भी संदेह नहीं है कि दशरथ ही उनके पिता हैं। ‘जिस तरह से वह बात कर रही है उसके चहरे से यह साफ ज़ाहिर भी होता है।’ अंजलि पवार ने कहा, ‘जब उसके बच्चे बहुत छोटे थे तो दशरथ प्लाइड (एक तरह का वाहन) टोंगा का इस्तेमाल कर उन्हें (ज्योति और गायत्री) घुमाने के लिए ले जाया करता था। यही यादें संभवतः ज्योति के सपने में आते रहे होंगे।’  ज्योति को विश्वास है कि अपने पिता दशरथ को पाने के बाद उसे शांति भी मिल जाएगी। भेदभाव को झेलने पर उसने (ज्योति ने) कहा, विदेशों में गोद लिया जाना बच्चों के लिए हमेशा आसान नहीं होता। स्वीडिश माता-पिता ने कहा, हमने अपने बच्चों को सबकुछ दिया, उसने (ज्योति ने) कहा, ‘वे भूल गए थे कि एक देश जहां से हम हैं वहां हमारा एक परिवार है। आप उसे मिटा नहीं सकते।’ मारुति जिसकी एक बेटी है ने, ज्योति से कहा कि लगभग 10 सालों तक वह कमला बाई से संपर्क में थी और बाद में लोगों ने बताया कि वह मर गई। पवार ने बताया, ‘फिर भी ज्योति को इस बात पर यकीन नहीं है। हम लोग अभी भी कमला बाई को ढूंढ़ रहे है। मैं तब तक विश्वास नहीं करूंगी, जब तक डेथ सर्टिफिकेट ना देख लूं।

वाघा बॉर्डर पर भी PAK के खिलाफ गुस्सा, BSF का ऐलान- पाकिस्तानी फौज को नहीं बांटेंगे दिवाली की मिठाई

इस दीवाली बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स (बीएसफ) के जवान वाघा बॉर्डर पर पाकिस्तान के सिपाहियों के साथ मिठाई का आदान-प्रदान नहीं करेंगे।

इस दीवाली बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स (बीएसफ) के जवान वाघा बॉर्डर पर पाकिस्तान के सिपाहियों के साथ मिठाई का आदान-प्रदान नहीं करेंगे। हर बार ऐसा किया जाता था। लेकिन इस बार पाकिस्तान की तरफ से लगातार हो रही सीजफायर और आतंकवादियों को दी जा रही सिक्योरिटी की वजह से भारतीय सेना ने ऐसा करने का फैसला किया है।
गौरतलब है कि उरी हमले के बाद से भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़ गया है। उसमें पाकिस्तान से आए आतंकियों ने भारत के 20 जवानों की जान ले ली थी। उसका बदला लेने के लिए भारतीय सेना ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में घुसकर सर्जिकल स्ट्राइक किया था। उसमें सेना ने कई आतंकी कैंप्स को तबाह किया था। जिससे पाकिस्तान तिलमिलाया हुआ है। तब से पाकिस्तान की तरफ से बार-बार सीजफायर का उल्लंघन हो रहा है। भारतीय सेना भी पाकिस्तानी हमले का मुंहतोड़ जवाब दे रही है।

सिक्किम के बाद हिमाचल प्रदेश बना ‘खुले में शौच की प्रथा’ से मुक्त होने वाला दूसरा राज्य

हिमाचल प्रदेश शुक्रवार (28 अक्टूबर) को खुले में शौच से मुक्त (ओडीएफ) राज्य बन गया जो सिक्किम के बाद इस उपलब्धि को हासिल करने वाला दूसरा प्रदेश है.

हिमाचल प्रदेश शुक्रवार (28 अक्टूबर) को खुले में शौच से मुक्त (ओडीएफ) राज्य बन गया जो सिक्किम के बाद इस उपलब्धि को हासिल करने वाला दूसरा प्रदेश है। एक आधिकारिक बयान के अनुसार हिमाचल प्रदेश ने राज्य में शत प्रतिशत (100%) ग्रामीण स्वच्छता कवरेज के लक्ष्य को प्राप्त कर लिया है जहां राज्य के सभी 12 जिले ओडीएफ घोषित किये गये हैं। मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने यहां एक सार्वजनिक समारोह में यह घोषणा की जहां केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे पी नड्डा और ग्रामीण विकास मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर मौजूद थे। मुख्यमंत्री ने कहा, ‘‘पर्वतीय राज्य हिमाचल पूरी तरह ओडीएफ बनने वाला पहला बड़ा राज्य हो गया है।’’ उन्होंने ‘स्वच्छ भारत मिशन’ के लक्ष्य को हासिल करने के प्रयासों में सहयोग के लिए राज्य की जनता को बधाई दी।

इससे पहले सिक्किम को देश का स्वच्छतम राज्य पाया गया था। इसके सभी चार जिलों को सेनीटेशन एवं साफ सफाई में शीर्ष 10 जिलों में रखा गया है। पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय द्वारा जारी स्वच्छ सर्वेक्षण ग्रामीण 2016 रिपोर्ट के अनुसार सिक्किम को 100 में से 98.2 फीसद अंक मिले थे। यह रैकिंग स्वच्छ शौचालयों वाले घरों के प्रतिशत के आधार पर निकाली गई थी। कुछ दिन पहले आई एक रिपोर्ट में भारत में महिलाओं के कार्य करने की स्थिति के लिहाज से पूर्वोत्तर के छोटे से राज्य सिक्किम को पहला स्थान मिला था। वहीं राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली सबसे निचले पायदान पर थी। वह रिपोर्ट अमेरिका के प्रमुख शोध संस्थान सेंटर फॉर स्ट्रेटजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज (सीएसआईएस) तथा नाथन एसोसिएट्स ने संयुक्त रूप से तैयार की थी। रिपोर्ट में सिक्किम को सर्वाधिक 40 अंक जबकि दिल्ली को केवल 8.5 अंक मिले हैं जो राष्ट्रीय राजधानी की स्थिति को बयां करता है।

सर्जिकल स्‍ट्राइक के बाद से शहीद हुए हमारे 7 जवान, 40 से ज्‍यादा बार टूटा संघर्षविराम

पाकिस्‍तान की तरफ से अब तक 40 से ज्‍यादा बार सीजफायर का उल्‍लंघन किया गया है।


भारत-पाकिस्‍तान के बीच सीमा पर करीब डेढ़ महीने से तनाव है। 18 सितंबर को जब जम्‍मू-कश्‍मीर के उरी स्थित आर्मी कैंप पर आतंकियों ने हमला किया, तो भारत स्‍तब्‍ध रह गया। हमले में 18 जवान मौके पर दो जवान इलाज के दौरान शहीद हुए। इसके बाद दबाव बढ़ने पर भारतीय सेना ने 28-29 सितंबर की रात को पाकिस्‍तान अधिकृत कश्‍मीर में आतंकी संगठनों के लॉन्‍च पैड्स पर सर्जिकल स्‍ट्राइक को अंजाम दिया। डायरेक्‍टर जनरल आफ मिलिट्री ऑपरेशंस ने 29 सितंबर को प्रेस कॉन्‍फ्रेंस में सर्जिकल स्‍ट्राइक का ख्‍ुालासा किया। हालांकि उन्‍होंने यह नहीं बताया कि सेना की इस कार्रवाई में कितने आतंकी या पाकिस्‍तानी जवान मारे गए। मीडिया रिपोर्ट्स में 38-40 आतंकियों के मारे जाने की चर्चा रही। बीबीसी ने एक पाकिस्‍तानी फौजी के हवाले से दावा किया कि भारत के हमले में पाकिस्‍तानी सेना का एक जवान मारा गया था। हालांकि पाकिस्‍तान ने आधिकारिक रूप से यह बात नहीं मानी है। मगर सर्जिकल स्‍ट्राइक्‍स के बाद से सीमा पार से पाकिस्‍तानी फौजें लगातार संघर्षविराम का उल्‍लंघन करती रही हैं। तब से 40 से ज्‍यादा बार पाकिस्‍तान की तरफ से फायरिंग की गई है, जिसमें सात भारतीय जवान शहीद हुए। इन फायरिंग्‍स में करीब डेढ़ दर्जन नागरिक भी घायल हुए हैं। भारत ने संघर्षविराम के उल्‍लंघन को लेकर पाकिस्‍तानी उच्‍चायुक्‍त अब्‍दुल बासित को गुरुवार को तलब किया और स्‍पष्‍ट शब्‍दों में सीमापार से ऐसी हरकतें रोकने को कहा है।

पांच दिन में पांच जवान शहीद: 
27 अक्‍टूबर: गुरुवार सुबह कश्‍मीर के आएस पुरा और अ‍रनिया सेक्‍टर में पाकिस्तान की ओर से संघर्षविराम उल्‍लंघन में बीएसएफ का एक कांस्‍टेबल शहीद हो गया। उसकी पहचान बिहार के जीतेंद्र कुमार के रूप में हुई है। इस हमले में कम से कम 6 नागरिक भी घायल हुए हैं। गुरुवार शाम को आतंकियों को भारतीय सीमा में घुसपैठ करने से रोकते हुए भी भारतीय सेना का एक जवान शहीद हो गया।
25 अक्‍टूबर: आरएस पुरा से लेकर अखनूर सेक्‍टर तक पाकिस्‍तान की गोलीबारी में बीएसएफ का एक हेड कांस्‍टेबल शहीद हुआ। हमले में 6 साल का एक बच्‍चा भी मारा गया। दो बीएसएफ जवानों और आधा दर्जन से ज्‍यादा महिलाएं-बच्‍चे घायल हो गए।
24 अक्‍टूबर: आरएसपुरा सेक्‍टर में पाकिस्‍तान की ओर से गोलीबारी में एक बीएसएफ शहीद हुआ, जबकि एक घायल हुआ।
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23 अक्‍टूबर: शनिवार (22 अक्‍टूबर) की गोलीबारी में घायल हुए बीएसएफ जवान गुरुनाम सिंह शहीद हुए। उनका सरकारी मेडिकल कॉलेज में इलाज चल रहा था।
18 अक्‍टूबर: बालाकोट और नौशेरा में पाकिस्‍तानियों की तरफ से फायरिंग में सेना का जवान शहीद हो गया। सूत्रों के मुताबिक, उसे स्‍नाइपर शॉट के जरिए मारा गया। जवान की पहचान सुदेश कुमार के रूप में हुई, वह बालाकोट के तरकुंडी एरिया में तैनात था।
3 अक्‍टूबर: आतंकियों ने बारामूला में 46 राष्‍ट्रीय रायफल्‍स के कैंप पर हमला किया, जिसमें एक बीएसएफ जवान शहीद हो गया, जबकि एक अन्‍य घायल हो गया।
इसके अलावा, पाकिस्‍तान की तरफ से अब तक 40 से ज्‍यादा बार सीजफायर का उल्‍लंघन किया गया है। सेना ने किसी भी फायरिंग का मुंहतोड़ जवाब देने की छूट जवानों को दे रखी है।

बस्तर पुलिस और सरकारी खामोशी

सुनील कुमार
छत्तीसगढ़ के बस्तर में कल पुलिस ने फौजी किस्म की वर्दी पहने हुए सामूहिक रूप से जगह-जगह सामाजिक कार्यकर्ताओं, वकीलों, राजनीतिक नेताओं, और पत्रकारों के पुतले जलाए. और प्रतीक के रूप में स्थानीय थानों की पुलिस ने पुतलों की आग बुझाने की कोशिश भी दिखाई. इन तस्वीरों को देखें तो यह हैरानी होती है कि पुलिस का एक हिस्सा एक ऐसे काम को रोक रहा है, जो कि पुलिस का ही दूसरा हिस्सा कर रहा है. और छत्तीसगढ़ वह राज्य है जहां पर पुलिस कर्मचारियों की कोई यूनियन भी नहीं है जिसे कि ऐसे किसी प्रदर्शन की छूट मिल सके.

अभी तक राज्य सरकार की तरफ से कल की इस व्यापक सोची-समझी अलोकतांत्रिक कार्रवाई पर कोई प्रतिक्रिया भी नहीं आई है, इसलिए यह सोचना भी गलत होगा कि सरकार इस पर कोई कार्रवाई करने का सोच रही है. लेकिन यह एक राज्य का मामला नहीं है, भारत जैसे विशाल लोकतंत्र की लोकतांत्रिक परंपराओं और इसके लोकतांत्रिक ढांचे की बात है, और उसी नजरिए से बस्तर की कल की इस भयानक कार्रवाई के बारे में सोचना जरूरी है जिसमें पुलिस ने आदिवासियों का तो नहीं, लेकिन शहरी लोकतंत्र का लहू जरूर बहाया है.

बस्तर में अभी पिछले दो-चार दिनों के भीतर ही पुलिस को लेकर सुप्रीम कोर्ट में पेश सीबीआई जांच रिपोर्ट खबरों में है जिसमें ऐसा कहा बताया जाता है कि ताड़मेटला की बहुत चर्चित आगजनी में सुरक्षा बलों ने आदिवासी बस्तियों में आग लगाई थी. बस्तर में काम कर रहे सामाजिक संगठन, मीडिया के कुछ लोग, और बहुत से स्थानीय आदिवासी पहले से यही बात कह रहे थे, लेकिन राज्य सरकार में उनकी कोई सुनवाई नहीं थी. अब जब यह बात सीबीआई के हलफनामे में सुप्रीम कोर्ट में सामने आई है, तो बस्तर की पुलिस मानो बौखलाते हुए ऐसा सार्वजनिक प्रदर्शन कर रही है जैसा कि भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में याद नहीं पड़ता है. बस्तर के कई जिलों में सैकड़ों या हजारों पुलिस वालों ने जगह-जगह सामाजिक कार्यकर्ताओं और वकीलों-पत्रकारों के पुतले यह कहते हुए जलाए कि वे नक्सल-हिमायती हैं, या कि नक्सल हैं.

अब यह बुनियादी सवाल उठता है कि बस्तर की जो पुलिस अनगिनत बेकसूर लोगों के खिलाफ अदालती कार्रवाई से लेकर मुठभेड़ हत्या तक की तोहमतें झेल रही है, उस पुलिस को कानूनी कार्रवाई करने से कौन रोक रहा था अगर ये सारे लोग नक्सली हैं? और अगर यह लोग नक्सली हैं भी, तो भी पुलिस का काम जांच करके उन्हें गिरफ्तार करके अदालत में पेश करने का है, न कि सड़कों पर उनके पुतले जलाते हुए अपनी वर्दी की अलोकतांत्रिक ताकत का हिंसक प्रदर्शन करने का. लोकतंत्र के लिए यह एक बहुत ही खतरनाक नौबत है कि पुलिस कानून को अपने हाथ में लेकर लोगों को मुजरिम करार दे, और अपनी वर्दी के साथ जुड़े हुए नियमों को कुचलकर ऐसा जश्न मनाए कि वह जिसके चाहे उसके पुतले जला सकती है.

यहां पर दो दिन पहले बस्तर के भारी विवादास्पद आईजी एस.आर.पी. कल्लूरी का कैमरों के सामने दिया गया वह राजनीतिक और अलोकतांत्रिक बयान भी देखने की जरूरत है जिसमें उन्होंने खुले राजनीतिक-अहंकार के साथ लोकतांत्रिक ताकतों के खिलाफ बयानबाजी की है, और अपने-आपको लोकतंत्र से ऊपर साबित करने की कोशिश की है. उनका यह बयान आदिवासी बस्तियों को जलाने की रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में पेश होने के बाद और उसी संदर्भ में आया है. बस्तियों के बाद अब शहरों में लोकतांत्रिक लोगों के पुतले जलाकर कल्लूरी की पुलिस ने यह साबित किया है कि लोकतंत्र की ऐसी आगजनी पर उनका कुछ नहीं बिगड़ सकता, और बस्तर की पुलिस बस्तियों के बाद बेकसूरों के पुतले भी एक आंदोलन की तरह जला सकती है.

छत्तीसगढ़ के लोकतांत्रिक ढांचे में यह एक बहुत ही अनोखी नौबत है कि एक अफसर इस कदर अलोकतांत्रिक बर्ताव कर रहा है, और सरकार में कोई भी उस पर रोक लगाने की न सोच रहा है, न ऐसा कुछ बोल रहा है. जब निर्वाचित लोकतांत्रिक ताकतें लोकतंत्र को इस तरह और इस हद तक हांकने की ताकत वर्दीधारी अफसरों को दे देती हैं, तो वह एक भयानक खतरनाक नौबत से कम कुछ नहीं है. कोई अफसर नक्सलियों को मारने में कामयाब हो सकता है, लेकिन क्या इस खूबी को देखते हुए उसे बस्तर जैसे एक नाजुक और संवेदनशील, संविधान में विशेष हिफाजत मिले हुए आदिवासी इलाके में तानाशाही का ऐसा हक देना जायज है?

ऐसे में मुल्क की सरहद पर बहादुरी दिखाने वाले फौजियों को भी कुछ कत्ल माफ होने चाहिए, और फौजियों को भी बस्तर की तरह यह छूट मिलनी चाहिए कि वे भारत के जिन सामाजिक आंदोलनकारियों को पाकिस्तान का हिमायती समझते हैं उनके पुतले जलाने के लिए दिल्ली के राजपथ पर वर्दी में इकट्ठे हों.

पुलिस या किसी भी फौज में अफसर तो आते-जाते रहते हैं, और हिंसक और तानाशाह अफसर भी लोगों ने वक्त-वक्त पर देखे हैं, लेकिन वे अफसर लोकतंत्र की आखिरी ताकत नहीं रहते हैं. लोकतंत्र में आखिरी ताकत निर्वाचित जनप्रतिनिधि रहते हैं, और छत्तीसगढ़ की निर्वाचित सरकार सुप्रीम कोर्ट के बार-बार के आदेश देखने के बावजूद सबसे बेजुबान आदिवासियों के बस्तर में जिस तरह की तानाशाही की छूट देकर चल रही है, वह रूख हक्का-बक्का करने वाला है.

हमारा ख्याल है कि राज्य सरकार ऐसे अफसरों के कितने ही जुर्म अनदेखे क्यों न करें, बस्तर सुप्रीम कोर्ट की नजरों में है, और हमको वह दिन दूर नहीं दिख रहा है जब लोकतंत्र के पुतलों को इस तरह से जलाने को लेकर राज्य सरकार को कटघरे में खड़ा किया जाएगा. अब यह काम सुप्रीम कोर्ट के जजों के पुतले जलने के पहले होगा, या बाद में, यह देखना होगा.

(लेखक ‘दैनिक छत्तीसगढ़’ के संपादक है. साभार ‘दैनिक छत्तीसगढ़’)

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डी मूर्ति की मौत, हालत बिगड़ने के बावजूद 6 घंटों तक नहीं मिली थी एंबुलेंस

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के सीनियर प्रोफेसर डी मूर्ति की वक्त पर एंबुलेंस का मिलने से मौत हो गई। एनडीटीवी की खबर के मुताबिक, 64 साल के डी मूर्ति डिपार्टमेंट ऑफ मॉडर्न इंडियन लेंग्वेज के हेड थे।

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के सीनियर प्रोफेसर डी मूर्ति की वक्त पर एंबुलेंस का मिलने से मौत हो गई। एनडीटीवी की खबर के मुताबिक, 64 साल के डी मूर्ति डिपार्टमेंट ऑफ मॉडर्न इंडियन लेंग्वेज के हेड थे। वह कैंसर के मरीज थे। रविवार को उनकी एक सर्जिरी हुई थी। लेकिन मंगलवार (25 अक्टूबर) को उनकी हालत अचानक से ज्यादा बिगड़ गई। यूनिवर्सिटी में मौजूद डॉक्टर मे उन्हें दिल्ली शिफ्ट करने की सलाह दी। लेकिन एंबुसलेंस मुहैया नहीं करवाई गई। अधिकारियों का आरोप है कि कागजी कार्यवाही के चलते एंबुलेंस का प्रबंध नहीं किया जा सका। यूनिवर्सिटी के प्रवक्ता एस पीरजादा ने कहा, ‘एक एंबुलेंस तक मुहैया नहीं करवाई जा सकी। हॉस्पिटल में आपसी समन्वय बिल्कुल नहीं है। उस वक्त पर फॉर्म भरवाने की जरूरत ही क्या थी?’
गौरतलब है कि इससे पहले यूनिवर्सिटी के एक स्टूडेंट की डेंगू के इलाज के दौरान हॉस्पिटल में ही मौत हो गई थी। उसमें पांच डॉक्टरों को दोषी पाया गया था।

 

रतन टाटा ने कर्मचारियों के नाम लिखा खुला पत्र, पद से हटाए जाने के खिलाफ मिस्त्री ने किया हाई कोर्ट का रुख

मिस्त्री ने रतन टाटा के 75 वर्ष की आयु पूरी करने पर उनकी सेवानिवृत्त के बाद 29 दिसंबर 2012 को चेयरमैन का पद भार संभाला था।

रतन टाटा ने टाटा समूह के कर्मचारियों के लिए खुला खत लिखा है। इस खत के माध्यम से वो कर्मचारियों को साइरस मिस्त्री को हटाने की जानकारी दे रहे हैं। साथ ही इस खत के माध्यम से रतन टाटा ने कर्मचारियों को भरोसा दिलाने की कोशिश की है कि साइरस मिस्त्री को पदस हटाना समूह के लिए भायदेमंद साबित होगा। रतन टाटा को सोमवार को ही 100 बिलियन अमेरिकन डॉलर के टाटा समूह की दोबारे जिम्मेदारी सौंपी गई है। मिस्टर टाटा ने अपने खत में ये भी बताया कि प्रंबधन ने नई सलेक्शन कमेटीका गठन किया है जो टाटा समूह के अगले चेयरमैन की खोज करेगी। ये सलेक्शन कमेटी अगले चार महीनों में नए चेयरमैन की तलाश करेगी। इस कमेटी में रतन टाटा, रोनेन सेन, वेणु श्रीनिवासन, अमित चंद्रा जैसे नाम शामिल हैं। चेयरमैन पद से हटाए जाने से नाराज साइरस मिस्त्री ने बंबई हाई कोर्ट का रुख किया है। अब ये मामला कोर्ट में भी चलेगा।

 

 

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मिस्त्री को वर्ष 2011 में कंपनी में चेयरमैन रतन टाटा का उत्तराधिकारी चुना गया था और उन्हें पहले डिप्टी चेयरमैन बनाया गया। टाटा संस के चेयरमैन पर दर मिस्त्री का चुनाव पांच सदस्यीय एक समिति ने किया था। मिस्त्री ने रतन टाटा के 75 वर्ष की आयु पूरी करने पर उनकी सेवानिवृत्त के बाद 29 दिसंबर 2012 को चेयरमैन का पद भार संभाला था। मिस्त्री वर्ष 2006 से कंपनी के निदेशक मंडल में शामिल रहे हैं। कंपनी के सबसे बड़े हिस्सेदार शापूरजी पालोनजी ने कंपनी के चेयरमैन पद के लिए उनके नाम की सिफारिश की थी। टाटा संस ने मिस्त्री को हटाने का कारण नहीं बताया है। उन्होंने बहुत धूमधड़ाके के साथ कंपनी की जिम्मेदारी सौंपी गयी थी पर माना जा रहा है कि घाटे में चल रही कंपनियों को छांटने और केवल लाभ देने वाले उपक्रमों पर ही ध्यान देने के उनके दृष्टिकोण से कंपनी में अप्रसन्नता थी। इनमें यूरोप में घटे में चल रहे इस्पात करोबार की बिक्री का मामला भी शामिल है। इसके अलावा कंपनी के दूरंसचार क्षेत्र के संयुक्त उद्यम टाटा डोकोमो में जापानी कंपनी से अलग होने के मामले में भी डोकोमो के साथ कंपनी का एक कानूनी विवाद चल रहा है।

कोहली इसी रफ़्तार से शतक बनाते रहे तो...

प्रदीप कुमार
बीबीसी संवाददाता

 

विराट कोहली

मोहाली के पंजाब क्रिकेट एसोसिएशन के मैदान पर विराट कोहली ने नाबाद 154 रन की पारी खेलकर टीम इंडिया को धमाकेदार जीत दिला दी.
विराट कोहली तब बल्लेबाज़ी करने उतरे जब टीम इंडिया ने महज 13 रन पर एक विकेट गंवा दिया था और टीम के सामने 286 रनों का विशाल लक्ष्य था.
कोहली विकेट पर टिकते इससे पहले ही उन्हें जीवनदान मिल गया. मेट हेनरी की गेंद पर स्लिप में रॉस टेलर से उनका कैच छूट गया.
इसके बाद कोहली ने इस मुक़ाबले में पीछे मुड़कर नहीं देखा. उन्होंने 134 गेंद पर नाबाद 154 रन ठोक दिए. 16 चौके और एक छक्के की अपनी पारी के साथ वे टीम इंडिया को जीत दिलाकर ही पेवेलियन लौटे.

विराट कोहली
उनकी इस पारी पर जीत के बाद टीम इंडिया के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने पुरस्कार प्रजेंटेशन समारोह में कहा, "क्रिकेट में टॉप लेवल क्या होता है, ये कहना बेहद मुश्किल है. लेकिन कोहली ने भारत को गर्व से भर दिया है."
ज़ाहिर है कि भारतीय कप्तान का इशारा विराट कोहली के टॉप लेवल क्रिकेट की ओर ही था, कम से कम वनडे क्रिकेट में कोहली के कारनामे तो मैच दर मैच इसकी तस्दीक ही करते हैं.

मोहाली में कोहली ने अपने वनडे करियर का 26वां शतक बनाया. कोहली किस रफ़्तार से शतक बना रहे हैं, इसका अंदाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि महज 174वें वनडे में इस मुकाम तक पहुंच गए हैं.
वनडे क्रिकेट में कोहली से ज़्यादा शतक बनाने वाले बल्लेबाज़ों पर अगर नज़र डालें तो सचिन तेंदुलकर के नाम सबसे ज़्यादा शतक हैं. 49 शतक के लिए तेंदुलकर को 463 मैच खेलने पड़े.
जबकि 30 शतक बनाने वाले रिकी पॉन्टिंग को 375 वनडे. वहीं सनथ जयसूर्या ने 404 वनडे में 28 शतक जमाए.
ऐसे में बहुत जल्द ही वनडे क्रिकेट में शतक बनाने वालों में कोहली दूसरे नंबर पर आ सकते हैं और सचिन तेंदुलकर के वनडे शतकों का रिकॉर्ड भी उनसे बहुत दूर नहीं दिख रहा है.
विराट कोहली के शतकों के साथ सबसे ख़ास बात ये भी है कि वे टीम इंडिया को जीत दिलाने के लिए लगाए शतक हैं.

विराट कोहली

26 शतकों में कोहली ने 16 शतक तब लगाए हैं जब टीम इंडिया किसी विशाल स्कोर का पीछा करने के लिए खेल रही थी और 14 बार टीम इंडिया जीत हासिल करने में कामयाब हुई है.
दबाव के इन पलों में कोहली साल दर साल और शतक दर शतक ख़ुद को साबित करते रहे हैं.
कोहली की इस ख़ासियत पर चर्चा करते हुए टीम इंडिया के कप्तान एमएस धोनी मोहाली वनडे के बाद कहा, "शुरुआत से ही, कोहली हमेशा ख़ुद को बेहतर करना चाहते रहे ताकि वो टीम इंडिया के लिए मैच जीत सकें."
धोनी ने ये भी माना कि विराट कोहली वैसे क्रिकेटर हैं जिन्हें अपनी ताक़त का बखूबी अंदाज़ा है.
वनडे क्रिकेट में विराट कोहली का करियर महज आठ साल पुराना है और वो अभी कम से कम सात-आठ साल तो खेल ही सकते हैं.

अगर कोहली अपनी क्रिकेट और अपने संयम दोनों पर काबू रख पाए तो वनडे क्रिकेट में बल्लेबाज़ी के तमाम रिकॉर्ड उनके नाम होंगे, इसमें शायद ही किसी को शक हो.
हालांकि वनडे क्रिकेट में शतक लगाने के मामले में उन्हें दक्षिण अफ़्रीकी क्रिकेटर हाशिम अमला से चुनौती मिलती दिख रही है. अमला अब तक 140 वनडे मैचों में 23 शतक लगा चुके हैं.
इस लिहाज से देखें तो वे विराट कोहली को तगड़ी टक्कर दे रहे हैं. लेकिन क्रिकेट के मैदान पर विराट कोहली को बल्लेबाज़ी करते देखने का अनुभव शायद ही कहीं और मिले.

 

(बीबीसी हिंदी ) 

व्हाइट हाउस के प्रमुख फोटोग्राफर ने लिस्ट में ‘टॉप’ पर रखी मनमोहन सिंह की यह तस्वीर, पीएम मोदी को नहीं दी जगह

यूएस के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपना 14वां और अंतिम औपचारिक राज्य आगमन समारोह किया।

यूएस के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने मंगलवार (18 अक्टूबर) को अपना 14वां और अंतिम औपचारिक राज्य आगमन समारोह किया। इसमें इटली के प्रधानमंत्री मैटो रेंजी और उनकी पत्नी अगनेसी मुख्य अतिथि के रूप में आए थे। एसोसिएटिड प्रेस (एपी) की रिपोर्ट के मुताबिक, कार्यक्रम में सबकुछ बहुत शानदार था। उसमें लगभग 400 लोगों को न्योता दिया गया था। यह मौका व्हाइट हाउस के मुख्य फोटोग्राफर पेटे सूजा के लिए बेहद खास था। वह पिछले आठ सालों से ओबामा की हर पार्टी का हिस्सा रहे हैं। सभी स्टेट डिनर्स में भी वह ओबामा के साथ थे। इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक, उन्होंने अपने पिछले आठ साल में हुई 14 स्टेट मीट में क्लिक की गई सभी फोटोग्राफ में से ‘बेस्ट’ को चुना। अपनी फोटो सिरीज में उन्होंने सबसे ऊपर भारत के पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनकी पत्नी गुरुशरण कौर की तस्वीर को रखा है। मनमोहन सिंह ओबामा के न्योते पर 24 नवंबर 2009 को व्हाइट हाउस गए थे। तब ओबामा सत्ता में आए थे। वह उनका पहला राज्य आगमन समारोह था। फोटो में मिशेल ओबामा गुरुशरण कौर को और ओबामा मनमोहन सिंह को लेकर जा रहे हैं। हालांकि, सूजा की फोटो सीरिज में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कोई तस्वीर शामिल नहीं है। मोदी 2016 के जून में स्टेट विजिट के लिए गए थे।

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फर्स्ट लेडी मिशेल ओबामा गुरुशरण कौर को लेकर जाते हुए, दूसरी तरफ अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को लेकर जाते हुए। (Source: Official White House Photo by Pete Souza)

सूजा ने बताया कि उन्होंने कुछ खास किस्म की फोटोज को चुना है। सूजा ने कहा, ‘मैंने कुछ अलग तरह की फोटोज को चुना। अपनी सीरीज में मैंने औपचारिक और परदे के पीछे की स्थिति वाली फोटोज (बिहाइंड द सीन) को लिया है ना कि डिनर और मीटिंग की फोटोज को।’
मनमोहन सिंह की फोटो के अलावा कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन थ्रूडेयू, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, मेक्सिको के राष्ट्रपति फिलिप काल्ड्रेन, जर्मन चांसलर एंजेला मार्केल, फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद, जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे, ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री डेविड कैमरून और पॉप फ्रांसेस की फोटोज भी सूजो की लिस्ट में शामिल हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने दी सहारा प्रमुख सुब्रत रॉय को बड़ी राहत

नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय से सहारा समूह के प्रमुख सुब्रत रॉय को बड़ी राहत मिली है। उच्चतम न्यायालय ने एक बार फिर सुब्रत रॉय की पैरोल अवधि 28 नवंबर तक के लिए आज बढ़ा दी। मुख्य न्यायाधीश टी एस ठाकुर, न्यायमूर्ति अनिल आर दवे और न्यायमूर्ति ए के सिकरी की खंडपीठ ने सहारा प्रमुख के वकील कपिल सिब्बल की दलीलें सुनने के बाद पैरोल अविध 28 नवंबर तक बढ़ाने का आदेश दिया। न्यायालय ने रॉय को पैरोल के लिए इस अवधि के दौरान 200 करोड़ रुपए और जमा कराने का आदेश भी दिया। 

सहारा प्रमुख ने अदालत में जमा कराया 215 करोड़ रुपए का ड्राफ्ट
इससे पहले सिब्बल ने सहारा प्रमुख की ओर से 215 करोड़ रुपए का ड्राफ्ट अदालत के समक्ष जमा किया। सिब्बल ने कल मुख्य न्यायाधीश के समक्ष मामले का विशेष उल्लेख किया था और मामले की सुनवाई पहले से निर्धारित तारीख (24 अक्टूबर) के बजाय आज करने का अनुरोध आग्रह किया था। शीर्ष अदालत ने यह अनुरोध मान लिया था।  रॉय गत मई में अपनी मां के निधन के बाद जेल से बाहर आए थे और उसके बाद से उनकी पैरोल अवधि समय-समय पर बढ़ाई जाती रही है। 

धोखे से मारना सर्जिकल स्ट्राइक नहीं, भारत को चीन से करना पड़ेगा युद्ध : काटजू

कानपुर: सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज और प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन रहे जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने एक बार फिर विवादित बयान दिया है। उन्होंने भारतीय सेना द्वारा किए गए सर्जिकल स्ट्राइक पर सवाल उठाते हुए कहा कि किसी को धोखे से मारना सर्जिकल स्ट्राइक नहीं है। उन्होंने कहा कि भारत को पाकिस्तान से नहीं, बल्कि उसके पीछे खड़े सुपर पावर चाइना से युद्ध करना पड़ेगा। पाकिस्तान की औकात दो कौड़ी की है। उन्होंने कहा कि केवल चाइना के बल पर पाकिस्तान कूद रहा है। अब पाक के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक करना आसान नहीं है। पॉलिटिशियन अपने फायदे के लिए सेना को बलि का बकरा बना रहे हैं। यह बात उन्होंने शुक्रवार को आईआईटी कानपुर के कल्चरल फेस्ट अंतराग्नि 2016 के टॉक शो में स्टूडेंटों से बातचीत करते दौरान कही।

जनता के दिमाग में भरा गोबर, वोट का जमाना खत्म
इस दौरान उन्होंने कहा कि अब अब वोट और इलेक्शन का जमाना खत्म हो रहा है, हर जगह भ्रष्टाचार और अन्याय है। क्रांति और बंदूक की जरूरत है। जल्द ही हर देशवासी के हाथों में बंदूक होगी। बिना लड़ाई के कुछ नहीं होने वाला है। चीन की क्रांति के दौरान जितनी जानें गई थीं, शायद उससे कहीं ज्यादा जानें इस क्रांति में जाएं। इस दौरान उन्‍होंने ये भी कहा कि देश की जनता के दिमाग में गोबर भरा है।

बाल ठाकरे बाद राज ठाकरे कर रहा गुंडागर्दी
काटजून ने स्टूडेंटों के सामने बातचीत करते हुए महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख राज ठाकरे पर जमकर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि धर्म और जाति के नाम पर वोट मांगने वाले नेता, गुंडे और गैंगस्टर हैं। एक समय बाल ठाकरे गुंडा था, अब वही गुंडागर्दी राज ठाकरे कर रहा है। बाल ठाकरे के निधन पर राष्ट्रपति, पीएम, सोनिया गांधी और दूसरे नेताओं का संवेदना प्रकट किया जाना भारत में ही संभव है। देश में भूख, गरीबी, रोजगार और विकास नेताओं को नहीं दिख रहा है। यहां उन्‍हें राम मंदिर और जाति दिख रही है।

मायावती और भाजपा पर साधा निशाना
मायावती और भाजपा पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि दलितों के वोट बैंक पर मायावती कुंडली मारकर बैठी हैं। यादव कहीं और हिलने वाले नहीं हैं। ऐसे में बीजेपी के पास धर्म की आग भड़काने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है। बीजेपी को भी आड़े हाथों लेते हुए उन्होंने कहा कि उनके पास चुनाव जीतने के लिए अब सिर्फ मुस्लिमों का खून बहाना, पाकिस्तान से युद्ध करना या राम मंदिर का मुद्दा का ही रह गया है। अब यूपी चुनाव सिर पर है, ऐसे में बीजेपी के पास सांप्रदायिकता फैलाने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है। देश की जनता के दिमाग में गोबर भरा है। उसे न तो कुछ दिखाई पड़ता है, न ही उनके पास सोचने समझने की ताकत है।