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साइरस मिस्त्री के साथी की जुबानी- एक मिनट के अंदर उन्हें हटा दिया गया

टाटा संस के पूर्व अध्यक्ष साइरस मिस्त्री के करीबी सहयोगी और टाटा संस ग्रुप के भंग किए गए कार्यकारी परिषद के सदस्य प्रोफेसर निर्मल्य कुमार ने खुलासा किया है कि कैसे एक मिनट के अंदर 103 बिलियन डॉलर वाले ग्रुप के अध्यक्ष को पद से हटा दिया गया। लंदन बिजनेस स्कूल के पूर्व प्रोफेसर कुमार ने अपने ब्लॉग में ‘आई जस्ट गॉट फायर्ड’ शीर्षक से आलेख लिखा है। उसमें उन्होंने लिखा है, “24 अक्टूबर की रात 9 बजे के करीब मुझे मेरे एक सहयोगी, जिसके साथ हमने बहुत नजदीक से काम किया है और कई मौकों पर किसी मुद्दे पर हमलोग एक साथ बहस करते थे, का फोन आया। उसने मुझे बताया-‘यह मेरा अप्रिय कर्तव्य है और मुझे यह बताने के लिए कहा गया है कि अब ग्रुप को आपकी सेवा की जरूरत नहीं है।’ मैंने उससे पूछा-‘इसका मतलब यह कि कल सुबह मैं नहीं दिखूं।’ उसका सकारात्मक जबाव आया। जी हां। यह सब एक मिनट के अंदर हो गया।”
कुमार ने लिखा है, “ऐसा नहीं है कि मुझे मेरे काम में दोष की वजह से निकाला गया (मेरा पिछला मूल्यांकन अति उत्तम था)। मैंने हमेशा बेहतर किया। मुझे सिर्फ इसलिए निकाला गया कि मैं उस पद पर था और साइरस के साथ मिलकर अच्छा और व्यापक पैमाने पर काम कर रहा था।” हालांकि, कुमार कहते हैं कि टाटा संस ने एक बयान में उन्हें 29 अक्टूबर को हटाने की बात कही है।

कुमार ने लिखा है कि 18 साल की उम्र से वो काम कर रहे हैं और पहली बार वो अब बेरोजगार हैं। उन्होंने लिखा है, “30 साल के करियर में मुझे तीन बॉस ने प्रभावित किया है। एक हैं ल्यू स्टर्न जिनके अंडर नॉर्थ वेस्टर्न यूनिवर्सिटी से पीएचडी किया, दूसरे हैं एलबीएस के डीन लॉरा टाइसन और तीसरे आप, धन्यवाद साइरस।”
गौरतलब है कि साइरस मिस्‍त्री को टाटा ग्रुप के चेयरमैन पद से हटाए जाने से पहले पद छोड़ने को कहा गया था लेकिन मिस्‍त्री ने इससे इनकार कर दिया था। बताया जाता है कि बोर्ड मीटिंग से ठीक पहले मिस्‍त्री को पद छोड़ने को कहा गया। मिस्‍त्री के इनकार के बाद जब मीटिंग में उन्‍हें हटाने का प्रस्‍ताव पास किया गया तो साइरस ने इसे अवैध करार दिया। बताया जाता है कि ऐसा कहकर मिस्‍त्री मीटिंग छोड़कर चले गए। बोर्ड मीटिंग में रतन टाटा को चार महीने के लिए अंतरिम चेयरमैन चुना गया था। साथ ही नए चेयरमैन के लिए कमिटी का गठन भी किया गया।

दिवाली के बाद के प्रदूषण से दिल्ली-एनसीआर में करोड़ों लोगों की आंखों में जलन, सांस लेने में भी मुश्किल, सैकड़ों स्कूल बंद

देश की राजधानी दिल्‍ली इन दिनों गहरे धुएं के आगोश में है। दिवाली के बाद से फैले इस स्‍मॉग को लगभग एक सप्‍ताह होने को आया लेकिन अभी तक इसमें कोई कमी देखने को नहीं मिली है।

देश की राजधानी दिल्‍ली इन दिनों गहरे धुएं के आगोश में है। दिवाली के बाद से फैले इस स्‍मॉग को लगभग एक सप्‍ताह होने को आया लेकिन अभी तक इसमें कोई कमी देखने को नहीं मिली है। यह स्‍मॉग इतना जहरीला और गंदा है कि कुछ मिनट के लिए बाहर निकलते ही आंखें जलने लगती हैं और गले में खराश के साथ ही सांस लेने में दिक्‍कत होती है। सरकारी डाटा के अनुसार दिल्‍ली में 17 साल में सबसे खराब स्‍मॉग की स्थिति है। प्रदूषण की स्थिति को गंभीरता से लेते हुए केंद्रीय पर्यावरण मंत्री अनिल दवे ने सोमवार को एनसीआर राज्‍यों के पर्यावरण मंत्रियों की आपात बैठक बुलाई है। इसमें समस्‍या से निपटने के लिए त्‍वरित, शॉर्ट टर्म और लॉन्‍ग टर्म कदम उठाए जाने पर चर्चा होगी।
वहीं दिल्‍ली के उपराज्‍यपाल नजीब जंग ने भी हाईलेवल की बैठक बुलाई है। दिल्‍ली के मुख्‍यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा कि पड़ोसी राज्‍यों में फसलें जलाए जाने के कारण प्रदूषण का स्‍तर बढ़ा है। फसलों को जलाए जाने से उठा धुआं एक जगह ठहर गया है। उन्‍होंने फसलों को जलाए जाने से रोकने के लिए किसानों को इंसेंटिव दिए जाने की मांग की।

दिल्ली की हवा में इस समय पीएम 2.5 यानि छोटे कणों की मात्रा 700 माइक्रोग्राम पर क्‍यूबिक मीटर है। यह आंकड़ा सरकारी नियम से 12 गुना और विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन के नियमों से 70 गुना अधिक है। पीएम 2.5 से फेंफड़ों को सबसे ज्‍यादा नुकसान पहुंचता है। हजारों लोगों ने स्‍मॉग के चलते आंखों में जलन और खांसी की शिकायत की है। दिल्‍ली में 17 हजार से अधिक स्‍कूलों को बंद कर दिया गया है। डॉक्‍टर्स का कहना है कि लोग बाहर निकलने से बचें और घर के अंदर ही रहें।
विज्ञान व पर्यावरण केंद्र (सीएसई) की कार्यकारी निदेशक (शोध) अनुमिता राय चौधरी ने कहा है कि अब हालात ऐसे हैं कि सरकार को तुरंत हालिया व दूरगामी परामर्श जारी करने के साथ त्वरित व स्थाई उपाय करने की दरकार है। हृदय व सांस की दूसरी बीमारियों से पीड़ित लोगों के अलावा बच्चों को बचाने के लिए इमरजेंसी स्तर पर तुरंत उपाय करने की दरकार है। साथ ही सरकार को ऐसा निर्देश भी जारी करना चाहिए कि लोग ज्यादा बाहर न निकलें, घरों में ही रहे। धुएं की जगह पर व्यायाम न करें।
दिवाली के बाद राजधानी में इतना धुआं, धूल व कुहासा छाया रहा कि दिन में भी गाड़ियों की हेडलाइट जलानी पड़ रही है। गुरुवार (4 नवंबर) को हालात थोड़े ठीक हुए थे लेकिन पांच नंवबर को धुएं का असर फिर से बढ़ गया। इस दौरान विजिबिलिटी 100 मीटर के करीब ही रही। दिल्‍ली में स्‍मॉग के लिए डीजल इंजन, कोयले के पॉवर प्लांट और फैक्ट्रियों ने निकलने वाले धुंए से हालात खराब होते जा रहे हैं। इसके अलावा पंजाब और बाकी आसपास के इलाकों में जलने वाली फसल से भी दिल्ली प्रदूषित होती है। वहीं लड़कियों की मदद से खाना बना रहे लोग भी प्रदूषण को बढ़ाने में योगदान दे रहे हैं।

डीएम ने दिया ड्राइवर को रिटायरमेंट गिफ्ट, लाल बत्ती वाली गाड़ी सजवाकर खुद पहुंचाया दफ्तर

ड्राइवर को रिटायरमेंट के दिन डीएम ने यूनिक गिफ्ट दिया।
पहली नजर में यह कार देखकर लग रहा है कि इसे दूल्हे के लिए सजाया गया है। लेकिन यहां माजरा कुछ अलग है। जब आप इस फोटो को और गौर से देखेंगे तो इसकी सच्चाई जानने को और उत्सुक हो जाएंगे। तस्वीर में देख सकते हैं सफेद ड्रेस में ड्राइवर पीछे वाली सीट पर बैठा है और कार को एक सूट-बूट पहने कलेक्टर चला रहे हैं। इतना ही नहीं, बल्कि ड्राइवर के लिए कार का गेट भी खोला जाता है। एनडीटीवी की रिपोर्ट इसके पीछे कहानी कुछ यूं है कि महाराष्ट्र के अकोला के डीएम जी श्रीकांत ने अपने ड्राइवर दिगंबर ठाक को रिटायरमेंट का यूनिक गिफ्ट देने का फैसला किया था। कलेक्टर ने पहले अपनी लाल बत्ती वाली कार को सजवाया। उसके बाद उस कार में पीछे अपने ड्राइवर ठाक को बैठाया और खुद कार ड्राइव करके उन्हें दफ्तर पहुंचाया। इसके बाद दफ्तर में पार्टी आयोजित की गई। 58 साल के दिगंबर ने जिले के 18 कलेक्टरों के लिए कारें चलाई हैं।
ऐसा ही एक और मामला झारखंड के रामगढ़ जिले के रजरप्पा टाउनशिप में देखने को मिला है। यहां पिछले 30 सालों से झाड़ू लगानेवाली सुमित्रा देवी की आज बड़ी चर्चा हो रही है। इसकी वजह है उनका रिटायरमेंट और उस दिन विदाई समारोह में उनके बेटों का शामिल होना। दरअसल, जैसे ही रिटायरमेंट फंक्शन शुरू हुआ, वहां तीन बड़े अफसर पहुंचे। एक अफसर नीली बत्ती लगी गाड़ी में पहुंचे तो दो अफसर अलग-अलग बड़ी-बड़ी गाड़ियों में पहुंचे। उनमें एक थे बिहार के सिवान जिले के कलक्टर महेन्द्र कुमार, दूसरे रेलवे के चीफ इंजीनियर वीरेन्द्र कुमार और तीसरे थे मेडिकल अफसर धीरेन्द्र कुमार। ये तीनों सुमित्रा देवी के बेटे हैं जिन्हें उन्होंने बड़ी मेहनत से न केवल पाला-पोषा बल्कि उन्हें बड़ा अधिकारी बनाया। जब तीनों बेटे वहां पहुंचे तो सुमित्रा देवी की आंखें भर आईं। उन्होंने अपने तीनों बेटों का वहां मौजूद अपने अधिकारियों से परिचय कराया तो सबके सब दंग रह गए। सुमित्रा देवी के दूसरे सहयोगी सफाईकर्मियों को उन पर गर्व महसूस हो रहा था।

हाथ में प्लास्टर था, फिर भी मोर्चे पर चले गए थे मेजर सोमनाथ शर्मा- जानिए देश के पहले परमवीर चक्र विजता की वीरता की कहानी

मेजर सोमनाथ शर्मा महज 24 साल की उम्र में कश्मीर में पाकिस्तानी घुसपैठियों से लड़ते हुए 3 नवंबर 1947 को शहीद हो गए थे।


परम वीर चक्र भारत का सबसे बड़ा सैन्य पुरस्कार है। आजाद भारत के इतिहास में अभी तक केवल 22 लोगों को ये पुरस्कार मिला है। भारत का पहला परमवीर चक्र 1950 में दिया गया। पहला परम वीर चक्र मेजर सोमनाथ शर्मा (21 जनवरी 1923- 3 नवंबर 1947) को मरणोपरांत प्रदान किया गया था। मेजर शर्मा महज 24 साल की उम्र में देश के लिए कश्मीर में पाकिस्तानी घुसपैठियों से लड़ते हुए 3 नवंबर 1947 को शहीद हो गए थे। आजादी के ठीक बाद पाकिस्तानी सैनिकों के निर्देशन में कबायली लश्करों ने कश्मीर में घुसपैठ कर दी थी। हमलावर मोर्टार, लाइट मशीनगन और अन्य आधुनिक हथियारों से लैस थे। मेजर शर्मा बडगाम में एक पोस्ट पर तैनात थे। शहीद होने से पहले मेजर शर्मा ने ब्रिगेड मुख्यालय को भेजे आखिरी संदेश में उन्होंने कहा था, “दुश्मन हमसे केवल 50 गज दूर है। दुश्मन की संख्या हमसे बहुत ज्यादा है। हमारे ऊपर तेज हमला हो रहा है। लेकिन जब तक हमारा एक भी सैनिक जिंदा है और हमारी बंदूक में एक भी गोली है हम एक इंच भी पीछे नहीं हटेंगे।

जब कश्मीर पर पाकिस्तानियों ने हमला किया तो 4 कुमाऊं बटालियन के मेजर सोमनाथ शर्मा के दाहिने हाथ एक हॉकी मैच में फ्रैक्चर हो गया था जिसके कारण उस पर प्लास्टर लगा था। डॉक्टर ने उन्हें आराम करने के लिए कहा था लेकिन वो जिद करके मोर्चे पर गए। मेजर शर्मा और उनके साथ श्रीनगर एयरफील्ड से कुछ किलोमीटर दूर बडगाम में एक पोस्ट पर तैनात थे। हमले के दिन से पहले सेना की तीन कंपनियों ने बडगाम की पैट्रोलिंग की थी। जब वहां दुश्मन की कोई गतिविधि का सूत्र नहीं मिला तो तीनों कंपनियों को वापस भेज दिया गया था। केवल मेजर शर्मा की कंपनी को वहां दोपहर  3 बजे तक रुकने के लिए कहा गया। उन्हें औचक हमला होने की स्थिति में हमलावरों को आगे बढ़ने से रोकना था। मेजर शर्मा की कंपनी में कुल 50 जवान थे। हमलावरों की संख्या भारतीय सेना के अनुमान से बहुत ज्यादा थी। दोपहर के करीब 2.30 बजे 500 से ज्यादा पाकिस्तानी हमलावरों ने बडगाम पोस्ट के तीन तरफ से हमला किया। हमलावरों की भारी संख्या देखकर उन्होंने अपने ऊपर के अधिकारियों को मदद भेजने का संदेश दे दिया। लेकिन मदद आने तक दुश्मनों को रोकना जरूरी था क्योंकि अगर उन्हें रोका न जाता तो हमलावर श्रीनगर एयरफील्ड पर कब्जा कर सकते थे जो शेष भारत से कश्मीर घाटी के हवाई संपर्क का एक मात्र जरिया था।

मेजर शर्मा दुश्मन की गोलियों की बौछार के बीच खुले मैदान में आकर सैनिकों के अलग-अलग पोस्ट पर जाकर सटीक गोलीबारी के लिए निर्देश देते रहे। उन्होंने हवाई हमले के लिए दुश्मन की शिनाख्त करने के लिए गोलियों की बौछार के बीच कपड़े की पट्टी बिछाई। वो आखिर अपने बाएं हाथ से सैनिकों की बंदूकों में मैगजीन लगाते रहे। मेजर शर्मा आगे बढ़कर अपने साथियों का नेतृत्व करते रहे है। उनके पास पड़े हुए गोला-बारूद में एक मोर्टार का गोला आकर गिरा और धमाके के चपेट में मेजर शर्मा भी आ गए। उनकी शहादत से प्रेरित उनके साथी दुश्मनों का मुंहतोड़ जवाब देते रहे थे।

फेसबुक में महिला कॉन्स्टेबल के सात लाख फॉलोवर्स

 

गरीबों की है मददगार ,मानवता की मिसाल

रायपुर : छत्तीसगढ़ पुलिस की महिला कॉन्सटेबल स्मिता टांडी इन दिनों फेसबुक पर छाई हुई हैं। स्मिता जरुरतमंद लोगों तक पहुंचती हैं और फेसबुक के जरिए उनकी मदद करती हैं। फेसबुक पर उनकी पापुलैरिटी किसी सेलिब्रिटी से कम नहीं है। फेसबुक पर उनके 7 लाख के करीब फॉलोवर्स है जो कि उन्होंने 20 महीने के अंदर बनाए हैं। उनसे ज्यादा फॉलोवर्स सिर्फ राज्य के मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह के है। जानकर हैरानी कि इस यंग ऑफिसर ने बिना किसी सपोर्ट के लोगों की मदद करके यह मुकाम हासिल किया है। स्मिता अपनी पोस्ट के जरिए जरुरतमंद की समस्या को फेसबुक पर रखती है और लोगों से मदद की अपील करती हैं। उन्होंने पर्सनल ट्रेजडी का शिकार होने के बाद यह अकाउंट बनाया।


स्मिता बताती है कि जब 2013 में वह पुलिस की ट्रेनिंग ले रही थी, उसी दौरान उनके पिता शिव कुमार टांडी बीमार हो गए और उनके इलाज के लिए पर्याप्त पैसे नहीं थे। वह खुद पुलिस में कॉन्सटेबल थे लेकिन 2007 में दुर्घटना के बाद उन्होंने रिटायरमेंट ले लिया था। एक प्राइवेट अस्पताल में अचानक उनकी मौत हो गई। तब मैंने सोचा कि पैसों की कमी के कारण हजारों लोगों की मौत हो जाती है और मैंने उनकी मदद करने का फैसला किया।
2014 में अपने दोस्तों के साथ मिलकर टांडी ने फेसबुक ग्रुप बनाया, जहां उन्होंने मरीजों की फोटो डालते हुए वित्तीय मदद देने की लोगों से अपील की थी। सिर्फ फेसबुक पेज से ही नहीं स्मिता ने सरकारी योजनाओं के जरिए भी पैसा इकट्ठा किया, जिनके बारे में लोगों को ज्यादा पता नहीं होता है। उन्होंने बताया कि मैंने लोगों की समस्या का पता लगाकर फेसबुक पर लाना शुरू किया। शुरू में लोग मेरी पोस्ट पर रिस्पॉन्ड नहीं भी करते थे लेकिन एक महीने बाद लोगों ने पैसे दान करना शुरू किया। मेरा मानना है कि लोगों को विश्वास हआ कि मैं फर्जी नहीं हूं और उन्होंने मेरा विश्वास किया।

स्मिता ने बताया कि आसपास के इलाके में जब उन्हें पता चलता है कि किसी को मदद की जरुरत होती है तो वह खुद वहां पहुंचती है और सारी जानकारी एकत्र करके और उसकी पुष्टि करती हैं। इसके बाद फेसबुक पर मदद की अपील करते हुए पोस्ट करती हैं। वह अस्पताल का बिल चुकाने में 25 लोगों की मदद कर चुकीं हैं और फेसबुक के जरिए मदद करने के संबंध में उनका कहना है कि उन्हें संख्या तो याद नहीं लेकिन यह सौ तो होगी ही। स्मिता के कामों में बारे में उनके सीनियर अधिकारियों को पता है, इसके चलते उन्हें भिलाई वुमेन हेल्पलाइन के सोशल मीडिया कंप्लेंट सेल में रखा गया है।

(चित्र स्मिता टांडी के फेसबुक वाल से )

स्मिता ने बताया कि आसपास के इलाके में जब उन्हें पता चलता है कि किसी को मदद की जरुरत होती है तो वह खुद वहां पहुंचती है और सारी जानकारी एकत्र करके और उसकी पुष्टि करती हैं। इसके बाद फेसबुक पर मदद की अपील करते हुए पोस्ट करती हैं। वह अस्पताल का बिल चुकाने में 25 लोगों की मदद कर चुकीं हैं और फेसबुक के जरिए मदद करने के संबंध में उनका कहना है कि उन्हें संख्या तो याद नहीं लेकिन यह सौ तो होगी ही। स्मिता के कामों में बारे में उनके सीनियर अधिकारियों को पता है, इसके चलते उन्हें भिलाई वुमेन हेल्पलाइन के सोशल मीडिया कंप्लेंट सेल में रखा गया है।

टाइम्‍स नाउ का 60 फीसदी संसाधन अपने एक शो के लिए इस्‍तेमाल करते थे अरनब गोस्‍वामी, इसी से आता था 20% रेवन्‍यू

2012 में ही, अरनब को सालाना दो करोड़ रुपए बतौर वेतन मिलता था। चैनल में बिना उनकी इजाजत के पत्‍ता तक नहीं हिलता था।


वरिष्‍ठ टीवी पत्रकार अरनब गोस्‍वामी ने मंगलवार को टाइम्‍स नाउ के एड‍िटर-इन-चीफ पद से इस्‍तीफा दे दिया था। वजह साफ नहीं हुई मगर कहा जा रहा है कि वे अपना कुछ करने की तैयारी में हैं। टाइम्‍स नाउ में आखिरी बैठक में अपने सहयोगियों से उन्‍होंने इस बात का जिक्र किया कि किस तरह उन्‍होंने चैनल को बुलंदियों तक पहुंचाया। टाइम्‍स नाउ ने 2007 में जब प्रतिद्वंदियों को पीछे छोड़कर साप्‍ताहिक रेटिंग्‍स में नंबर वन पोजिशन हासिल की, तो अरनब गोस्‍वामी ने केक काटकर सेलि‍ब्रेट किया था। तब उन्‍होंने कहा था, मुझे रेटिंग्‍स की परवाह नहीं, लेकिन हम नंबर वन हैं।” लेकिन अंदरखाने ‘मीठी छुरी’ कहे जाने वाले अरनब को रेटिंग्‍स की इतनी परवाह थी कि उन्‍होंने खबरों के प्रोडक्‍शन की हर विधा पर अपना नियंत्रण किया। उन्‍होंने फ्लैशिंग पैनल्‍स, ऑन-स्‍क्रीन फॉन्‍ट्स में मनमुताबिक बदलाव किए। यहां तक कि कैमरामैन को भी बताया जाता था कि उसे किस एंगल से शूट करना है। टाइम्‍स नाउ का एडिटर-इन-चीफ बनने से पहले अरनब एनडीटीवी में थे। टाइम्‍स नाउ में आने के बाद गोस्‍वामी ने खुलकर पुराने संस्‍थान को ‘सफेद हाथी’ बताया। टाइम्‍स नाउ के लाइव होने से एक महीने पहले जब, राजदीप सरदेसाई ने सीएनएन-आईबीएन शुरू किया तो गोस्‍वामी और उनकी टीम नर्वस थी। महज 33 साल की उम्र में संपादक बने अरनब ने दिन में सामान्‍य और व्‍यापार की खबरें चलवाईं, रात में हल्‍के-फुल्‍के कार्यक्रम। यह प्रयोग अनूठा था, मगर दर्शक नहीं मिले। अरनब के साथ काम करने वाले एक पूर्व कर्मचारी ने बताया, ”किसी ने चैनल नहीं देखा। वह (अरनब) अपने शो पर दर्शक नहीं ला पाए। कोई उनसे बात नहीं करना चाहता था। उनके बड़े राजनेताओं से कोई संंबंध नहीं थे, न ही रिपोर्टर्स के। किसी ने हमें इंटरव्‍यू नहीं दिया।”


मगर, इसके बाद के सालों में गोस्‍वामी का प्राइम टाइम डिबेट शो ‘द न्‍यूजऑवर’ टाइम्‍स नाउ का सबसे ज्‍यादा देखा जाना वाला कार्यक्रम बना। करीब 60 से 120 मिनट के अरनब के कार्यक्रम को 2012 में बाकी सभी से ज्‍यादा दर्शक मिलने लगे। इसके विज्ञापन के रेट भी उस स्‍लॉट के लिए सबसे ज्‍यादा थे। अरनब का शो चैनल के लिए इतना जरूरी था कि एक वरिष्ठ प्रबंधक के मुताबिक, ‘चैनल के संपादकीय संसाधनों का 60 फीसदी द न्‍यूजऑवर के लिए इस्‍तेमाल किया जाता था।’ चैनल के राजस्‍व में अरनब के शो का योगदान कुल राजस्‍व का पांचवांं हिस्‍सा था। गाेस्‍वामी ने अपने स्‍टाफ को यह बताने में कसर नहीं छोड़ी कि उनका वेतन उनके शो से आता है। चैनल के तत्‍कालीन वरिष्‍ठ मैनेजर के अनुसार, विज्ञापन राजस्‍व से करीब 34 करेाड़ रुपए का वेतन दिया जाता था, जिसमें गोस्‍वामी का अपना 2 करोड़ रुपए सालाना वेतन शामिल होता था।

एक बार न्‍यूजऑवर के लिए दस सेकेंड का स्‍पॉट खाली था। इसलिए तत्‍कालीन संपादक महरुख इनयात ने अन्‍ना हजारे की भूख-हड़ताल की खबर चला दी। लेकिन कार्यक्रम खत्‍म होने के बाद अरनब को चेहरा गुस्‍से से लाल हो गया। वहां मौजूद दो वरिष्‍ठ संपादकों के अनुसार, अरनब ने इनायत को लताड़ लगाते हुए कहा, ”अन्‍ना हजारे चलाने की तुम्‍हारी हिम्‍मत कैसे हुई? कौन जानता है अन्‍ना हजारे को? यह देश अन्‍ना हजारे को नहीं जानता। तुमने उन्‍हें कवरेज क्‍यों दी?” लेकिन कुछ महीनों बाद ही अरनब का मन बदल गया। उन्‍होंने रविवार को अन्‍ना पर एक मिनट का सेगमेंट तैयार करने को कहा। बैठक में अरनब ने इसका कारण बताते हुए कहा, ”आपको पता है कि मुझे अन्‍ना हजारे पसंद नहीं। लेकिन जिस मुद्दे पर वह बात कर रहे हैं, वह अहम है। भ्रष्‍टाचार हर भारतीय से जुड़ा हुआ है, हम सभी इससे प्रभावित है। इसलिए हम अन्‍ना हजारे से एक अभियान बनाएंगे। मैं आज न्‍यूजऑवर पर बहस करूंगा, कल 12 से 1 के बीच हमारे सारे रिपोर्टर जंतर-मंतर पर होंगे। इस दौरान और कोई स्‍टोरी नहीं चलाई जाएगी।”

गोस्‍वामी चैनल की पहचान बनते जा रहे थे। अरनब ने डेस्‍क को अपने मुताबिक ढाला और रिपोर्टर्स से वही करवाया जो मुंबई डेस्‍क उनसे करने को कहती थी। जब कारवां मैगजीन ने अरनब का इंटरव्‍यू लेने के लिए उन्‍हें फोन किया तो उन्‍होंने यह कहते हुए मना कर दिया कि उन्‍हें खबर की रिपोर्ट‍िंग में दिलचस्‍पी है, खबर बनने में नहीं। बाद में चैनल के दो कर्मचारियों ने मुंबई और दिल्‍ली के स्‍टाफ को अपने इंटरव्‍यू से जुड़ी किसी भी तरह की रिक्‍वेस्‍ट लेने से साफ मना कर दिया था।
इस लेख का कुछ अंश कारवां मैगजीन के दिसंबर 2012 अंक में प्रकाशित रिपोर्ताज से लिया गया है।

सांसदों का वेतन जल्द हो जाएगा दोगुना, जानें कितना होगा मूल वेतन

 

केंद्र की मोदी सरकार के सांसदों के मूल वेतन में 100 फीसदी वृद्धि करने के फैसले के बाद सांसदों को जल्द ही खुशखबरी मिल सकती है। उनका मूल वेतन 50 हजार से बढ़कर जल्द ही 1 लाख रुपए हो सकता है।

मीडिया में चल रही खबरों के अनुसार, पीएमओ भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ की समिति की सिफारिशों को लागू करने के लिए सहमत हो गया है। पीएमओ न केवल सांसदों के मूल वेतन में बढ़ोत्तरी करने के पक्ष में है बल्कि वह सांसदों के भत्तों को बढ़ाने के लिए भी सहमत है।

सरकार राष्ट्रपति का वर्तमान वेतन डेढ लाख रुपए से बढ़ाकर 5 लाख रुपए और राज्यपालों का वेतन एक लाख 10 हजार से बढ़ाकर ढाई लाख रुपए करने पर भी राजी हो गई है।

कैबिनेट सचिव से कम है राष्ट्रपति की सैलरी, अब होगी 5 लाख रुपए महीना

गौरतलब है कि भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता वाली समिति ने सांसदों का वेतन 50 हजार से बढ़ाकर एक लाख और संसदीय क्षेत्र से संबंधित भत्ता 45 हजार से बढ़ाकर 90 हजार करने की सिफारिश की थी। सांसद का एक लाख रुपए वेतन होता है तो सरकार को प्रतिवर्ष इसके लिए 250 करोड़ देने होंगे।

पीएम मोदी के वेतन-भत्ते अन्य राष्ट्राध्यक्षों से काफी कम

उस सिफारिश में फर्नीचर के लिए भत्ता डेढ़ लाख रुपए करने की सलाह दी गई है। इसके अलावा सभी सांसदों को 1700 रुपए प्रति माह बीएसएनएल का ब्रॉडबैंड कनेक्शन देने की बात कही गई है।

समिति ने पेंशन में 75 फीसदी की वृद्धि करने की सिफारिश की थी। बता दें कि 6 साल पहले सांसदों का वेतन-भत्ता बढ़ा था।

नरेंद्र मोदी ने बाजार से चीनी सामान को बाहर रखने के लिए अपनाया नया तरीका

भारत अब चीन को उसके सामान पर ड्यूटी फीस में छूट देने में देरी और कटौती कर सकता है। ऐसा चीन के साथ व्‍यापार में कमी के चलते किया जा सकता है।

चीनी सामान की भारत में बिक्री को रोकने के लिए केंद्र सरकार ने नया तरीका अपनाया है। भारत अब चीन को उसके सामान पर ड्यूटी फीस में छूट देने में देरी और कटौती कर सकता है। ऐसा चीन के साथ व्‍यापार में कमी के चलते किया जा सकता है। हालांकि अभी तक ऐसा तय नहीं किया गया है कि कौनसे सामान पर छूट कम की जाएगी। लेकिन बताया जाता है कि एक नेगेटिव लिस्‍ट बनाई जाएगी और इसमें शामिल वस्‍तुओं पर सीमित या ना के बराबर छूट दी जाएगी। वाणिज्‍य मंत्री निर्मला सीतारमण फिलीपींस में तीन-चार नवंबर को रीजनल कॉम्प्रिहेंसिव इकॉनॉमिक पार्टनरशिप(आरसीईपी) की मंत्री लेवल की बैठक में इस पर बातचीत कर सकती हैं। वाणिज्‍य विभाग के एक अधिकारी के अनुसार चीन का व्‍यापार दायरा काफी बड़ा है। जापान भी इससे चिंतित है। जहां तक भारत की बात है तो सभी जानते हैं कि चीन सबसे बड़ी समस्‍या हैं।

सरकार का यह नया कदम चीन के साथ बढ़ते व्‍यापार दायरे को पाटने के लिए उठाया गया है। साल 2015-16 में भारत ने चीन में 9 बिलियन डॉलर का निर्यात किया था। जबकि उसका चीन से आयात 61.7 बिलियन डॉलर का था। इस तरह से भारत के निर्यात और आयात का अंतर 52.7 बिलियन डॉल रहा। अधिकारियों के अनुसार कुछ सामानों की नेगेटिव लिस्‍ट बनाई जाएगी। अभी इस पर फैसला नहीं हुआ है लेकिन विचार चल रहा है। भारत में ड्यूटी रेट की तीन स्‍तरीय ढांचा है और सरकार इसे दुरुस्‍त करना चाहती है। लेकिन चीन के साथ व्‍यापार के दायरे को पाटने के लिए उसके पास यही उम्‍मीद की किरण है।

रीजनल कॉम्प्रिहेंसिव इकॉनॉमिक पार्टनरशिप के तहत 16 देशों के बीच निवेश, व्‍यापार, तकनीकी सहयोग और विवादों के निपटारे को लेकर समझौता है। इसमें दक्षिण पश्चिम एशिया के 10 देशों के अलावा ऑस्‍ट्रेलिया, चीन, भारत, जापान, कोरिया और न्‍यूजीलैंड भी शामिल हैं।

मुठभेड़िये खून पीते हैं, न्याय का खून

भोपाल में हुई मुठभेड़ पर सिर्फ शर्म आनी चाहिए. उसे जायज ठहराना अपने हाथ-पांव काट लेना है क्योंकि मुठभेड़िये खून पीते हैं, न्याय का खून.

2009 में ह्यूमन राइट्स वॉच की एक रिपोर्ट आई थी. उसमें एक सब इंस्पेक्टर का बयान है. कहता है, "(एसपी) साहब लोग तो (फख्र से) बोलते हैं कि मेरे इलाके में इतने एनकाउंटर हुए. हमें तो हुक्म मानना होता है." यही होता है. भारत में मुठभेड़ करने वाला पुलिसवाला हीरो होता है. वह छाती ठोक कर बताता है, अब तक 56. और मुठभेड़ कराने वाला महाहीरो. नेता लोग पुलिस अफसरों को और अफसर लोग मातहतों को आगे बढ़ाकर नायक और महानायक बनते हैं. लेकिन, क्या भारत में कोई पुलिस पर भरोसा करता है? चाय की दुकान से लेकर सजे धजे ड्रॉइंग रूम्स तक में होने वाली आम चर्चाओं में पुलिस की छवि कैसी दिखती है? क्या वे वर्दी वाले गुंडों से ज्यादा कुछ हैं?


इन सवालों के जवाब नहीं में होने के बावजूद भोपाल जैसी मुठभेड़ों का बचाव किया जाता है. सोशल मीडिया पर आप देख सकते हैं कि एक विशाल जनसमूह 'आतंकवादियों को मारा ही जाना चाहिए' जैसे तर्क के साथ इन मुठभेड़ों का समर्थन कर रहा है. और यही तर्क सारी समस्याओं की जड़ है. एक लोकतंत्र की जनता को यह छोटी सी बात समझ नहीं आ रही है कि आतंकवादी को भी मुठभेड़ में मारना गलत है क्योंकि पुलिस का काम सजा देना नहीं है. उसका काम है अपराधियों के खिलाफ सबूत जमा करके अदालत के सामने रखना. फिर अदालत तय करेगी कि इस व्यक्ति का अपराध कितना है और सजा कितनी होगी.

और भोपाल के मामले में तो यह तर्क भी कहीं नहीं ठहरता. वे आठ युवक तो किसी पैमाने पर अपराधी या आतंकवादी नहीं थे. तीन साल से ये लड़के जेल में थे. अब तक उनका दोष साबित नहीं हुआ था और पुलिस ने उन्हें मार दिया. लोकतंत्र की जनता को एक पल दिल पर हाथ रखकर सोचना चाहिए कि अगर उनमें से एक भी मासूम था. एक भी निर्दोष था. तो उसकी मौत को कैसे जायज ठहराया जाएगा?
न्याय का पहला सिद्धांत है, सौ अपराधी छूट जाएं लेकिन एक मासूम को सजा नहीं होनी चाहिए. लेकिन यहां तो ना मुकदमा, ना सुनवाई, सीधे सजा. और सजा देने का अधिकार कुछ वर्दीधारियों को. यह न्यायतंत्र तो नहीं है. यह पुलिस राज है. और पुलिसराज में सिर्फ अन्याय होता है. सबके साथ. क्योंकि पुलिस राज में वर्दीवालों के अलावा सब अपराधी माने जाते हैं. गुलाम माने जाते हैं. ऐसे राज में मुठभेड़िये खून पीते हैं. न्याय का खून.

मृत्‍यु संबंधी पीएफ दावा सात दिन में निपटाने का निर्देश, रिटायरमेंट लेने वालों को भी मिलेगी राहत

कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) ने मृत्यु संबंधी निपटारे के दावों को सात दिन के अंतर निपटाने के दिशानिर्देश जारी किए हैं।

कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) ने मृत्यु संबंधी निपटारे के दावों को सात दिन के अंतर निपटाने के दिशानिर्देश जारी किए हैं। इसी तरह सेवानिवृत्त होने वाले कर्मचारियों का हिसाब-किताब सेवा पूरी होने से पहले ही तय करने को कहा गया है। ईपीएफओ ने मंगलवार को इसे संबंध में अपने अधिकारियों को निर्देश जारी कर दिए। श्रम मंत्रालय ने कहा कि श्रम मंत्री बंगारू दत्तात्रेय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 26 अक्टूबर को हुई बैठक में दिए गए दिशानिर्देशों पर की गई कार्रवाई की  समीक्षा की। इसमें केंद्रीय भविष्य निधि कोष आयुक्त (सीपीएफसी) ने मंत्री को बताया कि प्रधानमंत्री के निर्देश पर ईपीएफओ ने सेवानिवृत्ति और मृत्यु संबंधी दावों के निपटान के बारे में विस्तृत दिशानिर्देश जारी कर दिए हैं। बता दें कि बीमा कवर 3.6 लाख रुपए तक था जिसे अब बढ़ाकर 6 लाख रुपए कर दिया गया है। इस नियम के मुताबिक सदस्य की मृत्यु हो जाने पर उसके परिवार को 6 लाख रुपए मिलेंगे। जीवन बीमा कवर के लिए कर्मचारी को एक साल तक नौकरी करने की अनिवार्यता से मुक्त कर दिया गया है।

मंत्रालय की ओर से कहा गया, ”ये दिशा निर्देश फील्‍ड ऑफिसर्स को भेज दिए गए हैं।” साथ ही सोशल मीडिया के जरिए मिलने वाली शिकायतों पर भी फुरती से काम करने को कहा गया है। ईपीएफओ ने कॉमन सर्विस सेंटर्स केसाथ एक एमओयू किया है। इसके जरिए अधार कार्ड रखने वाले 50 लाख ईपीएफ पेंशनर्स को जीवन प्रमाण पत्र दिए जाएंगे। इससे पहले ईपीएफओ ने पीएफ अकाउंट में पैसे ट्रांसफर करने के नियमों में भी बदलाव किया था। कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) ने पीएफ डिपॉजिट ट्रांसफर के लिए नियमों में कुछ बदलाव किया है।
ईपीएफओ की रिटायरमेंट फंड बॉडी ने पुराने डेक्लरेशन फॉर्म की जगह नया डेक्लरेशन फॉर्म (new Form No 11) जारी किया है। नए जगह नौकरी ज्वाइन करते वक्त इस फॉर्म में व्यक्ति को अपने पूर्ववर्ती संस्थान के बारे में सारी डिटेल्स देनी होगी। इसके आलावा ईपीएफओ ने फॉर्म 13 (एक संस्थान से दूसरे संस्थान में पीएफ के पैसे ट्रांसफर करने संबंधित) में भी बदलाव किया है। इस फॉर्म में पहले यूएएन के जरिए प्रॉविडेंट फंड ट्रांसफर किया जाता था। इसके अतिरिक्त कर्मचारी भविष्य निधि संगठन ने कर्मचारियों की पेंशन स्कीम को बेहतर बनाने और ज्यादा लाभ देने के लिए पीएफ नियमों में बदलाव किए हैं। ऑनलाइन सर्विस, बीमा कवर बढ़ाना, एक साल नौकरी की अनिवार्यता खत्म, मिलता रहेगा ब्याज, न्यूनतम वेतनमान की सीमा बढ़ी व भाग-दौड़ से मिलेगी छुट्टी जैसे बदलाव किए गए हैं।

22 साल पहले स्वीडिश कपल ने लिया था गोद, तब से ढूंढ़ रही थी अपने मां-बाप, अब हुआ सपना पूरा

ज्योति और उसकी छोटी बहन गायत्री को एक स्वीडिश परिवार ने 1994 में बेंगलुरु के एक अनाथालय से गोद लिया था।

स्वीडिश गांव में पली-बढ़ी ज्योति स्वान का सपना एक अनजाने इंसान के घोड़े पर सवारी की तरह था जिसे उसने कई बार देखा। आखिरकार 22 साल के बाद 24 अक्टूबर को उसका यह सपना सच हुआ जब ज्योति अपने बायोलॉजिकल पिता दशरथ से मिली, जोकि बेंगलुरु शहर निगम में एक स्वास्थ्य कर्मचारी के तौर पर कार्यरत हैं। ज्योति, जोकि अपने माता-पिता की तलाश में दूसरी बार भारत दौरे पर आई थी, ने कहा उसने अपने पिता दशरथ को देखते ही तुरंत पहचान लिया। 27 वर्षीय ज्योति के चेहरे पर मुस्कार बिखरी थी, हो भी क्यों न, करीब 20 सालों के दर्द का अंत जो हुआ था। ज्योति और उसकी छोटी बहन गायत्री को एक स्वीडिश परिवार ने 1994 में बेंगलुरु के एक अनाथालय से गोद लिया था, जब वे (ज्योति-गायत्री) क्रमशः 5 और 4 साल के थे। ज्योति उस पल को याद करते हुए ग़मगीन हो जाती है जब उन दोनों को एक महिला ने अनाथालय में छोड़ दिया था। ज्योति की धुंधली यादों में शायद वह महिला उसकी मां थी। स्वीडन के अपने गांव में ज्योति कहती है, ‘यहां वह और गायत्री ही सिर्फ सांवले बच्चे हैं। उन्हें इस बात की जानकारी थी वे अलग हैं और वे हमेशा खुद को दूसरों से अलग ही महसूस करते थे।’ ज्योति कहती है कि उसके इसी अहसास ने उसे इस बात के लिए प्रेरित किया वह अपना वास्तविक वजूद ढूंढे।

2013 में, पहली बार ज्योति और उसकी छोटी बहन गायत्री अपने स्वीडिश माता-पिता के साथ बेंगलुरु के आश्रय अनाथालय पहुंचे जहां से उन्हें गोद लिया गया था। काफी निवेदन के बाद अनाथालय ने उनके (ज्योति और गायत्री) बायोलॉजिकल मां का नाम कमला बाई बताया और कहा उसने रिकॉर्ड कराया था कि वह सिंगल मदर है। ज्योति जो कि एक लेखक भी है, ने कहा, ‘अनाथालय ने मुझे यह भी बताया कि 1996 में हमारी मां दोबारा हमें देखने के लिए आई थी। आश्रय (अनाथालय) ने इसके अलावा हमारी कोई मदद नहीं की।’ 2016 में अक्टूबर महीने के तीसरे सप्ताह में, उसने (ज्योति ने) पुणे के बाल अधिकार ग़ैर-सरकारी संस्था (एनजीओ) सखी और इसके संस्थापक अंजलि पवार से संपर्क किया। जल्द ही वह (अंजलि पवार) अपने फिल्म क्रू के साथ बेंगलुरु पहुंची ताकि वह ज्योति की इस खोज को एक दस्तावेज (डॉक्यूमेंट) के तौर पर ढाल सके।

अपने माता-पिता को खोजने के पक्के इरादे को देखते हुए इस बार अनाथालय ने ज्योति को गोद लेने से जुड़े सारे दस्तावेज (पेपर) मुहैया कराए। पेपर के मुताबिक कमला बाई का एक पति था जिसका नाम रिकॉर्ड में दशरथ दर्ज है और वह (कमला बाई) बेंगलुरु शहर के बाहरी इलाके की रहने वाली थी। अनाथालय द्वारा मुहैया कराए गए फाइल के मुताबिक कमला बाई ने जिस वक्त ज्योति और गायत्री को अनाथालय में छोड़ा, वह बेंगलुरु के चमरजपेट में रहती थी। ज्योति ने आगे कहा, ‘स्थानीय लोगों ने कहा कि वह (कमला बाई) मर गई होगी। उनलोगों ने कहा, कोई दशरथ नहीं है। इसने मुझे अहसास कराया कि मैं एक प्रेतात्मा का पीछा कर रही थी।’ अंजलि पवार ने सुझाया कि वे लोग मारुलुकट्टे गांव जाए। जल्द ही वहीं की एक औरत उन्हें (ज्योति-गायत्री) बताया कि उनकी एक स्कूल की दोस्त थी कमला बाई, जिसके पिता की मौत अस्थमा की वजह से हुई थी। ज्योति को इसी घटनाक्रम से जुड़ा हुआ कुछ याद आया। गांववालों ने उन्हें (ज्योति-गायत्री) दूसरे जगह जाने की सलाह दी, जहां वे अपने माता-पिता को ढूंढने की कोशिश कर सकते थे। 23 अक्टूबर की रात, ज्योति मारुलुकट्टे गांव के नजदीक सुसिवेगुंटे पहुंची। ‘यहां हमें हमारे पिता का बड़ा बेटा मिला। हमारे बिना कुछ कहे ही उसने कहा कि कमला बाई और दशरथ की दो बेटियां थीं, ज्योति और गायत्री।’ अंकल ने दशरथ को बेंगलुरु बुलाया और उसने ज्योति को उसके अगले दिन आने को कहा। 24 अक्टूबर को ज्योति बेंगलुरु में कुमारस्वामी लेआउट के फर्स्ट फ्लोर पर अपने माता-पिता के खोज की यात्रा के आखिरी कदम पर थी। एक-दूसरे से मुलाकात के दौरान ज्योति और उसके पिता दशरथ टूट गए। दशरथ ने ज्योति से कहा कि कमला बाई ने उसके (ज्योति) और गायत्री के साथ घर छोड़ दिया था जिसके बाद वह कभी नहीं लौटी।

ज्योति की मुलाकात मारुति से भी हुई, जिसके बारे वह नहीं जानती थी, जो दशरथ के साथ रहता था। दशरथ को दूसरी पत्नी से एक और बेटी भी थी। ज्योति और दशरथ के बीच रिश्तों की सत्यता जांचने के लिए उनका डीएनए सैंपल ले लिया गया है। लेकिन ज्योति को इस बात में ज़रा भी संदेह नहीं है कि दशरथ ही उनके पिता हैं। ‘जिस तरह से वह बात कर रही है उसके चहरे से यह साफ ज़ाहिर भी होता है।’ अंजलि पवार ने कहा, ‘जब उसके बच्चे बहुत छोटे थे तो दशरथ प्लाइड (एक तरह का वाहन) टोंगा का इस्तेमाल कर उन्हें (ज्योति और गायत्री) घुमाने के लिए ले जाया करता था। यही यादें संभवतः ज्योति के सपने में आते रहे होंगे।’  ज्योति को विश्वास है कि अपने पिता दशरथ को पाने के बाद उसे शांति भी मिल जाएगी। भेदभाव को झेलने पर उसने (ज्योति ने) कहा, विदेशों में गोद लिया जाना बच्चों के लिए हमेशा आसान नहीं होता। स्वीडिश माता-पिता ने कहा, हमने अपने बच्चों को सबकुछ दिया, उसने (ज्योति ने) कहा, ‘वे भूल गए थे कि एक देश जहां से हम हैं वहां हमारा एक परिवार है। आप उसे मिटा नहीं सकते।’ मारुति जिसकी एक बेटी है ने, ज्योति से कहा कि लगभग 10 सालों तक वह कमला बाई से संपर्क में थी और बाद में लोगों ने बताया कि वह मर गई। पवार ने बताया, ‘फिर भी ज्योति को इस बात पर यकीन नहीं है। हम लोग अभी भी कमला बाई को ढूंढ़ रहे है। मैं तब तक विश्वास नहीं करूंगी, जब तक डेथ सर्टिफिकेट ना देख लूं।

वाघा बॉर्डर पर भी PAK के खिलाफ गुस्सा, BSF का ऐलान- पाकिस्तानी फौज को नहीं बांटेंगे दिवाली की मिठाई

इस दीवाली बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स (बीएसफ) के जवान वाघा बॉर्डर पर पाकिस्तान के सिपाहियों के साथ मिठाई का आदान-प्रदान नहीं करेंगे।

इस दीवाली बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स (बीएसफ) के जवान वाघा बॉर्डर पर पाकिस्तान के सिपाहियों के साथ मिठाई का आदान-प्रदान नहीं करेंगे। हर बार ऐसा किया जाता था। लेकिन इस बार पाकिस्तान की तरफ से लगातार हो रही सीजफायर और आतंकवादियों को दी जा रही सिक्योरिटी की वजह से भारतीय सेना ने ऐसा करने का फैसला किया है।
गौरतलब है कि उरी हमले के बाद से भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़ गया है। उसमें पाकिस्तान से आए आतंकियों ने भारत के 20 जवानों की जान ले ली थी। उसका बदला लेने के लिए भारतीय सेना ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में घुसकर सर्जिकल स्ट्राइक किया था। उसमें सेना ने कई आतंकी कैंप्स को तबाह किया था। जिससे पाकिस्तान तिलमिलाया हुआ है। तब से पाकिस्तान की तरफ से बार-बार सीजफायर का उल्लंघन हो रहा है। भारतीय सेना भी पाकिस्तानी हमले का मुंहतोड़ जवाब दे रही है।

सिक्किम के बाद हिमाचल प्रदेश बना ‘खुले में शौच की प्रथा’ से मुक्त होने वाला दूसरा राज्य

हिमाचल प्रदेश शुक्रवार (28 अक्टूबर) को खुले में शौच से मुक्त (ओडीएफ) राज्य बन गया जो सिक्किम के बाद इस उपलब्धि को हासिल करने वाला दूसरा प्रदेश है.

हिमाचल प्रदेश शुक्रवार (28 अक्टूबर) को खुले में शौच से मुक्त (ओडीएफ) राज्य बन गया जो सिक्किम के बाद इस उपलब्धि को हासिल करने वाला दूसरा प्रदेश है। एक आधिकारिक बयान के अनुसार हिमाचल प्रदेश ने राज्य में शत प्रतिशत (100%) ग्रामीण स्वच्छता कवरेज के लक्ष्य को प्राप्त कर लिया है जहां राज्य के सभी 12 जिले ओडीएफ घोषित किये गये हैं। मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने यहां एक सार्वजनिक समारोह में यह घोषणा की जहां केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे पी नड्डा और ग्रामीण विकास मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर मौजूद थे। मुख्यमंत्री ने कहा, ‘‘पर्वतीय राज्य हिमाचल पूरी तरह ओडीएफ बनने वाला पहला बड़ा राज्य हो गया है।’’ उन्होंने ‘स्वच्छ भारत मिशन’ के लक्ष्य को हासिल करने के प्रयासों में सहयोग के लिए राज्य की जनता को बधाई दी।

इससे पहले सिक्किम को देश का स्वच्छतम राज्य पाया गया था। इसके सभी चार जिलों को सेनीटेशन एवं साफ सफाई में शीर्ष 10 जिलों में रखा गया है। पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय द्वारा जारी स्वच्छ सर्वेक्षण ग्रामीण 2016 रिपोर्ट के अनुसार सिक्किम को 100 में से 98.2 फीसद अंक मिले थे। यह रैकिंग स्वच्छ शौचालयों वाले घरों के प्रतिशत के आधार पर निकाली गई थी। कुछ दिन पहले आई एक रिपोर्ट में भारत में महिलाओं के कार्य करने की स्थिति के लिहाज से पूर्वोत्तर के छोटे से राज्य सिक्किम को पहला स्थान मिला था। वहीं राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली सबसे निचले पायदान पर थी। वह रिपोर्ट अमेरिका के प्रमुख शोध संस्थान सेंटर फॉर स्ट्रेटजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज (सीएसआईएस) तथा नाथन एसोसिएट्स ने संयुक्त रूप से तैयार की थी। रिपोर्ट में सिक्किम को सर्वाधिक 40 अंक जबकि दिल्ली को केवल 8.5 अंक मिले हैं जो राष्ट्रीय राजधानी की स्थिति को बयां करता है।

सर्जिकल स्‍ट्राइक के बाद से शहीद हुए हमारे 7 जवान, 40 से ज्‍यादा बार टूटा संघर्षविराम

पाकिस्‍तान की तरफ से अब तक 40 से ज्‍यादा बार सीजफायर का उल्‍लंघन किया गया है।


भारत-पाकिस्‍तान के बीच सीमा पर करीब डेढ़ महीने से तनाव है। 18 सितंबर को जब जम्‍मू-कश्‍मीर के उरी स्थित आर्मी कैंप पर आतंकियों ने हमला किया, तो भारत स्‍तब्‍ध रह गया। हमले में 18 जवान मौके पर दो जवान इलाज के दौरान शहीद हुए। इसके बाद दबाव बढ़ने पर भारतीय सेना ने 28-29 सितंबर की रात को पाकिस्‍तान अधिकृत कश्‍मीर में आतंकी संगठनों के लॉन्‍च पैड्स पर सर्जिकल स्‍ट्राइक को अंजाम दिया। डायरेक्‍टर जनरल आफ मिलिट्री ऑपरेशंस ने 29 सितंबर को प्रेस कॉन्‍फ्रेंस में सर्जिकल स्‍ट्राइक का ख्‍ुालासा किया। हालांकि उन्‍होंने यह नहीं बताया कि सेना की इस कार्रवाई में कितने आतंकी या पाकिस्‍तानी जवान मारे गए। मीडिया रिपोर्ट्स में 38-40 आतंकियों के मारे जाने की चर्चा रही। बीबीसी ने एक पाकिस्‍तानी फौजी के हवाले से दावा किया कि भारत के हमले में पाकिस्‍तानी सेना का एक जवान मारा गया था। हालांकि पाकिस्‍तान ने आधिकारिक रूप से यह बात नहीं मानी है। मगर सर्जिकल स्‍ट्राइक्‍स के बाद से सीमा पार से पाकिस्‍तानी फौजें लगातार संघर्षविराम का उल्‍लंघन करती रही हैं। तब से 40 से ज्‍यादा बार पाकिस्‍तान की तरफ से फायरिंग की गई है, जिसमें सात भारतीय जवान शहीद हुए। इन फायरिंग्‍स में करीब डेढ़ दर्जन नागरिक भी घायल हुए हैं। भारत ने संघर्षविराम के उल्‍लंघन को लेकर पाकिस्‍तानी उच्‍चायुक्‍त अब्‍दुल बासित को गुरुवार को तलब किया और स्‍पष्‍ट शब्‍दों में सीमापार से ऐसी हरकतें रोकने को कहा है।

पांच दिन में पांच जवान शहीद: 
27 अक्‍टूबर: गुरुवार सुबह कश्‍मीर के आएस पुरा और अ‍रनिया सेक्‍टर में पाकिस्तान की ओर से संघर्षविराम उल्‍लंघन में बीएसएफ का एक कांस्‍टेबल शहीद हो गया। उसकी पहचान बिहार के जीतेंद्र कुमार के रूप में हुई है। इस हमले में कम से कम 6 नागरिक भी घायल हुए हैं। गुरुवार शाम को आतंकियों को भारतीय सीमा में घुसपैठ करने से रोकते हुए भी भारतीय सेना का एक जवान शहीद हो गया।
25 अक्‍टूबर: आरएस पुरा से लेकर अखनूर सेक्‍टर तक पाकिस्‍तान की गोलीबारी में बीएसएफ का एक हेड कांस्‍टेबल शहीद हुआ। हमले में 6 साल का एक बच्‍चा भी मारा गया। दो बीएसएफ जवानों और आधा दर्जन से ज्‍यादा महिलाएं-बच्‍चे घायल हो गए।
24 अक्‍टूबर: आरएसपुरा सेक्‍टर में पाकिस्‍तान की ओर से गोलीबारी में एक बीएसएफ शहीद हुआ, जबकि एक घायल हुआ।
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23 अक्‍टूबर: शनिवार (22 अक्‍टूबर) की गोलीबारी में घायल हुए बीएसएफ जवान गुरुनाम सिंह शहीद हुए। उनका सरकारी मेडिकल कॉलेज में इलाज चल रहा था।
18 अक्‍टूबर: बालाकोट और नौशेरा में पाकिस्‍तानियों की तरफ से फायरिंग में सेना का जवान शहीद हो गया। सूत्रों के मुताबिक, उसे स्‍नाइपर शॉट के जरिए मारा गया। जवान की पहचान सुदेश कुमार के रूप में हुई, वह बालाकोट के तरकुंडी एरिया में तैनात था।
3 अक्‍टूबर: आतंकियों ने बारामूला में 46 राष्‍ट्रीय रायफल्‍स के कैंप पर हमला किया, जिसमें एक बीएसएफ जवान शहीद हो गया, जबकि एक अन्‍य घायल हो गया।
इसके अलावा, पाकिस्‍तान की तरफ से अब तक 40 से ज्‍यादा बार सीजफायर का उल्‍लंघन किया गया है। सेना ने किसी भी फायरिंग का मुंहतोड़ जवाब देने की छूट जवानों को दे रखी है।

बस्तर पुलिस और सरकारी खामोशी

सुनील कुमार
छत्तीसगढ़ के बस्तर में कल पुलिस ने फौजी किस्म की वर्दी पहने हुए सामूहिक रूप से जगह-जगह सामाजिक कार्यकर्ताओं, वकीलों, राजनीतिक नेताओं, और पत्रकारों के पुतले जलाए. और प्रतीक के रूप में स्थानीय थानों की पुलिस ने पुतलों की आग बुझाने की कोशिश भी दिखाई. इन तस्वीरों को देखें तो यह हैरानी होती है कि पुलिस का एक हिस्सा एक ऐसे काम को रोक रहा है, जो कि पुलिस का ही दूसरा हिस्सा कर रहा है. और छत्तीसगढ़ वह राज्य है जहां पर पुलिस कर्मचारियों की कोई यूनियन भी नहीं है जिसे कि ऐसे किसी प्रदर्शन की छूट मिल सके.

अभी तक राज्य सरकार की तरफ से कल की इस व्यापक सोची-समझी अलोकतांत्रिक कार्रवाई पर कोई प्रतिक्रिया भी नहीं आई है, इसलिए यह सोचना भी गलत होगा कि सरकार इस पर कोई कार्रवाई करने का सोच रही है. लेकिन यह एक राज्य का मामला नहीं है, भारत जैसे विशाल लोकतंत्र की लोकतांत्रिक परंपराओं और इसके लोकतांत्रिक ढांचे की बात है, और उसी नजरिए से बस्तर की कल की इस भयानक कार्रवाई के बारे में सोचना जरूरी है जिसमें पुलिस ने आदिवासियों का तो नहीं, लेकिन शहरी लोकतंत्र का लहू जरूर बहाया है.

बस्तर में अभी पिछले दो-चार दिनों के भीतर ही पुलिस को लेकर सुप्रीम कोर्ट में पेश सीबीआई जांच रिपोर्ट खबरों में है जिसमें ऐसा कहा बताया जाता है कि ताड़मेटला की बहुत चर्चित आगजनी में सुरक्षा बलों ने आदिवासी बस्तियों में आग लगाई थी. बस्तर में काम कर रहे सामाजिक संगठन, मीडिया के कुछ लोग, और बहुत से स्थानीय आदिवासी पहले से यही बात कह रहे थे, लेकिन राज्य सरकार में उनकी कोई सुनवाई नहीं थी. अब जब यह बात सीबीआई के हलफनामे में सुप्रीम कोर्ट में सामने आई है, तो बस्तर की पुलिस मानो बौखलाते हुए ऐसा सार्वजनिक प्रदर्शन कर रही है जैसा कि भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में याद नहीं पड़ता है. बस्तर के कई जिलों में सैकड़ों या हजारों पुलिस वालों ने जगह-जगह सामाजिक कार्यकर्ताओं और वकीलों-पत्रकारों के पुतले यह कहते हुए जलाए कि वे नक्सल-हिमायती हैं, या कि नक्सल हैं.

अब यह बुनियादी सवाल उठता है कि बस्तर की जो पुलिस अनगिनत बेकसूर लोगों के खिलाफ अदालती कार्रवाई से लेकर मुठभेड़ हत्या तक की तोहमतें झेल रही है, उस पुलिस को कानूनी कार्रवाई करने से कौन रोक रहा था अगर ये सारे लोग नक्सली हैं? और अगर यह लोग नक्सली हैं भी, तो भी पुलिस का काम जांच करके उन्हें गिरफ्तार करके अदालत में पेश करने का है, न कि सड़कों पर उनके पुतले जलाते हुए अपनी वर्दी की अलोकतांत्रिक ताकत का हिंसक प्रदर्शन करने का. लोकतंत्र के लिए यह एक बहुत ही खतरनाक नौबत है कि पुलिस कानून को अपने हाथ में लेकर लोगों को मुजरिम करार दे, और अपनी वर्दी के साथ जुड़े हुए नियमों को कुचलकर ऐसा जश्न मनाए कि वह जिसके चाहे उसके पुतले जला सकती है.

यहां पर दो दिन पहले बस्तर के भारी विवादास्पद आईजी एस.आर.पी. कल्लूरी का कैमरों के सामने दिया गया वह राजनीतिक और अलोकतांत्रिक बयान भी देखने की जरूरत है जिसमें उन्होंने खुले राजनीतिक-अहंकार के साथ लोकतांत्रिक ताकतों के खिलाफ बयानबाजी की है, और अपने-आपको लोकतंत्र से ऊपर साबित करने की कोशिश की है. उनका यह बयान आदिवासी बस्तियों को जलाने की रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में पेश होने के बाद और उसी संदर्भ में आया है. बस्तियों के बाद अब शहरों में लोकतांत्रिक लोगों के पुतले जलाकर कल्लूरी की पुलिस ने यह साबित किया है कि लोकतंत्र की ऐसी आगजनी पर उनका कुछ नहीं बिगड़ सकता, और बस्तर की पुलिस बस्तियों के बाद बेकसूरों के पुतले भी एक आंदोलन की तरह जला सकती है.

छत्तीसगढ़ के लोकतांत्रिक ढांचे में यह एक बहुत ही अनोखी नौबत है कि एक अफसर इस कदर अलोकतांत्रिक बर्ताव कर रहा है, और सरकार में कोई भी उस पर रोक लगाने की न सोच रहा है, न ऐसा कुछ बोल रहा है. जब निर्वाचित लोकतांत्रिक ताकतें लोकतंत्र को इस तरह और इस हद तक हांकने की ताकत वर्दीधारी अफसरों को दे देती हैं, तो वह एक भयानक खतरनाक नौबत से कम कुछ नहीं है. कोई अफसर नक्सलियों को मारने में कामयाब हो सकता है, लेकिन क्या इस खूबी को देखते हुए उसे बस्तर जैसे एक नाजुक और संवेदनशील, संविधान में विशेष हिफाजत मिले हुए आदिवासी इलाके में तानाशाही का ऐसा हक देना जायज है?

ऐसे में मुल्क की सरहद पर बहादुरी दिखाने वाले फौजियों को भी कुछ कत्ल माफ होने चाहिए, और फौजियों को भी बस्तर की तरह यह छूट मिलनी चाहिए कि वे भारत के जिन सामाजिक आंदोलनकारियों को पाकिस्तान का हिमायती समझते हैं उनके पुतले जलाने के लिए दिल्ली के राजपथ पर वर्दी में इकट्ठे हों.

पुलिस या किसी भी फौज में अफसर तो आते-जाते रहते हैं, और हिंसक और तानाशाह अफसर भी लोगों ने वक्त-वक्त पर देखे हैं, लेकिन वे अफसर लोकतंत्र की आखिरी ताकत नहीं रहते हैं. लोकतंत्र में आखिरी ताकत निर्वाचित जनप्रतिनिधि रहते हैं, और छत्तीसगढ़ की निर्वाचित सरकार सुप्रीम कोर्ट के बार-बार के आदेश देखने के बावजूद सबसे बेजुबान आदिवासियों के बस्तर में जिस तरह की तानाशाही की छूट देकर चल रही है, वह रूख हक्का-बक्का करने वाला है.

हमारा ख्याल है कि राज्य सरकार ऐसे अफसरों के कितने ही जुर्म अनदेखे क्यों न करें, बस्तर सुप्रीम कोर्ट की नजरों में है, और हमको वह दिन दूर नहीं दिख रहा है जब लोकतंत्र के पुतलों को इस तरह से जलाने को लेकर राज्य सरकार को कटघरे में खड़ा किया जाएगा. अब यह काम सुप्रीम कोर्ट के जजों के पुतले जलने के पहले होगा, या बाद में, यह देखना होगा.

(लेखक ‘दैनिक छत्तीसगढ़’ के संपादक है. साभार ‘दैनिक छत्तीसगढ़’)