कृषि

धान की रोपाई में देरी होने की स्थिति में एक स्थान पर चार-पांच पौधे लगाना जरूरी : रोपाई वाले खेतों में 5 सेंटीमीटर भरना चाहिए

रायपुर  कृषि वैज्ञानिकों ने पिछले दिनों से हो रही बारिश के पानी को धान के खेतों में रोकने के लिए समुचित प्रबंध करने की सलाह किसानों को दी है। कृषि वैज्ञानिकों ने आज  कहा है कि धान के बोता तों में बियासी के लिए तथा रोपाई वाले खेतों में रोपा लगाने के लिए पानी रोकना चाहिए।
    कृषि वैज्ञानिकों ने कहा है कि धान की रोपाई में देरी होने पर रोता लगाते समय एक स्थान पर चार-पांच पौधों की रोपाई करनी चाहिए। ऐसी स्थिति में 10 प्रतिशत अधिक खाद डालना चाहिए। रोपे गए खेतों में लगभग 5 सेंटीमीटर पानी भर कर रखना लाभदायक होता है। ऐसे खेतों में अधिक पानी भरा होने से धान के कन्सो की संख्या प्रभावित होती है। धान नर्सरी में कार्बोफ्यूरान दानेदार दवा 20 किलो प्रति एकड़ के हिसाब से थरहा निकालने के चार दिन पहले नर्सरी में डालना चाहिए।
    कृषि वैज्ञानिकों ने यह भी कहा है कि प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में कम वर्षा की स्थिति है। इन क्षेत्रों की धान फसलों में कटुआ इल्ली की आशंका है। सूखे खेतों में कटुआ इल्ली का प्रकोप होने पर डाइक्लोरोवास एक मिली लीटर एक लीटर पानी में घोल कर 200 लीटर प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करना चाहिए। जिन खेतों में पानी भरा है और वहां कटुआ इल्ली दिखाई दे तो एक लीटर मिट्टी तेल प्रति एकड़ की दर से खेतों के पानी में डालकर पौधों के ऊपर रस्सी चलाना चाहिए, ताकि इल्लियां मिट्टी तेल युक्त पानी में गिरकर मर जाएं।
    कृषि वैज्ञानिकों ने कहा है कि धान फसल में हानिकारक कीड़ों पर सतत निगरानी रखनी चाहिए। इसके लिए प्रकाश प्रपंच उपकरण का उपयोग किया जा सकता है। प्रकाश प्रपंच उपकरण फसल से थोड़ी दूरी पर लगाकर शाम 6.30 से रात्रि 10.30 बजे तक बल्ब जलाना चाहिए। सुबह कीड़ों को एकत्र कर नष्ट कर देना चाहिए। सोयाबीन की फसल में पत्ती खाने वाली इल्लियां एवं चक्र भंृग कीड़े ज्यादा दिखने पर ट्राईजोफास दवा की 2 मिली लीटर मात्रा एक लीटर पानी या फ्लुबेंडामाईट आधा मिली लीटर एक लीटर पानी में घोल बनाकर 200 लीटर घोल प्रति एकड़ के हिसाब से छिड़काव करना चाहिए। दवा छिड़कने के तीन घंटे के भीतर बारिश हो जाने पर पुनः घोल छिड़कना जरूरी होता है

छत्तीसगढ़ में खरीफ फसलों की 80 प्रतिशत बोनी पूरी

रायपुर, 03 अगस्त २०१८ छत्तीसगढ़ में खरीफ फसलों की 80 प्रतिशत बोनी पूरी हो गई है। राज्य शासन के कृषि विभाग ने इस साल 48 लाख 20 हजार हेक्टेयर में अनाज, दलहन, तिलहन और साग-सब्जी बोने का लक्ष्य रखा है। इस लक्ष्य के विरूद्ध अभी तक किसानों ने 38 लाख 70 हजार हेक्टेयर में विभिन्न फसलों की बोनी पूर्ण कर ली है। 
कृषि मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने आज यहां बताया कि चालू खरीफ मौसम में 33 लाख 87 हजार हेक्टेयर में अनाज फसलों की बोनी हो गई है। छत्तीसगढ़ में किसान इस मौसम में अनाज फसलों के अंतर्गत धान, मक्का, कोदो-कुट्की की खेती करते हैं। अनाज फसलों में सबसे अधिक रकबा धान का होता है। अभी तक 31 लाख 48 हजार हेक्टेयर में धान की बोआई हो गई है।
 अग्रवाल ने बताया कि इस साल दलहन के लिए 3 लाख 86 हजार 800 हेक्टेयर  रकबा रखा गया है। अभी तक लगभग एक लाख 95 हेक्टेयर में अरहर, उड़द, मूंग, कुल्थी आदि की बोनी की जा चुकी है। तिलहन फसलों के लिए निर्धारित रकबे में से 2 लाख हेक्टेयर में मुंगफली, सोयाबीन, रामतिल, सूरजमुखी और अरण्डी बोई जा चुकी है। इसी प्रकार लगभग 95 हजार हेक्टेयर में साग-सब्जियों की बोआई सब्जी उत्पादक किसानों ने कर ली है। 

 

धान फसल में हानिकारक कीड़ों की निगरानी करने प्रकाश प्रपंच उपकरण उपयोगी

 रायपुर, 30 जुलाई 2018 कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को धान फसल में हानिकारक कीड़ों की निगरानी करने प्रकाश प्रपंच उपकरण का उपयोग करने की सलाह दी है। उन्होंने आज यहां जारी सम-सामयिक कृषि बुलेटिन में कहा है कि प्रकाश प्रपंच उपकरण फसल से थोड़ी दूर पर लगाकर शाम 6.30 बजे से रात 10 बजे तक बल्ब जलाना चाहिए। इसके बाद एकत्रित कीड़ों को सुबह नष्ट कर देना चाहिए।
    कृषि वैज्ञानिकों ने कहा है कि धान खेतों की मेड़ों को बांधकर पानी रोकने का सही समय है। रोपा लगाने के बाद खेतों में पांच सेंटीमीटर से ऊपर पानी रोक कर रखा जाना चाहिए। अधिक पानी होने से धान कंसों की संख्या प्रभावित होती है। जहां धान की बोनी फसल 25 दिनों की हो गई हो, वहां 5 से 10 सेंटीमीटर पानी होने की स्थिति में बियासी कर लेना चाहिए। बियासी के तुरंत बाद सघन चलाई करना फायदेमंद होता है, इससे कम से कम पौधे नष्ट होते हैं। चलाई के समय  प्रति वर्ग मीटर में 150 की संख्या में पौधे होने चाहिए। रासायनिक निंदा नियंत्रण फसल की प्रारंभिक अवस्था में ही कारगर होता है। धान रोपा लगाते समय पौधों के बीच पर्याप्त दूरी रखनी  चाहिए। प्रत्येक तीन मीटर के पश्चात 30 सेंटीमीटर की पट्टी निरीक्षण पथ के रूप में छोड़ना जरूरी है। नत्रजन उर्वरक का उपयोग रोपा लगाने के सात दिन बाद करना चाहिए। स्वचलित यंत्र द्वारा धान रोपाई करने के पूर्व खेतों की उथली मचाई ट्रैक्टर चलित रोटरी पडलर द्वारा की जानी चाहिए। स्वचलित यंत्र द्वारा रोपाई के लिए तैयार की गई मेट टाइप नर्सरी में यह ध्यान रखना चाहिए कि पौधों की जड़ों की लम्बाई अधिक न हो।

 

खरीफ मौसम में हल्की जमीनों पर 100 से 115 दिन में पकने वाली धान की किस्मों की बोआई करने की सलाह

  रायपुर कृषि विशेषज्ञों और कृषि विभाग के अधिकारियों ने खरीफ मौसम में हल्की जमीनों पर 100 से 115 दिन में पकने वाली धान की किस्मों की बोआई करने की सलाह किसानों को दी है। कृषि विशेषज्ञों द्वारा आज  जानकारी देते हुए  बतया है कि धान की दंतेश्वरी, पूर्णिमा, इंदिरा बारानी धान-1, अनंदा, समलेश्वरी, एमटीयू-1010 तथा आई.आर. 36 किस्में 100 से 115 दिन के भीतर पक कर तैयार हो जाती है। उन्होंने कहा कि इन किस्मों के प्रमाणित बीज उपलब्ध न हो तो किसान स्वयं के बीजों को 17 प्रतिशत नमक के घोल एवं बाविस्टीन से उपचारित कर बोनी कर सकते हैं।
कृषि बुलेटिन में यह भी बताया गया है कि कतार बोनी धान में बोआई के तीन दिन के अंदर अंकुरण पूर्व प्रस्तावित निंदानाशक पेण्डीमेथेलिन 1.25 लीटर की 500 लीटर पानी में घोल बनाकर एक हेक्टेयर में छिड़काव करना चाहिए। शीघ्र एवं मध्यम अवधि की धान किस्मों की कतार बोनी करनी चाहिए। इनमें बियासी की आवश्यकता नहीं होती तथा धान की फसल 10-15 दिन पहले पक कर तैयार हो जाती है। सोयाबीन में खरपतवार नियंत्रण के लिए अंकुरण पूर्व क्यूजोलाफाप-पी-एथिल, इमेजाथाइपर या पेन्डीमेथिलिन या मैट्रीबुजिन का छिड़काव अनुशंसित मात्रा में करना फायदेमंद होता है। उकठा रोग से प्रभावित क्षेत्रों में अरहर के साथ ज्वार की मिलवा खेती करने से अरहर में इस रोग का प्रकोप कम हो जाता है।

कृषि एवं कृषि अभियांत्रिकी महाविद्यालयों में प्रवेश हेतु ऑनलाइन काउंसलिंग आज 1 जुलाई 2018 से प्रारंभ

15 जुलाई तक पंजीयन न करने वाले अभ्यर्थी प्रवेश के पात्र नहीं होंगे

रायपुर, इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के अंतर्गत संचालित कृषि, उद्यानिकी एवं कृषि अभियांत्रिकी महाविद्यालयों में प्रवेश हेतु ऑनलाइन काउंसलिंग  आज 1 जुलाई 2018 से प्रारंभ होगी। यह ऑनलाइन काउंसलिंग   15 जुलाई तक चलेगी। इस बार काउंसलिंग की संपूर्ण प्रक्रिया ऑनलाइन होगी अर्थात अभ्यर्थी घर बैठे-बैठे मोबाइल अथवा कम्प्यूटर के माध्यम से ऑनलाइन काउंसलिंग में शामिल होंगे। 15 जुलाई तक ऑनलाइन काउंसलिंग हेतु पंजीयन न करने वाले अभ्यर्थी महाविद्यालयों में प्रवेश के पात्र नहीं होंगे अर्थात उक्त तिथि तक ऑनलाइन पंजीयन न करने वाले अभ्यर्थियों को महाविद्यालयों में दाखिला नहीं मिल सकेगा। 
    इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के अंतर्गत संचालित कृषि, उद्यानिकी एवं कृषि अभियांत्रिकी महाविद्यालयों में पी.ए.टी. 2018 प्रवेश परीक्षा के आधार पर प्रवेश हेतु आवेदन करने एवं ऑनलाइन काउंसलिंग के समस्त चरणों में शामिल होने के लिए अभ्यर्थियों को केवल एक ही बार पंजीयन करना होगा। पंजीयन हेतु निर्धारित तिथि 1 से 15 जुलाई के मध्य पंजीयन कराना आवश्यक होगा। 15 जुलाई के पश्चात पंजीयन की सुविधा नहीं दी जाएगी। पंजीयन एवं आवेदन वेबसाईट ूूूण्पहाअउपेण्बहण्दपबण्पद  पर जाकर किया जा सकता है। पंजीयन के पश्चात समस्त पंजीकृत अभ्यर्थियों को मेरिट के आधार पर ऑनलाइन काउंसलिंग द्वारा निर्धारित दिनांक पर सीटों का आबंटन किया जाएगा। ऐसे अभ्यर्थियों को जिन्हंे सीट एवं महाविद्यालय आबंटित हुआ है। उन्हें रजिस्टर्ड मोबाइल पर सीट आबंटन की सूचना दी जाएगी। विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा अभ्यर्थियों को आवेदन फार्म एवं काउंसलिंग फीस अंतिम तिथि के पूर्व भरने की सलाह दी गई है ताकि किसी प्रकार की कठिनाई से बचा जा सके।  
    ऑनलाइन काउंसलिंग के प्रथम चरण के तहत 1 जुलाई से 15 जुलाई तक आवेदन फार्म भरने हेतु ऑनलाइन पंजीयन, फीस जमा कर दस्तावेज अपलोड किये जा सकेंगे। 18 जुलाई को सीट एवं महाविद्यालय का आबंटन किया जाएगा। 19 जुलाई से 21 जुलाई तक अभ्यर्थी आबंटित प्रोविजनल सीट को सुरक्षित करने हेतु ऑनलाइन फीस जमा कर सकेंगे। दस्तावेज परीक्षण हेतु अभ्यर्थियों को 19 जुलाई से 22 जुलाई के मध्य कृषि महाविद्यालय रायपुर में उपस्थित होना होगा और 19 जुलाई से 25 जुलाई के मध्य आबंटित महाविद्यालय में अपनी उपस्थिति दर्ज करानी होगी। महाविद्यालयों में रिक्त सीटों हेतु द्वितीय चरण की काउंसलिंग 27 जुलाई, तृतीय चरण की चरण की काउंसलिंग 2 अगस्त और अंतिम चरण की काउंसलिंग 8 अगस्त को होगी। निजी महाविद्यालयों में प्रबंधन कोटे की सीटों पर प्रवेश हेतु सीधे संबंधित निजी महाविद्यालय में संपर्क कर सकते हैं। प्रबंधन कोटे में प्रवेश 13 से 16 अगस्त के मध्य होगा। 

किसानों की आय बढ़ाने में मसाला फसलों की महत्वपूर्ण भूमिका: केन्द्रीय बागवानी आयुक्त : कृषि विश्वविद्यालय में एकीकृत बागवानी विकास मिशन की दो दिवसीय समीक्षा

रायपुर भारत सरकार के बागवानी आयुक्त डॉ. बी.एन.एस. मूर्ति ने आज यहां कहा कि वर्ष 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने के मिशन के तहत बागवानी फसलों विशेषकर मसाला फसलों की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है। भारत से प्रति वर्ष बड़ी मात्रा में मसाला फसलों का विदेशों में निर्यात भी किया जाता है। छत्तीसगढ़ में भी मसाला फसलों के उत्पादन की संभावनाओं को देखते हुए यहां किसानों को हल्दी, अदरक तथा अन्य मसाला फसलांे के उत्पादन के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय द्वारा कृषि महाविद्यालयों एवं कृषि विज्ञान केन्द्रों के माध्यम से किसानों को मसाला फसलों की खेती के लिए प्रेरित किया जा रहा है। डॉ. मूर्ति आज यहां इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय में एकीकृत बागवानी विकास मिषन की 12वीं वार्षिक समीक्षा बैठक का शुभारंभ कर रहे थे। इस बैठक का आयोजन भारत सरकार के संचालनालय सुपारी एवं मसाला फसलें कालीकट (केरल) द्वारा किया गया। बैठक की अध्यक्षता इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. एस.के. पाटील ने की। बैठक में इस परियोजना के तहत देश भर में संचालित लगभग 50 केन्द्रों के प्रतिनिधि शामिल हुए।
    बागवानी आयुक्त डॉ. मूर्ति ने कहा कि देश में अनाज और दलहन का उत्पादन आवश्यकता से अधिक हो रहा है और अब इनमें वृद्धि की संभवनाएं बहुत कम है। अब बागवानी फसलों खासकर मसाला फसलों के उत्पादन में बढ़ोतरी की काफी संभावनाएं है। उन्होंने कहा कि भारत में 75 प्रकार की मसाला फसलों का उत्पादन होता है। उन्होंने मसाला फसलों के अनुसंधान और विकास पर और अधिक ध्यान दिये जाने पर जोर दिया। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. एस.के. पाटील ने कहा कि बागवानी फसलें विशेषकर मसाला फसलें किसानों की आर्थिक स्थिति को बेहतर बना सकती है। इन फसलों के उत्पादन के लिए अच्छे बीज और रोपण सामग्री उपलब्ध हो पाना एक बड़ी चुनौती है। किसानों को सही प्लांटिंग मटेरियल मिलना जरूरी है। उन्होंने कहा कि किसान क्लस्टर बनाकर अगर खेती करें तो वे सही प्लांटिंग मटेरियल प्राप्त करने के साथ ही मसाला फसलों का मूल्य संवर्धन और सही तरीके से मार्केटिंग भी कर सकते हैं।
संचालनालय सुपारी एवं मसाला फसलें कालीकट (केरल) के संचालक डॉ. होमी चेरीयन ने संस्थान की गतिविधियों और उपलब्धियों की जानकारी देते हुए बताया कि देश में लगभग 34 लाख हेक्टेयर में 80 लाख टन मसाला फसलों का उत्पादन हो रहा है। यहां से लगभग 6 बिलियन डॉलर मूल्य की मसाला फसलों का निर्यात दूसरे देशों को होता है। उन्होंने बताया कि छत्तीसगढ़ में इस परियोजना के तहत हल्दी, अदरक, धनिया और मेथी के उत्पादन को बढ़ावा दिया जा रहा है। उन्होंने परियोजना का सफलतापूर्वक संचालन किये जाने के लिए इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय की सराहना की। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के परियोजना प्रभारी डॉ. एस.एस. टूटेजा ने परियोजना प्रतिवेदन प्रस्तुत किया तथा अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर भारतीय मसाला अनुसंधान संस्थान के संचालक डॉ. के. निर्मल बाबू, छत्तीसगढ़ शासन के संचालक उद्यानिकी श्री नरेन्द्र पाण्डेय, इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के संचालक विस्तार सेवाएं डॉ. एल.एल. राठौर, कृषि महाविद्यालय रायपुर के अधिष्ठाता डॉ. ओ.पी. कश्यप सहित बड़ी संख्या में कृषि वैज्ञानिक तथा विश्वविद्यालय प्रशासन के अधिकारी उपस्थित थे।

इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय द्वारा विकसित पांच नई किस्में छत्तीसगढ़ के लिए जारी

रायपुर - इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर द्वारा विकसित विभिन्न फसलों की पांच नई किस्में छत्तीसगढ़ के लिए जारी कर दी गई हैं। कृषि उत्पादन आयुक्त   सुनील कुजूर की अध्यक्षता में गठित राज्य बीज उप समिति ने इन किस्मों की छत्तीसगढ़ में उपयुक्तता तथा इनके विशेष गुणों को देखते हुए इन्हें छत्तीसगढ़ राज्य के लिए जारी करने की अनुशंसा की है। राज्य बीज उप समिति द्वारा अनुशंसित किस्मों में धान की नई किस्में ट्राम्बे छत्तीसगढ़ दुबराज म्युटेन्ट-1, छत्तीसगढ़ जिंक राइस - 2  और छत्तीसगढ़ धान बरहासाल सेलेक्शन -1, गेहूं की किस्म छत्तीसगढ़ अम्बर गेहूॅ तथा तिखुर की छत्तीसगढ़ तिखुर-1 शामिल हैं।
    उल्लेखनीय है कि इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित विभिन्न फसलों की 27 नई किस्मों में से पांच किस्मों का प्रस्तुतिकरण राज्य बीज उप समिति के समक्ष किया गया। छत्तीसगढ़ के लिए इन किस्मों की उपयुक्तता, अधिक उत्पादन क्षमता, गुणवत्ता, पोषक मूल्य, कीटों एवं रोगों के प्रति सहनशीलता, मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों में भी उत्पादन का सामर्थ्य, औषधीय तथा अन्य विशेष गुणों आदि को ध्यान में रखते हुए राज्य बीज उप समिति द्वारा इन किस्मों को छत्तीसगढ़ के लिए जारी किये जाने का निर्णय लिया गया। इन किस्मों के गुण तथा विशेषताएं निम्नानुसार हैं -

   धान
1.    ट्राम्बे छत्तीसगढ़ दुबराज म्यूटेन्ट-1: यह किस्म छत्तीसगढ़ में प्रथम किस्म है जो गामा विकिरण जनित म्यूटेशन (उत्परिवर्तन) विधि द्वारा भाभा एटामिक रिसर्च सेन्टर, मुम्बई के सहयोग से तैयार की गयी है। यह सुगन्धित मध्यम बौनी प्रजाति है जिसकी गुणवत्ता स्थानीय दुबराज के समान ही है। दुबराज किस्म की लोकप्रियता को देखते हुए इस किस्म को विकसित किया गया है। इस किस्म की ऊँचाई 90 से 95 से.मी. है। यह किस्म स्थानीय दुबराज प्रजाति से विकसित की गयी है जिसकी ऊंचाई 140 से 150 से.मी. थी, जिससे लाजिंग होकर उत्पादकता एवं गुणवत्ता प्रभावित होती थी। इसकी उर्वरक उपयोग क्षमता भी अच्छी है, जिससे राष्ट्रीय स्तर पर इस प्रजाति की उपज क्षमता 47 क्विंटल प्रति हेक्टेयर पायी गयी है। इसमें कम उर्वरक देने पर भी अच्छी उपज प्राप्त होती है। इस किस्म को सिंचित अवस्था के लिए अनुशंसित किया गया है।
2.    छत्तीसगढ़ जिंक राइस - 2: यह सामान्य से अधिक जिंक की मात्रा (22-24 पी.पी.एम.) वाली प्रीमियम गुणवत्ता वाली प्रजाति है। यह छोटे दाने वाली किस्म है जो खाने में बहुत अधिक स्वादिष्ट है। राष्ट्रीय स्तर पर यह किस्म अन्य न्यूट्री रिच किस्मों की अपेक्षा अधिक उपज 42 क्विंटल प्रति हेक्टेयर देने वाली पायी गयी है। इस किस्म में राइस ब्रान आयल की मात्रा सामान्य किस्मों से अधिक पायी गयी है। जिंक की अधिक मात्रा होने के कारण यह किस्म अधिक पौष्टिक है और छोटे बच्चों में जिंक की कमी से होने वाले डायरिया की रोक-थाम में मद्दगार है। यह किस्म आईआर-68144-बी-18-2-1-1 एवं पीकेव्ही एचएमटी के संकरण के पश्चात वंशावली विधि अपनाकर विकसित की गई है।
3.    छत्तीसगढ़ धान बरहासाल सेलेक्शन -1: यह किस्म सुगन्धित एवं स्वादिष्ट पोहे के लिए उपयुक्त किस्म है। इस किस्म से बना पोहा आयरन एवं जिंक युक्त होता है। इस किस्म से बना पोहा अधिक समय तक मुलायम बना रहता है। इसके जनन द्रव्य संग्रह में देशी किस्म का शुद्ध वंशक्रम अपनाकर चयन किया गया है। यह देर से (150 दिनों में) पकने वाली, लंबी (155 से.मी.) एवं हल्के लाल रंग की मोटे दानों वाली किस्म है। यह किस्म जीवाणु जनित झुलसा रोग एवं गंगई बॉयोटाईप 4 (गंगई) के प्रति सहनशील पाई गई है।

    गेहूँ
4.    छत्तीसगढ़ अम्बर गेहूँ: यह किस्म अर्द्धसिंचित अवस्था के लिए अनुशंसित किस्म है। इस अवस्था के लिए अनुशंसित किस्में जैसे - सुजाता एवं एच. आई. 1531 से इसकी उत्पादकता 10 प्रतिशत ज्यादा है। इसका दाना बड़ा चमकदार एवं अच्छा होता है जिससे रोटियां अच्छी बनती हैं। यह किस्म पीले एवं भूरे रस्ट के प्रति प्रतिरोधी है। यह किस्म एच.डब्ल्यू 2004 एवं पीबीएन 1666-1 के संकरण पश्चात् वंशावली विधि अपनाकर तैयार की गई है। इसके बीज अम्बर रंग के होते हैं तथा इसमें प्रोटीन की मात्रा 12ण्3ः एवं सेडिमेन्टेशन वैल्यू 44 पायी गई है।

   कन्द वर्गीय
5.    छत्तीसगढ़ तिखुर-1: यह भारत में विकसित की गई तिखुर की प्रथम प्रजाति है। इसकी उपज क्षमता 33.43 टन प्रति हेक्टेयर है। इसकी औसत स्टार्च प्राप्ति 14.46 प्रतिशत है। यह शीघ्र अवधि (150 से 160 दिन) वाली किस्म है। यह किस्म रोगों एवं कीटों के प्रति सहनशील है। इस किस्म का स्टार्च पकाने एवं कलिनरी गुण बहुत ही अच्छा है। एयर टाईट परिस्थितियों में इस किस्म की संग्रहण क्षमता 18 माह तक पायी गयी है। इस किस्म को बलरामपुर जिले के कामरी गांव से संग्रहित तिखुर के लोकल जिनोटाइप से क्लोनल सलेक्शन विधि द्वारा विकसित किया गया है।
    इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. एस.के. पाटील ने आशा व्यक्त की है कि कृषि विश्वविद्यालय द्वारा विकसित नई फसल किस्में छत्तीसगढ़ के विभिन्न क्षेत्रों में अच्छा उत्पादन देगीं और किसानों के लिए आर्थिक रूप से अधिक फायदेमंद साबित होगीं।

जैविक खेती से सुगंधित प्रजातियों के धान को पुनर्जीवित करने हो रही पहल

रायपुर  नगरी विकासखण्ड के ग्राम रावणसिंघी के किसान   जैनेन्द्र साहू ने करीब दो दशक पहले का विख्यात नगरी दुबराज की सुगंधित फसल को पुनर्जीवित करने में सफल हुआ है। उन्होंने जैविक विधि अपनाकर अपने खेतों में श्री विधि से सुगंधित धान दुबराज की सफलतापूर्वक फसल ली, जिससे उनके खेतों में इसकी खुशबू बिखर रही है। कृषि विस्तार सुधार कार्यक्रम (आत्मा) के तहत नगरी विकासखण्ड में विभाग द्वारा जैविक खेती का सतत् प्रदर्शन किया जा रहा है और किसानों को इसके लिए लगातार जागरूक और प्रोत्साहित करने अनेक प्रकार की कवायद की जा रही है।

किसान   जैनेन्द्र ने बताया कि उन्होंने अपने खेतों में बिना रासायनिक खाद और उर्वरक का प्रयोग किए कृषि विभाग के अधिकारी के मार्गदर्शन में श्री पद्धति से रोपा लगाया। श्री साहू ने इससे पहले हरी खाद का उपयोग किया साथ ही वर्मी कम्पोस्ट को खाद के तौर पर उपयोग किया। इसके 40-45 दिनों के बाद खेतों की मताई करके उसे सड़ाने छोड़ा गया जिससे खेत में नाइट्रोजन और अन्य आवश्यक खाद की पूर्ति हो गई। नींदा नियंत्रण के लिए उन्होंने पैडी वीडर का प्रयोग किया, जबकि कीटनाशक के रूप में नीम तेल का प्रयोग किया। उन्होंने बताया कि इन सब देशी उपायों के चलते इसमें कीट एवं खरपतवारों का आक्रमण नहीं होने से फसल अच्छी हुई, जिसके बाद हार्वेस्टर से फसल की कटाई की गई। इस प्रकार प्रति हेक्टेयर 25-30 क्विंटल धान प्राप्त हुआ। किसान श्री साहू ने बताया कि खड़ी फसल के समय से ही खरीदारों की मांग शुरू हो गई थी। इसकी 60-65 रूपए प्रतिकिलो की दर से मांग प्राप्त हुई है। किसान श्री साहू को कृषि विभाग द्वारा शेलो नलकूप, थ्रेसर, रोटावेटर, सीड ड्रिल, कल्टीवेटर, पैडीवीडर एवं अन्य आदान सामग्रियों का लाभ दिलाया जा चुका है। श्री साहू ने बताया कि जैविक खेती से फसलों के साथ-साथ मनुष्यों की सेहत अच्छी रहती है इसलिए लोगों को त्वरित लाभ को नजरअंदाज कर स्थायी लाभ की ओर ध्यान देना चाहिए। आज के समय में लुप्त होते जा रहे सुगंधित धानों की प्रजातियों को पुनर्जीवित करने के लिए जैविक विधि की ओर लौटना होगा और पूर्वजों की इस अनमोल विरासत को सुरक्षित और संरक्षित करना होगा। प्रगतिशील कृषक श्री साहू को वर्ष 2016-17 के लिए विकासखण्ड स्तर पर उत्कृष्ट प्रगतिशील किसान के पुरस्कार से प्रदेश के कृषि एवं जल संसाधन मंत्री श्री बृजमोहन अग्रवाल के हाथों सम्मानित किया जा चुका है। जिले में वर्तमान में लगभग डेढ़ सौ हेक्टेयर में दुबराज सहित अन्य सुगंधित प्रजाति के धान की पैदावार किसानों द्वारा जैविक पद्धति से खेती की जा रही है तथा यह खुशी की बात है कि अब प्रतिवर्ष सुगंधित प्रजातियों के धान के रकबे में इजाफा दर्ज किया जा रहा है।

छत्तीसगढ़ में इस साल 15.61 लाख हेक्टेयर से अधिक रकबे में बोई गई रबी फसलें

रायपुर छत्तीसगढ़ में इस वर्ष रबी फसलों की बोनी लगभग पूरी हो चुकी है। राज्य शासन के कृषि विभाग द्वारा चालू रबी मौसम में लगभग 18 लाख 51 हजार हेक्टेयर में अनाज, दलहन, तिलहन और साग-सब्जी की बोनी की तैयारी की गई थी। अभी तक किसानों ने 15 लाख 61 हजार 390 हेक्टेयर क्षेत्र में धान, गेहूं, मूंग, मटर, चना, तिवरा, कुलथी, अलसी, तिल, सूरजमुखी, मूंगफली, राई-सरसो सहित अन्य फसलों की बोआई पूरी कर ली है। इस प्रकार इस साल निर्धारित लक्ष्य के विरूद्ध 84 प्रतिशत रकबे में रबी फसलों की बोनी हुई है।
 कृषि मंत्री   बृजमोहन अग्रवाल ने बताया कि प्रदेश में इस रबी मौसम में एक लाख 80 हजार 380 हेक्टेयर में गेहूं, 46 हजार हेक्टेयर में धान, 71 हजार हेक्टेयर में मक्का और 6 हजार हेक्टेयर में अन्य अनाज फसलों की बोनी हो चुकी है। उन्होंने बताया कि दलहनी फसलों के अंतर्गत तीन लाख 47 हजार हेक्टेयर में चना, 55 हजार हेक्टेयर में मटर, 29 हजार हेक्टेयर में मसूर,  26 हजार हेक्टेयर में मूंग के साथ-साथ लगभग तीन लाख हेक्टेयर में तिवरा की उतेरा बोनी पूरी हो गई है। इस रबी मौसम में 2 लाख 56 हजार हेक्टेयर में तिलहनी फसलें भी लगायी गई है। किसानों ने तिलहनी फसलों में सबसे ज्यादा एक लाख 58 हजार हेक्टेयर में राई-सरसो और तोरिया की बोआई की है। उनके अलावा तिल, सूरजमुखी, कुसुम, मूंगफली भी किसानों ने लगायी है। लगभग 23 हजार हेक्टेयर में गन्ना लगाने का काम पूरा हो गया है। बागवानी किसानों ने एक लाख 83 हजार हेक्टेयर में साग-सब्जियां लगायी है।

जाज्वल्य देव लोक महोत्सव एवं एग्रीटेक कृषि मेला 2018 किसानो की आय बढ़ाने और नई तकनीक के उपयोग के बारे में जानकारी दी

जांजगीर-चांपा, :-जाज्वल्य देव लोक महोत्सव एवं एग्रीटेक कृषि मेला में आज कृषक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कृषक संगोष्ठी में कृषि से संबंधित विभिन्न विषयों के विशेषज्ञों ने कृषकों को नवीन तकनीकी की जानकारी दी। वैज्ञानिकों ने 2022 तक किसानों की आय को दुगुना करने तथा फसल अवशिष्ट के उचित प्रबंधन के बारे में बताया। रायपुर के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. के. पी. वर्मा ने फसल अवशिष्ट प्रबंधन की जानकारी देते हुए बताया कि खेत में पुआल (पैरा) जलाने से वायु प्रदूषण होता है, जो मानव स्वास्थ्य के प्रतिकुल है। वरिष्ठ वैज्ञानिक बिलासपुर डॉ. जे. आर. पटेल ने रबी फसलों पर शस्य क्रियाएं की विस्तृत जानकारी दी। इसी प्रकार इंजीनियर देवेश पांडेय द्वारा रबी फसलों में जल प्रबंधन की जानकारी दी गई। उन्होंने बताया कि ग्रीष्मकाल में धान के स्थान पर दलहन, तिलहन लगाना उचित है। कम पानी में यह फसल तैयार हो जाता है। मिट्टी की उर्वरा बनी रहती है। वरिष्ठ वैज्ञानिक बिलासपुर के डॉ. ए. के. अवस्थी रबी मौसम में विभिन्न फसलों में कीट व्याधि की रोक थाम के लिए कृषि विभाग के मैदानी अमलों से सम्पर्क कर दवा का छिड़काव करने की सलाह दी। वरिष्ठ वैज्ञानिक रायपुर डॉ. शशि ने बताया कि पशुपालन कर कृषक अपने आय मंे वृद्धि कर सकते है। दुधारू पशु के रखरखाव तथा दुग्ध उत्पादन बढ़ाने के संबंध में तकनीकी जानकारी दी। कृषि महाविद्यालय तथा कृषि विज्ञान केन्द्र के वैज्ञानिकों ने भी तकनीकी जानकारी दी। संगोष्ठी में राज्य के प्रगतिशील कृषकों ने अनुभव के बारे में बताया। प्रगतिशील कृषक श्री ईश्वर बघेल के द्वारा कन्द वर्गीय फसलों के उत्पादन वृद्धि की तकनीकी जानकारी दी गई। उन्होंने सब्जी वर्गीय फसलों के उत्पादन की तकनीकी जानकारी दी। छोटी जगह में सब्जी वर्गीय तथा शोभायमान पौधे लगाने की जानकारी दी। हरियाली दीदी के नाम से विख्यात श्रीमती पुष्पा साहू के द्वारा अपने घर की छत को पूरी तरह से हरियाली में बदल दी है। उन्होंने घर की छत में सब्जी वर्गीय पौधे लगाकर अतिरिक्त आय प्राप्त करने के संबंध में बताया।

30 डिसमिस से सब्जी की खेती शुरू आज दे रहा दर्जनों मजदूरों को काम ...जिले का हो रहा नाम रोशन

BBN24@भूपेंद्र गबेल

जांजगीर/मालखरौदा :- ग्राम चिखली के किसान कार्तिक राम चन्द्रा जो कि पिछले 2 वर्षों से टमाटर , भाटा , मिर्ची की खेती से कई जिलों में अपनी सब्जियों की छाप छोड़ रहे है । दरसल मालखरौदा ब्लॉक के ग्राम चिखली के किसान कार्तिक राम समीपस्त ग्राम नवागांव के कछार में 10 एकड़ में पिछले दो वर्षों से बाड़ी में लगातार सब्जियों की खेती करते आ रहे हैं । वे पहले अपने गांव चिखली में 30 डिसमिल से सब्जियां लगाना शुरू किए जिसमे टमाटर , भांटा , मिर्ची , गोभी आदि सब्जियां लगाई । फिर 2016 में ग्राम नवागांव में 10 एकड़ में बाड़ी लगाकर ड्रीप फसल से सब्जियों की खेती में लगा है । जिसमे 6 एकड़ में हाइब्रिड टमाटर की और 1 एकड़ में मिर्ची लगा है । बाकी 3 एकड़ में धनिया , गोभी , लौकी , भांटा , बरबट्टी लगाया गया है । मिर्ची एक सप्ताह में 20 क्विंटल 100 बोरी तक टूटता है । वहीं टमाटर अभी शुरुआती दौर है जिससे अंदाजा में किसान कार्तिक राम का कहना है कि इस सीजन में करीब 10 हजार कैरेट तक टमाटर टूटेगा । लगाए गए सब्जियों की डिमांड इतनी ज्यादा है कि रायगढ़ , सक्ती , बिलासपुर , मुंगेली , तखतपुर तक अपनी छाप छोड़ रहे हैं ।

= 20 मजदूरों को रोजगार

सब्जी बाड़ी में प्रतिदिन आसपास के गावों से 20 मजदूर कार्य करते हैं । जिसमे 10 पुरुष और 10 महिलाएं शामिल हैं । जिनके परिवार के लिए भी महीने के खर्चे निकल जाते है और भरण पोषण भी हो जाता है । मजदूर प्रतिदिन देखरेख , साफसफाई , दवाई छिड़काव , खाद्य पदार्थों का छिड़काव किया जाता है ।

= रासायनिक खाद के साथ जैविक खाद व दवाइयों का प्रयोग

किसान कार्तिक राम के द्वारा स्वयं जैविक खाद बनाया जाता है । जिसमे खाद बनाने के लिए गोबर , गौमूत्र , गुड़ , बेसन , बरगद पेड़ नीचे की मिट्टी का मिश्रित का प्रयोग किया जाता है । वही दवाई भी जैविक कीटनाशक बनाया जाता है जिनमे छाछ का विशेष प्रयोग किया जाता है। वही मिर्च , लहसुन , गुड़ , गौमूत्र , आंख पेंड की डोंडे , धतूरे , बेशरम के पत्ते आदि को मिलाकर जैविक कीटनाशक प्रयोग कर सब्जियों को स्वस्थ्य तरीके से उत्पादन किया जा रहा है । जिससे पौधे , फल व फूल अच्छे ग्रोथ करते है ।

= आने वाले गर्मी में सब्जी फसलों की तैयारी

कार्तिक राम चन्द्र ने बताया कि अभी विंटर सीजन का सब्जी अब लगभग खत्म होने को है वही अब गर्मी सीजन का सब्जी का थरहा लगाने का कार्य प्रारम्भ किया जाएगा जिसमे कुंदरू , परवल , करेली , बरबट्टी , तरबूज ,मखना आदि 5 एकड़ में लगाया जाएगा । वही आने वाली दिनों में अच्छे दाम के आसार नजर आ रहे है । जिससे आमदनी अच्छी होगी ।

30 डिसमिस से सब्जी की खेती शुरू आज दे रहा दर्जनों मजदूरों को काम ...जिले का हो रहा नाम रोशन

BBN24@भूपेंद्र गबेल

जांजगीर/मालखरौदा :- ग्राम चिखली के किसान कार्तिक राम चन्द्रा जो कि पिछले 2 वर्षों से टमाटर , भाटा , मिर्ची की खेती से कई जिलों में अपनी सब्जियों की छाप छोड़ रहे है । दरसल मालखरौदा ब्लॉक के ग्राम चिखली के किसान कार्तिक राम समीपस्त ग्राम नवागांव के कछार में 10 एकड़ में पिछले दो वर्षों से बाड़ी में लगातार सब्जियों की खेती करते आ रहे हैं । वे पहले अपने गांव चिखली में 30 डिसमिल से सब्जियां लगाना शुरू किए जिसमे टमाटर , भांटा , मिर्ची , गोभी आदि सब्जियां लगाई । फिर 2016 में ग्राम नवागांव में 10 एकड़ में बाड़ी लगाकर ड्रीप फसल से सब्जियों की खेती में लगा है । जिसमे 6 एकड़ में हाइब्रिड टमाटर की और 1 एकड़ में मिर्ची लगा है । बाकी 3 एकड़ में धनिया , गोभी , लौकी , भांटा , बरबट्टी लगाया गया है । मिर्ची एक सप्ताह में 20 क्विंटल 100 बोरी तक टूटता है । वहीं टमाटर अभी शुरुआती दौर है जिससे अंदाजा में किसान कार्तिक राम का कहना है कि इस सीजन में करीब 10 हजार कैरेट तक टमाटर टूटेगा । लगाए गए सब्जियों की डिमांड इतनी ज्यादा है कि रायगढ़ , सक्ती , बिलासपुर , मुंगेली , तखतपुर तक अपनी छाप छोड़ रहे हैं ।

= 20 मजदूरों को रोजगार

सब्जी बाड़ी में प्रतिदिन आसपास के गावों से 20 मजदूर कार्य करते हैं । जिसमे 10 पुरुष और 10 महिलाएं शामिल हैं । जिनके परिवार के लिए भी महीने के खर्चे निकल जाते है और भरण पोषण भी हो जाता है । मजदूर प्रतिदिन देखरेख , साफसफाई , दवाई छिड़काव , खाद्य पदार्थों का छिड़काव किया जाता है ।

= रासायनिक खाद के साथ जैविक खाद व दवाइयों का प्रयोग

किसान कार्तिक राम के द्वारा स्वयं जैविक खाद बनाया जाता है । जिसमे खाद बनाने के लिए गोबर , गौमूत्र , गुड़ , बेसन , बरगद पेड़ नीचे की मिट्टी का मिश्रित का प्रयोग किया जाता है । वही दवाई भी जैविक कीटनाशक बनाया जाता है जिनमे छाछ का विशेष प्रयोग किया जाता है। वही मिर्च , लहसुन , गुड़ , गौमूत्र , आंख पेंड की डोंडे , धतूरे , बेशरम के पत्ते आदि को मिलाकर जैविक कीटनाशक प्रयोग कर सब्जियों को स्वस्थ्य तरीके से उत्पादन किया जा रहा है । जिससे पौधे , फल व फूल अच्छे ग्रोथ करते है ।

= आने वाले गर्मी में सब्जी फसलों की तैयारी

कार्तिक राम चन्द्र ने बताया कि अभी विंटर सीजन का सब्जी अब लगभग खत्म होने को है वही अब गर्मी सीजन का सब्जी का थरहा लगाने का कार्य प्रारम्भ किया जाएगा जिसमे कुंदरू , परवल , करेली , बरबट्टी , तरबूज ,मखना आदि 5 एकड़ में लगाया जाएगा । वही आने वाली दिनों में अच्छे दाम के आसार नजर आ रहे है । जिससे आमदनी अच्छी होगी ।

जानिए क्या है मल्टी कट धनिया जल्द ही आ रहा है ’पंत हरीतिमा’आपके बिच

पत्तियां बेचने के बाद लीजिए बीज का भरपूर उत्पादन
इंदिरा गांधी कृषि विष्व विद्यालय के सब्जी वैज्ञानिको ने तैयार की धनिया की नई प्रजाति नाम दिया ’पंत हरीतिमा’
बिलासपुर। अब पत्तियांे और बीज के लिए अलग-अलग धनिया बीज की जरुरत नही पड़ेगी। पहली बार सब्जी वैज्ञानिकों ने धनिया की ऐसी प्रजाति तैयार करने में सफलता हासिल कर ली है जिसकी पत्तियां तेज खुष्बू देती है और भरपूर बीज भी मिलते हैं। एक ही पौधे में दोनेां गुणों के एक साथ मिलने वाली इस प्रजाति को मल्टी-कट पंत हरीतिमा नाम दिया गया है।
    धनिया उत्पादक किसानों के लिए यह नई रिसर्च नि;संदेह राहत देने वाली कही जा सकती हैै। जिस तरह मसालों की खेती को प्रोत्साहन दिया जा रहा है और किसान रुझान भी दिखा रहे हैं उसके बाद हर जिले  में धनिया की खेती का रकबा हर साल बढ़त ले रहा है। अभी तक  किसान बाजार में उपलब्ध धनिया की दो अलग प्रजाति के बीज की कीमत और उत्पादन को लेकर परेषान रहे है। वे किसान जो सब्जी के लिए पत्तियों वाली धनिया की फसल लेते है उनके लिए अलग बीज आते है। वही बीज उत्पादक किसानों के लिए बीज की अलग प्रजाति है। इस तरह एक ही फसल की दो अलग-अलग प्रजाति की खेती पर खर्च अधिक आता है। उत्पादन के आंकड़े भी भिन्न-भिन्न होते हैं। इन्ही दिक्कतों को ध्यान में रखते हुए इंदिरा गांधी कृषि विवि ने इस पर अनुसंधान की योजना बनाई। एक और वजह यह थी कि प्रदेष में धनिया की आपूर्ति महाराष्ट्र से होती है। इस निर्भरता को भी खत्म करना था। इस पर हुई कोषिष ने पंत नगर स्थित कृषि विवि से ऐसे बीज मंगवाए गए जो छत्तीसगढ़ की जमीन और जलवायु के अनुकूल हों। दो साल के प्रयास के बाद धनिया के ऐसे बीज तैयार करने में सफलता मिल गई जिसे पंत हरीतिमा नाम दिया गया है। आगामी अप्रैल माह से इसके बीज किसानों को मिलने लगेंगे।
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ऐसी है मल्टी-कट पंत हरीतिमा
विष्वविद्यालय के सब्जी वैज्ञानिको ने धनिया की जो नई प्रजाति विकसित की है उसमें इसकी पत्तियां गहरे हरे रंग की हैं साथ ही इसकी पत्तियां तेज सुगंध देती हैं। पत्तियां बेची जाने के बाद इन्ही पौधों में धनिया के बीज तैयार होंगे याने एक ही पौधे से पत्तियां और बीज एक साथ। इस तरह किसानों को पत्ती और बीज वाले अलग-अलग धनिया बीज की खरीदी नही करनी पड़ेगी।
 
75 दिनोें में तैयार 
प्ंात हरीतिमा मल्टी-कट धनिया की बुवाई नवंबर माह में की जाने के बाद फसल फरवरी मध्य तक आएगी। बीच-बीच में स्थिति देखकर पत्तियों की तोडाई की जा सकेगी। रिसर्च में प्रति एकड़ 10 से 12 क्विंटल उत्पादन का होना पाया गया है। पंत हरीतिमा मल्टी कट धनिया की खेती  हर जिले की जमीन और जलवायु में की जा सकती है। 
 
इन्होनें किया रिसर्च 
इंदिरा गांधी कृषि विवि ने इस महत्वपूर्ण योजना की कमान सब्जी विज्ञान के प्रमुख वैज्ञानिक डा. धनंजय षर्मा को सौपीं। वरिष्ठ सब्जी वैज्ञानिक डा. जितेन्द्र सिंह और डा. अमित दीक्षित की टीम ने योजना को सफलता के मुकाम तक पहुंचाया।
 
मल्टी कट पंत हरीतिमा के बीज से तैयार पौधांे से पत्ती और बीज दोनों मिलेंगें। किसान अब इस तरह रिसर्च के बाद बीज और पत्ती के लिए दो अलग खर्चे से बच सकेंगें। भरपूर उत्पादन देने वाली धनिया का यह बीज अगले माह से कृषि विवि के सब्जी विभाग से मिलेंगें।
-डा. अमित दीक्षित,सीनियर साइंटिस्ट, वेजिटेबल साइंस, इंदिरा गांधी विवि रायपुर

तैयार हुआ बाॅटनिकल पेस्टीसाइड्स‘ किसान अपने घर पर ही बिना किसी लागत के कर सकेंगे तैयार। जीवाणु और फफूंदजनित रोग से फसलों को मिलेगी निजात

भाटापारा।फसलों में कीट प्रकोप की बढ़ती षिकायत और बचाव के लिए कीटनाषक दवाओं के उपयोग के बाद धान और सब्जी पर पड़ते प्रतिकूूल असर से बचाव के उपाय के बीच खरपतवार की ऐसी 144 प्रजातियां मिली है।जिनमे जीवाणु और फफूदजनित रोग खत्म करने के गुण मिले हैं। इन गुणों के खुलासे के बाद इन खरपतवारों की मदद से ‘बाॅटनिकल पेस्टीसाइड्स‘बना सकते हैं।
धान की खेती और सब्जी उत्पादन में कीट प्रकोप अब व्यापक समस्या बनती जा रही हैै। फसल बचाने के उपाय पर किसानों को काफी रकम खर्च करनी पड़ती है। जो दवाएं बाजार में उपलब्ध हैं वे काफी महंगे हैं। इसके साथ ही इस बात की कोई गारंटी नहीं कि कीट प्रकोप से पूरी तरह छुटकारा मिल ही जाएगा। ऐसे में फसल को बर्बाद होता देखने के सिवाए कोई उपाय नहीं। जैविक खेती को लेकर किसानेां के बढ़ते रुझान के बीच अब कीट प्र    कोप से बचने के लिए एक ऐसा उपाय खोज निकाला गया है जिसे ‘बाॅटनिकल पेस्टीसाइड्स‘ के नाम से जाना जाएगा। यह ‘बाॅटनिकल पेस्टीसाइड्स‘ प्रदेष के जंगलों में खोजे गउ ऐसे 144 खरपतवार से ेबनाए जा सकेंगे जिनसे जीवाणु जनित और फफंूद जनित रोगों से फसलों को बचाया जा सकेगा।सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह ‘बाॅटनिकल पेस्टीसाइड्स‘ किसान अपने घर पर ही बिना किसी लागत के तैयार कर सकेंगे। इस सफलता के बाद अब इससे बीज उपचार की कोषिष की जा रही है ताकि स्वस्थ बीज किसानों तक पहुंच सके।    
 इन खरपतवार से ‘बाटनिकल पेस्टीसाइड्स‘
ऐसा कोई जिला नहीं होगा जहां के खेतों की मेड़ में ‘बनतुलसा‘ ‘चिरचिरा‘ ‘गोरखमुंडी‘, ‘भेंभरा‘ और ‘अकरकरा‘ नजर नहीं आते । इसके अलावा 139 ऐसे और खरपतवार की पहचान हुई है जिनमें से कुछ के पत्तों में तो कुछ में पूरे पौधे ही ऐसे औषधिय गुणों से भरपूर है जिनकी मदद से कीट प्रकोप पर नियंत्रण पाया जा सकता है।
 ऐसे बनाएं ‘बाॅटनिकल पेस्टीसाइड्स‘
इन खरपतवारों की पत्तियों और पूरे पौधे को एक लीटर गौ-मूत्र के साथ मिट्टी के मटके में मिलाएं। एक पखवाड़े के बाद इससे जो ‘बाॅटनिकल पेस्टीसाइड्स‘ तेैयार होगा वह 100 लीटर कीटनाषक दवा के बराबर क्षमतावान होगा। गौ-मूत्र और खरपतवार की मात्रा बढ़ाने पर आनुपातिक रुप से ऐसे कीटनाषक ‘बाॅटनिकल पेस्टीसाइड्स‘ तैयार होगा जो सब्जी ओैर धान की फसल पर कीट प्रकोप से छुटकारा दिला सकेगा।
 
प्रदेष के जंगलों से मेडिषनल वैल्यू रखने वाले ऐसे 144 खरपतवार संग्रहित किए गए हैं जिनमें जीवाणु और फफंूद जनित रोग से छुटकारा दिलाने के गुण हैं। रिसर्च में मिली सफलता के बाद इससे ‘बाॅटनिकल पेस्टीसाइड्स‘ तैयार किया जा सकता है।
-डा. आर. के. एस. तिवारी,प्रो.सांइटिस्ट, टीसीबी काॅलेज आॅफ एग्री.रिसर्च स्टेषन, बिलासपुर