कृषि

चना उत्पादक किसानों को मिलेगी 118 करोड़ से ज्यादा की प्रोत्साहन राशि राज्य सरकार ने जारी किया आदेश

 रायपुर,  राज्य सरकार द्वारा रबी वर्ष 2017-18 के चना उत्पादक किसानों को इस वित्तीय वर्ष 2018-19 में 1500 रूपए प्रति एकड़ की दर से 118 करोड़ 54 लाख रूपए की प्रोत्साहन राशि का वितरण किया जाएगा। कृषि एवं जैव प्रौद्योगिकी विभाग के अधिकारियों ने आज यहां बताया कि इस राशि का आवंटन यहां मंत्रालय (महानदी भवन) से कृषि संचालनालय को जारी किया जा चुका है। कृषि संचालनालय द्वारा जिला कलेक्टरों से प्राप्त मांग के अनुसार उन्हें यह आवंटन तत्काल उपलब्ध कराया जाएगा। 
    विभाग द्वारा जारी आदेश के अनुसार प्रोत्साहन राशि का भुगतान किसानों को सीधे उनके बैंक खातों में प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) प्रक्रिया के अनुसार संबंधित जिला कलेक्टरों के माध्यम से किया जाएगा। पारदर्शिता की दृष्टि से वितरण सूची अंतरित राशि सहित ग्राम पंचायतों के सूचना पटल पर चस्पा की जाएगी। उल्लेखनीय है कि मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की अध्यक्षता में इस वर्ष दस अप्रैल को आयोजित मंत्रिपरिषद की बैठक में राज्य के वर्ष 2017-18 के चना उत्पादक किसानों को प्रति एकड़ 1500 रूपए की प्रोत्साहन राशि देने का निर्णय लिया गया था। कृषि मंत्री श्री बृजमोहन अग्रवाल ने विभागीय अधिकारियों को यह सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं कि प्रोत्साहन राशि का वितरण जल्द से जल्द कर दिया जाए। इस सिलसिले में कृषि और जैव प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा 27 अगस्त को यहां मंत्रालय (महानदी भवन) से जहां संचालक कृषि को भुगतान योग्य राशि का आवंटन आदेश जारी कर दिया है। वहीं विभाग द्वारा 27 अगस्त को ही एक अन्य परिपत्र में संबंधित अधिकारियों को प्रोत्साहन राशि के भुगतान के लिए पात्रता और भुगतान प्रक्रिया आदि के संबंध में बिन्दुवार दिशा-निर्देश भी जारी किए गए हैं। 
    कृषि एवं जैव प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा यह परिपत्र सचिव राजस्व एवं आपदा प्रबंधन, आयुक्त भू-अभिलेख, संचालक कृषि, प्रबंध संचालक, राज्य बीज एवं कृषि विकास निगम सहित सभी पांच संभागीय कमिश्नरों और सभी 27 जिला कलेक्टरों को जारी किया गया है। परिपत्र के अनुसार प्रोत्साहन राशि रबी वर्ष 2017-18 के अंतर्गत किसानों द्वारा बोए गए चने की फसल के रकबे के आधार पर दी जाएगी। इस योजना के कार्य क्षेत्र में सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ राज्य को शामिल किया गया है। सभी जिला कलेक्टर रबी वर्ष 2017-18 के चना उत्पादक किसानों की संख्या, राजस्व अभिलेख में दर्ज बोये गए रकबे की ग्रामवार और विकासखण्डवार जानकारी और उस आधार पर आवश्यक आवंटन की मांग कृषि संचालनालय को भेजेंगे। 

धान पौधों के कमजोर होने पर यूरिया डालनेे की सलाह धान में कन्से निकलने की स्थिति में यूरिया की दूसरी मात्रा जरूरी

रायपुर 30 अगस्त 2018 कृषि वैज्ञानिकों ने पिछले 15-20 दिनों से सूर्य प्रकाश की कमी की स्थिति में धान के पौधे कमजोर होने पर यूरिया डालने की सलाह किसानों को दी है। कृषि वैज्ञानिकों ने आज यहां जारी विशेष कृषि बुलेटिन में कहा है कि सूर्य प्रकाश की कमी की वजह से पौधों की बढ़ोतरी कम हो जाती है। इस स्थिति में पौधों की बाढ़ संतुलित रखने के लिए यूरिया डालना जरूरी होता है।
    कृषि वैज्ञानिकों ने कहा कि रोपाई वाले खेतों में लगभग 5 सेंटीमीटर पानी रोक कर रखना चाहिए। अधिक मात्रा में पानी रखने से कन्सो की संख्या प्रभावित होती है। धान फसल की बियासी करने के बाद तत्काल सघन चलाई करनी चाहिए। इसके बाद 10 से 15 प्रतिशत अधिक यूरिया छिड़काव करना फायदे मंद होता है। धान फसल में कन्से निकलने की स्थिति हो तो यूरिया की दूसरी मात्रा डालनी चाहिए। इससे कन्सो की स्थिति में सुधार आती है। धान फसल में कीट या खरपतवार होने की स्थिति में दोनों के नियंत्रण के बाद ही 40 किलोग्राम यूरिया प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़कना चाहिए।

धान खेतों की नियमित निगरानी करते रहना चाहिए। धान फसल में पत्ती मोड़क का प्रकोप एक पौधे में एक से अधिक दिखाई देने पर क्लोरोप्यरीफोस 1 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से 500 लीटर पानी में मिलाकर छिड़कना चाहिए। जिन खेतों में तना छेदक की तितली एक वर्ग मीटर में एक से अधिक दिखाई दे रही हो तो वहां कार्बोफुरान 33 किलोग्राम या फर्टेरा 10 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से डालना लाभदायक होता है। रोपा धान में सकरी पत्ती वाली खरपतवार के नियंत्रण के लिए रोपाई के तीन दिन के अंदर ब्यूटाक्लोर डेढ़ किलोग्राम सक्रिय तत्व या आक्साडायर्जिल 70 ग्राम सक्रिय तत्व डालना चाहिए। धान फसल में हानिकारक कीटों के नियंत्रण के लिए प्रकाश प्रपंच उपकरण का उपयोग किया जा सकता है। प्रकाश प्रपंच उपकरण फसल से थोडी दूर पर लगाकर शाम 6.30 बजे से रात्रि 10.30 बजे तक ही बल्ब जलाना चाहिए तथा सुबह एकत्रित कीड़ों को नष्ट कर देना चाहिए।

धान की रोपाई में देरी होने की स्थिति में एक स्थान पर चार-पांच पौधे लगाना जरूरी : रोपाई वाले खेतों में 5 सेंटीमीटर भरना चाहिए

रायपुर  कृषि वैज्ञानिकों ने पिछले दिनों से हो रही बारिश के पानी को धान के खेतों में रोकने के लिए समुचित प्रबंध करने की सलाह किसानों को दी है। कृषि वैज्ञानिकों ने आज  कहा है कि धान के बोता तों में बियासी के लिए तथा रोपाई वाले खेतों में रोपा लगाने के लिए पानी रोकना चाहिए।
    कृषि वैज्ञानिकों ने कहा है कि धान की रोपाई में देरी होने पर रोता लगाते समय एक स्थान पर चार-पांच पौधों की रोपाई करनी चाहिए। ऐसी स्थिति में 10 प्रतिशत अधिक खाद डालना चाहिए। रोपे गए खेतों में लगभग 5 सेंटीमीटर पानी भर कर रखना लाभदायक होता है। ऐसे खेतों में अधिक पानी भरा होने से धान के कन्सो की संख्या प्रभावित होती है। धान नर्सरी में कार्बोफ्यूरान दानेदार दवा 20 किलो प्रति एकड़ के हिसाब से थरहा निकालने के चार दिन पहले नर्सरी में डालना चाहिए।
    कृषि वैज्ञानिकों ने यह भी कहा है कि प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में कम वर्षा की स्थिति है। इन क्षेत्रों की धान फसलों में कटुआ इल्ली की आशंका है। सूखे खेतों में कटुआ इल्ली का प्रकोप होने पर डाइक्लोरोवास एक मिली लीटर एक लीटर पानी में घोल कर 200 लीटर प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करना चाहिए। जिन खेतों में पानी भरा है और वहां कटुआ इल्ली दिखाई दे तो एक लीटर मिट्टी तेल प्रति एकड़ की दर से खेतों के पानी में डालकर पौधों के ऊपर रस्सी चलाना चाहिए, ताकि इल्लियां मिट्टी तेल युक्त पानी में गिरकर मर जाएं।
    कृषि वैज्ञानिकों ने कहा है कि धान फसल में हानिकारक कीड़ों पर सतत निगरानी रखनी चाहिए। इसके लिए प्रकाश प्रपंच उपकरण का उपयोग किया जा सकता है। प्रकाश प्रपंच उपकरण फसल से थोड़ी दूरी पर लगाकर शाम 6.30 से रात्रि 10.30 बजे तक बल्ब जलाना चाहिए। सुबह कीड़ों को एकत्र कर नष्ट कर देना चाहिए। सोयाबीन की फसल में पत्ती खाने वाली इल्लियां एवं चक्र भंृग कीड़े ज्यादा दिखने पर ट्राईजोफास दवा की 2 मिली लीटर मात्रा एक लीटर पानी या फ्लुबेंडामाईट आधा मिली लीटर एक लीटर पानी में घोल बनाकर 200 लीटर घोल प्रति एकड़ के हिसाब से छिड़काव करना चाहिए। दवा छिड़कने के तीन घंटे के भीतर बारिश हो जाने पर पुनः घोल छिड़कना जरूरी होता है

छत्तीसगढ़ में खरीफ फसलों की 80 प्रतिशत बोनी पूरी

रायपुर, 03 अगस्त २०१८ छत्तीसगढ़ में खरीफ फसलों की 80 प्रतिशत बोनी पूरी हो गई है। राज्य शासन के कृषि विभाग ने इस साल 48 लाख 20 हजार हेक्टेयर में अनाज, दलहन, तिलहन और साग-सब्जी बोने का लक्ष्य रखा है। इस लक्ष्य के विरूद्ध अभी तक किसानों ने 38 लाख 70 हजार हेक्टेयर में विभिन्न फसलों की बोनी पूर्ण कर ली है। 
कृषि मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने आज यहां बताया कि चालू खरीफ मौसम में 33 लाख 87 हजार हेक्टेयर में अनाज फसलों की बोनी हो गई है। छत्तीसगढ़ में किसान इस मौसम में अनाज फसलों के अंतर्गत धान, मक्का, कोदो-कुट्की की खेती करते हैं। अनाज फसलों में सबसे अधिक रकबा धान का होता है। अभी तक 31 लाख 48 हजार हेक्टेयर में धान की बोआई हो गई है।
 अग्रवाल ने बताया कि इस साल दलहन के लिए 3 लाख 86 हजार 800 हेक्टेयर  रकबा रखा गया है। अभी तक लगभग एक लाख 95 हेक्टेयर में अरहर, उड़द, मूंग, कुल्थी आदि की बोनी की जा चुकी है। तिलहन फसलों के लिए निर्धारित रकबे में से 2 लाख हेक्टेयर में मुंगफली, सोयाबीन, रामतिल, सूरजमुखी और अरण्डी बोई जा चुकी है। इसी प्रकार लगभग 95 हजार हेक्टेयर में साग-सब्जियों की बोआई सब्जी उत्पादक किसानों ने कर ली है। 

 

धान फसल में हानिकारक कीड़ों की निगरानी करने प्रकाश प्रपंच उपकरण उपयोगी

 रायपुर, 30 जुलाई 2018 कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को धान फसल में हानिकारक कीड़ों की निगरानी करने प्रकाश प्रपंच उपकरण का उपयोग करने की सलाह दी है। उन्होंने आज यहां जारी सम-सामयिक कृषि बुलेटिन में कहा है कि प्रकाश प्रपंच उपकरण फसल से थोड़ी दूर पर लगाकर शाम 6.30 बजे से रात 10 बजे तक बल्ब जलाना चाहिए। इसके बाद एकत्रित कीड़ों को सुबह नष्ट कर देना चाहिए।
    कृषि वैज्ञानिकों ने कहा है कि धान खेतों की मेड़ों को बांधकर पानी रोकने का सही समय है। रोपा लगाने के बाद खेतों में पांच सेंटीमीटर से ऊपर पानी रोक कर रखा जाना चाहिए। अधिक पानी होने से धान कंसों की संख्या प्रभावित होती है। जहां धान की बोनी फसल 25 दिनों की हो गई हो, वहां 5 से 10 सेंटीमीटर पानी होने की स्थिति में बियासी कर लेना चाहिए। बियासी के तुरंत बाद सघन चलाई करना फायदेमंद होता है, इससे कम से कम पौधे नष्ट होते हैं। चलाई के समय  प्रति वर्ग मीटर में 150 की संख्या में पौधे होने चाहिए। रासायनिक निंदा नियंत्रण फसल की प्रारंभिक अवस्था में ही कारगर होता है। धान रोपा लगाते समय पौधों के बीच पर्याप्त दूरी रखनी  चाहिए। प्रत्येक तीन मीटर के पश्चात 30 सेंटीमीटर की पट्टी निरीक्षण पथ के रूप में छोड़ना जरूरी है। नत्रजन उर्वरक का उपयोग रोपा लगाने के सात दिन बाद करना चाहिए। स्वचलित यंत्र द्वारा धान रोपाई करने के पूर्व खेतों की उथली मचाई ट्रैक्टर चलित रोटरी पडलर द्वारा की जानी चाहिए। स्वचलित यंत्र द्वारा रोपाई के लिए तैयार की गई मेट टाइप नर्सरी में यह ध्यान रखना चाहिए कि पौधों की जड़ों की लम्बाई अधिक न हो।

 

खरीफ मौसम में हल्की जमीनों पर 100 से 115 दिन में पकने वाली धान की किस्मों की बोआई करने की सलाह

  रायपुर कृषि विशेषज्ञों और कृषि विभाग के अधिकारियों ने खरीफ मौसम में हल्की जमीनों पर 100 से 115 दिन में पकने वाली धान की किस्मों की बोआई करने की सलाह किसानों को दी है। कृषि विशेषज्ञों द्वारा आज  जानकारी देते हुए  बतया है कि धान की दंतेश्वरी, पूर्णिमा, इंदिरा बारानी धान-1, अनंदा, समलेश्वरी, एमटीयू-1010 तथा आई.आर. 36 किस्में 100 से 115 दिन के भीतर पक कर तैयार हो जाती है। उन्होंने कहा कि इन किस्मों के प्रमाणित बीज उपलब्ध न हो तो किसान स्वयं के बीजों को 17 प्रतिशत नमक के घोल एवं बाविस्टीन से उपचारित कर बोनी कर सकते हैं।
कृषि बुलेटिन में यह भी बताया गया है कि कतार बोनी धान में बोआई के तीन दिन के अंदर अंकुरण पूर्व प्रस्तावित निंदानाशक पेण्डीमेथेलिन 1.25 लीटर की 500 लीटर पानी में घोल बनाकर एक हेक्टेयर में छिड़काव करना चाहिए। शीघ्र एवं मध्यम अवधि की धान किस्मों की कतार बोनी करनी चाहिए। इनमें बियासी की आवश्यकता नहीं होती तथा धान की फसल 10-15 दिन पहले पक कर तैयार हो जाती है। सोयाबीन में खरपतवार नियंत्रण के लिए अंकुरण पूर्व क्यूजोलाफाप-पी-एथिल, इमेजाथाइपर या पेन्डीमेथिलिन या मैट्रीबुजिन का छिड़काव अनुशंसित मात्रा में करना फायदेमंद होता है। उकठा रोग से प्रभावित क्षेत्रों में अरहर के साथ ज्वार की मिलवा खेती करने से अरहर में इस रोग का प्रकोप कम हो जाता है।

कृषि एवं कृषि अभियांत्रिकी महाविद्यालयों में प्रवेश हेतु ऑनलाइन काउंसलिंग आज 1 जुलाई 2018 से प्रारंभ

15 जुलाई तक पंजीयन न करने वाले अभ्यर्थी प्रवेश के पात्र नहीं होंगे

रायपुर, इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के अंतर्गत संचालित कृषि, उद्यानिकी एवं कृषि अभियांत्रिकी महाविद्यालयों में प्रवेश हेतु ऑनलाइन काउंसलिंग  आज 1 जुलाई 2018 से प्रारंभ होगी। यह ऑनलाइन काउंसलिंग   15 जुलाई तक चलेगी। इस बार काउंसलिंग की संपूर्ण प्रक्रिया ऑनलाइन होगी अर्थात अभ्यर्थी घर बैठे-बैठे मोबाइल अथवा कम्प्यूटर के माध्यम से ऑनलाइन काउंसलिंग में शामिल होंगे। 15 जुलाई तक ऑनलाइन काउंसलिंग हेतु पंजीयन न करने वाले अभ्यर्थी महाविद्यालयों में प्रवेश के पात्र नहीं होंगे अर्थात उक्त तिथि तक ऑनलाइन पंजीयन न करने वाले अभ्यर्थियों को महाविद्यालयों में दाखिला नहीं मिल सकेगा। 
    इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के अंतर्गत संचालित कृषि, उद्यानिकी एवं कृषि अभियांत्रिकी महाविद्यालयों में पी.ए.टी. 2018 प्रवेश परीक्षा के आधार पर प्रवेश हेतु आवेदन करने एवं ऑनलाइन काउंसलिंग के समस्त चरणों में शामिल होने के लिए अभ्यर्थियों को केवल एक ही बार पंजीयन करना होगा। पंजीयन हेतु निर्धारित तिथि 1 से 15 जुलाई के मध्य पंजीयन कराना आवश्यक होगा। 15 जुलाई के पश्चात पंजीयन की सुविधा नहीं दी जाएगी। पंजीयन एवं आवेदन वेबसाईट ूूूण्पहाअउपेण्बहण्दपबण्पद  पर जाकर किया जा सकता है। पंजीयन के पश्चात समस्त पंजीकृत अभ्यर्थियों को मेरिट के आधार पर ऑनलाइन काउंसलिंग द्वारा निर्धारित दिनांक पर सीटों का आबंटन किया जाएगा। ऐसे अभ्यर्थियों को जिन्हंे सीट एवं महाविद्यालय आबंटित हुआ है। उन्हें रजिस्टर्ड मोबाइल पर सीट आबंटन की सूचना दी जाएगी। विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा अभ्यर्थियों को आवेदन फार्म एवं काउंसलिंग फीस अंतिम तिथि के पूर्व भरने की सलाह दी गई है ताकि किसी प्रकार की कठिनाई से बचा जा सके।  
    ऑनलाइन काउंसलिंग के प्रथम चरण के तहत 1 जुलाई से 15 जुलाई तक आवेदन फार्म भरने हेतु ऑनलाइन पंजीयन, फीस जमा कर दस्तावेज अपलोड किये जा सकेंगे। 18 जुलाई को सीट एवं महाविद्यालय का आबंटन किया जाएगा। 19 जुलाई से 21 जुलाई तक अभ्यर्थी आबंटित प्रोविजनल सीट को सुरक्षित करने हेतु ऑनलाइन फीस जमा कर सकेंगे। दस्तावेज परीक्षण हेतु अभ्यर्थियों को 19 जुलाई से 22 जुलाई के मध्य कृषि महाविद्यालय रायपुर में उपस्थित होना होगा और 19 जुलाई से 25 जुलाई के मध्य आबंटित महाविद्यालय में अपनी उपस्थिति दर्ज करानी होगी। महाविद्यालयों में रिक्त सीटों हेतु द्वितीय चरण की काउंसलिंग 27 जुलाई, तृतीय चरण की चरण की काउंसलिंग 2 अगस्त और अंतिम चरण की काउंसलिंग 8 अगस्त को होगी। निजी महाविद्यालयों में प्रबंधन कोटे की सीटों पर प्रवेश हेतु सीधे संबंधित निजी महाविद्यालय में संपर्क कर सकते हैं। प्रबंधन कोटे में प्रवेश 13 से 16 अगस्त के मध्य होगा। 

किसानों की आय बढ़ाने में मसाला फसलों की महत्वपूर्ण भूमिका: केन्द्रीय बागवानी आयुक्त : कृषि विश्वविद्यालय में एकीकृत बागवानी विकास मिशन की दो दिवसीय समीक्षा

रायपुर भारत सरकार के बागवानी आयुक्त डॉ. बी.एन.एस. मूर्ति ने आज यहां कहा कि वर्ष 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने के मिशन के तहत बागवानी फसलों विशेषकर मसाला फसलों की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है। भारत से प्रति वर्ष बड़ी मात्रा में मसाला फसलों का विदेशों में निर्यात भी किया जाता है। छत्तीसगढ़ में भी मसाला फसलों के उत्पादन की संभावनाओं को देखते हुए यहां किसानों को हल्दी, अदरक तथा अन्य मसाला फसलांे के उत्पादन के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय द्वारा कृषि महाविद्यालयों एवं कृषि विज्ञान केन्द्रों के माध्यम से किसानों को मसाला फसलों की खेती के लिए प्रेरित किया जा रहा है। डॉ. मूर्ति आज यहां इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय में एकीकृत बागवानी विकास मिषन की 12वीं वार्षिक समीक्षा बैठक का शुभारंभ कर रहे थे। इस बैठक का आयोजन भारत सरकार के संचालनालय सुपारी एवं मसाला फसलें कालीकट (केरल) द्वारा किया गया। बैठक की अध्यक्षता इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. एस.के. पाटील ने की। बैठक में इस परियोजना के तहत देश भर में संचालित लगभग 50 केन्द्रों के प्रतिनिधि शामिल हुए।
    बागवानी आयुक्त डॉ. मूर्ति ने कहा कि देश में अनाज और दलहन का उत्पादन आवश्यकता से अधिक हो रहा है और अब इनमें वृद्धि की संभवनाएं बहुत कम है। अब बागवानी फसलों खासकर मसाला फसलों के उत्पादन में बढ़ोतरी की काफी संभावनाएं है। उन्होंने कहा कि भारत में 75 प्रकार की मसाला फसलों का उत्पादन होता है। उन्होंने मसाला फसलों के अनुसंधान और विकास पर और अधिक ध्यान दिये जाने पर जोर दिया। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. एस.के. पाटील ने कहा कि बागवानी फसलें विशेषकर मसाला फसलें किसानों की आर्थिक स्थिति को बेहतर बना सकती है। इन फसलों के उत्पादन के लिए अच्छे बीज और रोपण सामग्री उपलब्ध हो पाना एक बड़ी चुनौती है। किसानों को सही प्लांटिंग मटेरियल मिलना जरूरी है। उन्होंने कहा कि किसान क्लस्टर बनाकर अगर खेती करें तो वे सही प्लांटिंग मटेरियल प्राप्त करने के साथ ही मसाला फसलों का मूल्य संवर्धन और सही तरीके से मार्केटिंग भी कर सकते हैं।
संचालनालय सुपारी एवं मसाला फसलें कालीकट (केरल) के संचालक डॉ. होमी चेरीयन ने संस्थान की गतिविधियों और उपलब्धियों की जानकारी देते हुए बताया कि देश में लगभग 34 लाख हेक्टेयर में 80 लाख टन मसाला फसलों का उत्पादन हो रहा है। यहां से लगभग 6 बिलियन डॉलर मूल्य की मसाला फसलों का निर्यात दूसरे देशों को होता है। उन्होंने बताया कि छत्तीसगढ़ में इस परियोजना के तहत हल्दी, अदरक, धनिया और मेथी के उत्पादन को बढ़ावा दिया जा रहा है। उन्होंने परियोजना का सफलतापूर्वक संचालन किये जाने के लिए इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय की सराहना की। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के परियोजना प्रभारी डॉ. एस.एस. टूटेजा ने परियोजना प्रतिवेदन प्रस्तुत किया तथा अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर भारतीय मसाला अनुसंधान संस्थान के संचालक डॉ. के. निर्मल बाबू, छत्तीसगढ़ शासन के संचालक उद्यानिकी श्री नरेन्द्र पाण्डेय, इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के संचालक विस्तार सेवाएं डॉ. एल.एल. राठौर, कृषि महाविद्यालय रायपुर के अधिष्ठाता डॉ. ओ.पी. कश्यप सहित बड़ी संख्या में कृषि वैज्ञानिक तथा विश्वविद्यालय प्रशासन के अधिकारी उपस्थित थे।

इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय द्वारा विकसित पांच नई किस्में छत्तीसगढ़ के लिए जारी

रायपुर - इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर द्वारा विकसित विभिन्न फसलों की पांच नई किस्में छत्तीसगढ़ के लिए जारी कर दी गई हैं। कृषि उत्पादन आयुक्त   सुनील कुजूर की अध्यक्षता में गठित राज्य बीज उप समिति ने इन किस्मों की छत्तीसगढ़ में उपयुक्तता तथा इनके विशेष गुणों को देखते हुए इन्हें छत्तीसगढ़ राज्य के लिए जारी करने की अनुशंसा की है। राज्य बीज उप समिति द्वारा अनुशंसित किस्मों में धान की नई किस्में ट्राम्बे छत्तीसगढ़ दुबराज म्युटेन्ट-1, छत्तीसगढ़ जिंक राइस - 2  और छत्तीसगढ़ धान बरहासाल सेलेक्शन -1, गेहूं की किस्म छत्तीसगढ़ अम्बर गेहूॅ तथा तिखुर की छत्तीसगढ़ तिखुर-1 शामिल हैं।
    उल्लेखनीय है कि इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित विभिन्न फसलों की 27 नई किस्मों में से पांच किस्मों का प्रस्तुतिकरण राज्य बीज उप समिति के समक्ष किया गया। छत्तीसगढ़ के लिए इन किस्मों की उपयुक्तता, अधिक उत्पादन क्षमता, गुणवत्ता, पोषक मूल्य, कीटों एवं रोगों के प्रति सहनशीलता, मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों में भी उत्पादन का सामर्थ्य, औषधीय तथा अन्य विशेष गुणों आदि को ध्यान में रखते हुए राज्य बीज उप समिति द्वारा इन किस्मों को छत्तीसगढ़ के लिए जारी किये जाने का निर्णय लिया गया। इन किस्मों के गुण तथा विशेषताएं निम्नानुसार हैं -

   धान
1.    ट्राम्बे छत्तीसगढ़ दुबराज म्यूटेन्ट-1: यह किस्म छत्तीसगढ़ में प्रथम किस्म है जो गामा विकिरण जनित म्यूटेशन (उत्परिवर्तन) विधि द्वारा भाभा एटामिक रिसर्च सेन्टर, मुम्बई के सहयोग से तैयार की गयी है। यह सुगन्धित मध्यम बौनी प्रजाति है जिसकी गुणवत्ता स्थानीय दुबराज के समान ही है। दुबराज किस्म की लोकप्रियता को देखते हुए इस किस्म को विकसित किया गया है। इस किस्म की ऊँचाई 90 से 95 से.मी. है। यह किस्म स्थानीय दुबराज प्रजाति से विकसित की गयी है जिसकी ऊंचाई 140 से 150 से.मी. थी, जिससे लाजिंग होकर उत्पादकता एवं गुणवत्ता प्रभावित होती थी। इसकी उर्वरक उपयोग क्षमता भी अच्छी है, जिससे राष्ट्रीय स्तर पर इस प्रजाति की उपज क्षमता 47 क्विंटल प्रति हेक्टेयर पायी गयी है। इसमें कम उर्वरक देने पर भी अच्छी उपज प्राप्त होती है। इस किस्म को सिंचित अवस्था के लिए अनुशंसित किया गया है।
2.    छत्तीसगढ़ जिंक राइस - 2: यह सामान्य से अधिक जिंक की मात्रा (22-24 पी.पी.एम.) वाली प्रीमियम गुणवत्ता वाली प्रजाति है। यह छोटे दाने वाली किस्म है जो खाने में बहुत अधिक स्वादिष्ट है। राष्ट्रीय स्तर पर यह किस्म अन्य न्यूट्री रिच किस्मों की अपेक्षा अधिक उपज 42 क्विंटल प्रति हेक्टेयर देने वाली पायी गयी है। इस किस्म में राइस ब्रान आयल की मात्रा सामान्य किस्मों से अधिक पायी गयी है। जिंक की अधिक मात्रा होने के कारण यह किस्म अधिक पौष्टिक है और छोटे बच्चों में जिंक की कमी से होने वाले डायरिया की रोक-थाम में मद्दगार है। यह किस्म आईआर-68144-बी-18-2-1-1 एवं पीकेव्ही एचएमटी के संकरण के पश्चात वंशावली विधि अपनाकर विकसित की गई है।
3.    छत्तीसगढ़ धान बरहासाल सेलेक्शन -1: यह किस्म सुगन्धित एवं स्वादिष्ट पोहे के लिए उपयुक्त किस्म है। इस किस्म से बना पोहा आयरन एवं जिंक युक्त होता है। इस किस्म से बना पोहा अधिक समय तक मुलायम बना रहता है। इसके जनन द्रव्य संग्रह में देशी किस्म का शुद्ध वंशक्रम अपनाकर चयन किया गया है। यह देर से (150 दिनों में) पकने वाली, लंबी (155 से.मी.) एवं हल्के लाल रंग की मोटे दानों वाली किस्म है। यह किस्म जीवाणु जनित झुलसा रोग एवं गंगई बॉयोटाईप 4 (गंगई) के प्रति सहनशील पाई गई है।

    गेहूँ
4.    छत्तीसगढ़ अम्बर गेहूँ: यह किस्म अर्द्धसिंचित अवस्था के लिए अनुशंसित किस्म है। इस अवस्था के लिए अनुशंसित किस्में जैसे - सुजाता एवं एच. आई. 1531 से इसकी उत्पादकता 10 प्रतिशत ज्यादा है। इसका दाना बड़ा चमकदार एवं अच्छा होता है जिससे रोटियां अच्छी बनती हैं। यह किस्म पीले एवं भूरे रस्ट के प्रति प्रतिरोधी है। यह किस्म एच.डब्ल्यू 2004 एवं पीबीएन 1666-1 के संकरण पश्चात् वंशावली विधि अपनाकर तैयार की गई है। इसके बीज अम्बर रंग के होते हैं तथा इसमें प्रोटीन की मात्रा 12ण्3ः एवं सेडिमेन्टेशन वैल्यू 44 पायी गई है।

   कन्द वर्गीय
5.    छत्तीसगढ़ तिखुर-1: यह भारत में विकसित की गई तिखुर की प्रथम प्रजाति है। इसकी उपज क्षमता 33.43 टन प्रति हेक्टेयर है। इसकी औसत स्टार्च प्राप्ति 14.46 प्रतिशत है। यह शीघ्र अवधि (150 से 160 दिन) वाली किस्म है। यह किस्म रोगों एवं कीटों के प्रति सहनशील है। इस किस्म का स्टार्च पकाने एवं कलिनरी गुण बहुत ही अच्छा है। एयर टाईट परिस्थितियों में इस किस्म की संग्रहण क्षमता 18 माह तक पायी गयी है। इस किस्म को बलरामपुर जिले के कामरी गांव से संग्रहित तिखुर के लोकल जिनोटाइप से क्लोनल सलेक्शन विधि द्वारा विकसित किया गया है।
    इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. एस.के. पाटील ने आशा व्यक्त की है कि कृषि विश्वविद्यालय द्वारा विकसित नई फसल किस्में छत्तीसगढ़ के विभिन्न क्षेत्रों में अच्छा उत्पादन देगीं और किसानों के लिए आर्थिक रूप से अधिक फायदेमंद साबित होगीं।

जैविक खेती से सुगंधित प्रजातियों के धान को पुनर्जीवित करने हो रही पहल

रायपुर  नगरी विकासखण्ड के ग्राम रावणसिंघी के किसान   जैनेन्द्र साहू ने करीब दो दशक पहले का विख्यात नगरी दुबराज की सुगंधित फसल को पुनर्जीवित करने में सफल हुआ है। उन्होंने जैविक विधि अपनाकर अपने खेतों में श्री विधि से सुगंधित धान दुबराज की सफलतापूर्वक फसल ली, जिससे उनके खेतों में इसकी खुशबू बिखर रही है। कृषि विस्तार सुधार कार्यक्रम (आत्मा) के तहत नगरी विकासखण्ड में विभाग द्वारा जैविक खेती का सतत् प्रदर्शन किया जा रहा है और किसानों को इसके लिए लगातार जागरूक और प्रोत्साहित करने अनेक प्रकार की कवायद की जा रही है।

किसान   जैनेन्द्र ने बताया कि उन्होंने अपने खेतों में बिना रासायनिक खाद और उर्वरक का प्रयोग किए कृषि विभाग के अधिकारी के मार्गदर्शन में श्री पद्धति से रोपा लगाया। श्री साहू ने इससे पहले हरी खाद का उपयोग किया साथ ही वर्मी कम्पोस्ट को खाद के तौर पर उपयोग किया। इसके 40-45 दिनों के बाद खेतों की मताई करके उसे सड़ाने छोड़ा गया जिससे खेत में नाइट्रोजन और अन्य आवश्यक खाद की पूर्ति हो गई। नींदा नियंत्रण के लिए उन्होंने पैडी वीडर का प्रयोग किया, जबकि कीटनाशक के रूप में नीम तेल का प्रयोग किया। उन्होंने बताया कि इन सब देशी उपायों के चलते इसमें कीट एवं खरपतवारों का आक्रमण नहीं होने से फसल अच्छी हुई, जिसके बाद हार्वेस्टर से फसल की कटाई की गई। इस प्रकार प्रति हेक्टेयर 25-30 क्विंटल धान प्राप्त हुआ। किसान श्री साहू ने बताया कि खड़ी फसल के समय से ही खरीदारों की मांग शुरू हो गई थी। इसकी 60-65 रूपए प्रतिकिलो की दर से मांग प्राप्त हुई है। किसान श्री साहू को कृषि विभाग द्वारा शेलो नलकूप, थ्रेसर, रोटावेटर, सीड ड्रिल, कल्टीवेटर, पैडीवीडर एवं अन्य आदान सामग्रियों का लाभ दिलाया जा चुका है। श्री साहू ने बताया कि जैविक खेती से फसलों के साथ-साथ मनुष्यों की सेहत अच्छी रहती है इसलिए लोगों को त्वरित लाभ को नजरअंदाज कर स्थायी लाभ की ओर ध्यान देना चाहिए। आज के समय में लुप्त होते जा रहे सुगंधित धानों की प्रजातियों को पुनर्जीवित करने के लिए जैविक विधि की ओर लौटना होगा और पूर्वजों की इस अनमोल विरासत को सुरक्षित और संरक्षित करना होगा। प्रगतिशील कृषक श्री साहू को वर्ष 2016-17 के लिए विकासखण्ड स्तर पर उत्कृष्ट प्रगतिशील किसान के पुरस्कार से प्रदेश के कृषि एवं जल संसाधन मंत्री श्री बृजमोहन अग्रवाल के हाथों सम्मानित किया जा चुका है। जिले में वर्तमान में लगभग डेढ़ सौ हेक्टेयर में दुबराज सहित अन्य सुगंधित प्रजाति के धान की पैदावार किसानों द्वारा जैविक पद्धति से खेती की जा रही है तथा यह खुशी की बात है कि अब प्रतिवर्ष सुगंधित प्रजातियों के धान के रकबे में इजाफा दर्ज किया जा रहा है।