संपादकीय

सुकमा की लालक्रांति का अंत कब ?

 

हमारी आतंरिक सुरक्षा के लिए आतंक और नक्सलवाद की पनती विषबेलें बड़ा खतरा बन गयी हैं। लोकतंत्र में विचारों की संस्कृति पर बंदूक की सभ्यता भारी दिखती है। चरमपंथ की यह विचाराधारा देश को कहां ले जाएगी पता नहीं, लेकिन अतिवाद के बल पर सत्ता के समानांतर व्यवस्था खड़ी करने वालों का सपना पूरा होगा या नहीं,ं यह वक्त बताएगा। हलांकि मजबूत होती नक्सलवाद की जड़ें और जवानों की बढ़ती शहादत हमें विचलित करती हैं। आतंकवाद से भी बड़े खतरे के रुप में नक्सलवाद उभरा है। आतंकवादी हमलों में इतनी तादात में जवान कभी नहीं शहीद हुए जितने की नक्सल प्रभावित इलाकों में बारुदी सुरंगों और सीधी मुठभेंड में मारे गए। हमें यह कबूल करने में कोई गुरज नहीं करना चाहिए की नक्लवाद और आतंकवाद की रणनीति के आगे हमारा सुरक्षा और खुफिया तंत्र बौना साबित हो रहा है। सुकमा के जंगलों में काफी तादात में सेना और सीआरपीएफ के जवान शहीद हुए हैं। जवानों की शहादत का देश अभ्यत हो चुका है। एक हमले से निपटने के लिए जब तक हम रणनीति बनाते हैं तब तक दूसरा हमला हो चुका होता है। छत्तीगढ़ के बस्तर जिले में एक बार फिर सुकमा के जंगलों में नक्सलियों ने खूनी खेल खेला है। सैकड़ों की संख्या में महिला और पुरुष नक्सलियों ने रणनीति के तहत जवानों पर हमला बोला और उन्हें मौत की नींद सुला दिया। इस सुनियोजित षडयंत्र में अब तक 40 से अधिक सीआरपीएफ के जवान शहीद हो गए। हमला उस समय किया गया जब जवान निर्माणाधीन सड़क पर चलने वाले काम को खुलवाने गए थे। नक्सलियों ने सड़क निर्माण पर प्रतिबंध लगा रखा। सुबह छह बजे 90 की संख्या में जवान गए थे।

सुकमा से 64 किमी दूर बुर्कापाल में दोपहर में जब जवान भोजन ले रहे थे उसी समय हथियारों से लैस नक्सलियों ने चैथरफा हमला कर, गोलिया बरसा जवानों की निर्मम हत्या कर दी। कहा जा रहा है कि हमला करने वाली गैंग में सबसे आगे सेना की वर्दी में महिलाएं थी और उन्हें सुरक्षा कवर पुरुष नक्सली दे रहे थे। यह घटना दिल को दहलाने वाली है। लेकिन कहीं न कहीं से हमारे सुरक्षा और खुफिया तंत्र की विफलता साबित करती है। हमें यह पता नहीं चल सका की नक्सली बड़े हमले का गेम प्लान तैयार कर रखें है। नक्सलियों ने जवानों की हत्या करने के बाद उनके पर्स, मोबाइल, हथियार भी लूट ले गए। यहां तक की मुठभेंड में मरे अपने साथियों को भी घसीट कर जंगल में ले गए। सुकमा के जंगलों में सेना और सीआरपीएफ के जवानों की शहादत आम बात हो चली है। लेकिन नक्सलियों से निपटने के लिए अभी तक हमने कोई ठोस नीति नहीं तैयार कर पाए। 2011 के बाद संभवतः यह दूसरा बड़ा नक्सली हमला है जिसमें 76 जवानों की मौत हुई थी। इसके पूर्व बड़े हमले में कांग्रेस के कई दिग्गत नेताओं को मौत के घाट उतार दिया गया था। जिसमें वीसी शुक्ल, कर्माकर और दूसरे नेता शामिल थे। इस घटना में तो नक्सलियों ने लाशों में नृत्य भी किया था। नक्सलवाद हमारे लिए आतंक से भी बड़ी चुनौती बना है।

  माओेवाद विकास और लोकतंत्र की भाषा नहीं समझता है। वह वर्तमान व्यवस्था से अलग बंदूक संस्कृति के जरिए जल, जंगल और जमींन की आजादी चाहता है। वह अपनी सत्ता चाहता है जहां उसका कानून चले जबकि सरकार ऐसा कभी होने नहीं देगी। सरकारें आदिवासी और पिछड़े इलाकों में उनकी सांस्कृतिक सुरक्षा और सर्वांगीण विकास के लिए संकल्पित हैं। नक्सल प्रवावित उड़ीसा, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, झारखंड और बिहार में विकास योजनाएं क्रियान्वित हैं। लेकिन माओवादियों का विकास में भरोसा ही नहीे, आदिवासी इलाकों में वह विकास नहीं चाहते। उन्हें डर है कि अगर ऐसा हो गया तो लोग मुख्यधारा की तरफ लोैट जाएंगे, फिर हमारे अतिवाद का क्या होगा। वह लोकतांत्रिक मूल्यों का गलाघांेट बंदूक के बल पर सब कुछ हासिल करना चाहते हैं। मुख्यधारा में लौटना नहीं चाहते या फिर कोशिश नहीं करना चाहते। दुनिया भर में हिंसक संस्कृति का कोई स्थान नहीं है। लोकतांत्रिक और वैचारिक नीतियों के जरिए ही हम कामयाब हो सकते हैं।जिन बारह जिलों में नक्सवाद फैला है वहां सबसे अधिक प्राकृतिक खनिज संपदा है। लेकिन वहां के आदिवासी लोगों का विकास आज भी बदतर हालात में हैं। सरकारों ने प्राकृतिक संसाधनों को खूब दोहन किया। लेकिन आदिवासियों के पुनर्वास के लिए नीतिगत योजनाएं नहीं बनाई गई। सरकारी नीतियों ने प्राकृतिक संसाधनों से संपंन इन इलाकों के लोगों को विपन्न बना दिया। जिसका नतीजा हमारे सामने नक्सलवाद के रुप में है।

नक्सलवाद के खात्मा के लिए हमें ठोस और नीतिगत निर्णय लेना होगा। सुरक्षा और खुफिया तंत्र को नक्सलियों के मुकाबले अधिक सुरक्षित और मजबूत बनाना होगा। इसके अलावा स्थानीय लोगों का विश्वास जीतना होगा। हमें यह अच्छी तरह मालूम है कि सुरक्षा में जरा सी लापरवाही हमारे लिए मुश्किल खड़ी कर सकती है। आपको मालूम होगा नोटबंदी के बाद सरकार की तरफ से खूब प्रचारित किया गया कि इस फैसले से आतंक और नक्सलवाद की कमर टूट गई है। काफी तादात में नक्सलियों ने आत्मसमर्पण भी किया। मीडिया ने इस तरह की खबरों को खूब प्रसारित भी हुई। लोगों में भरोसा जगा कि विपक्ष जो भी चिल्लाए, लेकिन सरकार ने अच्छा काम किया है। उसके बाद भी कई हमले हुए जिसमें हमारे बेगुनाहों की जान गई।  नक्सलवाद सिर्फ एक विचारधारा की जंग नहीं है। इकसे पीछे राष्टविरोधी ताकतें भी लगी हैं। हमारा तंत्र नक्सलियों की रणनीति में सेंध लगाने में नाकाम रहा है। दुर्गम इलाकों में इतनी आसानी से आधुनिक आयुध, एक-47, गोले, बारुद, सेना की वर्दी और रशद सामाग्री की पहुंच कैसे सुलभ होती है। देश की सीमा पाकिस्ता, बंग्लादेश, अफगानिस्ता, नेपाल, से घिरी हुई है। यहां हमारे सशस्त्र जवान सुरक्षा में लगे हैं। इसके बाद भी इतनी सामाग्रियंा कहां से और कैसे पहुंच जाती हैं। इन सबके लिए फंडिंग कहा से होती है। युवाओं और महिलाओं को इतनी सुनियोंजित तरीके से प्रक्षिण कैसे दिया जाता है। सेना की तरफ नक्सलियों ने भी कई स्तरीय सुरक्षा कोर स्थापित किया है

। सभी नेटवर्क को ध्वस्त करने में हम नाकाम हुए हैं। हम इसके लिए किसी खास सरकारों को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते हैं। इसके लिए हमारी सुरक्षा नीतियां ही दोषी हैं। हमने कभी इस रणनीति पर विचार नहीं किया कि बस यह अंतिम हमला होगा। आदिवासी इलाकों की समस्याओं के गहन अध्यन के लिए आयोग गठित करने की जरुरत हैं। यह जरुरी नहीं की हम बंदूक की संस्कृति का जबाब उसकी लौटती भाषा में ही दें। नक्सल संगठनों से बात करनी चाहिए। उनकी मांगों पर जहां तक संभव हो, उस पर लोकतांत्रिक तरीकों और बातचीत के जरिए विचार होना चाहिए। उन्हें मुख्यधारा में लौटाना चाहिए। क्योंकि मरने और मारने वाले दोनों अपने हैं। किसी भी स्थिति में छति देश की होती है। अब वक्त आ गया है जब लाल सलाम की खूनी संस्कृति पर विराम लगना चाहिए।

प्रभुनाथ शुक्ल स्वतंत्र पत्रकार

Mo : 8924005444  

पत्रकारिता धर्म और दायित्वबोध की नई भाषा और परिभाषा...... सुप्रीत

 
 पत्रकारिता धर्म और दायित्वबोध की नई भाषा और परिभाषा......  सुप्रीत 

भारतीय पत्रकारिता इतिहास में जहां तक मेरा खयाल है यह घटना दिल को झिंझोड़ने वाली है। टीवी एंकर सुप्रीत कौर ने पत्रकारिता का मिजाज बदल दिया है। उन्होंने पत्रकारिता धर्म और दायित्वबोध की नई भाषा और परिभाषा गढ़ी है। पत्रकार और पत्रकारिता धर्म को सवालों के कटघरे में खड़े करने वाले लोगों को यह घटना सोचने को मजबूर करेगी और बोलेगी कि चुप रहो ! सवाल मत खड़े करों, उनका दिल रोएगा, जिन्होंने इस मिशन के लिए सब कुछ कुर्बान कर दिया। अपनी बेदना, संवदेना के साथ, उस जीवन साथी को भी जिसके साथ कभी जिंदगी भर साथ निभाने का वादा किया था।
यह सब कुछ कर दिखाया है छत्तीगढ़ के रायपुर स्थित एक निजी टीवी चैनल की एंकर सुप्रीत कौर ने। वह पत्रकारिता की रोल माडल बन गयी हैं।  पत्रकारिता के पीछे सोच रखने वालो के लिए भी जिनकी निगाह में शायद पत्रकारिता नाम की संस्था और पत्रकार पेशा और पैसा से अधिक कुछ नहीं होता है।

 लेकिन कौर ने यह साबित किया है कि दायित्व का धर्म और जिम्मेदारियां कहीं अपनों से बड़ी होती हैं। जरा सोचिए, जाने अनजाने ही सहीं, जब सच का उन्हें एहसास हुआ होगा, तो उस महिला ने कैसा महसूस किया होगा। सुप्रीत महासमुंद में सड़क हादसे में मारे गए तीन लोगों के मौत की खबर का लाइव प्रसारण कर रही थी उसी में जान गंवाने वाला एक शख्स हर्षद गावड़े भी थे जो उस महिला एंकर के पति थे।
एंकर ने खुद अपने पति की मौत की खबर प्रसारित किया। यह बात हो सकती है की खबर पढ़ने के पहले सुप्रीत को यह बात मालूम न रही हो। लेकिन आप सुप्रीत की जगह अपने को रख कर देखें। यह घटना दिल को दहला देने वाली है।हलांकि खबर के लाइव प्रसारण के दौरान ही सुप्रीत को आशंका हो गयी थी की उसने किसी अपने को खो दिया है। यह हादसा राज्य के महासमुंद में टक और एसयूपी यानी डस्टर वाहन में हुई थी। जिसमें डस्टर में सवार पांच लोगों में से तीन की मौत हो गई थी। महासमुंद से लाइव टेलीकास्ट के दौरान रिपोर्टर से घटना की सारी जानकारी भी कौर ने हासिल किया था। एंकर की आशंका को उस समय अधिक बल मिला जब पता चला की सभी भिलाई के रहने वाले हैं और पति भी सुबह मित्रों साथ डस्टर वैन से महासमुंद की तरफ निकले थे। 
वैसे वक्त के साथ पत्रकार और उसकी परिभाषा भी बदलती गयी। उसके काम करने का तरीका भी बदला। लेकिन पत्रकारिता की पेशागत अवधारणा आज भी वहीं है जो आजादी के दौर में थी। पत्रकारिता पेशा के साथ-साथ एक धर्म भी है कम से कम उस पत्रकार के लिए जो संबंधित संस्थान के लिए काम करता है। बदलते हुए दौर में पत्रकारिता की साख और उसकी गरिमा सवालों के कटघरे में हैं। चाय-पान की चैपाल से लेकर संसद तक मीडिया और पत्रकारो पर कीचड़ उछालने वालों की भी कमी नहीं है। आधुनिक भारतीय राजनीति की बदली सोच और परिवेश में लोग पत्रकारों और मीडिया को बिकाउ तक कह डालते हैं। उस पर तमाम तरह के आरोप-प्रत्यारोप लगते हैं। सच्चाई सामने लाने पर जिंदा जला दिया जाता है। हलांकि यह बात कुछ हद तक सच भी हो सकती है। लेकिन इसके लिए सिर्फ पत्रकार उसका काम ही जिम्मेदार और जबाबदेह है ऐसा नहीं, जो पत्रकार और पत्रकारिता के खुद के खबरों के सरोकार तक देखते हुए उनके लिए पत्रकारिता का दायित्व बेहद सीमित होता है। पत्रकार खुद के लिए नहीं समाज और व्यवस्था के लिए जीता और लिखता है। उसकी अपनी चिंता को टटोलने का कभी वक्त भी नहीं मिलता है। लोग उसकी निजी जिंदगी के बारे में बहुत कम पढ़ पाते हैं, इसकी वजह है की वह अपने को अधिक पढ़ना चाहते हैं। 
हम अपनों के खोने की कल्पना मात्र से बेसुध हो जाते हैं। उस स्थिति में हमें अपनी दुनिया का पता ही नहीं रहता है। लेकिन एक औरत जिसका पति इस दुनिया से चला गया और वह खुद पति की मौत का लाइव प्रसारण कर रही थी। यह सब एक आम इंसान के बूते की बात नहीं हो सकती है। पत्रकारिता का इससे बड़ा कोई धर्म हो ही नहीं सकता। यह उस युद्ध रिपोर्टिंग से भी खतरनाक क्षण हैं। महिला एंकर ने पत्रकारिता के जिस धर्म दायित्व निभाया है दुनिया में उसकी मिसाल बेहद कम मिलती है। पत्रकारिता में यु़़द्ध कवरेज सबसे खतरनाक होता है। वहां खुद की जान जाने का हमेंशा खतरा बना रहता है। लेकिन उससे भी बड़ी संवेदनशीलता की बात है जब किसी अपने को खोने का हमें एहसास हो जाए बावजूद इसके हम अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें। किसी महिला के लिए उसका पति कितना अहम होता है, यह एक महिला के सिवाय दूसरा कोई नहीं समझ सकता।
 छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने टीवी एंकर की इस दिलेरी की ट्वीट कर प्रशंसा की है। लेकिन यह काम केवल ट्वीट और प्रशंसा तक सीमित नहीं रहना चाहिए। पीएम मोदी और राज्य सरकार के साथ पत्रकारिता एवं प्रसारण मंत्रालय की तरफ से उस जांबाज महिला एंकर का सम्मान होना चाहिए। सुप्रीत को पत्रकारिता का सर्वोच्च सम्मान मिलना चाहिए। दुनिया में इस तरह के कार्य के लिए ऐसी संस्थाएं जो काम कर रही हैं इस घटना का संज्ञान उन्हें दिलाया जाना चाहिए। सुप्रीत की पूरी दुनिया उजड़ गयी है। उनके नाम पर पत्रकारिता पुरस्कारों की शुरुवात होनी चाहिए।देश की सरकार को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। सुप्रीत के साथ एक ऐसी याद जुड़ी रहनी चाहिए जिससे पत्रकारिता जगत उस महिला का ऋणी रहे और इस दुनिया में काम करने वाले लोगों को हमेंशा अपने कर्तब्य और दायित्वबोध का ध्यान होता रहे। निश्चित तौर पर समाज को पत्रकारों के प्रति नजरिया बदलना होगा। पूरे देश और दुनिया में सुप्रीत की जांबाजी की प्रशंसा हो रही है। देश की मीडिया में यह खबर सुर्खियां बनी है। पत्रकारिता के दायित्व को उन्होंने जिस तरह निभाया उसके लिए किसी के पास कुछ कहने को शब्द नहीं बचता। सुप्रीत कौर की इस दिलेरी को हम सलाम करते हैं, साथ ही आंसूओं से भिनी एक संवेदना भरी श्रद्धांजलि गावडे जी  लिए जो इस दुनिया में खोकर अपनी सुप्रीत को पत्रकारिता इतिहास में अमर कर गए। 
       प्रभुनाथ शुक्ल
लेखकः स्वतंत्र पत्रकार  
Mo : 8924005444 
email - pnshukla6@gmail.com 
(UP

आमबजट-2017 – सपने वही दिखाए जाएं जो यथार्थ की जमीन पर साकार होते दिखें..

इन दिनों बस स्टॉप से लेकर निजी और सरकारी दफ्तरों में एक ही चर्चा है इसबार का बजट भला होगा कैसा। 92 साल बाद आमबजट और रेलबजट एक साथ सामने होंगे। 1924 में दोनों को अलग अलग किया गया था। इन सबके बीच लोगों की जुबान पर एक ही चर्चा पीएम की बातें हवा हवाई नहीं हैं तो नोटबंदी के बाद जितना धन टैक्स के रुप में सरकारी खजाने में आने का दावा किया जा रहा है उससे देश की जनता का कुछ तो भला किया ही जा सकता है। बातचीत को एक मूकदर्शक की तरह सुना जाए तो समझ आ जाता है कि हर जुबां पर जो जिक्र है वह अपने लिए संचय का नहीं है.. देश हित में आने वाली पीढि़यों के लिए हर व्यक्ति सब लुटा देने को तैयार है..शर्त बस इतनी सी कि जो कहा जा रहा है वह जमीन पर दिखाई देना चाहिए...

तर्क तो ऐसे कि जब माननीय के आने से पहले 24 घंटे में 10किमी सड़क बनाई जा सकती है तो क्या बनी बनाई सड़कों को नहीं सुधारा जा सकता...क्या शिक्षा जो व्यवसायिकता के दौर से गुजरते हुए नीलामी के बाजार में खड़ी हो गई है जिसे ऊंची बोली लगाकर ही खरीदे जा सकने की नौबत आ गई है का दोबारा सरकारीकरण या यूं कहें कि बजट से शिक्षा के लिए कुछ बेहतर विकल्प तैयार नहीं किया जाना चाहिए...स्वास्थ्य सेवाओं में इजाफा किए जाने पिटारे से कुछ निकलना ही चाहिए...

नौकरीपेशा व्यक्ति जब सब कुछ बैंक में रखकर टैक्स पटाएगा..बैंक से निकासी की राशि भी तय होगी तो क्या बुजुर्ग हो चुके माता पिता के लिए अब भी कोई स्वास्थ्य बीमा योजना सस्ते में उपलब्ध होगी..घर की चिंता भी पीएम आवास देने से खत्म नहीं होती..उसमें जो भ्रष्टाचार का कीड़ा लगा है उसे दूर करने से मिटेगी..फिर होम लोन सस्ते करने के विकल्प पर क्या सरकार ध्यान देगी..या नोटबंदी और डिजिटिलाइजेशन के नाम पर ढोल पीटकर देश की आम जनता फिर ठगी जाएगी। केंद्र सरकार अपना आम बजट एक फरवरी को पेश करने जा रही है। बजट से सीधे तौर पर मध्यम वर्ग के परिवारों पर सबसे ज्यादा असर होता है। और आम आदमी का वास्ता शिक्षा, स्वास्थ्य, रोटी, कपड़ा और मकान तक सीमित है।

उन्हें कुछ चाहिए तो सस्ता ट्रांसपोर्ट, फिर रेल हो या बस..इसके अलावा आयकर में छूट की सीमा बढ़ाया जाने की मांग पिछले तीन बजट से हर नौकरी पेशा कर रहा है। नोटबंदी और कालेधन पर अंकुश के जुमले ने इस बार के आम बजट से हर वर्ग की उम्मीदें बढ़ा दी हैं। इनका रखा जाए ध्यान तो बनेगी बात- शिक्षा पर खर्च सीमित किया जाए आज के समय में बच्चों की पढ़ाई मध्यम वर्ग के परिवारों के लिए एक चुनौती बन गई है एक नौकरी पेशा व्यक्ति को कुल सैलरी का 20-30 प्रतिशत तक केवल बच्चों की पढ़ाई पर खर्च करना पड़ता है। इस खर्च को सीमित करने के लिए सरकार को पहल करनी चाहिए। कर्मचारियों के लिए सातवां वेतन मान लागू किए जाने के बाद आयकर सीमा बढ़ाकर न्यूनतम पांच लाख रुपए करनी चाहिए। अभी सैलरी का लगभग 20 प्रतिशत तो टैक्स में ही चला जाता है। अमीर हो या गरीब सभी के बच्चों का शिक्षा का समान अधिकार दिया जाना चाहिए..नौनिहालों की चिंता है तो बजट में निजी स्कूलों की फीस पर नियंत्रण लगाने फीस नियामक आयोग का गठन किया जाने जैसे प्रावधान और स्कूलों की फीस श्रेणीवार तय कर देनी चाहिए। हेल्थ इंश्योरेंस सस्ती दरों पर हो उपलब्ध हेल्थ इंश्योरेंस को भी बुजुर्गों के लिए कम खर्चीला किए जाने की जरूरत है। न सिर्फ बुजुर्ग बल्कि देश के हर युवा को स्वास्थ्य गारंटी सेवा के तहत कम दरों पर हेल्थ इंश्योरेंस उपलब्ध कराए जाने के प्रवाधान किए जाने चाहिए।

साथ जीवन रक्षक दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करते हुए इसके दायरे में और भी दवाओं को शामिल किया जाना चाहिए। टैक्स की मार अब कम की जाए सबसे पहले केंद्र सरकार को करों का बोझ मध्यम वर्ग पर कम करना चाहिए। वर्तमान में आयकर सीमा 3 नहीं 3.50 किए जाने की आवश्यकता है प्रति व्यक्ति आय के दावे देखे जाएं तो आज आम आदमी की जरूरत 900- 1000 रुपए प्रतिदिन की है। जिसे टैक्स फ्री किया ही जाना चाहिए। मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए इतनी राहत ही संजीवनी का काम करेगी। होमलोन को सस्ता किए जाने की जरूरत अपना घर सबका सपना होता है कस्बों का शहर में तब्दील होना वहां प्रॉपर्टी के रेटों में जिस स्तर का इजाफा हो रहा है उससे लोगों के खुद के घर के सपने पूरे नहीं किए जा सकते। आम आदमी आज भी टू बीएचके की चाहत पूरी करने की स्थिती में नहीं है। ऐसे में पीएम आवास विकल्प हो सकता है लेकिन पहली पसंद नहीं.. वो गरीबों के लिए है मध्यम वर्गीय परिवार इनसे अब भी अधूता है।

िलहाजा बैंक की ब्याज दरों में कटौती की मांग भी इस बजट में किए जाने की पहल होनी ही चाहिए। घर के होमलोन की ईएमआई कम हो जाने का सपना पूरा हुआ तो लोगों के अपने घर के सपना भी पूरा हो जाएगा। सबसे पहले तो होमलोन की दरों को कम करके इसे सस्ता किए जाने की जरूरत है। उद्योगों को भी राहत की दरकार- देश में ज्यादातर उद्योग मंदी के दौर से गुजर रहे हैं। बिजली, पानी के लिए तरसते उद्योगों को भी सस्ती दरों पर बिजली के साथ ही पानी भी सस्ती दरों पर उपलब्ध कराने की दिशा में पहल की जानी चाहिए। स्वयं का व्यवसाय स्थापित करने लोगों के लिए बेहतर योजनाओं के साथ ही उन्हें अनुभव का लाभ दिलाने बड़ी कंपनियों में प्रशिक्षण जैसे अवसर भी दिए जाने के विकल्पों पर काम किया जाना चाहिए। घरेलू उद्योग और पारंपरिक उद्योंगो को बढ़ावा देने के लिए योजनाएं तैयार की जाएं। बहुमंजिला इमारतों के साथ बड़े बड़े कॉर्पोरेट दफ्तरों से पहचान रखने वाली बी ग्रेड टाउन की तरफ आईटी कंपनियों की आमद के लिए उन्हें पर्याप्त रियायतें दी जानी चाहिए। जिससे बी ग्रेड टाउन में ही पढ़े लिखे युवाओं को रोजगार उपलब्ध करवाया जा सके। कृषि एक बेहतर विकल्प- रोजगार और उद्योग दोनों ही रुपों में देश में कृषि को बढ़ावा दिए जाने की आवश्यकता है। इसके लिए आम बजट में सरकार को किसानों की जमीन खरीद फरोख्त पर रोक लगाए जाने से लेकर फसल उत्पादान बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाए जाने की उम्मीदें किसानों को हैं। किसान अपने हरे भरे खेतों और पशुधन के साथ खुश रहना चाहता है बशर्ते कि उसे उत्पादन का सही मूल्य मिले। इतना ही नहीं समय पर बिजली, पानी और खाद, बीज का इंतजाम किए जाने से ही वह खुश है। मंहगाई की मार से कोई निजात दिला सकता है तो वह इस देश का किसान है जो सही मायनों में देश निर्माता है। इसलिए खाद्य उत्पादन की दिशा में नए कदम उठाए जाने के साथ ही किसान बीमा, फसल बीमा, मवेशी बीमा के साथ पूर्व के बजट में घोषित मृदा परीक्षण प्रयोगशालाओं के संचालन के लिए भी बजट का प्रावधान होना चाहिए। जागरुक किसान तो केंद्र सरकार को अभी से किसान विरोधी करार देने लगी है..जानकर आश्चर्य हुआ तो पूछ लिया वजह क्या है ऐसी सोच क्यों? उत्तर आप भी सुनिए...70 साल तक शासन करने वाली कांग्रेस को कोसने वालों से पूछो...यूपीए की सरकार किसानों को प्रति क्विंटल 200 रुपए प्रोत्साहन राशि दे रही थी..आखिर उसे बंद क्यों किया...गेंहू उत्पादन में भारत पहले नंबर पर है...चावल उत्पादन में हम दूसरे नंबर पर हैं...दलहन और तिलहन के उत्पादन की स्थिती भी ठीक ही है...ये किसान आंकड़े सामने रखते हुए बात कर रहे हैं। सरकारी रिकॉर्ड में पिछले दो सालों से उत्पादन की स्थिती यूपीए सरकार की तुलना में बेहतर है...फिर अपनी ही रिपोर्ट में दूसरे देशों को गेंहू और चावल भेजने वाले देश को भला बाहर से गेंहू और चावल के साथ दालें मंगवाने की जरूरत क्यों पड़ी...

सवाल मुझे तो सोचने पर मजबूर कर देता है..अब जरा आप भी सोचिए... पांच राज्यों में चुनाव के मद्देनजर आमबजट का लोक लुभावन होना तय है लेकिन आवश्यका इस बात की है बजट लागू किए जाने योग्य भी हो घोषणाएं महज कागजों तक सिमट कर न रह जाएं.. तीन साल तक बातें बहुत हुई अब जनता का विश्वास जीतने कुछ ठोस कदम उठाए जाने की आवश्यकता है सपने वही दिखाए जाएं जो दो सालों में यथार्थ की जमीन पर साकार होते दिखें...

कुमार पाठक 

बात उत्तरप्रदेश चुनाव की

 


-कुछ दिन पहले की ही बात है। जब  भी कोई उत्तरप्रदेष  में बिहार के तर्ज पर भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ गठबंधन की बात करता था  समाजवादी पार्टी की तेज प्रतिक्रिया होती थी कि वह किसी और दल के साथ गठबंधन क्यों करे। उसकी स्थिति उत्तरप्रदेष मे काफी मजबूत है और वह अपने बल पर चुनाव लड़ कर बहुमत हासिल करेगी व अपने बूते पर 2017 में दोबारा सरकार बनाएगी। लेकिन उस समाजवादी पार्टी की इधर दो सप्ताह से अचानक गठबंधन या महागठबंधन बनाने जरुरत क्यों महसूस होने लगी। और इसकी कवायत क्यों षुरु हो गई। क्या इसका यह मतलब लगाया जाए कि समाजवादी पार्टी अपने बल पर सरकार बनाने की आषा छोड़ चुकी है। और अपनी हार मान चुकी है। बीएसपी की नेता मायावती की यह बात क्या  सही है कि संपत्ति हार स्वीकार कर ली और इसी कारण अन्य दलों का दामन थाम कर अपनी नैया पार लगाना चाहती हंेेेेेै। डूबते को तिनके का सहारा चाहिए,यह कहावत तो आपने सुना ही होगा। क्या समाजवादी पार्टी इसी ओर बढ़ रही है।बिहार में भी पहले भारतीय जनता पार्टी को हराने के लिए जो गठबंधन बना था, उसमें समाजवादी पार्टी को षमिल थी, लेकिन अंतिम समय में यह पार्टी गठबंधन से अलग होकर चुनाव लड़ी थी। परिणाम क्या हुआ-जदयू,राजद,और कांग्रेस का गठबंधन ने न केवल भारतीय जनता पार्टी को हराया बल्कि समाजवादी पार्टी को एक भी सीट हासिल  नही होने दी। इस जीत के बाद बिहार के मुख्यमंत्री नीतीष कुमार की नजर उत्तरप्रदेष पर गयी और उन्होनें अजित सिंह की पार्टी के साथ गठजोड़ करने की कोषिष की। बात कुछ आगे बढती दिखायी पड़ी तो अजीत सिंह ने यू टर्न लिया  और बात वही रुक गयी भी अब जाकर गठबंधन हुआ। कुछ महीने यू ही व्यतीत  हो गए। फिर उत्तरप्रदेष में समाजवादी के प्रथम परिवार यानी मुलायम सिंह यादव के परिवार में  महासंग्राम षुरु हुआ। इस महासंग्राम ने चाचा षिवपाल सिंह यादव और भतीजा मुख्यमंत्री अखिलेष यादव के बीच महाभारत का रुप धारण कर लिया और यह सड़कों तक आ गया। सबको उम्मीद के पिता और समाजवादी पार्टी के सर्वेसर्वा मुलायम सिंह यादव चाचा-भतीजा के बीच के संघर्ष को षायद रोक लेंगें। लेकिन ऐसा नही हुआ। अखिलेष यादव ने बगावती रुप धारण किया और पिता के सामने भी नही झुके। सपा दो धड़ो में विभाजित हो गई। एक तरफ मुलायम सिंह यादव और षिवपाल सिंह यादव तो दूसरी ओर अखिलेष यादव और उनके एक अन्य चाचा रामगोपाल यादव जिन्हे बाद में अखिलेष का साथ देने के लिए पार्टी के महामंत्री के पद से तो हटाया ही गया पार्टी से भी निष्कासित कर दिया। अखिलेष ने बहुत ही संयम से काम लिया और रामगोपाल  यादव के निष्कासन पर मौन ही साधे रखा। उन्होने अपना हौसला बनाए रखा और इसी कड़ी में मुलायम सिंह यादव के चहेते पार्टी के महामंत्री अमर सिंह को दलाल तक कह ड़ाला और इषारों ही इषारों में यह संकेत दे दिया कि परिवार में फूट ड़ालने में उनकी अहम भूमिका हैै।उन्होने ही चाचा षिवपाल यादव को उनके खिलाफ भड़काया। परिवार की यह लड़ाई जब सड़क पर आ गई तो पार्टी की भारी किर किरी तो हुई ही साथ ही उसका ग्राफ भी काफी नीचे गिरा। लेकिन आष्चर्य की बात तो यह है कि इस लड़ाई में उनकी याने अखिलेष की भूमिका से लोकप्रियता काफी बढ़ी और एक सर्वे के अनुसार वह मतदाताओं के मुख्यमंत्री के रुप में पहली पसंद बने रहे लेकिन सवाल उठता है कि जब पार्टी जीतेगी तभी तो वह मुख्यमंत्री बनेंगंे और जब पार्टी ही हार जाएगी तो उन्हे मुख्यमंत्री कौन बनाएगा। समाजवादी पार्टी के इस भयानक झगड़े से मुलायम सिंह यादव को यह लग गया कि अब अपने बलबूते पर सरकार बनाना संभव नही होगा इसलिए उन्होने अपने भाई षिवपाल सिंह यादव के माध्यम से उत्तरप्रदेष मे भारतीय जनता पार्टी को हराने के लिए सभी सेक्यूलर ताकतों को एक जुट होने का आव्हान किया। इस पर मुलायम सिंह की सहमति थी। उनकी सहमति के बिना षिवपाल तो आगे बढ़ नही सकते। बिहार चुनाव के पहले भी जनता परिवार को एकजुट होने का प्रयास किया गया था और यह घोषणा भी हो गयी थी कि एकीकृत जनता परिवार के मुखिया मुलायम सिंह यादव होंगंे। लेकिन मुलायम ने इस प्रयास की धज्जियां बिखेरते हुए अपने को इससे अलग कर लिया था। आज यह कहा जा रहा है कि इसके लिए रामगोपाल दोषी हैं। उन्होने ही एकता के प्रयास पर पलीता लगाया। यदि रामगोपाल उतने ही ताकतवर थे तो उन्हे सपा से क्यों निकाला गया। दूध का जला छाछ को भी फूंक-फूंक कर पीता है। नितिष कुमार को जब सपा की 25 वीें वर्षगांठ समारोह में षामिल होने का निमंत्रण मिला तो उन्होने सपा के षासक परिवार ने घमासान को ध्यान में रखते हुए इसमें भाग लेने से मना कर दिया। उन्हे इस बात का अभी तक मलाल है कि बिहार चुनाव के समय मुलायम ने उन्हें धोखा दिया। लालू यादव ने अपना समधी धर्म निभाया और समारोह में षामिल हुए।हालाकि वह चाचा और भतीजा के बीच मधुर संबंध बनाने में असफल रहे। इन दोनों को जब तलवार भेंट किया गया तो अखिलेष ने कहा कि इसे  चलाने भी दिया जाना चाहिए।ंेे षिवपाल ने सबसे पहले रालैाद मुखिया अजीत सिंह से गठबंधन बनाने के संबंध में बातचीत की और सभी धर्म निरपेक्ष ताकतों केा एक मंच पर लाने का प्रयास तेज करने पर आमराय बनी। इसके बाद उत्तरप्रदेष में कांग्रेस की प्रचार रणनिति का जिम्मा संभाल रहे प्रषांत किषोर के साथ जदयू के के सी त्यागी और षिवपाल यादव की बातचीत हुई।ं इस कड़ी को आगे बढ़ाते हुए 1 नवंबर को मुलायम सिंह ने प्रषांत किषोर से अपने दिल्ली स्थित निवास  पर लंबी वार्ता की। इस वार्ता का मुख्य केंद्र बिन्दु उत्तरप्रदेष में सभी समान विचारधारा वाले लोंगों को मंच पर लाकर चुनावी गठबंधन बनाना था। प्रषांत किषोर को कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी का विष्वास पात्र बताया जाता है। यह कयास लगाया जा रहा है कि प्रषांत किषोर का मुलायम सिंह से मिलना इस बात का संकेत है कि यदि ऐसा कोई गठबंधन बना तो इसका चुनावी लाभ मिलेगा। यह इससे लगता है कि जो मायावती अभी तक अपना निषाना भारतीय जनता पार्टी को बनाई हुई थी वह इस गठबंधन को बनने की सुगबुगाहट के साथ ही अपना मुख इस ओर मोड़ दिया है और इसकी तीखी आलोचना करने में लगी हुई है।
उधर बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी सभी भारतीय जनता पार्टी विरोधी पार्टियों को एक जुट होने की वकालत की है।उनका कहना है  िकवह राष्ट्रीय राजनीति में मुख्य भूमिका अदा करने के लिए तैयार है। कांग्रेस जदयू समाजवादी पार्टी और आम आदमी पार्टी ने ममता बनर्जी की इस स्पष्टवादिता का स्वागत किया है। यदि ऐसा कोई मंच बनता है तो यह अवष्य ही सत्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी के लिए खतरे की घंटी होगी।ंे
लेखक हिन्दुस्तान के पूर्व संपादक राज्य मामले है।

-सुरेष अखौरी-

गांव और गरीब की चिंता कब?

 

गांवों में स्वरोजगार के अवसर जुटा कर ही हम भूमिहीनों की दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भरता को कम कर सकते हैं. तभी उनके परिवार पढ़ पायेंगे और अपने स्वास्थ्य की रक्षा कर पायेंगे और किसी भी मुश्किल का सामना करने में सक्षम होंगे.
भारत सरकार द्वारा वर्ष 2011 में हुई जनगणना के आर्थिक, सामाजिक गणना के आंकड़े हाल ही में प्रकाशित किये गये हैं. ये आंकड़े भारत में गरीबों की वर्तमान दुर्दशा की कहानी बयान कर रहे हैं. चिंता का विषय केवल यह नहीं है कि गरीबों की हालत खराब है, बल्कि वह पहले से तेज गति से बदतर होती जा रही है. गौरतलब है कि अभी ग्रामीण क्षेत्रों के लिए ही ये आंकड़े प्रकाशित हुए हैं. जनगणना के आंकड़े बताते है कि जहां 2001 में जनजाति वर्ग के 45 प्रतिशत किसान अपनी जमीन पर खेती करते थे, 2011 में इस वर्ग के मात्र 35 प्रतिशत लोगों ने ही यह बताया कि वे अपनी जमीन पर खेती करते हैं. जहां 2001 में अनुसूचित जाति के 20 प्रतिशत लोग अपनी जमीन पर खेती करते थे, 2011 में 15 प्रतिशत की अपनी जमीन पर खेती करते रिपोर्ट हुए. जहां 2001 में 37 प्रतिशत लोगों ने यह कहा था कि वे भूमिहीन खेतिहर मजदूर हैं, 2011 में 44.4 प्रतिशत लोगों ने अपने आपको भूमिहीन खेतिहर मजदूर बताया. यानी 2001 से 2011 के बीच दस वर्षो में काफी संख्या में गरीबों के हाथ से भूमि छिन गयी.
भूमि की मिल्कियत व्यक्ति और परिवार के लिए रोजगार और आमदनी का मात्र एक जरिया ही नहीं, वह परिवार के लिए एक बीमा का भी काम करती है. समाज में व्यक्ति और परिवार का सम्मान भी भूमि की मिल्कियत से बढ़ता है. भूमिहीन लोग रोजगार के लिए सरकार समेत अन्य लोगों पर निर्भर करते हैं और उनका रोजगार भी आकस्मिक होता है, जबकि भूमि के मालिक लोग स्वरोजगार युक्त कहलाते हैं. भूमि के छिनने की यह प्रक्रिया राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के 68वें दौर की रिपोर्ट में भी परिलक्षित होती है. गौरतलब है कि इस रिपोर्ट में बताया गया था कि 2004-05 से लेकर 2009-10 के पांच सालों में ही स्वरोजगार में लगे 2 करोड़ 50 लाख लोग स्वरोजगार से बाहर हो गये और दूसरी ओर 2 करोड़ 20 लाख लोग दिहाड़ी मजदूर बन गये.
परिवार की आय से उसकी आर्थिक स्थिति का सही जायजा मिलता है. जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि कुल 13.35 करोड़ परिवारों (यानी कुल परिवारों का 74.5 प्रतिशत) में अधिकतम कमानेवाले सदस्य की आमदनी 5000 रुपये मासिक से कम थी. पांच से 10 हजार रुपये के बीच आमदनी वाले परिवारों की संख्या 3.1 करोड़ थी. ये आंकड़े स्पष्ट रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में अभावग्रस्तता की कहानी बयान करते हैं.
हमारी सरकारें आजादी के बाद से ही लगातार किसान और गांव की बेहतरी के वादे करती रही हैं. लेकिन सच्चाई यह है कि आज भी गांवों में 36 प्रतिशत लोग निरक्षर हैं. मात्र 29.7 परिवारों के पास ही सिंचित भूमि है. अभी तक मात्र 3.8 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों के पास ही किसान क्रेडिट कार्ड हैं. शहरों में जनदबाव व सुविधाओं के अभावों के चलते, अभावों में जी रही ग्रामीण जनता के पास कोई विकल्प भी नहीं दिखता.
किसी भी समस्या का हल उसके कारणों से निकलता है. लेकिन ग्रामीण अभावग्रस्तता और गरीबी का हल आसान नहीं है. सब जानते हैं कि भूमि की मिल्कियत गांव में सशक्तीकरण का माध्यम है. आजादी के बाद भू-सुधारों के द्वारा भूमिहीनों के आर्थिक सशक्तीकरण का कुछ प्रयास जरूर हुआ, लेकिन आज भू-सुधार बीते जमाने की चीज हो गये हैं. आंकड़े बताते हैं कि पिछले 10 वर्षो में गरीबों के हाथों से भूमि छिनने की गति बढ़ गयी है. लाखों किसानों की आत्महत्याएं इस बात का प्रमाण हैं कि कृषि अलाभकारी होती जा रही है और किसान मजबूरन खेती से विमुख होकर भूमि बेच रहा है. यही नहीं, जनसंख्या का दबाव भी भूमि के अभाव को बढ़ा रहा है. इसके अलावा बड़ी मात्र में भूमि का उपयोग गैर कृषि कार्यो के लिए होने लगा है. शहरीकरण, औद्योगीकरण, इन्फ्रास्ट्रर के लिए भूमि का उपयोग बढ़ा ही है और भविष्य में लाभ कमाने के लिए अमीरों द्वारा बड़ी मात्र में भूमि हस्तगत कर ली गयी है.
इन सब कारणों से भूमिहीनता की प्रक्रिया को बल मिला है. गणना के आंकड़े भी भूमिहीनता को ही अभावों का सबसे बड़ा कारण बता रहे हैं. ऐसे में गरीब को भूमि मिले, इसका तो प्रयास होना ही चाहिए, साथ ही वैकल्पिक रोजगार के अवसरों द्वारा उसका आर्थिक सशक्तीकरण भी जरूरी है. ग्रामीण उद्योग धंधों, विशेष तौर पर फूड प्रोसेसिंग, दस्तकारी, समेत लघु-कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देना होगा. कृषि को लाभकारी बना कर गांवों को खुशहाल बनाना होगा और गांवों को मुख्य धारा से जोड़ना होगा. ऐसी सब वस्तुएं जो गांवों में बन सकती हैं, उनके आयातों पर अंकुश लगाना होगा. ग्रामीण महिलाओं के लिए रोजगार के विशेष अवसर जुटाने होंगे. गांवों में स्वरोजगार के अवसर जुटा कर ही हम भूमिहीनों की दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भरता को कम कर सकते हैं. तभी उनके परिवार पढ़ पायेंगे और अपने स्वास्थ्य की रक्षा कर पायेंगे और किसी भी मुश्किल का सामना करने में सक्षम होंगे.
 
डॉ अश्विनी महाजन
अर्थशास्त्री, डीयू

स्याह करतूत

अक्सर यह शक जताया जाता रहा है कि चाहे बढ़ते एनपीए का मामला हो या बड़ी रकम के संदिग्ध लेन-देन का, कुछ बैंक अफसरों की मिलीभगत के बगैर यह संभव नहीं होता होगा। काले धन को सफेद करने के एक ताजा वाकये ने बैंकिंग प्रणाली के भीतर भ्रष्ट तत्त्वों की मौजूदगी सिद्ध कर दी है। नोटबंदी के बाद परेशानी भरी परिस्थितियों में जहां तमाम बैंकों के तमाम कर्मचारी अतिरिक्त कार्यभार उठाने में जुटे रहे, वहीं कुछ ऐसे भी तत्त्व हैं जिन्होंने इस मुश्किल समय को अपने लिए काली-कमाई का ‘सुअवसर’बना लिया और कइयों का काला धन सफेद करने में मददगार बन गए। प्रवर्तन निदेशालय ने दिल्ली के कश्मीरी गेट स्थित एक्सिस बैंक के दो प्रबंधकों को सोमवार को गिरफ्तार किया। एक के घर से एक किलो सोने की सिल्ली भी बरामद हुई। आरोप है कि पकड़े गए दोनों अधिकारियों ने चालीस करोड़ रुपए मूल्य के अमान्य नोटों को फर्जी कंपनियों के खातों में जमा कराने में मदद की और उसके बदले भारी रिश्वत ली।
ये अधिकारी कुछ सर्राफा कारोबारियों और उनके दलालों के माध्यम से बैंक बंद होने के बाद रात को बैंकों में नोट जमा कराते थे। गिरफ्तार एक बैंक प्रबंधक के लखनऊ स्थित घर से एक किलो और दिल्ली के दो कारोबारियों के घरों से एक-एक किलो की सोने की सिल्लियां मिली हैं। प्रवर्तन निदेशालय की मांग पर फिलहाल अदालत ने दोनों बैंक अधिकारियों को एक हफ्ते की हिरासत में उसे सौंप दिया है। असल में यह खेल अजीब तरह से रचा गया। कुछ सर्राफा कारोबारियों ने काले धन को सफेद करने वाले भ्रष्ट अमीरों को इस बात के लिए उकसाया कि वे पचास हजार रुपए प्रति दस ग्राम सोना उनसे खरीद सकते हैं। जबकि बाजार रेट तीस हजार रुपए प्रति दस ग्राम है। इस तरह से कारोबारियों के पास करोड़ों रुपए के अमान्य नोट आ गए। इसके बाद कारोबारियों ने एक चार्टर्ड एकाउंटेंट से संपर्क किया। उसने सारी तरकीब रची। उसने पहले फर्जी ग्यारह कंपनियां मजदूरों और गरीब लोगों के नाम पर बनार्इं। फिर उनमें बैंक अधिकारियों की मिलीभगत से कारोबारियों ने अपने अमान्य नोटों को जमा करना शुरू किया। इस तरह चालीस करोड़ रुपए उन्होंने इन फर्जी खातों में खपा दिए और फिर नेट बैंकिंग के जरिए ये पैसे अपने खातों में भेजने शुरू किए।
इस बीच दिल्ली पुलिस को अपने मुखबिर के जरिए इस गोरखधंधे की जानकारी हुई तो उसने प्रर्वतन निदेशालय को इसकी सूचना दी। इस पूरे काले कारोबार में और लोग भी शामिल हो सकते हैं। उन लोगों को भी गिरफ्तार किया जाना चाहिए जिन्होंने रातोंरात महंगे दामों पर सोना खरीद कर अपनी अवैध कमाई छिपाई है। प्रवर्तन निदेशालय को चाहिए कि जिस ईमानदारी और निडरता से उसने इस मामले का पर्दाफाश किया है, उसी तरह इसे तार्किक परिणति तक पहुंचाए। समाज भी ऐसे भ्रष्ट तत्वों को बेनकाब होते देखना चाहता है। कैसी विडंबना है कि जहां आम लोग अपनी गाढ़ी कमाई से बस दो हजार रुपए निकालने के लिए बैंकों के बाहर घंटों खड़े रहते हैं, और कई बार तो उन्हें खाली हाथ वापस भेजा रहा है, वहीं कुछ लोग अपना स्याह धन सफेद करने की नई-नई तरकीबें निकालने में व्यस्त हैं। यह अपराध तो है ही, एक बड़े अभियान को पलीता लगाने जैसा भी है। उम्मीद की जानी चाहिए कि ताजा वाकये के बाद वित्तीय मामलों के महकमे और भी सतर्कता बरतेंगे।

 

नोटबंदी से टमाटर लुढ़का


जशपुर : छत्तीसगढ़ के टमाटर उत्पादक नोटबंदी के कारण घाटे में अपने उत्पाद बेच रहे हैं. बाजार में 500 और 1000 के नोटों की कमी के चलते पहले जो 30 किलो का टमाटर का कैरेट 700 रुपये में बिकता था अब वह 70 रुपये से 120 रुपये में बिक रहा है. ऐसे में टमाटर के उत्पादक अपनी लागत का मूल्य तक निकाल पाने की स्थिति में नहीं हैं.
छत्तीसगढ़ का जशपुर जिला टमाटर के उत्पादन के लिये जाना जाता है. यहां के पत्थलगांव, लुंड़ेग, बागबहार, चिकनीमानी, झिमकी तथा सरईटोला में टमाटर की मंडी लगती है. जहां से छत्तीसगढ़ के अलावा झारखंड तथा ओडिशा तक से व्यापारी आकर टमाटर खरीदते हैं.

पहले जशपुर जिले के 2 हजार हेक्टेयर जमीन में टमाटर की फसल उगाई जाती थी जो अब बढ़कर 3 हजार हेक्टेयर तक का हो गया है. इस बार फसल कम होने से किसानों तथा उत्पादकों को मुनाफे की उम्मीद थी परन्तु नोटबंदी के कारण हुये चिल्हर तथा नकदी की दिक्कत के कारण उन्हें सस्ते में अपना टमाटर बेचना पड़ रहा है.(सीजी खबर से )