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सफलता की कहानी:- सबसे कम उम्र में आईपीएस से लेकर जज तक बने हैं ये लोग

22 साल के सफीन हसन जो देश के सबसे युवा आईपीएस अधिकारी हैं से लेकर 21 वर्षीय मयंक प्रताप सिंह जो सबसे कम उम्र में जज बने हैं ,ऐसे लोगों कहानियां देश भर के लोगों को प्रेरित करती हैं। 22 साल के देश के सबसे युवा आईपीएस अधिकारी जो 23 दिसंबर को सहायक पुलिस अधीक्षक का पदभार ग्रहण किये है। देश के सबसे युवा आईपीएस अधिकारी बनने के उनका सफर आसान नहीं था। उनका बचपन बहुत संघर्षपूर्ण रहा है। सफीन में मां ने बेटे की पढ़ाई के लिए रेस्टोरेंट से लेकर शादियों तक में रोटियां बनाने का काम किया। गुजरात के राजकोट में रहने वाले सफीन हसन 23 दिसंबर को नया इतिहास रचे। वह देश के सबसे युवा आईपीएस अधिकारी होंगे। सफीन की माता का नाम नसीम व पिता का नाम मुस्तफा है। सफीन हसन 23 दिसंबर को जामनगर के जिला पुलिस उपाधीक्षक का पदभार ग्रहण किये। गुजरात के बनासकांठा के एक छोटे से गांव कनौदर में प्राथमिक शिक्षा के बाद सफीन ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई सूरत में की है।21 साल के मयंक प्रताप सिंह भारत के सबसे कम उम्र के जज बनने वाले शख्स हैं। मयंक प्रताप सिंह राजस्थान के जयपुर शहर से हैं। मयंक ने न्यायिक सेवा परीक्षा साल 2018 में पास की थी। आपको बता दें, साल 2018 तक न्यायिक सेवा परीक्षा में बैठने की उम्र कम से कम 23 साल थी ,जिसको इस साल राजस्थान हाई कोर्ट ने घटाकर 21 साल कर दिया है। मयंक प्रताप सिंह हमेशा न्यायिक सेवाओं और समाज में न्यायाधीशों को मिलने वाले सम्मान के प्रति हमेशा आकर्षित रहे हैं। मयंक ने साल 2014 में राजस्थान यूनिवर्सिटी में एलएलबी के 5 साल के कोर्स में दाखिला लिए था जो इसी साल खत्म हुआ है।यूपीएससी सिविल सर्विसिज में टॉप करने वाले कनिष्क कटारिया की कहानी बहुत दिलचस्प है।विदेश में अच्छी-खासी नौकरी छोड़कर UPSC की तैयारी करने वाले कनिष्क कटारिया ने कभी सोचा भी नहीं होगा की उन्हें पहली रैंक हासिल होगी। कनिष्क ने कंप्यूटर साइंस में बीटेक किया हुआ है।कनिष्क ने सॉउथ कोरिया में एक करोड़ रुपए के पैकेज पर नौकरी की है। कनिष्क कटारिया की कहानी देश के कई युवाओं को प्रेरित करती है।

जिनपर है देश की सुरक्षा की जिम्मेदारी उनपर भारतीय करते है सबसे ज्यादा भरोसा... और किनपर नही करते भरोसा जानने के लिए देखे

नई दिल्ली:- जिनके ऊपर देश की जिम्मेदारी है उन जवानो पर सबसे ज्यादा भरोसा करते है लोग यह बात सर्वे में साबित हुआ है ।सर्वे के मुताबिक भारतीयों की नजर में सुरक्षाबलों में तैनात जवान सर्वाधिक भरोसेमंद हैं तो राजनेता सबसे कम विश्वास करने लायक। मार्केट रिसर्च फर्म इप्सोस का हालिया सर्वे तो कुछ यही बयां करता है। ग्लोबल ट्रस्ट इन प्रोफेशंस सर्वे में शामिल 70 फीसदी से ज्यादा देशवासियों ने सेना को सबसे ज्यादा भरोसेमंद पेशा बताया। वहीं, 59 फीसदी ने राजनेताओं को संशय की दृष्टि से देखने की बात कही। वैज्ञानिकों (60 फीसदी), डॉक्टरों (56 फीसदी) और शिक्षकों (52 फीसदी) को भी बेहद भरोसेमंद माना गया है। सर्वे के मुताबिक 52 फीसदी लोग मंत्रियों और 41 प्रतिशत विज्ञापन अधिकारी को भरोसे लायक नहीं समझते। इप्सोस इंडिया के पारिजात चक्रवर्ती ने कहा, सशस्त्र बलों को सर्वाधिक समर्पित पेशा माना गया है। बलिदान, प्रतिबद्धता और अनुशासन के मूल्यों को इनकी पहचान बताया गया है। इसी तरह वैज्ञानिक शोध, चिकित्सा और शिक्षा के पेश को भी विश्वसनीय माना गया है, जो देश निर्माण में अपना योगदान देते हैं। चक्रवर्ती के मुताबिक सिस्टम को साफ करने की कोशिशों के बावजूद राजनेता अधिकतर लोगों का विश्वास नहीं जीत सके हैं। विज्ञापन पेशवरों, रुचिकर कॉपी लिखने वाले और रचनात्मकता का प्रदर्शन करने वाले, ब्रांड के गुणों को प्रदर्शित करने वाले लोगों को भी संदेह भरी नजरों से देखा जाता है। सर्वे के नतीजे 16 से 74 साल के 19587 वयस्कों की राय पर आधारित हैं।

मिस कॉल

सुबह के 7:30 का समय था मैं हमेंशा की तरह अपने बिस्तर पर गहरी नींद में थी अचानक फ़ोन की घंटी बजी और मैं हड़बड़ाहट में थोड़ी जागी थी थोड़ी नींद में थी और आंखों को हाथों से मलते हुए फ़ोन को इधर उधर ढूंढने लगी फ़ोन चादर में कहीं छुप गया था उसे ढूढने के चक्कर में फ़ोन की घंटी बजते बजते थम गई।मैं इतनी नींद में थी कि मैंने किसने फ़ोन किया था उसे भी देखने की कोशिश नहीं कि और फिर बिस्तर में सो गई।सुबह की नींद मुझे सबसे प्रिय थी क्यों कि रात को देरी सोना और सुबह देरी से उठना ये मेरी ख़ासियत थी।मैं हर रोज यही सोच के सोती की कल से जल्दी सोऊंगी और सुबह जल्दी उठूंगी पर वो कल अब तक नहीं आया।आख़िर कार 9 बजे मेरी नींद खुली और मैं अंगड़ाई लेते हुए एक हाथ रजाई से बाहर निकालते हुए मैंने फ़ोन को ऑन किया एक आंख को खोलते हुए मैंने फ़ोन पे आये मिस कॉल को देखी और देखते ही मैं झट से बिस्तर पर उठकर बैठ गई बालो को जल्दी-जल्दी ठीक कर उसे क्लच किया तब तक मेरी नींद जा चुकी थी मैंने मन ही मन सोच क्या ये उसी ने काल की थी या गलती से कॉल आगे उसकी नहीं फोन की बैल तो पूरी बजी थी तो ये मिस कॉल तो नहीं हो सकती थी अब मिस कॉल थी तो अब बहुत से सवाल दिमाग़ में आना शुरू हो गये। चार साल हो चुके थे हमें अलग हुए अब तो वो बड़े पद पर थे उन्होंने अपनी ही एक परिचित दोस्त से शादी भी कर ली थी और एक बिल्कुल उसी की तरह एक बेटा भी था ये सब जानकारी मुझे हमारी एक कॉमन दोस्त ने मुझे बताई थी।मैं अब भी उसी जगह पर ठहरी हुई थी जहां उसने मुझे छोड़ा था हां समय आगे निकल गया था और उसके साथ मैं भी पर दिल और दिमाग़ अब भी वहीं था हक्कीकत में अब वो किसी और का था पर मेरे लिए अब भी वो वही कुणाल था। मेरे पास उसकी कुछ चीजें अब भी थी जो उसने मुझे दी थी मैंने उसे गुस्से में कह जरूर दी थी कि उसकी सारी चीजें मैंने फेंक दी है कुछ चीजें उसे वापस भी कर दी थी उसकी एक पिक थी और उसका लिखा वो लेटर जिसने उसे पहली और आख़री बार मुझे लिखा था जिसमे उसने अपनी बात हमारी पहली मुलाक़ात से शुरुवात की थी और साथ बिताए उन सब पलों के ज़िक्र भी किया था जो हमने साथ बिताए थे फिर धोरे -धीरे बिगड़ते हमारें रिश्तों के कारण का भी जिक्र किया उसमें उसने केवल मेरे से जो गलतियां हुई थी केवल उन्हीं बातों का जिक्र किया गया था पर वो गलतियां क्यों कि थी वो बहुत अच्छे से जानते हुए भी उसने केवल मेरी ही गलतियां गिनवाने को ज़्यादा महत्व देते हुए उन्ही बातों का जिक्र किया था गलतियां उसने पहले की थी मेरे होते हुए किसी और के यहां रिश्ता लेकर गये थे और वो भी किसी और ने ये रिश्ता नहीं भेजा था ये ख़ुद वो लड़की का रिश्ता अपने घर वालों को बताये थे और वो रिश्ता घर वालों को मंजूर नहीं था जब ये बातें उनकी चाची ने ही मुझे बताई थी।मैं जब उनकी एक जान पहचान वाली भाभी के घर में किराए से रहती थी और वो उनकी चाची के घर में रहते थे तो मेरा उनकी चाची के घर में आना जाना था और वो चाची भी मेरा बहुत अच्छे से ख़्याल रखती थी आज भी उन्हें हमारे बारे में कुछ नहीं पता है वो मुझे केवल एक अच्छा दोस्त ही समझती है कुणाल का ।जब मुझे ये बातें पता चली तो मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई काटो तो खून नहीं ऐसी हालत हो गई थी मन कर रहा था अभी कुणाल को कॉल करूं और उसे पूछुं की मुझसे क्या गलती हो गई जो मेरे साथ होते हुए किसी और के यहां रिश्ते लेके जाने की क्या जरूत पढ़ गई क्यों कि वो उसी लड़की यहां रिश्ता लेकर गए थे इसलिए वो रायपुर में नहीं थे।चाची ने मुझे आवाज़ लगाई रिशिता मैं ख़्यालों से बाहर आते हुए लड़खड़ाती आवाज़ से हां चाची बोलिये उन्होंने कहाँ क्या हुआ मैंने झूठी मुस्कान देते हुए कहां कुछ नहीं चाची अच्छा है कुणाल की शादी हो गई तो वो भी उसकी पसंद की लड़की से मुझे तो सबसे ज़्यादा खुशी होगी ऐसा कहते हुए मैंने जैसे तैसे अपनी बात को संभाली और चाची ने चाय का कप मेरी ओर बढ़ाते हुए और उस लड़की के बारे में और बाते बतानी शुरू कर दी जैसे उसका नाम उसकी पढ़ाई लिखाई और हां वो सरकारी नॉकरी में थी।कुणाल मुझे हमेंशा सरकारी नॉकरी करते देखना चाहते थे और इसलिए वो मेरा एडमिशन भी एक कोचिंग में करवा दिए थे जहां सरकारी नॉकरी की तैयारी करवाई जाती थी पर मुझे सरकारी नॉकरी में कोई दिलचस्पी नहीं थी पर जब भी मैं कुणाल से हमारी शादी की बात करती तो वो हमेंशा इधर-उधर की बात करके उसे टालने की कोशिश करते थे और सरकारी नॉकरी लगने पर ही हम शादी कर सकते है उससे क्या होगा उसके बारे में कहां करते थे पर मैं कुणाल से कहती कि यदि मुझे सरकारी नॉकरी न लगी तो क्या तुम मुझसे शादी नहीं करोगे तब वो चुप हो जाते और कहते कि अभी समय है इन सबके लिए समय आएगा तब सोचेंगे।मैं भी शांत हो जाती।आगे उन्होंने लेटर में और भी बहुत सी बातें लिखी थी लास्ट में कुछ शब्द मेरी परवाह है उन्हें इसलिए हमेंशा ख़ुश रहो और मैं हमेंशा तुम्हारा भला ही चाहता हूं इन शब्दों के साथ अंत में तुम्हारा कुणाल लिख कर वो पत्र को समाप्त किया।न जाने मैंने कितने बार ये पत्र पढ़ चुकी थी और अंत में लिखे तुम्हारा कुणाल पढ़ कर मैं कुछ देर उन सारी बातों को भूल कर "तुम्हारा" शब्द पर थोड़े देर के लिए विश्वास करने लग जाती थी की वो मेरे है और किसी और के नहीं हो सकते थे पर वास्तविकता तो कुछ और ही थी।ये सब सोचते-सोचते लग भाग 11 बज चुके थे।मैं आज भी उन जगहों में जाती थी जहां हमनें साथ वक़्त गुजारा था मैं उसी गार्डन के उसी बैंच में अक़्सर बैठा करती जहां हम एक दूसरे के हाथों को पकड़े बैठा करते थे।कुणाल को करेले की सब्ज़ी बहुत पसंद थी जब भी मैं जब भी करेले की सब्जी बनाती हूँ उसकी याद जरूर आ जाती है ।हमें सबसे ज़्यादा मंदिर के दर्शन साथ ही किये थे।कुणाल की दो बहनें और माता-पिता थे कुणाल अकेले ही इस घर के वारिस थे उनकी एक बहन थी जिसका बचपन से ही दिमाग़ का विकास ज़्यादा नहीं हो पाया था एक बहन की शादी हो चुकी थी कुणाल घर में सबसे बड़े थे और उनके गावों में दूसरे जात की लड़की से शादी करने पर दंड का प्रावधान था ये सारी बातें मुझे वो हमेंशा बताते रहते थे।उन्हें उनकी छोटी बहन की बहुत चिंता होती थी उनकी चिंता देख मैं हमेंशा कहती थी हमारी शादी होगी तो हम खुद का बच्चा नहीं करेंगे हम इनका ही ख्याल रखेंगे हमारा बच्चा होगा तो हम इनका ध्यान नहीं रख पाएंगे मेरी ये बातें सुन वो खूब हँसा करते थे और मैं गुसा हो जाती थी और वो मुझे मनाने के लिए मेरे माथे पर किस करके गले से लगा लिया करते थे और उनकी बाहों में आने के बाद मैं सब भूल जाती थी उनकी बाहों में मेरी जन्नत थी ये बात वो बहुत अच्छे से जानते थे कुणाल अपनी गलती कभी नहीं मानते थे चाहे कुछ भी हो जाये शायद यही वजह थी...... किसी ने सच ही कहाँ है पहला प्यार कभी भुलाया नहीं जा सकता।सवाल अब भी वही था कि कुणाल ने सच में मुझे कॉल की थी या गलती से लग गई थी।मैं सोच में थी कि क्या मुझे वापस कॉल बैक करनी चाहिए या नहीं यदि कॉल कर भी दी कहीं उनकी जगह उनकी पत्नी ने कॉल अटेंड कर ली तो क्या होगा क्या जवाब दूंगी।फिर भी खुद को समझाते हुए मैंने कुणाल को कॉल करने का मन बना ही लिया।रिंग बजने लगी उसके साथ-साथ मेरा दिल भी जोरों से धड़कने लगा चौथी रिंग पर उधर से एक पुरुष की आवाज आई ये कुणाल की आवाज थी मेरा दिल बैठ गया था उस कुछ समय के लिए मुझे समझ नहीं आया क्या कहूँ फिर उधर से आवाज आई रिशिता क्या तुम हो मुझे अपना नाम कुणाल के मुंह से सुनकर बहुत अच्छा लगा और मैंने भी जवाब देते हुए कहां हां मैं हूँ आज तुमने सुबह कॉल की थी तुम्हारे पास अब भी मेरा नम्बर है किस काम के लिए कॉल किये थे मुझे?कुणाल हँसते हुये कहाँ पहले हालचाल तो पूछा होता मैंने भी मन ही मन सोची हां इतने दिनों के बाद कॉल पे बात हो रही है और मैंने भी ।हां मैंने काल किया था सुबह तुमको क्यों पता चला कि तुम अब मेरी बॉस बनकर यहां आई हो जब मैं आफिस गया था तो मुझे तुम्हारे बारे में पता चला सच कहूं मुझे बहुत ख़ुशी हुई कि आखिर कार तुमने सरकारी नॉकरी को चुना इसलिए मैंने तुम्हें बधाई देने के लिए कॉल की थी अब तो हम रोज मिला करेंगे आख़िर अब तुम मेरी बॉस जो ठहरी।उसकी बातों को सुन मैं मन ही मन सोचने लगी कि ये यदि मैं पहले होती तो शायद हम साथ होते तुम्हे मुझसे नहीं सरकारी नॉकरी से महौबत थी इसलिए तुमने सरकारी नॉकरी वाली लड़की से शादी की थी।कुणाल ने कहां क्या तुम कुछ नहीं कहोगी।मैंने कहां हां धन्यवाद बस इतना ही कहोगी मैंने कहाँ हां और क्या।कुणाल ने भी कल आफिस में मिलते है कहते हुए फ़ोन रख दिये। मन तो बहुत था कुणाल से बहुत सी बातें करूँ उसे बताऊं की मैं तो कभी सरकारी नॉकरी नहीं करना चाहती थी मैं तो राइटर बनना चाहती थी पर जब उसने मुझे सिर्फ सरकारी नॉकरी के लये बेइज्जत किया था और मुझपे इल्ज़ाम लगाए थे कि मैं उनसे प्यार केवल उनकी नॉकरी की वजह से करती हूं और शादी इसी वजह से करना चाहती थी तब मैंने भी सोच की सरकारी नॉकरी करके उन्हें बता दूंगी की मैं जो चहुं वो कर सब कर सकती हूं मैं भी सरकारी नॉकरी के सकती हूँ पर सच ये था मैंने कुणाल से प्यार की थी उनकी सरकारी नॉकरी से नहीं।आज जब उसकी बधाई के लिए कॉल आई तो मुझे बहुत ख़ुशी हुई।कुणाल ने बधाई तो दी पर उसकी आवाज़ में पछतावा जरूर महसूस कर सकती थी वो भी मुझसे बिछड़ने के बाद बहुत दुखी थे ।सरकारी नॉकरी वाली लड़की से शादी तो जरूर कर ली थी कुणाल ने पर वो ज्यादा समय परिवार को नहीं दे पाती थी जिसकी वजह से हर रोज़ दोनों के बीच लड़ाइयां हुआ करती थी।जब आप किसी से बहुत प्यार करते हो तो रिश्ता खत्म होने के बावजूद भी कहीं न कहीं से उसकी सारी जानकारी जुगाड़ ही लेते है वैसे ही मुझे भी उसकी जिंदगी की हर बात पता थी हां कुणाल ने भी मेरी थोड़ी बहुत जानकारी ले रखी थी पर कभी कॉल नहीं किये थे इन चार सालों में हमनें।डोर बेल की आवाज मुझे सुनाई दी मैं उठ खड़े हुई और दरवाजा खोला दरवाज़े पर मेरे पति थे मैंने घड़ी की तरफ देखा तो 6 बज रहे थे उन्होंने कहाँ आज बहुत काम था सुनों एक कप चाय पिला दो मस्त अदरक डाल कर मैंने भी हल्की मुस्कान दी और किचन की ओर चल पड़ी। ||वर्षा||

नए साल में अब 130 रुपये में मिलेंगे 200 चैनल फ्री चैनल ट्राई ने केबल नेटवर्क ग्राहकों को दी बड़ी सौगात

नई दिल्‍ली:-नए साल पर टेलीकॉम रेगुलेटर (ट्राई) ने केबल नेटवर्क ग्राहकों को बड़ी सौगात दी है। ट्राई ने एक नई टैरिफ सूची जारी की है, जिसमें अब ग्राहक को 130 रुपए में 200 चैनल फ्री मिलेंगे। जबकि पहले 130 रुपये में 100 चैनल ही मुफ्त मिलते थे। यह व्‍यवस्‍था एक मार्च 2020 से लागू होगी। इसके साथ ही ट्राई ने एक और बदलाव किया है कि 12 रुपए से ज्यादा कीमत वाले चैनल बुके का हिस्सा नहीं होंगे। कंपनियों को टैरिफ की जानकारी 15 जनवरी को वेबसाइट पर डालनी होगी। बता दें कि बीते साल ट्राई ने नई ब्राडकास्ट टैरिफ व्यवस्था लागू की थी। इसके तहत ग्राहकों को सिर्फ उन्हीं चैनलों के लिए भुगतान करना पड़ता है, जिन्हें वे देखना चाहते हैं। पहले ब्रॉडकास्टर्स पैकेज में चैनल देते थे, यानी मनपसंद चैनल देखने के लिए कुछ ऐसे चैनल्स के लिए भी पैसे देने पड़ते थे, जो आप कभी नहीं देखते हैं। जब ट्राई ने नई ब्राडकास्ट टैरिफ व्यवस्था लागू की थी, उसमें टीवी ग्राहकों को 100 फ्री टू एयर चैनल दिए गए थे। इनमें 26 चैनल दूरदर्शन के हैं। इसके लिए उन्हें टैक्स हटाकर 130 रुपये का भुगतान करना था। इसके अतिरिक्त अपने मनपसंद चैनल के देखने के लिए तय रकम का पेमेंट करना पड़ता है।

अनजानी मुलाक़ातें और नये साल का आग़ाज़-वर्षा

अनजानी मुलाक़ातें और नये साल का आग़ाज़ ..................................

वो अनजान था वो एक मुसाफ़िर था वो जो भी था पर इस सफर में वो मेरा एक लौटा जानने वाला था।

2019 खत्म होने की कगार पर है और हम 2020 के स्वागत करने के लिए बेसब्री से इंतजार कर रहे है मानो घर मे कोई नई दुल्हन का गृहप्रवेश होना हो।सब बहुत खुश है जैसे शादी के बाद नया जोड़ा हनीमून की प्लानिंग करता है वैसे ही लोग नये साल के स्वागत के लिये बाहर जाने का प्लान बना रहे थे ।मेरा भी बाहर जाने का प्लान था पर नए साल के स्वागत के लिए नहीं दरसल मेरी बड़ी दीदी के बेटे के जन्मदिन रहता है 31 को और मेरे भैया का 1 जनवरी को तो जन्मदिन की खुशी और नए साल का स्वागत भी हम साथ ही मना लेते है इसी लिए मैं हज़रत निज़ामुद्दीन राजधानी B4 सीट नम्बर 20 में बैठ कर बैंगलौर जा रही हूं पीली कुर्ती और सफेद सलवाल बाल खुले है मेरे और कानों में ईयर फ़ोन लगा गाने चला रखे हैं मैंने और हाथों में चेतन भगत की बुक है "द गर्ल इन रूम 105" एक अनलव स्टोरी पढ़ते हुए सफ़र का आगाज किया मैंने।

ट्रैन भी अपनी रफ़्तार से चल पड़ी पूरे डिब्बो में आर्मी के जवानों की ज्यादा तादाद थी मेरे अलग बगल ज़्यादा लड़के ही थे इसलिए मुझे शांत बैठना पैड रहा था वैसे मैं बिल्कुल भी शांत नहीं बैठती ये मेरी ख़ासियत है पर कोई लड़की होती बगल में तो शायद मैं उसकी पूरी हिस्ट्री जान गई होती और वो मेरी।मेरी ट्रैन पहले ही 7 घंटे देरी से चल रही थी क्यों कि ये दिल्ली से आती है और वहां काफी ठंड थी और कोहरे की वज़ह से वो वही से देरी सी निकली थी।मेरा फ़ोन बजा बड़ी बहन का फ़ोन था वो मुझे कहने लगी तुम फ्लाइट से क्यों नहीं आती हो हर बार तुम्हारी ट्रैन लेट ही रहती है ठीक है ये बताओ कहाँ तक पहुँची हो खाने के लिए कुछ लाई हो या ट्रैन से लेने वाली हो टाइम पे कहा के सो जाना सुबह फ़ोन करना मैंने उसे उसके सब सवालों के जवाब देते हुए उसे कहाँ मैं सो जाऊंगी और सुबह उठ के फ़ोन करूंगी।राजधानी ट्रैन सुनते ही लग्ज़री गाड़ी की कल्पना थी मेरे दिमाग में ये मेरी पहली यात्रा थी इस ट्रैन से पर सच कहूं ये मेरी सबसे बेकार यात्रा थी लग्जरी जैसा कुछ भी नहीं था इससे अच्छी तो बाकी के ट्रेनों में सुविधा होती है खैर अब यही ट्रेन से मुझे बैंगलौर जाना था।वेंडर ने आवाज लगाई मैडम वेज या नॉनवेज मैंने बोली वेज फिर वो चला गया इस ट्रेन की बस एक ही बात अच्छी थी कि इसमें खाना नाश्ता सब मिलता था पर टेस्ट की बात मैं नहीं करना चाहती।सामने बैठे एक भैया मुझे काफ़ी देर से देख रहे थे आख़िर कर मैंने बहुत देर बाद अपनी चुप्पी तोड़ी और बात एक पानी की बोतल मांगते हुए शुरू की सबसे पहला सवाल की आप कहाँ जा रहे हो जो हर कोइ यही पूछकर अपनी बातें आगे बढ़ाता है ट्रैन में हल्की फुल्की पहचान हुई फिर उनके फ़ोन की घंटी बजी और वो बात करने लग गए हमारी बातों का सफर वहीं थम गया मैं भी अपनी बुक को लेकर वापस अध्याय 10 पढ़ना शुरू कर दी इससे पहले मैंने कभी चेतन भगत की कोई बुक नहीं पढ़ी थी ये भी इस ट्रेन के सफर की तरह पहली बार ही था जो मैं चेतन भगत की बुक पढ़ रही थी ये इतनी अच्छी तरह लिखी गई थी कि उसे पढ़ते-पढ़ते मेरा सफर बहुत अच्छा गुजर रहा था और समय का पता ही नहीं चल रहा था देखते ही देखते 11 बज चुके थे और मेरे ऊपर के भैया ने आवाज लगाई लाइट जल्दी बंद कर दीजिएगा मैंने 10 मिनट कहकर फिर पढ़ना शुरू कर दी थोड़ी देर बाद लाइट बंद कर मैं भी सो गई।सुबह होते ही चहल पहल से मेरी नींद जागी फिर नाश्ता मैडम बोल मुझे वेंडर ने नाश्ते की प्लेट मेरे हाथों में थमा दी मैं फ्रैश होते ही नाश्ता करते वक्त फिर वही भैया ने मुझे पूछा आप कहाँ जा रही हो मैंने कहाँ दीदी के यहां उनको विस्तार से सब बात बताई फिर वो भी बताना शुरू किए मैं दिल्ली से हूँ रेलवे में लोको पायलेट हूँ दोस्त के यहाँ जा रहा हूँ नये साल को सेलिब्रेट करने रेल्वे का नाम सुनते ही मुझे लगा अरे ये तो मेरे परिवार के ही सदस्य है

आप सोच रहे होंगे कि परिवार का सदस्य हां क्यों कि मेरा पूरा परिवार की तीन पीढ़ियों ने रेल्वे में अपनी सेवा दी थी और दे रहे है इसलिए जहां रेल्वे की बात होती है लगता है ये घर की बात है हमारे बगल के एक भैया भी बोले मेरे पापा भी रेल्वे में वैल फेयर इंस्पेक्टर है लो भई अब तो और मेरा मन गदगद हो गया धीरे से फिर हमने कहाँ इसलिए आपको इस्पेशल वाली चाय सर्व की जा रही थी वो हंस पड़े फिर हमनें बातों का सिलसिला शुरू किया वो भी नए साल के अपने दोस्तों के पास जा रहे थे उनके भी बहुत से प्लान थे मैंने उन्हें कुर्ग और चिकमंगलूर जाने की सलाह भी दे डाली क्यों कि मैं इन जगहों में जा चुकी थी और मुझे ये जगहें काफी पसंद आई थी। ट्रैन जैसा कि मैं आपको बता चुकी हूं कि लेट चल रही थी हम बैठे बैठे काफ़ी बोर हो चुके थे सब के फ़ोन में जो बजी कॉल आ रहे थे सब के यही प्रश्न थे कि कब तक पहुँच रहे हो सब का एक ही जवाब 12 तक पहुच जाएंगे और फिर फोन कट।सफ़र भी कितना अजीब होता है ना हम ट्रेन में बैठने से पहले तक किसी को नहीं जानते है पर जैसे-जैसे ट्रेन आगे बढ़ती है वैसे वैसे हम भी अपने आसपास के लोगों को जानना शुरू कर देते है जैसे कोई नई किताब को पढ़ना शुरू किया हो और सफ़र खत्म होते ही पूरी किताब पढ़ ली हो।उनसे बिछड़ते वक्त बुरा तो नहीं लगता पर एक अपना पन जरुर होता है उन्हें अलविदा करते वक्त फिर कभी मुलाक़ात न होगी फिर भी एक याद जरूर जुड़ जाती है

जब भी राजधानी के इस सफ़र का जिक्र होगा ये मेरी आँखों में इस सफ़र का जिक्र घूम जाएगा और हल्की मुस्कान होगी।ट्रेन रुकती है भैया ने आवाज लगाई बैंगलौर आ गया है मैं भी हां कहकर अपना सामान लेकर बाहर निकल पड़ी और कैब में सामान रख दीदी के घर की ओर निकल पढ़ी।

||वर्षा||

लग रहा बेचैनी का माहौल क्यों रो रहा है समाज ईश्वर उस बच्चे को दे परम् शांति :लेखक- ज्ञानेन्द्र पांडेय, वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर

स्कूली बच्चों की असामयिक मौत से पूरे समाज का दिल रो रहा है, पालकों पर क्या बीतती होगी यह सोचकर ही बेचैनी होने लगती है। ईश्वर बच्चों की परम शांति प्रदान करें और परीजनों को इस दुख की घड़ी में संबल प्रदान करे ऐसी प्रार्थना करता हूं।

स्कूली बच्चों के लिए पिकनिक तथा खेलकूद संबंधी अन्य गतिविधियां सस्ते और ढर्रे पर चलने वाली दुकान बन कर रह गई हैं। ऐसे किसी भी कार्य के लिए विशेषज्ञों की राय लेना जरुरी न होकर चंद रूपयों के बंदरबांट से सब खेल हो जाता है। जिम्मेदार अपना पल्ला झाड़कर कभी पालकों से अनापत्ति प्रमाण पत्र का खेल खेलते हैं और कभी कभी मुआवजा देकर। शैक्षणिक संस्थाओं को इस पर विचार करना चाहिए क्योंकि मुआवजा हर मर्ज की दवा नहीं होती और न ही इन पर रोक लगाना किसी समस्या का हल है। जरूरत सिर्फ थोड़ी सी इमानदार कोशिश करने की है।

शैक्षणिक संस्थाओं को विशेषज्ञों की राय तथा सेवाएं लेनी चाहिए और उनकी ही अगुआई में सभी खेलकूद, पिकनिक तथा एडवेंचर स्पोर्टस आयोजित किया जाना चाहिए।

आसानी से पैसा कमाने के चक्कर में लोग इसे व्यवसाय बनाकर काम कर रहे हैं, बिना किसी मापदण्ड और सुरक्षा मानकों के धड़ल्ले से यह धंधा चल रहा है। सरकार को भी तभी होश आता है जब कोई दुर्घटना होती है। कागजों पर चल रहे खेल संघ एवं विभाग का अस्तित्व महज अखबार में फोटो छपवाने के लिए रह गया है,ऐसा लगता है।

रेडी टू इट के पैकेट में निकल रहे कीड़े,,पोषण के नाम पर परोसा जा रहा जहर,,

नीलकमल सिंह ठाकुर मुंगेली- कुपोषण दूर करने के नाम पर सरकार किस तरह बच्चों और महिलाओं को जहर परोस रही है इसका खुलासा मुंगेली क्षेत्र के ग्राम बांकी में हुआ। महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा कुपोषण- सुपोषण कार्यक्रम के तहत खाद्य विभाग के साथ रेडी टू ईट मिल के पैकेट बांटे जा रहे हैं। मुंगेली के बाक़ी गांव में वाले हरिओम सिंह के घर भी इसी तरह के कुछ पैकेट दिए गए जिसमें निर्माण तिथि अक्टूबर और अगस्त 2019 अंकित है। सील बंद पैकेट को जब उन्होंने देखा तो उनके होश उड़ गए क्योंकि रेडी टू ईट मिल में बेहिसाब कीड़े मौजूद थे। उन्होंने इसे खोल कर देखा तो पाया कि रेडी टू ईट मिल के नाम पर जो पोषक आहार उन्हें दिया गया है उसमें कीड़े घूम रहे हैं । जाहिर है महिला एवं बाल विकास विभाग और खाद्य विभाग लोगों की सेहत से खुला खिलवाड़ कर रहा है। उन्हें दोयम दर्जे का रेडी टू ईट मिल प्रदान कर यह तसल्ली की जा रही है कि प्रदेश से कुपोषण दूर होगा। उल्टे इन्हें खाकर लोग बीमार पड़ेंगे। हरिओम सिंह तो जागरूक थे जिन्होंने इन्हें इस्तेमाल करने से पहले खोल कर देख लिया लेकिन कई ग्रामीण ऐसे भोले भाले और मासूम है जिन्हें सरकारी योजनाओं पर पूरा भरोसा होता है इसलिए पता नहीं ऐसे दूषित पोषाहार कितने ग्रामीणों ने ग्रहण भी कर लिया होगा। सरकारी योजनाओं को इसी तरह अधिकारी पलीता लगाते हैं, जिससे उनका मूल उद्देश्य पूरा नहीं होता। जाहिर है इसके पीछे विभागीय गफलत है । इसलिए शासन को तुरंत संज्ञान लेकर दोषी व्यक्तियों पर कार्यवाही करनी होगी , नहीं तो फिर लोग रेडी टू ईट मिल को खाने तक से इंकार कर देंगे और प्रदेश में कुपोषण हटाने की मुहिम खतरे में पड़ जाएगी। इस गंभीर मसले पर तत्काल कार्यवाही की आवश्यकता है।वही इस मामले की शिकायत सम्बन्धी अधिकारी से की गई तो उस अधिकारी के द्वारा शिकायत करता पर ही आरोप लगाने लगे कि तुम्हारे द्वारा ही पैकेट में कीड़ा डाल कर लाये हो,,,वही अधिकारी की भी इस मालमे में कार्यवाही करने से बचते नजर आ रहे हैं,,जानकारी के मुताबिक जो समूह के द्वारा ये रेडी टू इट का निर्माण कराया जा रहा है वो भाजपा पार्टी से सम्बंधित है जिसके चलते कार्यवाही करने से बचते नजर आ रहे हैं,,, ये पहला मामला नही है कि इस समूह के पोषण आहार में कीड़े नही मीले है इससे पहले भी मिला था और इसकी शिकायत किया भी गया था पर उस समय भाजपा का शासन था तो उस समय भी कार्यवाही नही हुए,,पर आज कांग्रेस की सरकार बन जाने के बाद भी उस समूह के खिलाफ कोई भी कार्यवाही होगी कि नही ये संसय बना हुआ है,,,

विशेष : मुंगेली के सीताफल की प्रसिद्धि छत्तीसगढ़ में ही नही अपितु दूसरे राज्य के लोग भी हैं इसके स्वाद के दीवाने,,

नीलकमल सिंह ठाकुर

मुंगेली- सीताफल का नाम आते ही मुह में पानी आ जाता है और कही मुंगेली का सीताफल हो तो बात ही कुछ ओर…. मुंगेली क्षेत्र का सीताफल पुरे प्रदेश में प्रसिद्ध है। यहाँ के सीताफल की सुगंध , सइज और स्वाद लोगो का मन मोह लेती है ,, क्षेत्र के सीताफल साइज में बड़े होने के कारण लोगो की पहली पसंद है ,, इसकी बाज़ार में आवक् दशहरा दिवाली के समय देखने को मिलती है,मुंगेली क्षेत्र के लोगो का आय का यह एक अच्छा जरिया है जिससे किसान त्यौहार के समय लाभान्वित होते है ।

मुंगेली जिले के किसान अब आधुनिक खेती में जुट गए है. अब किसानो का नगदी फसलो की तरफ झुकाव अधिक हो रहा है ! छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है क्योकि छत्तीसगढ़ की मुख्य फसल धान रही है और अधिकतर इलाके में धान की फसल ही बोई जाती है लेकिन कुछ वर्षो से किसानो का रुझान नगदी फसलो की तरफ बढ़ गया है ! आधुनिक खेती से जहा किसानो को पानी पर ज्यादा निर्भर नहीं होना पड़ता वही इस तकनीक से किसानो की आमदनी में बढ़ोत्तरी हुई है और किसान शासन की योजनाओ का भी लाभ लेते नजर आ रहे है ......

1 - मुंगेली क्षेत्र के किसान लगभग दो सो सालो से सीताफल की बाड़ी लगाते आ रहे है

2 -सीताफल की बाड़ी यहाँ की परंपरा बन गयी है

3 - क्षेत्र की कछारी जमीन सीताफल के लिए वरदान साबित हो रही है

मुंगेली जो की एक कृषि प्रधान जिला है , यहाँ के लोगो की मुख्य आमदनी कृषि से ही है ,ज्यादातर लोग कृषि पर आधारित है जैसा की प्रदेश में धान की अधिक खेती ली जाती है मुंगेली अंचल में भी किसान धान की फसले लेते है लेकिन कृषि प्रधान जिले मुंगेली में अब किसान आधुनिक किस्म की खेती में जुट गए है ! ऐसा ही एक नजारा मुंगेली विकासखंड के ग्राम बरईदहरा में देखने को मिला जहा के किसान नागेश्वर सिंह ने आधुनिक खेती करने की मिसाल पैदा की ! उन्होंने सीताफल की बाड़ी में पेड़ के निचे सोयाबीन , हल्दी , अदरक, आलू लगाकर अच्छी आमदनी अर्जित की वही एक मिसाल दुसरे किसानो के सामने पेश किया !

किसान की सफलता से अधिकारी भी गदगद है उन्होंने किसान नागेश्वर सिंह के कार्य की प्रशंशा करते हुए कहा की दुसरे किसानो को भी धान के फसलो पर निर्भर नहीं रहना चाहिए और नगदी फसलो की तरफ ध्यान देना चाहिए जैसे सीताफल केला, गन्ना, पपीता अनानस , हल्दी अदरक ,,सब्जी में घोभी आलू, करेला , मिर्ची, प्याज या जिनकी बाजार में जरुरत हो

सीताफल के फायदे

सीताफल स्वास्थवर्धक होता है , इसमें प्रोटीन विटामिन की बहुतयात रहती है , सीताफल पेट को ठण्डकता पहुचाता है / बाज़ार में इसकी मांग और इसका अच्छा रेट किसानो को मिलता है

! अधिकारी ने यह भी बताया की सीताफल की खेती बाड़ी जिले में बरदान साबित हो रही है मुंगेली और आसपास के क्षेत्रो की मिटटी कछारी होने के कारण सीताफल के किये एकदम उपयुक्त हैं, अधिकारी की माने तो सीताफल की खेती में दो महीने में ही एक लाख से भी अधिक की आमदनी हो सकती है क्षेत्र में दस से बारह किसानो को सिताफल की फसल के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है जिनकी जमीन कछारी है ,

शासन नगद फसल लगाने वाले किसानो को अनुदान,पौधा,दवा,खाद,हाइब्रिड बीज और लघु सिंचाई योजना के अंतर्गत स्प्रिकलर सेट और ड्रिप सिस्टम में छूट देती है !

सीजन -

जून जुलाई में सीताफल की बहार आ जाती है और अगस्त सितम्बर में फल लगने लगते है और अक्टूबर नवम्बर में फल बाज़ार में आ जाते है

आंगनबाड़ी केंद्रों में मिलीभगत से हो रहे भ्रष्टाचार ...

एक तरफ छत्तीसगढ़ शासन महिला बाल विकास विभाग को कुपोषण दूर करने के लिए बड़ी-बड़ी योजनाएं चला रही है तो दूसरी तरफ उसके ही देखरेख मैं लगे अधिकारी उसकी बंदरबांट करने में लगे हुए हैं लोगों को अपने कमीशन खोरी से ही मतलब है चाहे वह महिला बाल विकास के परियोजना अधिकारी हो या फिर सुपरवाइजर या फिर सहायिका व कार्यकर्ता क्यों ना हो मस्तूरी में महिला बाल विकास विभाग पहले से ही विवादित एवं बड़े-बड़े घोटाले से चर्चित है लेकिन इसमें सुधार कहीं भी नहीं होता मस्तूरी क्षेत्र के 75 परसेंट आंगनबाड़ी सही समय पर नहीं खुलता और नहीं किसी भी आंगनबाड़ी में पोषण युक्त बच्चों को भोजन मिलता है कई आंगनबाड़ियों में तो बच्चे आंगनवाड़ी केंद्र ही नहीं आते लेकिन उनकी नाम से आए हुए राशि बराबर समय पर आरण हो रही है मस्तूरी क्षेत्र में महिला बाल विकास के जितने भी जवाबदार अधिकारी बनकर आए हैं सभी अपनी मुख्यालय में बैठकर कुर्सी तोड़ने में ही मस्त रहते हैं क्षेत्र में कभी भी दौरा कर आंगनबाड़ियों के चरमर आए हुए व्यवस्था को सुधारने में दिलचस्पी नहीं लेते. मस्तूरी ब्लाक के पचपेड़ी क्षेत्र के ग्राम पंचायत चिल्हाटी में आंगनबाड़ी क्रमांक 5 में कार्यकर्ता भगवती केवट और सहायिका रेखा पांडे देखरेख व संचालित करती है पर आसपास के लोगों ने बताया एवं गांव के कुछ जनप्रतिनिधियों ने उच्च अधिकारियों को लिखित में सूचना दी है कि ग्राम पंचायत चिल्हाटी के आंगनवाड़ी क्रमांक 5 कभी भी समय पर नहीं खुलता और ना ही कोई बच्चे वहां पढ़ने आते हैं शासन के पैसा को हजम करने के लिए एवं शासन को गुमराह करने के लिए वहां के आंगनबाड़ी के रजिस्टर्ड में लिखा पूछा घर बैठकर कंप्लीट करके पैसा आहरण कर लिया जाता है लेकिन वहां कभी भी आंगनबाड़ी जाकर खोल कर नहीं बैठते और ना ही वहां किसी भी प्रकार के बच्चों का पढ़ाई लिखाई होता है वहां की कार्यकर्ता भगवती केवट चिल्हाटी बस स्टैंड में अपनी फलों की दुकान वह फैंसी दुकान चलाती है और सहायिका रेखा पांडे बरोबर रजिस्टर्ड मेंटेन करके रखती है और ग्राम पंचायत चिल्हाटी में उसकी बेटी आवास मित्र का काम करती है और उसकी मां रेखा पांडे स्वयं आवास ठेकेदार बनती फिरती है रोजाना वह आवास बनवाने को लेकर अपने काम धाम में व्यस्तता है करके बिजी रहती है पर आंगनबाड़ी कभी नहीं जाती लेकिन उनकी रजिस्टर में सिग्नेचर बरोबर रहती है. इनके नाम पर कई आवास के हितग्राहियों ने भी लिखित में शिकायत कर चुके हैं कि कई लोगों के घर को अभी भी कंप्लीट नहीं किए हैं ग्राम पंचायत चिल्हाटी के आंगनबाड़ी क्रमांक 5 एक प्राइवेट भवन में संचालित होती है जिसे दिखावे के लिए बस रखे हैं यहां कोई भी प्रकार की आंगनबाड़ी जैसी सुविधा नहीं है और नहीं वह बच्चों की पढ़ाई होती है यह जानकारी स्वयं मकान मालिक ने दिया है मकान मालिक ने यह भी बताया है कि कई महीनों से आंगनबाड़ी के नाम से लिए हुए किराए के मकान का पैसा भी नहीं मिल पाया है. ग्राम पंचायत के रमेश वर्मा .बुद्धदेव वर्मा .हरि शंकर केवट .एवं मंजू वर्मा ने जानकारी दिया कि चिल्हाटी के आंगनबाड़ी क्रमांक 5 में कभी भी कोई प्रकार की उच्च अधिकारी कभी निरीक्षण करने नहीं आए हैं आंगनबाड़ी की कार्यकर्ता एवं सहायिका और मस्तूरी मुख्यालय के कुछ कर्मचारी अधिकारी की की मिलीभगत के कारण यहां की आंगनबाड़ी की दैनिक स्थिति हुई है इन सभी लोगों की लापरवाही के ही चलते यहां के आंगनबाड़ी में कोई प्रकार की सुधार नहीं हो पाई है और न ही सुचारू रूप से यहां आंगनबाड़ी चल पा रही है l

वर्जन

वहां की सुपरवाइजर उत्तरा साहू का कहना है कि मुझे एक हफ्ता ही हुआ है वहां की प्रभार मिले बहुत जल्द वह निरीक्षण कर आंगनबाड़ी की कार्यकर्ता एवं सहायिका पर गड़बड़ी पाए जाने पर उचित करवाही करूंगीl

परियोजना अधिकारी उषा श्रीवास्तव का कहना है कि आंगनबाड़ियों के आए दिन निरीक्षण करने के लिए एवं समय-समय पर कई क्षेत्रों के आंगनबाड़ियों की व्यवस्था एवं कमियों को बताने के लिए शासन के द्वारा सुपरवाइजर नियुक्त किए गए हैं चिल्हाटी आंगनबाड़ी में मैं खुद जाकर या फिर तत्काल मैं सुपरवाइजर को बोलकर निरीक्षण करवाएगी गलती पाए जाने पर उचित कार्रवाई करेंगे l

छत्तीसगढ़ के गोठानों से निकले गोबर के दीये से दीवाली में रौशन होंगी दिल्ली की गलियां : दीपावली में गाय और गोबर का होता है खास महत्व

रायपुर : छत्तीसगढ़ के गोठानों से निकले गोबर के दीये से दीवाली में रौशन होंगी दिल्ली की गलियां : दीपावली में गाय और गोबर का होता है खास महत्व

 

ईकोफ्रेण्डली होने की वजह से दिल्ली से मिला दो लाख दीये का आर्डर

    

इधर गोबर हैं। थोड़ा देख के चलो। उधर गोबर है थोड़ा बच के चलो। तुम्हारें दिमाग में तो गोबर भरा है। कुछ ऐस शब्दों और वाक्यों के साथ अक्सर कुछ लोग गाय की गोबर का इस तरह तौहीन उड़ाते है जैसे यह बहुत गंदी हो। पर यह गोबर कितना कीमती हो सकता है, कितना उपयोगी हो सकता है, यह बात तो शायद इस प्रदेश के मुख्यमंत्री को और गाँव में रहने वाली महिलाओं को मालूम है। तभी तो, कल तक सिर्फ कण्डे और खाद बनाने के लिए काम आने वाला यह गोबर अब इतना महत्व का हो गया है कि इससे बने उत्पादों का आर्डर देश की राजधानी दिल्ली से मिलने लगा है। यहा के गोठानों से निकलने वाले गोबर से तैयार पूजन सामग्री और उत्पाद की मांग दिन ब दिन बढ़ती जा रही है। दिल्ली जैसे महानगर में जहां दीपावली त्यौहार के समय चाइनीज दीये,मोमबत्ती व झालर का बोलबाला रहता है ऐसे में पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिये उपयोगी छत्तीसगढ़ के गोबर से बने बायो दीये प्रदूषण की मार झेल रहे दिल्लीवासियों के लिये एक राहत जैसा है। ईकोफ्रेण्डली होने के साथ-साथ लक्ष्मी पूजन,दीवाली में गाय के गोबर का खास महत्व होता है। इन्हीं खास महत्व की वजह से ही गाय के गोबर से बने दीये की मांग दिल्ली और नागपुर से आई है। पहला आर्डर दो लाख दीये का है। जिसे स्वसहायता समूह की महिलाओं द्वारा तैयार किया जा रहा है।
      यह शासन द्वारा नरवा,गरूवा,घुरवा और बाड़ी विकास योजना की दिशा में उठाये गये कदम का ही परिणाम है कि गोठान के माध्यम से आरंग विकासखंड के ग्राम बनचरौदा की स्व सहायता समूह की महिलाओं द्वारा गोबर से बनाई गई कलाकृतियां दिन ब दिन प्रसिद्धि प्राप्त कर रही है। लाल, पीला हरा एवं सुनहरे सहित आकर्षक रंगों से सजे दीये, पूजन सामग्री के रूप में ओम,श्री,स्वास्तिक,छोटे आकार की मूर्तिया, हवन कुंड,अगरबत्ती स्टैण्ड, मोबाइल स्टैण्ड, चाबी छल्ला सहित अनेक उत्पाद देखने वालों को लुभा रही है। कीमत और अहमियत बढ़ने से गाय के गोबर की डिमांड तो बढ़ ही गई, गांव में आवारा घूमने वाले पशुओं का भी सम्मान बढ़ गया है। खासकर गोठान जहां गांव की सभी गाय इकट्ठी होती है वहा से निकलने वाला गोबर अब जैविक खाद और उपयोगी उत्पाद के रूप में गांव की बेरोजगार बैठी अनेक महिलाओं को रोजगार से जोड़ने के साथ-साथ आत्मनिर्भरता की राह पर ले जा रही है।

ग्राम बनचरौदा की स्व-सहायता समूह से जुड़ी महिलाओं द्वारा गोठान में आने वाले पशुओं के गोबर से कलाकृतियां बनाने का कार्य किया जा रहा है। लगभग 46 महिलाएं है जो गाय के गोबर से दीया, हवनकुंड,गमले,फ्रेण्डशिप बैण्ड, राखी एवं पूजन सामग्री बनाने की कला में निपुण हो गई है। समूह से जुड़ी श्रीमती टुकेश्वरी चंद्राकर ने बताया कि समूह की महिलाओं का अलग-अलग दायित्व है। गोबर लाने से लेकर गोबर का पाउडर तैयार करने और अन्य सामग्री के साथ मिश्रण कर एक आकर्षक उत्पाद तैयार करने की जिम्मेदारी है। उन्होंने बताया कि आकृति तैयार होने के बाद उसे फिनिशिंग टच देने और अलग-अलग रंगों के माध्यम से सही रूप देने में महिलाओं का योगदान होता है। इसकी पैकेजिंग और मार्केटिंग की जिम्मेदारी भी है। हाल ही में सांचा आदि तैयार कर काम शुरू किया गया है। अभी दो हजार का आर्डर जिला स्तर पर पूरा किये है। उन्होंने बताया कि दिल्ली से दो लाख दीयें का आर्डर मिला है। जिसे पूरा करने महिलाएं लगी हुई है। समूह की सदस्य श्रीमती हेमीन बाई और ममता चंद्राकर ने बताया कि सुबह 10 बजे से शाम 4 बजे तक सभी महिलाएं कुछ न कुछ काम करती है। एक दिन में एक महिला 300 तक दीये तैयार कर सकती है। दीया तैयार करने के बाद उसे मूर्त रूप देने का काम भी किया जाता है।
पांच रूपये के है एक दीये
गोठानों से निकलने वाले गाय के गोबर से तैयार डिजाइन किये दीये की कीमत फिलहाल पांच रूपये और छोटे दीये की कीमत दो रूपये रखी गई है। यह दिखने में भी बहुत आकर्षक है। स्वास्तिक, श्री, ओम की कलाकृति की कीमत पांच रूपये, शुभ लाभ, मोबाइल स्टैण्ड की कीमत 100 रूपये, गणेश भगवान की प्रतिमा की कीमत 101 रूपये रखी गई है। इनमें से दीया सहित अन्य उत्पादों का उपयोग तो जरूरत के हिसाब से किया ही जा सकता है साथ ही घरों एवं दफ्तरों में सजावट के लिये भी गोबर के इस उत्पाद का उपयोग सुदंरता बढ़ाने के लिये लिये किया जा सकता है।


पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिये है लाभदायक
गाय के गोबर से बने उत्पाद अनेक दृष्टिाकोण से उपयोगी है। मिट्टी की कटाई रोकने में मददगार और मिट्टी को दीये का रूप देकर उसे आग में पकाने जैसी प्रक्रियाओं से दूर गोबर के दीये को धूप में सूखाकर तैयार किया जाता है। इस प्रकार के दीये एवं सामग्री को आसानी से नष्ट करने के साथ खाद के रूप में किया जा सकता है। यह पर्यावरण के साथ स्वास्थ्य के लिये भी लाभदायक है।
राजस्थान के मुख्यमंत्री ने भी की तारीफ
गाय के गोबर से बने दीये सहित अन्य कलाकृतियां देखने वालों का ध्यान अपनी ओर खींच लेती है। बनचरौदा में आदर्श गोठान देखने आये राजस्थान के मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत और वहा के मंत्रियों ने जब स्व-सहायता समूह की महिलाओं द्वारा तैयार उत्पादों को देखा तो गोबर से बने इन उत्पादों की जमकर प्रशंसा की। प्रतीक चिन्ह के रूप में उन्हें जब गोबर से बना उत्पाद और अपनी नाम लिखी सामग्री मिली तो उनकी खुशी दुगनी हो गई। उन्होंने अपने प्रदेश में में नंदी गौशाला प्रारंभ करने और गोबर से उत्पाद तैयार करने के इस तरह के नवाचार को अपनाने की बात कही।