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उपराष्ट्रपति के हाथों आज उपाधि लेंगे BBN24 के संपादक कैलाश जायसवाल

हुमेश जायसवाल सह संपादक

रायपुर :-कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय रायपुर के तृतीय दीक्षांत समारोह-16 मई 2018 के लिए उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया0 नायडू और मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह की गौरवमयी उपस्थिति में सम्पन्न होने जा रहे दीक्षांत समारोह में एम एस सी ( इलेक्ट्रॉनिक मीडिया) की उपाधि हेतु दीनदयाल ऑडिटोरियम में पूर्वाभ्यास करते हुए BBN 24 के संपादक कैलाश जायसवाल ...वैसे तो हुनर को कोई पहचान की मोहताज नहीं होता लेकिन फिर भी हम आपको बता देते हैं कैलाश जायसवाल वह शख्सियत हैं कि जिन्होंने पत्रकारिता में एक अपनी अलग ही महारत हासिल की है आपको बता दें कि कैलाश जायसवाल जी मध्यप्रदेश छत्तीसगढ़ ,आईबीसी 24 ,स्वराज एक्सप्रेस जैसे प्रतिष्ठित निजी न्यूज चैनलों में काम करने के बाद छत्तीसगढ़ में तेजी से बढ़ता हुआ चैनल bbn24news.com में अपनी सेवाएं दे रहे जहां वे संपादक के पद पर है। आज कैलाश जायसवाल उपराष्ट्रपति के हाथों दीक्षांत समारोह में अपनी उपाधि लेंगे जिससे BBN24 की टीम में काफी उत्साह का माहौल है ।वहीं भी BBN24 परिवार ने उनको उज्ज्वल भविष्य शुभकामनाएं भी दी।

महिलाएं किसी भी क्षेत्र में पुरुषों से कम नही ...ईश्वरी भोय का चयन विश्व की सबसे बड़ी फिजिक्स लैब में रचा कीर्तिमान

सत्यजीत घोष

रायगढ़ :-आज महिलाएं किसी भी क्षेत्र में पुरुषों से कम नहीं है. हर क्षेत्र में महिलाएं रोज नया कीर्तीमान रच रही हैं. इसी क्रम में प्रदेश की ईश्वरी भोय का चयन विश्व की सबसे बड़ी फिजिक्स लैब में हुआ है. ईश्वरी देश की की अकेली महिला हैं जिनका चयन इस संस्था में हुआ है. आपको बता दें विश्व की सबसे बड़ी यह संस्था स्विट्जरलैंड के जिनेवा में स्थित है,जिसका नाम यूरोपीय नाभिकीय अनुसन्धान संगठन (CERN)  है. इस संस्था 20 यूरोपीय देश सदस्य हैं l

ईश्वरी भोय रायगढ़ जिले के बरमकेला ब्लॉक की सरिया की ही रहने वाली हैं और पेशे से शिक्षिका हैं. और गाड़ापारा मिडिल स्कूल में पढ़ाती हैं. ईश्वरी ने चर्चा करते हुए बताया कि विश्व के 34 लोगों का चयन इस प्रयोगशाला के लिए हुआ है जिसमें वे भी शामिल हैं. ईश्वरी ने बताया कि स्कूल के दिनों में ही भौतिक विषय में रूचि थी. हालांकि उन्होंने हिंदी साहित्य में पोस्ट ग्रेजुएट किया है, लेकिन फिजिक्स में उनकी रूचि हमेशा ज्यादा रही है. इस संस्था में जाने के लिए उन्होंने ऑनलाइन फार्म भरा था. जिसमें कठिन सवाल किए गए थे. इसमें पास होने के बाद संस्था ने उन्हें एक मिनट का प्रेजेंटशन मंगवाया गया.संस्था को उनका प्रेजेटेंशन पंसद आया और उनका चयन हो गया. जिले की कलेक्टर सम्मी आबिदी ने उनके चयन के लिए बधाई भी दिया है.

छत्तीसगढ़ के शक्तिपीठ मे से एक माँ चंद्रहासिनी का दरबार

जांजगीर चाम्पा: - चंद्रहासिनी देवी मंदिर चंद्रपुर में महानदी के तट पर स्थित है। चंद्रपुर जांजगीर-चांपा जिले में डभरा तहसील में बसा हुआ एक नगर है यहाँ प्रसिद्ध चंद्रहसिनी देवी की एक प्राचीन मंदिर है। चंद्रपुर छत्तीसगढ़ के राजधानी रायपुर से 221 किलोमीटर , जिला मुख्यालय जांजगीर से 120 किलोमीटर तथा रायगढ़ से 32 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां माता चंद्रहासिनी का वास है जहां महानदी अपने स्वच्छ जल से माता चंद्रसेनी के पांव पखारती है। यहां छत्तीसगढ़ के साथ-साथ उड़ीसा के भी श्रद्धालु भारी संख्या में माता के दरबार पहुंचते हैं कहा जाता है कि मां चंद्रहासिनी संतान दायनी है इसीलिए लोग संतान प्राप्ति के लिए माता से मन्नत मांगते हैं।

सती के अंग जहां-जहां धरती पर गिरे थे, वहां मां दुर्गा के शक्तिपीठ माने जाते हैं। महानदी व माण्ड नदी के बीच बसे चंद्रपुर में मां दुर्गा के 52 शक्तिपीठों में से एक स्वरूप मां चंद्रहासिनी के रूप में विराजित है। चंद्रमा की आकृति जैसा मुख होने के कारण इसकी प्रसिद्धि चंद्रहासिनी और चंद्रसेनी मां के नाम जगत में फैल रही है, लेकिन इसका स्वरूप चंद्रमा से भी सुंदर है।

माँ नाथलदाई का मंदिर कभी बाढ़ में नही डूबता

चंद्रहासिनी मंदिर के कुछ दूर आगे महानदी के बीच मां नाथलदाई का मंदिर स्थित है कहा जाता है कि मां चंद्रहासिनी के दर्शन के बाद माता नाथलदाई के दर्शन भी जरूरी है अन्यथा माता नाराज हो जाती है और यह भी कहा जाता है कि महानदी में बरसात के दौरान लबालब पानी भरे होने के बाद भी मां नाथलदाई का मंदिर नहीं डूबता।

माँ चंद्रहासिनी की कहानी

पूर्व में चंद्रपुर का नाम डोंगरी गांव था क्योंकि मां चंद्रहासिनी का मंदिर पहाड़ के ऊपर स्थित है ।एक किंवदंति के अनुसार हजारों वर्षो पूर्व सरगुजा की भूमि को छोड़कर माता चंद्रसेनी देवी उदयपुर और रायगढ़ होते हुए चंद्रपुर में महानदी के तट पर आती हैं। महानदी की पवित्र शीतल धारा से प्रभावित होकर यहां पर वह विश्राम करने लगती हैं। वर्षों व्यतीत हो जाने पर भी उनकी नींद नहीं खुलती। एक बार संबलपुर के राजा की सवारी यहां से गुजरती है, तभी अनजाने में चंद्रसेनी देवी को उनका पैर लग जाता है और माता की नींद खुल जाती है। फिर स्वप्न में देवी उन्हें यहां मंदिर निर्माण और मूर्ति स्थापना का निर्देश देती हैं। संबलपुर के राजा चंद्रहास द्वारा मंदिर निर्माण और देवी स्थापना का उल्लेख मिलता है। देवी की आकृति चंद्रहास जैसे होने के कारण उन्हें चंद्रहासिनी देवी भी कहा जाता है। बाद में राजपरिवार ने मंदिर की व्यवस्था का भार यहां के जमींदार को सौंप दिया यहां के जमींदार ने उन्हें अपनी कुलदेवी स्वीकार करके पूजा अर्चना की। इसके बाद से माता चंद्रहासिनी की आराधना जारी है यहां वर्ष भर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। नवरात्रि उत्सव के दौरान दूर-दूर से भक्त चंद्रहसिनी देवी मंदिर मे पूजा अर्चना के लिए आते हैं ।

माँ चंद्रहासिनी के पैर के निशान

वही कहा जाता है कि मां चंद्रहासिनी जहां प्रकट हुई थी उनके पांव के निशान आज भी वहां पर मौजूद है लोग मां चंद्रहासिनी के दर्शन के बाद उनके चरण कमल के चिन्ह को देखने भी पहुंचते हैं । वही जिन श्रद्धालुओं की मन्नत पूरी हुई रहती है वह वही बकरे की बलि भी देते हैं।

इस घटना के बाद माँ की ख्याति और दूर दूर तक फैली

एक बार एक निर्दयी पुलिसवाला अपने बेटे को उसकी सौतेली मां के कहने पर महानदी के पुल के ऊपर से पानी पर फेंक देता है। जिसे मां चंद्रहासिनी मां नाथल दाई अपने आँचल में ले लेते हैं रात में मां चंद्रहासिनी और माँ नाथलदाई बच्चे को अपने साथ रखते हैं सुबह एक मछुआरा नदी के बीच में टीले के पास उसका नाव अपने आप चला जाता है वहां पर जब वह जा कर देखता है तो वहां पर बच्चा खेलते हुए नजर आ रहा था जिसके बाद मां की महिमा सभी जान गए तब से मां चंद्रहासिनी मां नाथलदाई की ख्याति फैल गई।

कुछ वर्ष पूर्व चंद्रपुर मंदिर पुराने स्वरूप में था, लेकिन जब से ट्रस्ट का गठन हुआ, इसके बाद से मंदिर व परिसर का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। मंदिर का मुख्यद्वार इतना आकर्षक और भव्य है कि यहां पहुंचने वाले श्रद्धालु उसकी तारीफ किए बगैर नहीं रूकते। इसके बाद मंदिर परिसर में अर्द्धनारीश्वर, महाबलशाली पवन पुत्र, कृष्ण लीला, चीरहरण, महिषासुर वध, चारों धाम, नवग्रह की मूर्तियां, सर्वधर्म सभा, शेष शै्यया तथा अन्य देवी-देवताओं की भव्य मूर्तियां जीवन्त लगती हैं। इसके अलावा मंदिर परिसर में ही स्थित चलित झांकी महाभारत काल का सजीव चित्रण है, जिसे देखकर महाभारत के चरित्र और कथा की विस्तार से जानकारी भी मिलती है। दूसरी ओर भूमि के अंदर बनी सुरंग रहस्यमयी लगती है और इसका भ्रमण करने पर रोमांच महसूस होता है।भूलभैया मिर्रर हाउस ,हॉरर हाउस जो दर्शर्णार्थियो को उत्साहित कर देता तो वहीं माता चंद्रसेनी की चंद्रमा आकार प्रतिमा के एक दर्शन मात्र से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। चंद्रहासिनी माता का मुख मंडल चांदी से चमकता है।

“जुगाड़ की दुनिया”

  

 

क्या आप को पता है की आज जो हम शम्पू उपयोग करते है वो सबसे पहले कहाँ बना? क्या आप को ये पता है की हम जो शर्ट में बटन लगते है वो कहाँ बना ? अच्छा ये तो पता ही होगा की हम जो सुबह सुबह फ्लश युस करते है वो सबसे पहले कहाँ बना ? क्या नहीं पता चलो ये सब जान्ने के पहले हम सब एक कहानी पड़ते है |

एक गाव में एक सोहन नाम का कुम्हार अपने पुरे परिवार के साथ रहता था |कुछ दिन बाद उसकी पत्नी का देहांत हो गया | पत्नी के चले जाने के बाद वो अकेला हो गया था पर परिवार में बेटा और बहूँ साथ होने से  उसे थोड़ी संतुष्टि थी की उसका परिवार उसके साथ है |एक दिन सोहन को मुंग का हलवा खाने का मन किया उसने बहु को कहा की आज मुंग दाल का हलवा बना लो उसकी बहूँ ने कहा  की वो नहीं बना सकती अभी जो बना है वही खा लें |ये बात सोहन को खूब खल गई |

उसने पास के गाँव की एक हम उम्र विधवा महिला से शादी कर ली |एक दिन सोहन अपने बेटे के साथ चांदनी रात को हुक्का पिते बात चित करते बैठे थे रात काफी हो चुकी थी सोहन ने आपनी बीवी को आवाज लगाईं और कहाँ की अजी सुनती हो आज ज़रा तुम मुंग की दाल का हलवा और पूरी बना लो |बीवी ने आवाज लगाई अभी लाइ तब तक आप लोग हाथ मुह धो लो |सोहन को पता था की घर में मुंग की दाल ख़त्म हो गई है |सोहन की बीवी ने हलवा और पूरी खाने में परोस दी ये देख सोहन ने अपनी बीवी से पूछा की दाल तो थी नहीं फिर तो बीवी ने कहाँ की दाल थी नहीं पर मुंग दाल की बड़ी रखी थी उसे मैंने थोड़ी देर पानी में भीगा के रखी और फिर घी से छोक लगा कर हलवा बना दी |

वास्तव में यहीं सहीं बात है की भारत की औरते अपने परिवार को छोटे छोटे जुगाड़ करके अपने परिवार की खुशियों का ख्याल रखती है | हम और आप भी तो ऐसा ही करके अपना काम निकाल ही लेते है | जिसे हम हमारी भाषा में “जुगाड़” कहते है | “जुगाड़” शब्द की उत्पत्ति के पीछे संस्कृत शब्द है “युक्ति”,जिसका प्रचलित रूप है “जुगत” और “जुगत” का क्षेत्रीय रूप है “जुगाड़” विशेषकर हरियाणा और पंजाब में ज्यादा ये शब्द बोला जाता है | हम सब अक्सर लोगों से पूछते है की ये काम तो नामुमकिन था फिर  कैसे हो गया तो हमे यहीं सुनने को मिलता है की ये सब जुगाड़ करके कर लिया | ये शब्द हमारी आम जिन्दगी में हर रोज प्रयोग होने वाला आम शब्द है |

आज हम इसी जुगाड़ से जुडी हुई कई रोचक बाते जानेंगें |जुगाड़ का मतलब है किसी प्रॉब्लम का आसान से आसान तरीके का पता लगाना जो बहुत ही कम खर्च में हो जाये | भारत में ऐसी बहुत सी चीजें है जो हमारे यहाँ पहली बार बनी और पूरी दुनिया में मशहूर हो गई | जीहाँ चाहे वो शतरंज हो या अलग अलग तरह का संगीत या रेशमी साड़ियाँ ये सब भारत की ही देंन है | शम्पू भी पहली बार भारत में ही बना | शम्पू शब्द से पहले चम्पी आया फिर चम्पू बना और बाद में शम्पू शब्द बना | हमारी शर्ट में लगने वाले बटन भी यही पहली बार बने है |ये सब कैसे हुआ, जुगाड़ से |हम भारतीय लोग जुगाड़ करने में माहिर होते है कोई भी काम हमारे लिए मुश्किल नहीं क्यूँ की हमारे पास हर चीज के लिए जुगाड़ मौजूद होता है |   

जुगाड़ करते-करते हमने कई ऐसी कई चीजों का निर्माण कर लिया है जो आज कई लोगों का महत्व पूर्ण रोजगार बन गया है | आज हम जो पानी पूरी इतने चाव से खाते है वो भी जुगाड़ का ही नतीजा है |ये समझने के लिए हमे इतिहास में जाना होगा |एक दिन कुंती ने द्रोपती को थोडा सा आटा और कुछ आलू दिए और कहा  की इससे कुछ भी बना लो और साथ ही ये भी कहाँ की बनाना ऐसा की पाँचों पाडवों का पेट भर जाये | तो द्रोपती ने आलू उबाले और छोटी छोटी पुरियां बनाई और अलग –अलग तरह का पानी बनाया और उन छोटी छोटी पुरियों में आलू को डाल कर और उसमे अलग अलग तरह का पानी डाल पांडवों को खाने के लिए दे दिया तो यहाँ से जन्म हुआ पानी पूरी का | ऐसे ही रसगुल्ला ,जलेबी और भी बहुत सी ऐसी ही मिठाईयों का जन्म जुगाड़ के कारण हुआ है |

 आजकल पढाई का तरीका बदल रहा है |नई पीढ़ी की रूचि विज्ञान और कला में कम है | ज्यादातर छात्र इस तरह के विषय चुन रहे हैं जो व्यापार से और पैसा कमाने से सम्बंधित है |इस लिए जुगाड़ करने वाली प्रतिभा कम हो रही है |असल में जुगाड़ करने के लिए खाली वक्त भी चाहिए जो आज कल किसी के पास भी नहीं है |

ऐसा ही एक किस्सा जुडा है महात्मा गाँधी की जिंदगी से |जी हाँ एक बार महात्मा गाँधी को उपहार में फोर्ड कार मिली| गाँधी जी ने उस कार के आगे दो बैल लगा दिए और उसके बाद उस कार का नाम रख दिया ऑक्स-फोर्ड |

इसे ही गुजरात के शहर राजकोट के रहने वाले मंसुक भाई प्रजापति के द्वारा बनाया गया मिटटी का फ्रिज भारत में ही नहीं पुरे विशव में प्रसिद्ध है | ये फ्रिज भी मंसुक भाई ने जुगाड़ करके ही बनाया है | ऐसे ही कई चीजे जैसे मिटटी का फ़िल्टर ,मिटटी का तवा ,मिटटी का प्रशेर कुकर आदि बहुत सी चीजों का निर्माण किया जिसकी डिमांड भारत में ही नहीं दुसरे देश में भी है |

जुगाड़ शब्द केवल भारत में ही बोला जाता है| हाल ही में आई फिल्म “फुकरे” से प्रचलित शब्द “जुगाड़” को ऑक्सफोर्ड ने आधिकारिक तौर पर अपने नवीनतम अपडेट में शामिल कर लिया है,जिसका अर्थ है “सिमित संसाधनों को अभिनव तरीके से उपयोग कर समस्या को सुलझाना |”

देखा आपने जुगाड़ से कितनी अच्छी –अच्छी चीजों का निर्माण हो जाता है | जुगाड़ के कारण ही कई लोगों को शोहरत हासिल हुई |जुगाड़ शब्द बहुत ही दिलचस्प शब्द है | जुगाड़ का काम प्रशंसनीय काम है इसे हमे ख़ुशी ख़ुशी अपनाना चाहिए | इसलिए यह साबित हो गया है, की दुनिया उमीद पर नहीं, जुगाड़ पे दुनिया कायम है |

वर्षा भिवगड़े गलपांडे

भारत में मुद्रा के प्रचलन की कहानी

भारत में मुद्रा का प्रचलन 18 व़ी सदी से प्रारंभ हुआ था उस समय नोटों को प्राइवेट बैंक छापा करती थी जैसे बैंक ऑफ़ बंगाल, बैंक ऑफ़ मुंबई, बैंक ऑफ़ मद्रास | सन 1861 के ब्रिटिश इण्डिया करेंसी एक्ट के मुताबिक सिर्फ ब्रिटिश इंडिया सरकार ही नोट छाप सकती थी और भारत के स्वतंत्र होने तक ब्रिटिश राज के नाम पर नोटों का चलन चलता रहा जिन पर ब्रिटिश राजा के चित्र बना करते थे | 15 अगस्त 1947 को भारत के स्वतंत्र होने के बाद भारत सरकार के सामने कई चुनौतियां थी सबसे बड़ी चुनौती थी मुद्रा की | उस समय रिसर्व बैंक ने 1947 से 1950 तक अंतरिम काल के लिए ब्रिटिश काल के 5 रूपये, 2 रूपये और 1 रूपये के नोटों का चलन बनाए रखा | इन नोटों में ब्रिटिश राजा जोर्ज शिष्ठ्म का चित्र बना होता था | 1950 में जब भारत गणतंत्र बना तो तब नए नोटों का चलन आरंभ हुआ इन नोटों पर अशोक स्तंभ का चित्र था मूल्य को हिंदी और अंग्रजी में लिखा जाता था | 1953 में रूपये के बहुवचन को लेकर कई सवाल उठाये गये अब रुपया के बदले रुपये लिखा जाने लगा |भारतीय रुपये अब मुंबई और कोलकत्ता के टकसालों पर छापे जाने लगा | आगे चलकर दो और नई टकसालो का निर्माण हुआ जो हैदराबाद और नॉएडा में स्थित थी | इन नोटों को बनाने के लिए बाल्सम की लकड़ी के गुदे का प्रोयोग किया जाता है साथ ही कॉटन के रेशों को भी गुदे में मिलाया जाता है एस मिश्रण की आयु एक आम कागज़ के टुकड़े से काफी ज्यादा होती है | मजबूती के इसे जलेटीन में डुबोया जाता है ये पद्धति सालों साल ऐसे ही बनी रही जब तक टकसालों में आधुनिक मशीनों को नहीं लगाया गया | समय के साथ और भी नई टेक्नोलॉजी का प्रयोग किया जाने लगा ताकि नोटों को और भी सुरक्छित रखा जा सके | 1954 में 1000 ,5000 और 10000 के उच्च नोटों को प्रचलन में लाया गया तीनो नोटों पर अलग चित्रों का प्रयोग किया गया 1000 के नोट पर तंजौर के मंदिर का चित्र था , 5000 के नोट पर गेट ऑफ़ इंडिया का चित्र बनाया था और 10000 के नोट पर अशोक स्तम्भ का चित्र था | मूल्य को अंग्रजी और हिंदी में लिखा जाता था इस प्रकार के नोट ब्रिटिश राज के समय प्रचलन में लाये गये थे परन्तु दुर्बल अर्थ व्यवस्था के कारण इन नोटों को बंद करना पड़ा | उस समय 2, 5, 10 और 100 के नोटों को भी चलाया गया और हर नोटों के अग्र भाग में अशोक स्तम्भ का चित्र बना हुआ था और दुसरे पृष्ट में अलग अलग चित्रों का प्रयोग किया गया था | 2 रूपये में शेर का चित्र, 5 रूपये में हिरन पर चित्र, 10 रूपये के नोट पर पानी के जहाज का और 100 के नोटों पर दो हाथी का चित्र बना हुआ था जो भारत की जैविक स्थिति को दर्शाता था साथ ही एक जलांक भी बनाया गया जिसमे अशोक स्तंभ का बनाया गया | इस प्रकार के जलांक बनाना नकली नोटों पर रोक लगाने के लिए बहुत ही महत्व पूर्ण था | 1960 से 1969 के दशक के अंत तक भारत की अर्थ व्यवस्था चरमरा रही थी | भारतीय रिजर्व बैंक ने बदले के नोट 1000,500,10000 के नोटों का चलन बंद कर दिया और 70 के दशक में नये छोटे नोटों का प्रचालन शुरू किया | इनमे 20 और 50 रूपये के नए नोट थे | ये नोट दिखने में साफ और आधुनिक दीखते थे | 20 रूपये के पृष्ट भाग में कोणार्क चक्र का चिन्ह और 50 रूपये के नोट पर संसद का चित्र बना होता था | कोणार्क चक्र का चिन्ह भारत की वास्तु कला को प्रदर्शित करता है और संसद का चित्र भारत के गणतंत्र होने का प्रतिक है | दोनों नोटों के अग्र भाग में अशोक स्तम्भ बना हुआ होता और इसी का जलांक भी बना होता था | 1980 में नऐ शैली के नोटों को प्रदर्शित किया गया इस समय बने नोटों पर चिन्ह और चित्रों पर ज्यादा ध्यान दिया गया | हर चिन्ह और चित्र का अपना एक महत्त्व था जो देश की प्रगति को दर्शाता था | 2 रूपये के नोट पर आर्यभट उपग्रह का चित्र बना था जो भारत की साइंस और टेक्नोलोजी को दर्शता था | 1 रूपये और 5 रूपये के नोट पर आयल रिंग और खेती बड़ी की मशिनों का चित्रित किया गया था जो भारत के आधुनिक कारण को दर्शाता था | साथ ही 10 रूपये के नोट पर मोर के चित्र का उपयोग किया गया था इन नोटों के साथ साथ कई सिक्कों का भी प्रयोग किया गया था जैसे 5 पैसा, 10 पैसा , 25 पैसा , 50 पैसा और 1 रूपये के सिक्को को चलाया गया | 1980-1989 के अंत तक भारत की अर्थ व्यवस्था तेजी से बड रही थी भारतीय रिजर्व बैंक ने 500 के नये नोट बनाये इस नोट में कई नाइ बातें थी | नोट पर महात्मा गाँधी का चित्र बनाया गया था और अशोक स्तम्भा को जलांक के रूप में चित्रित किया गया था | 1990 के आरंभ में टेक्नोलौजी बड रही थी सुरक्षा के बदले नोटों में बदलाव जरुरी था | 1996 में महात्मा गाँधी के नोटों की श्रृखला को बनाया गया इन नोटों में नया जलांक यानि की वौटर मार्क नए चित्र और भी सुरक्षा के लिए नये बदलाव किये गये | नोटों को ऐसा बनाया गया था की एक अंधा वैक्ति भी इसे पड़ सके | इन नोटों को आधुनिक मशीन से बनाया जाता है जिससे उसकी आयु लम्बी बनी रहे | इन नोटों में 5,10,50 और 100 रूपये के नोट बनाये गये इन नोटों में अग्र भाग में महात्मा गांधी का चित्र बनाया गया हिंदी में मूल्य लिखा है और साथ ही इंग्लिश और हिंदी में रिजर्व बैंक लिखा जाता है | इन नोटों में मूल्य के साथ साथ माप पर भी काफी ध्यान दिया गया अलग नोटों की लम्बाई और चौड़ाई अलग अलग होती है | एक उत्कृष्ट जलांक तकनीक से महात्मा गाँधी का चित्र बनाया जाता है और कागज के सूखने से पहले एक चांदी की रेखा बने जाती है यही जलांक और चांदी की रेखा नोटों को सुरक्षा प्रदान करती है और इसकी वजह से इन नोटों की नक़ल बनाना आसान नहीं है | 2000 तक नोटों में कोई बदलाव नहीं आये | भारतीय मुद्रा का उपयोग 60 सालों से भी ज्यादा से चल रहा है परन्तु भारतीय मुद्रा का कोई चिन्ह नहीं है जैसे डॉलर का | 60 सालों में चिन्ह के बदले रुपीस को छोटा कर Rs ही लिखा जाता है | 2009 में भारती सरकार ने ग्राफिक डीजाईनरों के लिए एक प्रतियोगिता रखी जिसमें भारतीय डीजाईनरों को भारतीय मुद्रा को दर्शाने के लिए एक चिन्ह बनाना था | इस प्रतियोगिता में उदय कुमार धर्म लिंगम द्वारा बनाया गया चिन्ह (₹) चुना गया | भारतीय मुद्रा को अपना एक चिन्ह मिला |ये ₹ चिन्ह देवनागरी र और इंग्लिश के R के जैसा दीखता है | जल्द ही चिन्ह प्रख्यात हो गया ₹ इस चिन्ह का प्रयोग वस्तु की MRP के साथ होने लगा | 2012 में भारतीय सरकार ने इस चिन्ह हो सिक्कों और नोट पर भी बनाना शुरू कर दिया | 2016 में भारत सरकार ने फिर नोटों की सुरक्षा को देखते हुए कुछ बदलाव किये | इसमें 500 और हजार रूपये के नोटों का प्रचलन बंद करके 2000 के नए नोटों का प्रचलन शुरू हुआ | इन नोटों का कलर गुलाबी रखा गया और जितने भी पुराने 1000 और 500 के पुराने नोट थे उनको बैंक में जमा करवाया गया ताकि नकली नोटों के बाजार को रोका जा सके और भारत सरकार ने नेट बैंकिंग पर ज्यादा जोर दिया आज 50,200,500 के भी नए नोट उपलब्ध है इनकी बनावट और रंग पहले के नोटों की तुलना में बिलकुल अलग हैं | वर्षा बी गलपांडे

खेल ने बदली एक मोहल्ले के भाई की किस्मत”

अक्सर हम जब भी सुबह उठते है तो हमेशा बुरी बुरी खबर सुनते और पड़ते हैं | की कहीं मडर हो गया,कहीं चोरी हो गया रेप की खबरे सुनते है पर सब से ज्यादा बुरा तब लगता है जब हम देखते है की कम उम्र के बच्चे क्रिमिनल बन जाते है |मुझे नहीं पता की वो क्राइम की दुनिया को अपनी दुनिया क्यूँ बना लेता है निष्चित है की उसकी कोई मज़बूरी ही होती होगी जिसकी वजह से वो इस दुनिया में कदम रखता होगा | आज मैं आप को एक ऐसे ही शख्स की कहानी सुनाने वाली हूँ जिसका बचपन वसूली करना ,डराना धमकाना जैसे कामों में लिप्त था पर अचानक उसकी जिंदगी में एसा मोड़ आया की उसकी पूरी जिन्दगी ही बदल दी |जी हाँ मैं बात कर रही हूँ अखिलेश पौल की जो नागपुर शहर की बस्ती का रहने वाला है इसका पाला रोज गुंडा गर्दी ,शराब, गांजा से बहुत जल्द ही पड गया था |अखिलेश का जुर्म इतना बड गया था की उसके खिलाफ पोलिस थाने में अलग अलग तरह के केस दर्ज हो रहे थे और वहीँ विरोधी गैंग के लोग भी उसकी जान के प्यासे थे |उसकी जिंदगी ऐसे मोड़ पर आगई थी की वो अपनी जान को पोलिस और विरोधी गैग से बचाकर भागते फिर रहां था |उसको समझ नहीं आ रहा था की वो क्या करे |तब अखिलेश अपनी जान बचाने के लिए कब्रिस्तान का सहारा लिया वहां उसने गरीबो के साथ वक्त बिताया गरीबो के खाने के बाद जो भी खाना बचता था वो अखिलेश उस वक्त खाया करता था क्यूँ की उस वक्त उसके पास पैसे ही नहीं थे | अखिलेश ने फिर एक वकील किया और उस वकील ने उसको थाने में सरेंडर करवाया फिर उसको कोर्ट में पेश कर उसको जमानत दिलवाई |अब अखिलेश की लाइफ यहाँ से बदले वाली थी |एक दिन अखिलेश एक कॉलेज के सामने सिगरेट फूकते खड़ा हुआ था वहां से कुछ बच्चे सायकल में फुटबॉल लेकर जा रहे थे उन बचों को देख कर अखिलेश को उसके जीवन की कुछ बातें याद आरही थी जब वो महज 14-15 साल का हुआ करता था तब एक दिन अखिलेश और उसके कुछ साथी एक कॉलेज के सामने खड़े थे तब एक टीचर ने अपने पियून को उन लोगो के पास भेजा और उनको अपने पास बुलाया और वो लोग जब उस टीचर के पास गये तब उस टीचर ने उन लोगों से कहा की क्या वे लोग फुटबॉल खेलेंगें तब अखिलेश ने कहां की हम खेल तो लेंगें पर इसके बदले आप हमे क्या दोगे उस टीचर ने कहा मैं तुमको 5 रूपये दूंगा उन लोगोने हाँ कर दी और ये फुटबॉल खेलने का सिलसिला करीब 15-20 दिनों तक चलता रहा फिर उस टीचर ने उन लोगों को पैसे देना बंद कर दिए | बिना पैसे के अखिलेश लोग भी फूटबल खेलना बंद कर दिए कुछ दिन बाद एक लड़का अखिलेश को बोला भाई मन नहीं कर रहा कुछ खेलने का मन कर रा तो क्या करें वो सब सब के सब फिर उस टीचर के पास गये और बोले की हमे आप पैसे मत दो पर फुटबॉल दे दो हम खेलना चाहते है उस टीचर ने ठीक है पर खेलने के बाद ये फूटबाल यही ला के रख देना ये फिर से फुटबॉल खेलने का सिलसिला कुछ दिन तक चलता रहा फिर उन लडको का क्राइम इतना बड गया था की वो अब उसमे ज्यादा ध्यान देने लगे और फुटबॉल खेलना बंद कर दिए |यही सारी पुरानी बातें अखिलेश को याद आई उसने उन बच्चों का पिछा किया और उनको खेलता देख वहीँ खड़ा हो गया थोड़ी देर बाद वो बच्चे सर आ गये करके कहने लगे अखिलेश ने देखा दूर से कोई व्यक्ति आ रहा था वो व्यक्ति अखिलेश के पास आया और कहने लगा और अखिलेश आज कल क्या हो रहा हैं| वो और कोई नहीं वही सर थे जिसने कभी उनको फुटबॉल खेलने को अपने पास बुलाये थे | अखिलेश ने सर से कहा की सर अभी मेरी पहले से भी ज्यादा बुरी कंडीशन है तो सर ने कहा की एक काम करो तुम रोज कुछ समय यहाँ बच्चों को फुटबॉल सिखाया करों इससे तुम्हारी प्रक्टिस हो जाएगी |सर ने अखिलेश से एक बात पूछी की अखिलेश तुम ये बताओ जब तुम फुटबॉल खेला करते थे तो क्या उस वकत तुमने वो सारे काम किये थे जो तुम रोज किया करते थे अखिलेश ने कहाँ कौन से काम | सर ने कहाँ की जब तुम खेलते थे तो क्या उस वक्त तुमने किसी को डराया धमकाया या ऐसा कोई कम किया जिसकी वजह से तुमको पोलिसे के पकड़ने का डर होता या अपनी जान बचाने की फिकर थी अखिलेश ने कहाँ नहीं सर |सर ने यही बात अखिलेश से कही की मैं यही तुमको समझाना चाह रहा था की खेल एक एसा माध्यम है जब हम खेल खेलते है तब दुनिया कहाँ है कौन क्या कर रहा है उसका ख्याल नहीं रहता हम सिर्फ और सिर्फ अपने खेल पर ध्यान देते है |अखिलेश को ये बात समझ आ गई और वो रोज फुटबॉल खेलना शुरू कर दिया | सर और उनके साथ के लोग डिस्ट्रिक लेबल का टूरनामेंट करवाते थे |सर की एक टीम थी जो फुटबॉल खेल की डिस्ट्रिक लेबल का टुरनामेंट करवाया करती थी | सर की टीम ने एक ऐसी ही डिस्ट्रिक लेबल का टुरनामेंट करवाया और उसमे अखिलेश ने उसमे भाग लिया इस टुरनामेंट में जो भी अच्छा खेलता था उसके चयन स्टेट लेबल के लिए होता था और जो स्टेट लेबल में अच्छा खेलता था उसको नैशनल खेलने को मिलता था अखिलेश को भी नैशनल खेलने का मौका मिला ये जो टुरनामेंट होता है वो झोपड़ पट्टी के बच्चों के लिए होता है और ये बच्चे ही इसमें हिस्सा लेते हैं और जो बच्चे नैशनल के लिए चुने जाते है उन मेसे जो बच्चे अच्छा खेलते है उनका सलेक्शन भारतीय फुटबॉल टीम के लिए होता है |अखिलेश का भी परफोर्मेंस अच्छा था तो उसका भी चयन भारतीय टीम के लिए हुआ और उसे भारतीय टीम का कॅप्टन बना के ब्राजील भेजा गया ये टीम स्लैम सौकर वर्ड कप खेलने ब्राजील गई थी |अखिलेश ने जब ये मैच खेल के वापस आया तो उसकी जिन्दगी ही बदल गई आज अखिलेश रेड लाइट एरिया के बच्चों को फुटबॉल सिखाने का काम कर रहे है और उनका ये सपना है की जो बच्चे क्राइम की दुनिया में लिपत है या गलत काम कर रहे है उनको खेल के माध्यम से उनका जीवन अच्छा बना सके जैसे उनका जीवन बदल गया |क्या आप लोगों को पता था की एसी भी टीम होती है जिससे झोपड़-पट्टी के बच्चों का भारतीय फूटबल टीम के लिए स्लैकशन होता है | वर्षा बी गल्पान्डे

नगाड़ों की थाप के बिना होली का उल्लास अधूरा होली के रंग को गहरा करने शहर में नगाड़ों की बिक्री भी शुरू

भाटापारा एक सप्ताह बाद होली का त्योहार बड़े धूमधाम से मनाया जाएगा। नगाड़ों की थाप के बिना होली का उल्लास अधूरा है। होली के रंग को गहरा करने शहर में नगाड़ों की बिक्री भी शुरू हो गई है। नगाड़े की थाप पर बजने वाले पारंपरिक गीत उत्साह को दोगुना करते हैं। होली में नगाड़े मस्ती और उल्लास का रंग घोलेंगे। शहर के सब्जी मार्केट व मुख्य मार्ग पर कारीगर नगाड़े लेकर पहुंचने लगे हैं। इसके साथ ही शहर में रंग-गुलाल व पिचकारी की दुकान सजने लगी है। जैसे-जैसे होली नजदीक आते जाएगी, इसकी खरीदारी जोर पकड़ने लगेगी।

सुनाई देने लगी थाप

इस वर्ष 1 व 2 मार्च को होली का त्योहार मनाया जाएगा। इसके नजदीक आते ही नगाड़े की थाप धीरे-धीरे सुनाई दे रही है क्योंकि नगाड़े का रिश्ता होली से है और इसके बिना होली के उमंग की उत्साह की कल्पना नहीं की जा सकती। होली में रंग घोलने बाजार में नगाड़े सजने लगे हैं। साथ ही नगाड़ों की थाप फाग का पावन संदेश देने लगी है।

मिट्टी के पात्र से बनाया जाता है नगाड़ा

मिट्टी के पात्र में चमड़ा चढ़ाकर नगाड़ा बनाया जाता है। कर्मकारों ने बताया कि नगाड़ा बनाने के लिए मिट्टी के खोल वे नगर के आसपास के कुंभकारों से लाते हैं। जबकि चमड़ा आसपास के क्षेत्र जैसे तिल्दा-नेवरा, नागाबुडा, कोचबाय, बागबाहरा से लाते हैं। मिट्टी के खोल प्रति जा़ेडी 15 से 200 रुपए तक पड़ जाती है।

बाजार में 150 से 2000 तक कीमत वाले नगाड़े

महंगाई की मार नगाड़ों के दामों पर भी देखने को मिली है। चार साल पहले जो नगाड़े 100 रुपए जोड़ी बिकते थे आज उनकी कीमत 200 से 250 यानी दो दुगनी हो गई है। बाजार में 150 से लेकर 1500 रुपए तक की कीमत वाले नगाड़े बिक रहे हैं। इसकी कीमत आकार के अनुसार होती है। छोटे आकार के नगाड़े 150-200 रुपए तथा मध्यम आकार के 800-900 व बड़े आकार के नगाड़े लगभग दो हजार रुपए तक कीमत पर बाजार में उपलब्ध है।

अलग-अलग तरह की आती है आवाज

कर्मकारों ने बताया कि एक जोड़ी नगाड़ा में दो अलग-अलग तरह की आवाज निकलती है। इसलिए नगाड़ा बड़ी सावधानी से बनाना पड़ता है। टिन नगाड़ा की आवाज पतली होती है, जिसे अपेक्षाकृत पतली चमड़ी से बनाया जाता है। जबकि गद आवाज वाले नगाड़ा के लिए मोटी चमड़ी प्रयुक्त किया जाता है।

चूना से करते है परिष्कृत

कर्मकारों ने बताया कि नगाड़ा बनाने के पहले चमड़े को चूना से परिष्कृत करना पड़ता है, जिससे चमड़ा काफी दिनों तक नरम रहता है। उपरांत विभिन्ना गोलाई के बर्तन को ऊपर रखकर काटा जाता है। मिट्टी के खोल में छाने के बाद नगाड़ा को धूप में रख दिया जाता है, जिससे नगाड़ा शीघ्र ही पककर बजाने लायक हो जाता है।

चाह कर भी इन चार माह के दौरान पुलिस नही मोड़ सकते आस्तीन

जांजगीर-चांपा. भारत देश से अंग्रेजी हुकूमत वर्षों पहले समाप्त हो चुकी है, लेकिन उनके बनाए नियम-कायदे पुलिस व अन्य विभागों में आज भी प्रभावी हैं। कुछ ऐसा ही एक रोचक मामला पुलिस विभाग से संबंधित हैं, जिसके मुताबिक पुलिस के जवान चार माह तक ड्यूटी के दौरान अपने वर्दी के आस्तीन नहीं मोड़ पाते। चाहे मौसम कुछ भी हो। ऐसा नहीं करने पर उच्चाधिकारियों से कार्रवाई का भय बना रहता है। 

पुलिस विभाग की कड़ी ड्यूटी से हर कोई वाकिफ है, लेकिन वर्दी पहनने के अंग्रेज जमाने के कुछ नियमों से साधारण नागरिक वाकिफ  नहीं हैं। 15 नवंबर से 15 मार्च के बीच चार माह तक पुलिस अधिकारी-कर्मचारियों के वर्दी पहनने के अंदाज में भारी परिवर्तन हो जाता है। अधिकांश पुलिस अधिकारी-कर्मचारी खाकी वर्दी के बजाए अंगोला वर्दी में नजर आते हैं। इस वर्दी को पहनने का नियम अनिवार्य है। यदि ड्यूटी के दौरान या अधिकारियों के सामने पुलिस जवान इस वर्दी में नजर नहीं आते तो उन्हें सजा भी भुगतनी पड़ती है। हालांकि पूरे ठंड के मौसम में अंगोला वर्दी पुलिस के अधिकारी और कर्मचारियों को ठंड से बचाती है। कुछ पुलिस अधिकारी-कर्मचारियों का कहना है कि अंगोला वर्दी लगातार चार माह तक पहनने में उन्हें अटपटा सा लगता है, लेकिन विभाग का नियम पालन करना भी जरूरी है।

नहीं मोड़ेंगे 15 मार्च तक

साल के आठ माह खाकी वर्दी में दिखने वाले अधिकांश पुलिस अधिकारी-कर्मचारियों के शर्ट की आस्तिन कोहनी तक मुड़ी नजर आती है, जो पुलिसकर्मियों को अच्छा लगता है, लेकिन अंगोला वर्दी धारण करने के बाद पुलिस विभाग के नियमानुसार कोई भी अधिकारी-कर्मचारी चार माह तक अपने शर्ट का आस्तिन नहीं मोड़ सकते। चाहे इस दौरान उन्हें गर्मी क्यों न लगे। वह आस्तिन किसी भी शर्त पर नहीं मोड़ते।

गांव में बदलाव की एक किरण” कहानी वर्षा की जुबानी

“एक कदम ही काफी है पूरी कायनात को बदलने के लिए, एक सूरज की रोशनी ही काफी है अंधकार को मिटने के लिए |” पहल “खुद से खुद का परिचय” की दूसरी कड़ी है | मैं वर्षा फिर से हाजिर हूँ एक और कहानी के साथ | ये कहानी है सरकारी स्कूल के एक खेल टीचर मोहन की |जिसने पुरे गांव का नक्षा ही बदल दिया | मोहन ने पुरे गांव में एक पहल शुरू की ये पहल थी आत्मरक्षा की शिक्षा की | इस शिक्षा को गांव का हर एक इन्सान सिख रहा है चाहे वो बच्चा हो या बुजुर्ग वो लड़की हो या 80 साल की बुजुर्ग महिला इस क्लास में उम्र का कोई दायरा नहीं है |क्यूँ की अनहोनी किसी के साथ भी हो सकती है | मोहन स्कूल में बच्चों को सिखाता की लोगों के साथ कैसे बात करनी है कैसे लड़किया अपनी रक्षा खुद कर सकती है साथ ही बच्चों के माता पिता को भी कहता जो नियम लड़कियों के लिए है वही नियम आप लडको को भी पालन करने को कहों हर नियम लड़कियों के लिए ही क्यूँ ? मोहन जानता था की लड़कियों को हम खुद ही कमजोर कर देते है और यदि उसके साथ कुछ गलत हो तो हम उसे ही दोष देते है पर क्यूँ लड़कियां खुद तो नहीं चाहेगी की लड़के उसके साथ कुछ गलत करें | मोहन के ये सब करने के पीछे भी उसकी खुद की एक कहानी थी मोहन का छोटा सा परिवार था जिसमे केवल चार सदस्य थे |उसकी पत्नी एक प्यारी सी बेटी कृति जो केवल 8 साल की थी और मोहन की बुजुर्ग माँ |एक दिन कृति स्कूल से वापस घर आरही थी की कुछ बदमाशों ने उसका रास्ता रोका और उसको गाड़ी में बैठा कर ले गये और उसकी इजत लुट ली और फिर उसे मार कर फेक दिया | मोहन को जब ये सब पता चला तो वह पुलिस के पास गया रिपोर्ट लिखवाई | नेताओ के पास गया पर अपराधियों का पता न चल सका |मोहन से जो बन पड़ा अपनी बेटी को इन्साफ दिलाने वो उसने सब किया पर वो अपराधियों को सजा न दिला सका |उसी दिन से उसने ये प्रण लिया की वो हर लड़की को इतन सक्षम बायेगा की वो अपनी खुद की रक्षा कर सके तभी से उसने आत्म रक्षा की शिक्षा लोगों को देने की पहल की और लड़कों को भी ये शिक्षा दी की यदी आप किसी लड़की के साथ गलत करते हो तो कल कोई दूसरा भी आप की बहनों बेटियों के साथ गलत करेगा |यदि हर लड़का ये बात समझ जाये तो शायद ये अपराध हो ही न |मोहन ने इस काम के लिए पुलिस की भी मदत ली |उसने स्कूल में 4 दिन एक पुलिस वाले को स्कूल में बुला कर हो रहे अपराधों की जानकारी देने और उससे जुड़े नियम-कानून और खुद की आत्म रक्षा कैसी करनी है ये भी बताने आग्रह किया |आज मोहन की मेहनत की वजह से इस गाव में 25 सालों से एक भी अपराध नहीं हुआ | आस पास के लोग मोहन को अपने गाव में बुलाकर ये शिक्षा देने और लोगों जागरूक करने के लिए बुलाते हैं | दोस्तों लड़कियों की जब भी इजत लुटी जाती है ,इसिड फेका जाता है तब भी हम केवल लड़कियों को ही ब्लेम करते है अपराधियों को खोजने से पहले हम लड़कियों के चरित्र पर कीचड़ उछालते है ,लड़कियों के पहनावे पे सवाल उठाते है | और ये सवाल उठाने वाले और कोई नहीं हम खुद ही होते हैं |ये भूल जातें है की हम दूसरों की लड़कियों पर उगली उठा रे कल उस की जगह हमारी लड़कियां भी हो सकती है | बीच सड़क पर लड़की के साथ गलत होता है चार बदमाश होते है उसके आस पास दस लोगों की भीड़ फिर भी उस चार लोग लड़की के साथ गलत कर के चले जाते है और आस पास के दस लोग देखते रह जाते हैं पर कुछ करते नहीं क्यूँ उन्हें डर लगता है की कौन इस पछेडे में पड़ेगा इस सोच के पीछे हमारा कमजोर सिस्टम है जो बदमाशों को कुछ रुपयों की लालच में शय देता है और जिसके कारण बेगुनाह लोग भी फस जाते हैं | हम लड़कियों को हर बात में टोकते है रात के लड़कियां बहार नहीं जाती ,छोटे कपडे नहीं पहनना है ,हर जगह घर वालों के साथ भेजना, हम ये सब लड़कों को क्यूँ नहीं कहते क्यूँ आज जो लड़कियों की इजट लुटी जा रही है वो कौन लुटता है लड़के ही न ? तो आप खुद ही सोचें की हमें आने जाने में पाबन्दी लड़कियों में लगनी चाहिए या लड़कों में ? ये प्रशन मैं आप पर छोडती हूँ |और आप से एक जाते जाते यहीं कहना चाहती हूँ की आप के घर में यदि लड़कियां है तो उसे ये आहसास न दिलाएं की वो कमजोर है जबकि उसको मजबूत बनाये ताकि वो हर परिस्थिति का सामना कर सके और हर परिस्थिति में आप उसके साथ खड़े हैं ये विश्वास दिलाएं | ये सब कैसे संभव हो सकता है जब आप लड़कियों को आत्मरक्षा की शिक्षा दिलाएं और इसे गंभीर रूप से ले | ज्यादा तो नहीं पर कुछ हद तो अपराध को हम रोक सकेंगें | ये सब के लिए शारीरिक रूप से मजबूत भी होना जरुरी है |मुझे याद है की जब मैं स्कूल में थी तो खेल क्लास होती थी पर वो खेल क्लास कम टाइम पास की क्लास ज्यादा होती थी ,हफ्ते में एक दिन पिटी क्लास होती थी स्कूल में ये सब करने का एक ही मकसद होता है की बच्चे शारीरिक रूप से मजबूत बन सके पर टीचर इस बात को गंभीरता से नहीं लेते है और नहीं माता पिता | अब इसे गंभीरता से लेना सिख लीजिये | किसी परिस्थिति से लड़ने के लिए शारीरिक रूप से मजबूत होना जरुरी है | महिलाओ पर हो रहे अपराधों को रोकने के लिए हमने भी एक पहल शुरू करने की ठानी है की हम आत्मरक्षा की शिक्षा को हर स्कूल में एक अनिवार्य विषय की तरह लागु करवाना चाहते है | इसके लिए हम शिक्षा विभाग को एक पत्र भेजने का विचार कर रहे है इसमें आप सब की राय चाहिए की ,यदि स्कूल में ये शिक्षा लागु होती है तो क्या अपराध कम होंगें ? हर बार की तरह फिर यहीं कहूँगी की इस प्रोग्राम का मकसद आप के अन्दर की अच्छाइयों को आप खुद ही पहचान सकें | ये कहानीयां जो मैं लिखती हूँ वो सच्ची घटनायें है | जिसे मैं कहानी का रूप देखर लिखती हूँ क्यूँ की इसमें जुडी बातें हमारी निजी जिंदगी को काफी प्रभावित करती है | बस आप सब से लास्ट में यही कहना चाहती हूँ “नदी बहते हुए न जाने कितने ही उचे-नीचे रास्तों से गुजरती है कितनी ही चट्टानों से टकराती है और खुद अपना रास्ता बनती है, वैसे ही हमे भी अपना रास्ता खुद ही बनाना होगा” वर्षा बी गलपांडे

पिता के त्याग की कहानी

 पिता के त्याग की कहानी  वर्षा की जुबानी 

अपने परिवार की खुशियों के लिए अपने जीवन को भी कुर्बान करने वाले को ही, पिता कहते है

आमतौर पर हम सभी को  बचपन में अपनी अनुशासनप्रियता व सख्ती के चलते हमारे पिता हमें क्रूर नजर आते हैं। लेकिन जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है और हम जीवन की कठिन डगर पर चलने की तैयारी  करने लगते हैं, हमें अनुभव होता है कि पिता की वो डाँट और सख्ती हमारे भले के लिए ही थी। उनकी हर एक सिखावन जब हमें अपनी मंजिल की ओर बढ़ने में मदद करती है, तब हमें मालूम पड़ता है कि पिता हमारे लिए कितने खास थे और हैं।

आज भी दुनियाभर में बच्चे सर्वप्रथम आदर्श के रूप में अपने पिता को ही देखते हैं। मां उनकी पहली पाठशाला, पहला विश्वविद्यालय है तो पिता पहला आदर्श। वे अपने पिता से ही सीखते हैं और उनके जैसा ही बनना चाहते हैं

ये कहानी है प्रीतम सिंग की जो पेशे से एक सोसाइटी में वाच मैंन का कम करता है | उसका परिवार गाँव में रहता है  | इसके दो बेटे हैं  बड़े बेटे का नाम सोहन और छोटे का नाम मन्नू हैं | बडे बेटे को डांस करने का शोक है  वो रोज स्कूल जाने के लिए निकलता और स्कूल न जाकर वो पूरा समय खेतो में डांस करता | एक दिन जब प्रीतम अपने गाँव आया तो स्कूल के मास्टर ने सोहन की शिकायत की वो स्कूल नहीं आता सारा सारा दिन खेतो में डांस ही करता रहता है पड़ने में उसका मन नहीं लगता | ये बात सुनकर प्रीतम घर आया और उसने सोहन से बोला बेटा आज हमें तुम्हारी एक खूबी मास्टर जी ने बताई है सोहन डर के कपना शुर कर दिया की आज उसको उसके पिता खूब डाट लगाने वाले है पर हुआ उल्टा प्रीतम ने सोहन को डाटा नहीं बलकी उसको बोला आज से तुम मेरे साथ शहर में रहोगें |

प्रीतम की कमाई इतनी नहीं थी की वो अपने बच्चों को अच्छी  शिक्छा दे सके फिर भी उसने अपने बच्चे को डांस की तालीम दिलाने के लिए शहर ले आया और उसका एक डांस स्कूल में एडमिशन करवाया | अब वो अपने बच्चे की खुशियों को पूरा करने के लिए दो जगह कम करना शुरू कर दिया | ये सिल्सिता रोज एसा ही चलता रहा एक दीन  सोहन ने पिता से कहाँ पिताजी मेरा एक इंडिया लेबल के सबसे बड़े डांस कॉम्पिटिशन में सलेक्शन हो गया है और मुझे वहां जाने के लिए बहुत से पैसे की जरुरत होगी उसने बेटे को हस्ते हुआ कहा तुम जाओ और खूब नाम कमाओ मैय तुम्हारे हर सपने को पूरा करूँगा और कुछ पैसे सोहन को देकर कहा तुम पैसे की चिंता मत करना बस अपने डांस पर ध्यान देना और ये कहकर वो हर रोज की तरह काम पर चला गया | अब प्रीतम अपने बच्चे के सपने को पूरा करने के लिए और ज्यादा मेहनत करने लगा | जब वो थक कर घर आता सोहन पूछता पिता जी  आप थक गये होगे तो प्रीतम कहता नहीं मैं नहीं तुम  थक गये  होगे  दिन भर डांस करते करते और जब सोहन सो जाता तो प्रीतम उसका पैर दबाता | खुद की शर्ट फट जाती पर वो उसे सिल कर पहन लेता पर सोहन को हमेशा अच्छे ही कपडे पहनाता | खुद एक टाइम खाना खाता पर सोहन को दोनों समय खाना खिलाता रोज कड़ी धुप में पसीना बहता, लोगों की बाते सुनता फिर भी घर में आते ही वो अपना दुख भूल सोहन से उसके दिन भर का हल पूछता |

 आज तक सोहन ने न जाने कितने ही कॉम्पिटिशन जीते और आज सोहन इंडिया के टॉप डांसर मेसे एक है |आज प्रीतम को दो जगहों पर काम करने की जरुरत नहीं |प्रीतम का छोटा बेटा भी एक सरकारी स्कूल में टीचर है और पूरा परिवार अब साथ है आज यदि प्रीतम के दोनों बेटे इस मुकाम पर  है तो वो प्रीतम के बलिदान और त्याग के कारण हैं  |अब आप सोच रहे होगें की कौनसा त्याग ? प्रीतम ने अपनी खुशियों को त्याग दिया,अपने बेटों की इक्छओं  को पूरा करने केलिए खुद की भूक प्यास भूल गया,अपने दर्द की भी परवा  नहीं की ,अपने बचों की ख़ुशी में खुद की ख़ुशी  रहा ढूडता रहा  ,पूरी उम्र उसने सिर्फ अपने बच्चों के खुशहाल  भविष्य के सपने देखता रहां | ये काम सिर्फ एक पिता ही कर सकता है |

“अपने परिवार की खुशियों के लिए अपने जीवन को भी कुर्बान करने वाले को ही, पिता कहते है” वे अपने जीवन में अपने सुखो का त्याग कर के अपने परिवार की जरूरतों को पूरा करते है।

 

सीख-

हमेशा आप  अपने माता-पिता से प्यार कीजिये, क्यों की हमारी ख़ुशी के लिए वे कई चीजों का त्याग करते है। जिसका हमें पता भी नहीं होता है, बहुत से समय हम जीवन में अपने आप को बड़ा बनाने में व्यस्त होते है और जिन्होंने हमें बड़ा किया उन्हें ही भूल जाते है, चाहे हम कितने की व्यस्त क्यू ना हो, अपना थोडा समय भी उनके साथ बिताये और उन्हें ये बताये के आप भी उनसे उतना ही प्यार करते है जितना वे आपसे करते थे। उन्हें आपके जीवन में उनका महत्व बताइए, उनकी सेवा कीजिये और उन्हें कभी दुःख मत दीजिये।

एक बात और की हम अपने बड़ो के साथ जैसा करेंगे , हमारे छोटे भी वैसा ही हमारे साथ करेंगे | हम यदि उनकी सेवा कर रहे है उनको समझ रहे है उनकी ख़ुशी में यदि हमें ख़ुशी मिल रही है तो यकीं करें दोस्तों आप अपने ही भविष्य को अच्छा  बना रहे हो | क्यूँ की हम यदि अपने माता पिता के साथ गलत करेंगें तो हमारे बच्चे भी वैसा ही सीखेंगें | इस लिए हमे हमेशा कोशिश करनी चाहिए की हम अपनी इक्छाओ को उनपर थोपे ना बल्कि ज्यादा अच्छा  हो की हम खुद को उनके अनुसार बदल ले |

दोस्तों मेरे इस प्रोग्राम का मकसद आप में छुपी अच्छाइयों को बहार लाना है जो हम रोज की व्यस्त ज़िन्दगी में कही भूल जातें है हर इन्सान में कुछ न कुछ अच्छाइयान जरुर होती है | बस उसी अच्छाइयों को खुद आप पहचान सको यहीं इस प्रोग्राम का मकसद है | आप को यदि मेरी कहानियां अच्छी लगती है तो आप इसे शेयर करें |यदि आप के पास भी कोई आप की लिखी कहानियां है जो आप चाहते हो की हम उन कहानियों को भी इसमें शामिल करें तो आप मुझे bbn24newsupdate@gmail.com या हमारी वेब साइड www.bbn24news.com पर  पोस्ट कर सकते है आप के नाम के साथ उन कहानीयों को हम जरुर शेयर करेंगें |

वर्षा बी गलपांडे

एक भारत श्रेष्ठ भारत का संदेश देते महाराष्ट्र के डॉ रामाचंद्र

रायपुर रामाचंद्र रमेश पेशे से आयुर्वेदिक डॉक्टर हैं और उन्होंने महाराष्ट्र के सिन्धदुर्गा जिले से साईकल में सवार होकर पश्चिम से पूर्व तक " स्वच्छ भारत सुंदर भारत - एक भारत श्रेष्ठ भारत " का संदेश देने विगत 5 जनवरी 2018 से निकले हैं जो ओडिशा के कोनार्क हेतु जा रहे हैं। डॉ रामाचंद्र ने बताया कि मैं गोवा बॉर्डर के पास स्थित महाराष्ट्र के सिन्धदुर्गा से साईकल से निकला हुँ यह संदेश देने के लिए की हमारा भारत श्रेष्ठ भारत है तथा इसे स्वच्छ और सुंदर बनाएं। इन्होंने जितने भी शहर, जिला, गाँव, कसबे से होकर गुजरे वहाँ उन्होंने स्कूली विद्यार्थियों, कॉलेज के विद्यार्थियों एवं जनमानस से मिलकर यह संदेश दिया और वे ओडिशा के कोनार्क में अपना यात्रा समाप्त करेंगे।

प्रधानमंत्री आवास योजना उर्मिला और पुनबाई को मिला पक्का आशियाना उर्मिला बाई ने कहा, सरकार ने पूरा किया पक्के मकान का सपना

जांजगीर-चांपा, :- विकासखण्ड बलौदा के ग्राम जर्वें (च) की निवासी 60 वर्षीय श्रीमती उर्मिला विश्वकर्मा का पक्के मकान का सपना पूरा हो गया है। वह अब प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत निर्मित पक्के आशियाने में अपने पूरे परिवार के साथ खुशी-खुशी रहती हैं। श्रीमती उर्मिला का कहना है कि सरकार ही है जिसने उनके लिए प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत पक्का मकान बना दिया, नहीं तो उनके लिए इतने सुंदर पक्के मकान का सपना देखना भी मुमकिन नहीं था। श्रीमती उर्मिला ने बताया कि कभी ऐसा भी समय था, जब भोजन के लिए पर्याप्त पैसे नहीं थे। मिट्टी का कच्चा झोपड़ी था। मिट्टी के घर की कितनी भी अच्छी छवाई हो, बारिश में टपकता ही था। वे बड़े मुश्किलों वाले दिन थे, पर प्रधानमंत्री आवास ने इस तरह की सभी दिक्कतों से छुटकारा दिला दिया है। श्रीमती उर्मिला ने कहा कि प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ मिलना हमारी खुश किस्मती है। अब पक्के मकान में रहते हैं और बेटे की कमाई से अच्छा भोजन करते हैं। वे अपनी बहू श्रीमती सुनीता विश्वकर्मा, बेटे श्री कृष्णकुमार विश्वकर्मा और अपनी तीन पोतियों के साथ प्रधानमंत्री आवास में रहती हैं। श्री कृष्णकुमार विश्वकर्मा कहते हैं कि पूरी जिन्दगी में ऐसा मकान नहीं बना सकते थे, और तो और वे भी ऐसे मकान का सपना तक नहीं देख सकते थे, लेकिन सरकार ने उनकी इच्छा पूरी कर दी। श्रीमती उर्मिला ने बताया कि वर्ष 2016-17 के अंतर्गत स्वीकृत प्रधानमंत्री आवास योजना में उन्हें पहली और दूसरी किश्त में 48-48 हजार रूपये तथा तीसरी किश्त 24 हजार रूपये मिल चुके हैं। उनका घर जुलाई 2017 में रहने के लिए तैयार हो गया था। घर में शौचालय भी बना है, उसका प्रोत्साहन राशि भी शासन द्वारा दिया जाएगा। श्रीमती उर्मिला के घर से लगा हुआ ही श्रीमती पुन बाई का प्रधानमंत्री आवास बना हुआ है। पुन बाई के पति का स्वर्गवास हो चुका है, वे अकेले रहती हैं। पुनबाई ने बताया कि वे अकेली हैं इसलिए सरपंच ने योजना के तहत मकान बनाने में उनकी पूरी मदद की है।

राजनादगांव :, मुख्यमंत्री ने आज श्रमिकों के साथ भोजन कर पंडित दीनदयाल अन्न सहायता योजना का किया शुभारंभ केवल 5 रुपए में मजदूरों को मिलेगा भरपूर भोजन

 मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह ने आज राजनांदगांव नगर के जयस्तम्भ चौक में श्रमिकों को 5 रूपए में गुणवत्तापूर्ण भोजन उपलब्ध कराने वाली पंडित दीनदयाल अन्न सहायता योजना का शुभारंभ श्रमिकों के साथ भोजन कर किया और कहा की  , भोजन पौष्टिक और हाईजिनिक, श्रमिकों को बेहद कम मूल्य में अच्छा गुणवत्तापूर्वक भोजन देना योजना का लक्ष्य है  मुख्यमंत्री ने श्रमिकों से भोजन पर चर्चा करते हुए कहा कि दिन में आपको बहुत जल्दी काम पर निकलना पड़ता है और कई बार पति-पत्नी दोनों मजदूरी पर निकल जाते हैं। ऐसे में भोजन के लिए सुबह से ही जुटना पड़ता है। इस समस्या से मजदूर भाइयों को कैसे मुक्ति मिले, इसके समाधान के लिए यह योजना लाई गई। अब सुबह 8 बजे आते ही आपको गर्मागर्म खाना मिल जाएगा और टिफिन के लिए भी आप खाना पैक करा पाएंगे। पांच रूपए में खाने की यह सुविधा गुणवत्तापूर्ण होगी इसका पूरा ध्यान रखा गया है। कन्हारपुरी से आये श्रमिक श्री खगेश्वर साहू ने इस योजना के लिए मुख्यमंत्री को धन्यवाद दिया। उन्होंने कहा कि जितनी सुबह हम आ जाते हैं। उतने जल्दी हमें काम मिल जाता है और मजदूरी भी घंटे के हिसाब से कुछ बढ़ जाती है। अब यहां खाना मिल जाएगा तो हमें बड़ी राहत मिलेगी।
    इस मौके पर लोकसभा सांसद श अभिषेक सिंह ने स्वयं अपने हाथों से खाना श्रमिकों को परोसा। उन्होंने कहा कि इतना गर्म, पौष्टिक खाना इतने कम मूल्य में उपलब्ध होने से श्रमिक भाइयों के लिए बहुत अच्छा रहेगा। इसके साथ ही वे टिफिन के लिए भी भोजन 5 रूपए में ले सकते हैं। इस योजना के संबंध में जानकारी देते हुए श्रम विभाग की विशेष सचिव  आर. शंगीता ने बताया कि इसके लिए जिम्मेदारी अक्षयपात्र फाउंडेशन के सहयोगी संस्थान टचस्टोन फाउंडेशन को दी गई है। अक्षयपात्र फाउंडेशन सेवा भावना के साथ गुणवत्तापूर्ण मध्यान्ह भोजन आंध्रप्रदेश सहित अन्य राज्यों में उपलब्ध कराता है। संस्थान के प्रमुख  व्योमकाश ने बताया कि गुणवत्तापूर्वक भोजन के लिए हमारे बेस किचन चलाये जाते हैं। यहां हाईजिन के हर मानदंड का पालन किया जाता है। खाना ऐसे स्टेनलेस स्टील पात्रों में रखा जाता है जिनमें 4 घंटे खाना पूरी तरह गर्म रहता है।

कृषि मंत्री बृजमोहन अग्रवाल किया एप्प,लांच 7 दिन में होगा समस्या का निदान

रायपुर। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपायी के जन्मदिन के अवसर पर कृषि मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने अपना मोबाइल एप्प लॉंच किया है. इस एप्प के जरिए सीधे मंत्री बृजमोहन अग्रवाल से आप जुड़ सकते हैं और अपनी समस्याओं व शिकायतों को भेज कर उनका समाधान प्राप्त कर सकते हैं. एप्प में उनके सभी विभागों को जोड़ा गया है. इसमें कृषि, जल संसाधन. पशुपालन, धर्मस्थ और मतस्य विभागों को शामिल किया गया है.

ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में रहने वाले लोग जिन्हें इन विभागों से जुड़ी हुई समस्या हैं वे अपनी समस्या को इस एप्प में भेज सकते हैं. एप्प में भेजी गई समस्याओं का निदान 15 दिन के भीतर किया जाएगा. उनकी समस्याओं के समाधान के लिए बकायदा एक नोडल अधिकारी की नियुक्ति की जा रही है. इसके अलावा रायपुर दक्षिण विधानसभा में रहने वाले लोग भी अपनी सभी समस्याओं को भेज सकेंगे. निगम से जुड़ी हुई समस्याओं का निदान 7 दिन के भीतर किए जाने की बात कही जा रही है.

जिला अस्पताल के कर्मचारियों ने की राष्ट्रगान के साथ कामकाज की शुरूआत, शुरू की गई नेकी की दीवार

प्रकाश शर्मा

जांजगीर-चांपा :-जिला अस्पताल में अब कामकाज की शुरूआत राष्ट्रगान के साथ होती है। सुबह 9.30 बजे अस्पताल के सभी डॉक्टर, नर्स, वार्ड ब्वॉय सहित अधिकारी-कर्मचारी ओपीडी में उपस्थित होते है। अच्छी बात ये है कि कर्मचारी देश भक्ति के साथ अस्पताल की छवि सुधारने का प्रयास कर रहे हैं। अपनी इस अच्छी पहल को और अगे बढ़ाते हुए हॉस्पिटल स्टाफ ने ओपीडी में नेकी की दीवार बनाई गई है। जहां से बेसहारों को मदद मिलेगी। नेकी की दीवार मे घर में पुराने पहनने, ओढ़ने, बिछाने के कपड़े हैं जिसका आप प्रयोग नहीं कर रहे हैं और वह जरूरतमंदों के काम आ जाए उसे नेकी की दीवार में टांग सकते हैं। इससे जरूरतमंद लोग जरूरत के कपड़े ले जा सकेंगे। सीएस डॉ. जैन ने बताया कि कुछ दिन पहले इंटरनेट देख रहे थे। उन्होंने देखा कि मप्र के बैतुल में नेकी की दीवार का उल्लेख था। इसे देखने के बाद उन्होंने जिला अस्पताल में भी मुहिम शुरू करने की सोची। स्टॉफ से चर्चा के बाद बुधवार को इस नेकी की दीवार की शुरुआत की गई। कपड़े टांगने के लिए यहां खूंटियां लगाई गई हैं। डॉ. जैन ने कहा कि नेकी की यह दीवार उन लोगों के लिए जो गरीबी रेखा से नीचे जीवन व्यतीत कर रहे हैं। बहरहाल अव्यवास्थाओं के लिए चर्चा मे रहने वाले जिला हॉस्पिटल मे अब नेकी के जरिये ही सही पर स्टाफ अब छवी सुधारने मे जुटा है।