विशेष

खबरीलाल रिपोर्ट (वृंदावन) ::- माया को पार करना कठिन है, भगवान की शरण मे जाने से माया के पार हो सकते हैं :- स्वरूपानन्द सरस्वती ।।

जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने आज चातुर्मास्य व्रत अनुष्ठान के 13 वें दिवस पर सांयकालीन सत्संग सभा में उपस्थित भक्तों से कहा कि माया को पार करना कठिन है, पर भगवान की शरण मे जाने से माया के पार हो सकते हैं। आज के इस विशेष दिन पर पूज्य महाराजश्री के शिष्य प्रतिनिधि दंडी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज, स्वामी सदाशिवेंद्र सरस्वती जी महाराज, ब्रह्मचारी ब्रह्मविद्यानंद जी महाराज , किशोर जी महाराज, ब्रह्मचारी कैवल्यानन्द जी महाराज, साध्वी लक्ष्मी मणि शास्त्री व आदि संत, महात्मा एवं श्रद्धालुगण उपस्थित होकर मंत्रमुग्ध होकर पूज्य शंकराचार्य जी महाराज के सत्संग का लाभ ले रहे थे। स्वामी स्वरूपानन्द जी महाराज ने आगे कहा की सत्पुरुषों के संग से भगवान की कथा सुनने का अवसर प्राप्त होता है जिससे उसके महत्त्व का बोध हो जाता है। भगवान की कथा मनुष्य के लिए कर्ण रसाथन है। हृदय की निर्बलता और दोष कथा श्रवण के रसायण से दूर होता है। कथा श्रवण से मन , संसार से हटकर , प्राणी को मोक्ष मार्ग हेतु गति प्रदान करती है। भगवान के स्वरूप का बोध होने पर मनुष्य उनका ही हो जाता है। दुःख होने पर सब आंखे फेर लेते हैं पर भगवान उस समय भी हमारे सहाय करते हैं। आगे महाराजश्री ने कहा कि भगवान शंकर कहते हैं कि एक बार कोई श्रीराम के स्वभाव को जान ले तो उन्हें कोई छोड़ नहीं सकेगा। श्रीराम कोई साधारण मनुष्य नहीं और ना ही महामानव हैं, वे तो साक्षात परब्रह्म परमात्मा हैं।  आगे पूज्य महाराजश्री ने रामजी के प्रकट होने की कहानी बताई जिसमे उन्होंने कहा श्रीराम प्रकृति से उत्पन्न इंद्रियों के विषय नहीं है। श्रीराम जी ने प्रकट होने के लिए समग्र ब्रह्मांड में जम्बूद्वीप भारतवर्ष  आयोध्या दशरथ जी के महल के कौशल्या जी भवन का चयन किया। प्राकट्य तो भगवान जी का लीला है। भगवान की दो प्रकार की माया होती है - स्वजन मोहिनी माया तथा विमुखजन मोहिनी माया। इन्ही शब्दों के साथ महाराजश्री ने सत्संग में अपना आशीर्वचन प्रदान किया तथा आगे और भगवान की लीलाएं एवं कथा का रस पान होगा जिससे मनुष्य की शंकाएं दूर होती चली जायेगी और व्यक्ति सत्संग से जुड़कर नियमित भगवान की आराधना करेंगे जो प्राकृतिक रूप से प्रत्येक को श्रवण करना चाहिए।

खबरीलाल रिपोर्ट (वृंदावन) ::- गृहिणी गृहस्त आश्रम की केंद्र है :: स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ।।

जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज के 68 वें चातुर्मास्य व्रत अनुष्ठान में आज संत, महात्माओं व विध्वत जन सत्संग में सम्मिलित हुए जहां वर्णाश्रम धर्म और नारी शक्ति पर सत्संग में मंचासीन वक्ताओं ने अपनी बातें रखी। सर्व प्रथम जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती महाराज के शिष्य प्रतिनिधि दंडी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने कहा कि नारी और पुरुष दोनों ही अपने सिमा में रहते हुए स्वतंत्रता भोग करते हैं। घर मे रहने मात्र से कोई गृहस्त नहीं हो जाता है। घर मे जब गृहिणी आ जाती है तब गृहस्त जीवन शुरू होता है। गृहस्ती गृहिणी को केंद्र में रखकर चलती है। आगे स्वामिश्री: ने कहा कि भारतीय संस्कृति में स्त्री और पुरुष आधे आधे हैं। भगवान जब हमे दर्शन देते हैं तो वे अर्धनारीश्वर के रूप में दर्शन देते हैं। विदुषिका गार्गी जी ने सर्व प्रथम प्रार्थना के साथ अपना कथन रखा। उन्होंने कहा की विद्यालय, महाविद्यालय और विश्वविद्यालय में राष्ट्रभक्ति नहीं पढ़ाई गई तो वह शिक्षित शैतान बनाने की कारखाना बन जाएंगे। आजकल पैसे कैसे कमाए जाते हैं उसकी शिक्षा दी जा रही है तथा परंपराओं की अनदेखी करना आज फैशन सा हो गया है। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो व्यास जी को नहीं जानते हुए भी मंच से बयान बाजी करते हैं। आगे उन्होंने कहा कि रक्षा करने वाले से ज्यादा मूल्यवान वो होते हैं जिनकी रक्षा की जाती है जैसे पिता अपनी बेटी की रक्षा करता है, पति अपने स्त्री की रक्षा करता है। पत्नी के लिए उनका पति ही सबसे बड़ा गुरु होता है। आज जो दुष्कर्म की घटनाएं घाट रही है वह पाखंड बाबाओं के शरण मे जाने के कारण से हो रहा है जबकि स्त्रियों को अपने पति के शरण मे जाना चाहिए। आगे गार्गी जी ने कहा कि लड़कियां ज्यादा मूल्यवान होती हैं क्यों कि आगे चलकर उन्हें ही विवेकानन्द, भगत सिंह आदि के जैसे संतानों का जन्म देना है। गुजरात के वड़ोदरा से पधारे किशोर भाई दवे महाराज ने अपने क्रांतिकारी लहजे में बोलते हुए सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया। उन्होंने राष्ट्र के प्रति प्रेम और नारियों के प्रति सम्मान की एक अलग ही अलख आज के सत्संग में जला दिए। उन्होंने कहा राष्ट्र की रक्षा सर्वोपरि है और यह मुद्दा बार बार उठाये जाते हैं और उठाये जाने चाहिए। किसी देश को माता नहीं कहा जाता है केवल भारत को ही माता कहते हैं। हमारे देश के संस्कार ऐसे हैं कि हम सभी प्रातः उठते साथ अपने धरती माँ को प्रणाम करते हैं और भारत माता की जय बोलते हैं। गौ भी हमारी माता है जिसकी रक्षा हमारा परम् कर्तव्य है। जब पूजा की बात आती है तो भगवान, गाय, गुरु और माता पिता की पूजा की जाती है। उन्होंने क्रांतिकारी मदन लाल धींगड़ा, भगत सिंह के ऊपर भी प्रकाश डाला। बलिदान की संस्कृति हमारी है। अंत मे उन्होंने कहा कि देश के लिए, गाय के लिए, अपने संस्कृति की रक्षा के लिए हमे बलिदान देने हेतु हमेशा तैयार रहना चाहिए। इसके पश्चात ब्रह्मचारी शिवप्रियानन्द, साध्वी लक्ष्मी मणि शास्त्री, केशवानंद जी महाराज , स्वामी गोविंदानन्द सरस्वती व आदि संत, महात्मा एवं विध्वत जनों ने सत्संग में अपनी बातें रखी जिसे उपस्थित सभी भक्तगण, श्रद्धालु गण मंत्रमुग्ध हो गए और अंत में ज्योतिष पीठ व्यास के सुरेश पांडेय रामायणी के सुमधुर भजन से सत्संग समाप्त हुआ।

खबरीलाल रिपोर्ट (वृंदावन) ::- एक बार किसी के अंदर प्राण आ गया तो उसे आप मार नहीं सकते - स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ।।

ज्योतिष एवं द्वारका शारदा पीठ के पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द जी सरस्वती का 68 वां चातुर्मास्य व्रत अनुष्ठान वृंदावन धाम स्थित श्रीउड़िया बाबा आश्रम में आयोजित है जिसमे प्रतिदिन रासलीला, वेदांत अध्यन एवं सत्संग नियमित हो रहे हैं और इस सत्संग में संत, महात्मा अपने श्रीमुख से प्रवचन का रस पान कराते हैं जिसमे सैंकड़ो श्रद्धालुगण उपस्थित होकर पूज्य शंकराचार्य महाराज एवं अन्य संत, महात्माओं द्वारा दिये गए प्रवचनों को सुनकर अपने मन के संशय को दूर करते हैं। इसी कड़ी में आज शंकराचार्य महाराज के शिष्य प्रतिनिधि परम् पूज्य दंडी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने अपने प्रवचन में देवताओं के ऊपर हो रहे अत्याचार ( काशी में मंदिर तोड़े गए ) पर अपनी बात रखते हुए कहा की यदि 3 दिनों तक लगातार किसी मूर्ति या पत्थर की रोजाना पूजा अर्चना किया जाए, स्नान कराया जाए और भोग लगाया जाए तो शास्त्र अनुसार उस मूर्ति या पत्थर में प्राण आ जाते हैं । एक बार किसी मे प्राण आ जाये तो उसे हम मार नहीं सकते। व्यवहारिक दृष्टि की यदि बात करें तो वैध संतान और अवैध संतान होते हैं। जो संतान पाणिग्रहण के पश्चात उत्पन्न होता है वह वैध संतान कहलाता है पर जो संतान कामाचार्य से उत्पन्न होता है उसे हम अवैध कहते हैं जब कि संतान अवैध नहीं होता हैं बल्कि जो पुरुष और स्त्री अवैध रूप से कामाचार्य किये हैं बिना पाणिग्रहण के वह अवैध है। लेकिन अवैध संपर्क के कारण जो संतान पृथ्वी पर आया है क्या धर्म शास्त्र और भारत का संविधान उसे मारने की अनुमति देता है ? नहीं देता है , बल्कि उस संतान के लिए सरकार अनाथालय में व्यवस्था करती है जिससे कि उसका भरण पोषण हो सके। एक बार किसी के अंदर प्राण आ गया तो उसे आप कदापि मार नहीं सकते। आप बताइए वैध और अवैध का क्या मानक है ? काशी खंड में जिन मन्दिरों का उल्लेख किया गया है वह स्कन्द पुराण का अंग है और स्कन्द पुराण वैस जी द्वारा लिखा गया है जो हजार वर्ष पहले का लिखा हुआ है । यदि व्यक्ति इतिहासकार की दृष्टि से भी देखे तो वो 1000 वर्ष पहले की है। हजार साल पहले भारत मे कहाँ संविधान था वह तो 70-71 साल से लागू हुआ है। उससे पहले अंग्रेज थे, मुग़ल साम्राज्य था। उस समय शस्त्रीय संविधान लागू था, वेद मंत्रों से राजा बनाया जाता था, उनके मंत्री ब्राह्मण होते थे और विद्ववत परिषद होता था। ऐसा कोई अवसर आता था तो विद्वानों की परिषद निर्णय देती थी और उसे ही समाज स्वीकार करता था। पुराने समय में पट्टा आदि शुरू ही नहीं हुए थे और लोगों को जहां जगह मिली वहीं बस गया और वहीं आबादी बस गई। देश स्वतंत्र होने के बाद जो जहां बसा था उसे सरकार ने पट्टा दे दिया। जो जहां बैठ गया उसी को देखकर नक्शा बनाया गया। जो पहले आके बैठ गया उस स्थान पर उसका अधिकार है। जब भगवान वहां पहले से बैठे हैं , उन्हें किस कानून से वहां से हटा रहे हो और कैसे वे अवैध हैं यह भी बताओ ? जो मंदिर काशी में हैं वे पहले से वहां हैं इसलिए वह अवैध नहीं हो सकता। वो भगवान का जगह है और मनुष्य को उन्हें हटाने का कोई अधिकार ही नहीं है।

खबरीलाल रिपोर्ट (वृंदावन) ::-  " मैं हूं " इतना तो लोग जानते हैं, किन्तु अपनी आनन्दरूपता को नहीं जानते हैं :: स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती ।।

प्रातःकालीन सत्र में  बृहदारण्यक पर चर्चा करते हुए शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी महाराज ने रेखांकित किया कि शास्त्र उन्ही के लिए हैं जो शरीर को आत्मा से अलग मानते हैं और इस बात का उपाय करते हैं कि शरीर के न रहने पर आत्मा को परलोक में सुख मिले, आत्मा की सद्गति हो। मन का मैल निष्काम कर्म, ईश्वरार्पण बुद्धि और परोपकार से छूटता है। ईश्वर से कोई न कोई सम्बन्ध जोड़ लेना चाहिए। इससे उपासना आसान हो जाता है। माताभाव से, पिताभाव से , पुत्रभाव से किसी भी भाव से उपासना करें, किन्तु आत्मभाव ही मुख्य और सर्वोत्तम सम्बन्ध है।  वेदांत कक्षा में पञ्चदशी पढ़ाते हुये महाराजश्री ने बताया कि  वेद्य अर्थात् ज्ञेय अनेक हैं, संवित् अर्थात् ज्ञान एक है। वेद्य परिवर्तित होते रहते हैं, संवित् नहीं। वह संवित् ही आत्मा है।  प्रत्येक प्राणी का अपने आप से स्वाभाविक या अकारण प्रेम होता है। इसीलिए प्रत्येक प्राणी अपने अस्तित्व को बचाना चाहता है। अन्य से सोपाधिक या सकारण प्रेम होता है। आत्मा ही सबके लिए परम प्रेमास्पद है। आत्मा और उसके आनन्द का ज्ञान न होने के कारण ही लोग विषयों में आनन्द खोजते हैं। जिस प्रकार निकट के सरोवर में काई से ढका जल न दिखने से कोई दूर की मृगमरीचिका की ओर जल की खोज में जाये उसी प्रकार अज्ञान से ढके होने के कारण आत्मानन्द का लाभ न लेकर लोग विषयों की ओर भागते हैं। "मैं आनन्दरूप हूं", यह नहीं जानते। इसका कारण अनादि अविद्या है। वह अविद्या अनादि है किन्तु अनन्त नहीं। ज्ञान से उसका अन्त हो जाता है। उसके अन्त होने पर जीव अपने स्वरूपानन्द में स्थित हो जाता है। माया और अविद्या में अन्तर - ईश्वर का सम्बन्ध माया से है,  जीव का अविद्या से। माया ईश्वर के वश में है, जबकि जीव अविद्या के वश में। अविद्या के कारण मनुष्य शरीर को अपना स्वरूप और शरीर के सम्बन्धियों को "मेरा" कहता है। सृष्टि की रचना ईश्वर की आज्ञा से जीवों के भोग के लिए होती है। 

बचपन का पुनर्जन्म

बचपन की यादों की पोटली बाँध कर रखी थी मैंने , बुढ़ापे में बच्चों के साथ कब ये पोटली खुलती गई पता ही नहीं चला और कब बचपन की यादों की मेरी ये विरासत मैंने इन्हें सौप दी इसका अहसास ही नहीं हुआ |”सुबह के तक़रीबन पांच बजे थे अचानक पेट में दर्द उठा मैंने इन्हें उठाया और कहाँ की सुनो मुझे काफी दर्द हो रहा है थोड़ी ही देर में एम्बुलेंस की आवाज कानों में पड़ी फिर जब मेरी आंखें खुली तो मेरे पास एक नन्ही सी परी थी| थोड़े दिन बाद हम हॉस्पिटल से घर आये मेरी बेटी अब पंद्रह दिनों की थी |उसकी देखभाल में सारा घर भी कम पड़ जाता जैसे एक दरबार में किसी राजा को खुश करने में प्राजा लगी रहती है वैसा कुछ माहौल था |घर के सदस्य कोई उसके साथ बच्चों जैसी आवाज में बोलता तो कोई उलटी सीधी आवाज निकाल कर उसे हसाता |लोग उसके साथ रहकर अपनी उम्र भी भूल गये थे |मै भी उसके काम में करते करते खुद को भूल जाती उसके साथ कब सुबह होती कब रात पता ही नहीं चलता |कुछ दिनों में उसका नामकरण संस्कार किया गया और अब उसे सब लोग हृति कहकर बुलाने लगे |हृति जो अपने नाम की तरह ही हमारे जीवन की ख़ुशी लाई थी | जैसे जैसे समय गुजरता जा रहा था हृति की बदमाशियां भी बडती जा रही अब उसकी बदमाशियां देख उसे शैतान  की नानी ,बदमाश लड़की ना जाने कई नामों से पुकारने लगे हम |हृति को मैं खाना ही खिला रही थी की अचानक दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी उस दिन घर में कोई न होने के कारण मुझे उसे अकेले छोड़ दरवाजा खोलने जाना पड़ा देखा पोस्टमैंन था वापस आकार देखि तो हृति ने सारा खाना अपने ऊपर गिरा रखी थी |अब ये उसकी रोज की आदत सी बन चुकी थी जिसे करने से उसे खाफी ख़ुशी मिलती हो उसकी ये आदत की मुझे भी आदत हो गई थी| समय पंख लगा कर उड़ता चला गया और हृति की उम्र भी समय के साथ बडती चली गई अब हृति अब खाना गिराना वाला खेल छोड़ अब धुल मिटटी में खेलना उसका पसंदीदा खेल बन चूका था |खेल बदलने के साथ साथ शौक भी बदते गये अब हृति अपनी तोतली भाषा में अपनी पसंद ना पसंद कह सकती थी अब उसे जो पहनना है वही पहनना होता था | तोतलाना उसका छूटा ही नहीं था की उसके स्कूल जाने का पहला दिन आगया हृति का पहला दिन था पर डर मुझे लग रहा था की वो कैसे वहां रहेगी रोएगी या नहीं ,खाना खा लेगी या नहीं ना जाने इसे कई सवाल मन में सता रहे थे कुछ दिनों में उसके कई दोस्त बनगए थे अब सारा समय उसके दोस्तों के साथ बिताये पल के बारे में सुनते और उसकी रोज की नई-नई डिमांड सुनते निकल जाता | आज उसके बचपन का हर दिन मैं अपने बचपन के दिन की तरह ही जीती हूँ उसके साथ रह कर बिलकुल बच्ची बनकर इसलिए मुझे अक्सर ऐसा महसूस होता है की मेरे बचपन का पुनर्जन्म हुआ हो |अक्सर हम बच्चों के साथ बच्चे बन जाते है हमे अपनी उम्र का अहसास भी नहीं रहता और हम भी बच्चों जैसी हरकते करने लगते है |कभी उनके लिए घोड़ा बन जाते है तो, कभी उनके लिए कागज़ की कश्ती बना कर पानी में बहाते है| इसी बहाने हम अपनी बचपन की यादों को जीते है और हमे पता ही नहीं चलता की जो चीजे हमने  बचपन में की थी वो अब हम अपने बच्चों और नाती पोतों के साथ उसे कर के अपने बचपन की यादों को जी रहें हैं और उन बच्चों को अपने बचपन की विरासत सौप रहे जो वो बड़े होने के बाद आने वाली जनरेशन को देंगें |इसी लिए ये कहना गलत नहीं होगा की बचपन का पुनर्जन्म होता है |वर्षा भिवगड़े गलपांडे  

खबरीलाल लाइव न्यूज़ ::-  अधर्म करके जो सुखी हो रहे हैं वे फांसी के मुलजिम हैं : स्वरूपानन्द सरस्वती ।।

चातुर्मास्य व्रत अनुष्ठान के चतुर्थ दिन वृंदावन स्थित उड़िया बाबा आश्रम में सत्संग के अवसर पर द्विपीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती महाराज ने उपस्थित सभी भक्तों एवं श्रद्धालुओं से कहा कि जो व्यक्ति अधर्म करके सुखी हो रहे हैं वे फांसी के मुलजिम हैं। उन्हें उनके किये गए घोर पाप का दुःख भोगना ही पड़ेगा। अगर वे इससे बचना चाहते हैं तो उन्हें मृत्य भय को छोड़ मृत्यु की तैयारी करना पड़ेगा। कोई भी प्राणी मरने से बचना चाहता है। किट पतंग भी चाहते हैं कि उनकी मृत्यु न हो। जब जन्म लिया है तो मृत्यु निश्चित है और मृत्यु पश्चात जन्म भी निश्चित है। भगवान श्रीराम ने कहा था कि मैं कितना अभागा हूँ कि मुझे पितृ प्यार से वंचित रहना पड़ा और मेरे शोक में मेरे पिता की मृत्यु हो गई। भगवान श्रीराम ने जटायु से उन्हें अपने पिता बनने के लिए कहा। तब जटायु ने उत्तर दिया कि मैं आपका पिता नहीं बनना चाहता हूँ क्यों कि मैं अपने मृत्यु के समय आपको देखकर आपके गोद मे प्राण त्याग करना ज्यादा पसंद करूँगा। राजा दशरथ तो आपके बिना देखे ही प्राण त्याग दिए इसलिए मैं आपका पिता नहीं बनूंगा। आगे महाराजश्री ने कहा कि भगवान निर्बल के लिए हैं जो उन्हें बल प्रदान करते हैं। मरने से बचना है तो भगवान के शरण मे जाना चाहिए। आगे महाराजश्री ने पुनर्जन्म होता है कि नहीं उस पर भी प्रकाश डालते हुए भक्तों को अपनी बात बताई। सत्संग की शुरुवात ब्रह्मचारी ब्रह्मविद्यानन्द ने मंगलार्चन से किया तत पश्चात पादुका पूजन होने के बाद महाराजश्री ने अपने आशीर्वचन में उक्त बातें कही। आज के सत्संग में स्वामिश्री: अविमुक्तेश्वरानंद: सरस्वती , स्वामी सदाशिवेंद्र सरस्वती, साध्वी लक्ष्मी मणि शास्त्री व आदि महात्माओं ने भी अपने विचार रखे। इस अवसर पर बहु संख्या में भक्तों एवं श्रद्धालुओं ने उपस्थित होकर प्रवचन का लाभ उठाया

खबरीलाल लाइव रिपोर्ट ::- अपने सुख के लिए हम सबको छोड़ देते हैं, लेकिन अपना सुख नहीं छोड़ते हैं :: स्वरूपानंद सरस्वती ।।

अनंत श्री विभूषित ज्योतिष एवं द्वारका शारदा पीठ के पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी सरस्वती महाराज के 68 वें चातुर्मास्य व्रत अनुष्ठान वृंदावन स्थित उड़िया बाबा आश्रम में आयोजित है। आज 31 जुलाई 2018 को चातुर्मास्य व्रत अनुष्ठान के चतुर्थ दिन वेदांत अध्यन के समय पूज्य महाराजश्री ने कहा कि अपने सुख के लिए व्यक्ति सबको छोड़ देता है लेकिन अपना सुख कोई नहीं छोड़ता है। आगे उन्होंने कहा कि जहाँ प्रेम होता है वहां पर आनंद होता है। हम अपने आप से क्यों प्रेम करते हैं इसका कारण कोई नहीं बता सकता है। आगे महाराजश्री ने बताया कि आत्मा सत्य, चित्त और आनंद है। आत्मा सचिदानन्द का स्वरूप है। प्रत्येक मनुष्य का पिता है लेकिन सबके ऊपर जो पिता है वह स्वयं शंकर हैं। जिनका कोई पिता न हो उनका परमपिता होता है। इस अवसर पर महाराजश्री के शिष्य प्रतिनिधि दंडी स्वामी सदानंद सरस्वती व दंडी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती, स्वामी अमृतानन्द सरस्वती, ब्रह्मचारी सुबुद्धानन्द जी महाराज, ब्रह्मचारी ब्रह्मविद्यानन्द जी महाराज, साध्वी लक्ष्मी मणी शास्त्री, सुधा मोहता, सुचित्रा मोहता, पुष्पा पड़िया एवं आदि संत, महात्मा व भक्तगण उपस्थित थे। अंत मे महाराजश्री ने कहा कि प्रत्येक मनुष्य मरने से डरता है क्यों कि वह अपने अस्तित्व को खोने के लिए तैयार नहीं होता है। मनुष्य तो दूर, किट-पतंग भी मरने से डरता है। असल मे मृत्यु कोई नहीं चाहता है क्यों कि वे अपने से प्यार करते हैं। माना कि आत्मा सचिदानन्द स्वरूप है लेकिन उसका किसी भी वस्तु से प्रेम या द्वेष ज्ञान से होता है। बिना जाने प्रेम नहीं होता है। आत्मा में ही सुख है और प्रेम करने के लिए भी ज्ञान होना चाहिए।

खबरीलाल रिपोर्ट (वृंदावन) ::- कुसंग से बचने के लिए सत्संग करना चाहिए : स्वरूपानंद सरस्वती।।

वृंदावन के उड़िया बाबा आश्रम में आयोजित ज्योतिष एवं द्वारका शारदा पीठ के पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी महाराज के 68 वें चातुर्मास्य व्रत अनुष्ठान में आयोजित सत्संग में पूज्य महाराजश्री ने उपस्थित भक्तों से कहा कि " कुसंग से बचने के लिए सत्संग करना चाहिए" । सत्संग से ही मन में जमे हुए मेल, शंका दूर होते हैं और व्यक्ति ज्ञान अर्जित कर अपने बुद्धि से सफलता की ओर अग्रसित होते हैं। आज के सत्संग में सैंकड़ों भक्तों की उपस्थिति में पूज्य महाराजश्री का चरण पादुका का पूजन भक्तों ने किया और उनसे आशीर्वाद प्राप्त किया। पूज्य महाराजश्री ने अपने आशीर्वचन में प्रत्येक भक्तों के उद्देश्य से कहा कि गुरु की सेवा के साथ साथ सत्संग करना चाहिए, इससे मन मे न तो मैल जमती है, न शंका उत्पन्न होती है और न ही ईर्ष्या द्वेष की भावना जागृत होती है। साथ ही उन्होंने कहा कि व्यक्ति को अपने पद, पैसे आदि की घमंड कदापि नहीं करना चाहिए इससे व्यक्ति अकेला हो जाता है और वही घमंड, अहम उन्हें नीचे ला देती है। पूज्य महाराजश्री ने एक कहानी सुनाई जिसमे एक चोर अपने चार पुत्रों से कहता है कि कभी सत्संग में नहीं जाना और यदि किसी सत्संग वाली जगह से गुजरते हो तो कानों में उंगली डाल लेना, पर सत्संग नहीं सुन्ना। एक दिन एक स्त्री काली के भेष में उन चोरों के घर गई और उनसे कुछ कह। काली के रौद्र रूप को देखकर सभी भयभीत हो गए पर छोटे पुत्र ने तलवार निकली और काली की ओर मारने दौड़े जिसे देखते हुए काली की भेष वाली स्त्री भाग निकली जिससे उसके नकली हाथ, दांत आदि इधर उधर गिर गए। जब चोर के पिता ने पूछा कि तुम्हे कैसे मालूम पड़ा कि वो बहरूपिया है तब उनके छोटे पुत्र ने कहा कि मैं एक दिन एक सत्संग वाली जगह से गुजर रहा था कानों को बंद करके, पर जब प्यास लगी तो कान से हाथ हटाया, तब एक वाणी कानों में आई कि भगवान की कभी छाया नहीं पड़ती और यही बात हमको याद थी जिससे पता चला कि ये बहरूपिया है जो काली के भेष में आई थी। इसलिए हमेशा सत्संग करना चाहिए और अपने गुरु की बातों को मानकर चलना चाहिए क्यों कि गुरु ही व्यक्ति को सही रास्ता दिखाते हैं और व्यक्ति बिना किसी शंका से प्रसन्नचित रहता हैं।

खबरीलाल रिपोर्ट (वृंदावन) ::-  ब्रह्म का प्रत्यक्ष ज्ञान केवल श्रुतिवाक्य से होता है : स्वामी स्वरूपानन्द ।।

परम् पूज्य शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती अपने 68 तम चातुर्मास्य व्रत अनुष्ठान के तृतीय दिवस पर वेदांत पर चर्चा करते हुए बताया की ग्रंथ पंचदशी में लिखे हुए श्लोकों को पढ़ाते व समझाते हुए कहा कि ज्ञान एक और अखण्ड है, भेद केवल ज्ञेय में है जो उपाधिगत है। आत्मा न जागता है न सोता है न स्वप्न देखता है। वह जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति इन तीनों का साक्षी है। पूज्य महाराजश्री ने कहा कि ब्रह्म प्रमाण से नहीं जाना जा सकता। किन्तु उसका प्रत्यक्ष कैसे होगा? प्रत्यक्ष तो स्वयं प्रमुख प्रमाण है, शेष 5 प्रमाण इसके सहायक हैं। तो इसका उत्तर है कि ब्रह्म का प्रत्यक्ष ज्ञान श्रुति से होता है। श्रुति के महावाक्य तत्वमसि इत्यादि का जब सद्गुरु से श्रवण होता है तब उसके मनन निदिध्यासन से ब्रह्म का प्रत्यक्ष होता है। महाराजश्री ने दृष्टान्त दिया कि 10 व्यक्ति कहीं जा रहे थे। उनमें से प्रत्येक जब गिनती करता तो अपने को छोड़ देता था और कहता था कि हम 10 भेजे गये थे 9 ही हैं, 10वां कहां गया? तब एक बुद्धिमान् व्यक्ति आया और सबसे कहा कि 10वें तुम हो, तब सबको समझ में आया। इसी प्रकार जब गुरु बताता है कि ब्रह्म और कोई नहीं, तुम ही हो, तब शिष्य को  ब्रह्म का प्रत्यक्ष बोध हो जाता है । इस अवसर पर महाराजश्री के शिष्य प्रतिनिधि दंडी सन्यासी स्वामी सदानन्द जी सरस्वती एवं दंडी सन्यासी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी सरस्वती तथा , ब्रह्मचारी सुबुद्धानन्द जी महाराज, ब्रह्मचारी ब्रह्मविद्यानन्द व आदि संत, महात्मा, शिष्य, भक्त, श्रद्धालुगण उपस्थित थे। पूज्य शंकराचार्य जी महाराज ने आगे बताया कि कर्म से ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो सकती है इसके लिए अज्ञानता का नष्ट होना जरूरी है और ज्ञान - ज्ञान में भेद नहीं होता है। उन्होंने कहा ज्ञान स्वयं प्रकाश है तथा आत्मा और ज्ञान एक ही है। मन यदि कान के साथ जुड़ा न हो तो वह सुन नहीं सकता अर्थार्थ वह ज्ञान नहीं प्राप्त कर सकता है। इसलिए कोई यदि अपनी ही खोज करे तो वह परमात्मा को प्राप्त कर सकता है। इसलिए ब्रह्म ही सबका अधिपति है।

खबरीलाल रिपोर्ट (वृंदावन) ::-  कृष्ण की रासलीला देख मुग्ध हुए श्रद्धालुगण।।

ज्योतिष एवं द्वारका शारदा पीठ के पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी सरस्वती महाराज के 68 तम चातुर्मास्य व्रत अनुष्ठान के तृतीय दिवस की सुबह 8 बजे से वृंदावन स्थित उड़िया बाबा आश्रम में भगवान श्रीकृष्ण के रासलीला का आयोजन किया गया जिसमें सैंकड़ो श्रद्धालु एवं भक्तगण उपस्थित होकर रासलीला का आनंद लिए। कलाकारों ने बहुत ही सुंदर मंचन किया जिसमें माखन चोरी से लेकर वस्त्र चुराना, राधा की मुदली चुराना फिर सखियों द्वारा राधा से कृष्ण की बांसुरी आदि चुराने हेतु कहना और फिर जब कृष्ण निद्रा में थे तब राधा एवं उनके सखियों द्वारा कृष्ण के बांसुरी, अंगूठी आदि लेकर भाग जाना बहुत ही मनमोहक दृश्य था जिसे उपस्थित जनों ने खूब आनंद उठाया और राधे कृष्ण का जयकारा किये।

खबरीलाल रिपोर्ट (वृंदावन) ::-चातुर्मास्य व्रत अनुष्ठान में शिष्ययों ने गया सुमधुर भजन।।

जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी सरस्वती महाराज के 68 वें चातुर्मास्य व्रत अनुष्ठान के पावन अवसर पर 28 जुलाई 2018 की संध्या को पूज्य महाराजश्री के शिष्य एवं साध्वियों ने मिलकर पूज्य महाराजश्री के सामने सुमधुर भजन प्रस्तुत कर वातावरण को पूर्ण रूप से भक्तिमय बना दिया। इस विशेष दिन पर अखिल भारतीय हिंगलाज सेना (महिला ईकाई) की अध्यक्षा लक्ष्मीमणि शास्त्री, नीलमणि शास्त्री, सुचित्रा मोहता, मीता खेतान एवं मधु मिश्रा ने एक से बढ़कर एक मधुर भजन प्रस्तुत किये जिससे उपस्थित अन्य शिष्य, भक्तगण एवं श्रद्धालुओं ने सुर में सुर मिलते हुए संध्याकालीन समय को भक्तिमय बना दिया जिसे शंकराचार्य महाराज व उपस्थित अन्य संत महात्माओं ने बड़े प्रसन्नता के साथ सुनते हुए भगवान को याद किया। इस अवसर पर शंकराचार्य महाराज जी के शिष्य प्रतिनिधि दंडी स्वामी सदानंद जी सरस्वती, दंडी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी सरस्वती, ब्रह्मचारी शारदानंद जी महाराज, ब्रह्मचारी रामानंद जी महाराज व आदि संत , महात्मा व शिष्य उपस्थित थे।

खबरीलाल रिपोर्ट (वृंदावन) ::- वेदांत श्रवण से अज्ञानता की निवृत्ति होती है : स्वरूपानन्द सरस्वती ।।

वृंदावन के पवित्र धरती पर उड़िया बाबा आश्रम में आयोजित जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती महाराज के 68 तम चातुर्मास्य के द्वितीय दिवस पर पंचदसि वेदांत का स्वाध्याय हुआ जिसमें प्रमुख रूप से पूज्य महाराजश्री के शिष्य प्रतिनिधि दंडी स्वामी सदानंद जी सरस्वती, दंडी स्वामिश्री: अविमुक्तेश्वरानंद: सरस्वती, स्वामी अमृतानंद जी सरस्वती, ब्रह्मचारी सुबुद्धानंद जी महाराज, विश्व कल्याण आश्रम, झारखंड के ब्रह्मचारी कैवल्यानन्द जी महाराज, ब्रह्मचारी ब्रह्मविद्यानंद जी महाराज व शिष्य एवं भक्तगण उपस्थित थे। पूज्य शंकराचार्य जी महाराज ने पचंदसि वेदांत स्वाध्याय के प्रारम्भ में कहा की ज्ञान प्रदाता गुरु अपने शिष्य एवं भक्तों के अज्ञान रूपी अंधकार को ज्ञान रूपी प्रकाश से दूर करते हैं। आगे उन्होंने कहा कि महा मोह माने अनादि अज्ञानता है और इस मोह में मनुष्य डूबा हुआ है। यदि मनुष्य वेदांत का श्रवण करता है तो अपनी अज्ञानता दूर कर सकता है। आगे महाराजश्री ने बताया कि सुख हमारी स्वाभाविक इच्छा होती है तथा उसी तरह प्यार भी स्वाभाविक इच्छा है। मनुष्य को जहां प्यार मिलता है वह वहीं जाता है। मनुष्य की चाहत होती है कि उन्हें दुःख कभी न हो और उन्हें अनंत सुख चाहिए और यह ही परम पुरुषार्थ है। यह तब होगा जब प्रभु से साक्षात्कर होगा। प्रभु से साक्षात्कर के लिए पहले व्यक्ति को धर्म के पथ पर चलना होगा, हृदय के निर्मल होना है, किसी भी प्रकार के संशय में नही पढ़ना है, हमेशा प्रसन्न रहना है, मन मे किसी भी तरह के ईर्ष्या द्वेष नहीं रखना है आदि से जब परम् शांति का अनुभव हो तो ईश्वर की प्राप्ति होती है। जो व्यक्ति अपनी ही प्रसंशा करे , अपनी ही बढ़ाई करे वह जुगनू की तरह होता है। कभी भी दम्भ, घमंड नहीं करना चाहिए। माया से ही झूट और अधर्म की उत्पत्ति होती है। दम्भ बहुत घातक होता है, इससे क्रोध, ईर्ष्या आदि उत्पन्न होते हैं और यह बढ़ता ही चला जाता है।

खबरीलाल रिपोर्ट ::- यह कितना विचित्र है कि अध्यादेश में "पूजा संपादन स्थल" को भवन माना गया है :- अविमुक्तेश्वरानंद:

ज्योतिष एवं द्वारका शारदा पीठ के पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज के शिष्य प्रतिनिधि तथा मंदिर बचाओ आन्दोलनम के नेतृत्त्वकर्ता दंडी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने आज खचाखच भरे मीडिया प्रतिनिधियों की उपस्थिति में कहा कि यह कितना विचित्र है कि अध्यादेश में पूजा संपादन स्थल को भवन माना गया है । इससे यह प्रतीत हो रहा है कि पूजा संपादन स्थल को भवन के रूप में परिभाषित कर मठ और मंदिरों के ध्वस्तीकरण को वैध ठहराने का कुत्सित प्रयास किया जा रहा है। ज्ञात हो कि उत्तरप्रदेश सरकार द्वारा गंगा पाथवे और श्री काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के नाम पर 29 जून 2018 को श्री काशी विश्वनाथ विशिष्ठ क्षेत्र विकास परिषद, वाराणसी अध्यादेश 2018 पारित किया गया था। लेकिन अध्यादेश को पूर्ण पढ़ने के बाद यह समझ आया कि यह धर्म के विकास और उन्नयन के लिए नहीं अपितु उद्योग और पूंजीवाद के विकास के लिए है। स्वामिश्री: ने आगे कहा कि अध्यादेश में 15 मोहल्लों को समाहित किया गया है परंतु उन 15 मोहल्लों में स्थित मठ-मंदिरों को कहीं भी स्थान नहीं दिया गया है अपितु पूरा का पूरा बॉल उन्होंने अपने ही कोर्ट में रखा है। ये हिंदुत्त्ववादी सरकार , हिन्दू धर्म के पवित्र स्थान - पूजा संपादन स्थल को ही भवन के रूप में परिभाषित कर हिन्दू धर्म पर कुठाराघात किया है। साथ ही उन्होंने अध्यादेश में काशी को तीर्थ की जगह पर्यटन हेतु उन्नयन की बात कही है जब कि अनादि काल से काशी तीर्थ स्थान के रूप में ही समूचे विश्व मे जानी पहचानी जाती है और पर्यटन एक उद्योग है, क्या काशी को तीर्थ के रूप में उन्नयन न कर एक उद्योग के रूप में विकास किया जा रहा है ? स्वामिश्री: ने अध्यादेश पर कई बड़े सवाल उठाये हैं। उन्होंने कहा - परिषद नीलामी, आवंटन, पट्टा, किराया, लाइसेन्स आदि प्रदान करेगी। परिषद विशिष्ट क्षेत्र में कोई भी व्यापार या व्यवसाय कर सकती है। परिषद जिन्हें उचित समझेगी उसे टैक्स में छूट दे सकती है। परिषद जिस भवन को चाहे उसे अध्यादेश से छूट दे सकती है। परिषद के आदेशों का उल्लंघन करने पर दंड की व्यवस्था है किंतु परिषद के अधिकारियों द्वारा उल्लंघन किये जाने पर कोई दंड की व्यवस्था नहीं है। सबसे महात्त्वपूर्ण, परिषद में धर्म अथवा दर्शनशास्त्र के विशेषज्ञों को कोई स्थान नहीं दिया गया है जबकि प्रकरण धर्म स्थान का है। ये किस प्रकार का अध्यादेश है जो एक पक्षीय दंड की व्यवस्था करता है और तीर्थ, मठ, मन्दिर को कोई स्थान नहीं दिया जाता है ?

"आत्मा वही काया नई " कैसे रहेगी जब मन्दिरों गलियों के शहर में मन्दिर और गलियाँ ही नहीं रहेंगी ? खबरीलाल रिपोर्ट ::-

@ उपवास का 250वां घंटा 11वां दिन काशीवासी कई दिनों से प्रतीक्षारत थे कि प्रधानमंत्री और काशी के सांसद नरेन्द्र मोदी अपने काशी प्रवास में मन्दिरों को ना तोडने की बात कहेंगे । उन्होंने स्पष्ट तो नहीं पर संकेत में ही यह बात कह दी है । उन्होंने कहा कि काशी की आत्मा नहीं बदली जा सकती, काया नई करना ही हमारा काम है ।इससे आशा जगी है कि प्रधानमंत्री के वक्तव्य के अनुसार यहाँ का स्थानीय प्रशासन काशी की पौराणिक गलियों और मन्दिरों से छेडछाड की अपनी प्रवृत्ति पर विराम लगाएगा और प्रधानमंत्री के वचनों पर अमल कर दिखाएगा । उक्त उद्गार मंदिर बचाओ आन्दोलनम के अन्तर्गत तीसरे चरण में बारह दिनी उपवास @पराक व्रत पर बैठे स्वामिश्रीः अविमुक्तेश्वरानन्दः सरस्वती शंकराचार्य घाट स्थित उपवास स्थल से कही । उन्होंने कहा कि हमें आशा है कि मुद्दे पर शीघ्र ही उत्तरप्रदेश का शासन प्रशासन इस सम्बन्ध में स्पष्ट घोषणा करेगा । स्वामिश्रीः ने आगे कहा कि कल प्रातः नौ बजे उनका उपवास पूरा होगा और पारणा के बाद दिन बारह बजे प्रेस कान्फ्रेंस कर वे आन्दोलनम् का अगला चरण घोषित करेंगे । ज्ञात हो कि स्वामिश्रीः के पराक व्रत का 11वां दिन है । @ नरेंद्र मोदी भगवान नहीं । स्वामिश्रीः ने राजातालाब क्षेत्र में वर्षों से चली आ रही परम्परा के टूटने पर प्रधानमंत्री जी के कार्यक्रम आयोजकों की कड़ी आलोचना की है । उन्होंने कहा कि जिस तरह भगवान जगन्नाथ जी के रथ को मार्ग से हटाकर अन्यत्र ले जाकर खडा किया गया उससे लगता है कि उत्तरप्रदेश का शासन प्रशासन जगन्नाथ और विश्वनाथ को नहीं अपितु नरेन्द्र मोदी को ही भगवान मानने लग गया है । यह प्रवृति दानवी प्रवृत्ति है भारतीय समाज ने इसका कभी भी स्वागत नहीं किया है । @ गंगा के बारे में बोलने में संकोच क्यों नही हुआ ? स्वामिश्रीः ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इस वक्तव्य पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि वे पुरानी सरकारों पर गंगा के नाम पर धनको हजम का आरोप लगाते रहे पर अपने सवा चार साल के कार्यकाल में हुई गंगा की अनदेखी पर एक शब्द नहीं कहा । आश्चर्य है कि प्रधानमंत्री जैसे पद पर बैठा व्यक्ति अपनी कमियों पर कोई संकोच नहीं दिखाता । @ रंग बिरंगी बत्ती कब तक रहेगी ? स्वामिश्रीः ने अखबारों में प्रकाशित और पीएम मोदी द्वारा वर्णित वाराणसी के प्रमुख स्थापत्यों पर रंग-बिरंगी बत्तियों पर कटाक्ष किया और कहा कि नरेन्द्र मोदी के विकास का खोखलापन इसी से उजागर होता है कि आज उनके पास अपने द्वारा बनवाया गया एक स्थान नहीं है जिसे वे दिखा सकें । पुराने बने भवनों, घाटों आदि स्थान पर रंग-बिरंगी बत्तियां लगाकर वे अपने को विकास का पुरोधा कह रहे हैं । आखिर ये बत्तियां कबतक रहेंगी ? @ क्या हजार करोड़ की योजना सेकाशी को खरीदा जा सकता है ? स्वामिश्रीः ने कहा है कि यह वह काशी है जिसके डोम ने राजा हरिश्चन्द्र को खरीद लिया था । इसे आर्थिक प्रलोभन से खरीदा नहीं जा सकता है । काशी के लोगों में आज भी वही गौरव विद्यमान है । देने वाला देना चाहे तो दे पर दे देने मात्र से उसे यहाँ की परम्परा और संस्कृति से छेड़छाड़ का अधिकार नहीं मिल जाता ।

आखिर क्या है पराक व्रत ?

।। लेखक : रंजन शर्मा, शोध सहायक ,केन्द्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान ,सारनाथ, वाराणसी ।। इन दिनों काशी में मन्दिर बचाओ आन्दोलनम् के अन्तर्गत ज्योतिष्पीठाधीश्वर एवं द्वारका शारदा पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी महाराज के शिष्य प्रतिनिधि स्वामिश्रीः अविमुक्तेश्वरानन्दः सरस्वती जी केदार घाट के बगल में गंगा किनारे बारह दिनों के पराक व्रत पर बैठे हैं । इस व्रत के दौरान वे लगातार बारह दिनों तक केवल जल पर निर्वाह कर रहे हैं । ऐसे में लोगों के मन में इस व्रत के बारे में जानने की जिज्ञासा उत्पन्न हो गई है । लोग एक दूसरे से पूछ रहे हैं कि आखिर क्या है यह पराक व्रत? और किसलिए किया जाता है ? इसे जानने के लिए हमें भारत के उस कालखंड में जाना होगा जब लोग शास्त्रों के अनुसार जीवन व्यतीत करते थे । अधिकांश लोग तो अपराध जिसे शास्त्र की भाषा में पाप कहा जाता है , करते ही नहीं थे । यदि किसी से कोई दोष पाप जाने अनजाने हो भी जाता था तो वह स्वयं राजा या धर्माचार्य के पास जाकर अपना पाप बताकर उसका दण्ड स्वीकार करता था । बताये गये दण्ड को भोगकर वह स्वयं को निष्पाप बना लेता था । शास्त्रों की भाषा में इस कृत्य को प्रायश्चित्त कहा गया है । पाप के बारे में इसी तरह की अवधारणा विभिन्न धर्मों, युगों और देशों में विभिन्न प्रकार से  रही है ।  पर आजकल पूर्व और पश्चिम के बहुत से व्यक्ति पाप के अस्तित्व में विश्वास नहीं करते । सिन एण्ड दि न्यू साइकोलोजी नाम की किताब में बारबोअर ने लिखा है कि आजकल के जीवन में ईसाइयत का प्रभाव बढ़ता जा रहा है और ईसाई भावना में पाप नाम की कोई वस्तु नहीं है । किसी व्यक्ति का जीवन दुष्कर्म से भरा हो सकता है पर वह मानसिक कारणों से है और इसे सम्भवतः मनोवैज्ञानिक चिकित्सा से दूर किया जा सकता है । भारत में भी नास्तिक चार्वाक इसी तरह का विचार व्यक्त करते रहे हैं । पर भारत में सदा से पाप के अस्तित्व को स्वीकार किया गया है । यह माना जाता है कि धर्म ईश्वर की आज्ञा है और इसका उल्लंघन पाप । पाप के कई भेद हैं-- अतिपाप वह है जिससे बड़ा कोई और पाप न हो । महापाप किसी के प्राण हरण से जुडा है । पातक वह है जो महापातकों के समान हो और प्रासंगिक पाप संसर्ग से होता है । साधारण पापों को उपपातक की संज्ञा दी गई है । जातिभ्रंशकर, संकरीकरण, अपात्रीकरण, मलावह और प्रकीर्णक आदि पापों की अन्य अनेक श्रेणियाँ भी हैं । इन पापों और इनके फलों को कम करने के लिए भी धर्म शास्त्रों में व्यवस्था दी गई है ।अपने अपराध को स्वयं स्वीकार कर लेना, पश्चात्ताप करना, प्राणायाम, होम, जप, दान, तीर्थ यात्रा और उपवास उनकी श्रेणियाँ हैं । इनमें उपवास भी अनेक तरह के हैं । जिनमें कई तरह के सान्तपन, चान्द्रायण, और कृच्छ्र के अतिरिक्त अघमर्षण, एकव्रत,गोव्रत,कूर्च,प्राजापत्य,याम्य,यावक,वज्र,सोमायन और पराक आते हैं । इनमें पराक व्रत अत्यन्त कठिन माना जाता है । मनुस्मृति 11/215, बोधायन धर्म सूत्र 4/5/16, याज्ञवल्क्य स्मृति 3/320, शंखस्मृति 18/5, अत्रि स्मृति 28, अग्नि पुराण 170/10, विष्णु पुराण 46/18 और स्कन्द पुराण के काशीखण्ड में इसका विस्तार से वर्णन किया गया है । मनुस्मृति कहती है - इन्द्रिय निग्रह पूर्वक सावधान मन से निरन्तर बारह दिनों तक भोजन का परित्याग कर किये गये इस व्रत से सभी प्रकार के यानी छोटे बड़े सभी पाप नष्ट हो जाते हैं । स्वामी अविमुक्तेश्वरानन्द कहते हैं कि शास्त्र कहता है कि प्रायश्चित्त न करने से पापी को दुष्परिणाम भुगतने पड़ते हैं । अतः काशी में पौराणिक मन्दिरों को ढहाये  जाने  और देवमूर्तियों को अपमानित और गायब कर दिये जाने तथा अनेकों मन्दिरों में तालाबन्दी कर देवपूजा के बाधित कर दिये जाने से जो पाप हुआ है उसका प्रायश्चित्त आवश्यक था । यदि हम प्रायश्चित्त न करते तो पूरी काशी पर इसका दोष आता और सबको दैवदण्ड भोगना पड़ता । शंकराचार्य जी के शिष्य और प्रतिनिधि और काशी का जिम्मेदार वासी  होने के नाते हमने सनातनी समाज की रक्षा के लिए यह पराक व्रत अपनाया है । साथ ही मन्दिरों की मर्यादा रक्षा का प्रयत्न भी कर रहे हैं ।