विशेष

खबरीलाल रिपोर्ट (वृंदावन) ::-  प्रत्येक प्राणी एक दूसरे की कल्याण की बात करे :- स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ।।

68 वें चातुर्मास्य व्रत अनुष्ठान में आयोजित सायंकालीन सत्संग में ज्योतिष एवं द्वारका शारदा पीठ के पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती ने धर्म सम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज को याद करते हुए कहे कि धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो, विश्व का कल्याण हो आदि नारे उन्ही की देन है। इन नारों / जय घोष के मतलब को समझना होगा कि क्यों यह जय घोष स्वामी करपात्री जी महाराज ने दिया। स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी महाराज ने कहा कि अन्य धर्मों के शुरू होने की तारीख है लेकिन सनातन धर्म अनादि काल से चली आ रही है जिसकी कोई तारिख ही नहीं है। उन्होंने कहा कौन सा ऐसा सनातन धर्म है जिसका पिता सनातनी न हो। लोग आज धर्म से भटक रहे हैं। विभिन्न प्रकार के पंथ, सनातन धर्मियों को मार्ग से भटका रहे हैं। सनातन धर्मी के लोग उदार हैं कर के ही वे यह कर पा रहे हैं। जब जब धर्म की ग्लानि होती है तब तब अधर्म बढ़ जाता है। आगे पूज्य महाराजश्री ने कहा कि भगवान जब सोचेंगे तो सही सोचेंगे। वे कभी गलत नहीं सोचेंगे। भगवान जब अवतरित होते हैं तब हम कहते हैं कि धर्म की जय हो , पर हम यह नहीं कहते हैं कि अधर्मियों का नाश हो। यह सोचना होगा और विचार योग्य कथनी है। हम यह कहते हैं कि अधर्मी व्यक्ति भी धर्म के मार्ग पर चलकर धर्म की जयकारा करे। इसके पश्चात महाराजश्री ने कहा कि " विश्व का कल्याण हो ", मतलब की प्रत्येक प्राणी एक दूसरे के कल्याण की बात करे। हम यह नहीं कहते कि हिंदुओं का भला हो और मुसलमान का नाश हो। इन जय कारों में गहरा मतलब छुपा हुआ है जिसे प्रत्येक प्राणी को समझना होगा, जानना होगा तभी विश्व का कल्याण संभव है। गुरु रूपी भगवान शंकर हमे अज्ञान रूपी अंधकार से उठाकर ज्ञान रूपी प्रकाश में लाते हैं। सत्संग के इस शुभअवसर पर दंडी स्वामी अविमुक्तेश्वरानन्द सरस्वती, दंडी स्वामी सदाशिवेंद्र सरस्वती जी, ब्रह्मचारी ब्रह्मविद्यानन्द जी महाराज, ब्रह्मचारी कैवल्यानन्द जी महाराज, ब्रह्मचारी रामेश्वरानन्द जी महाराज एवं आदि संत, महात्मा तथा शिष्य व भक्तगण उपस्थित थे।

खबरीलाल रिपोर्ट ::- शंकराचार्य आश्रम में मनाया जाएगा धर्म सम्राट करपात्री जी महाराज का प्राकट्य उत्सव।

रायपुर के बोरियाकला स्थित जगद्गुरु शंकराचार्य आश्रम में 13 अगस्त को धर्म सम्राट करपात्री जी महाराज की जयंती बड़े धूम धाम से मनाई जाएगी साथ ही जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती महाराज के शिष्य प्रतिनिधि दंडी स्वामी अविमुक्तेश्वरानन्द सरस्वती जी महाराज का भी जन्म उत्सव मनाया जाएगा। आश्रम प्रमुख ब्रह्मचारी डॉ इंदुभवानन्द ने बताया कि श्रवण शुक्ला द्वितीया में धर्म सम्राट करपात्री जी का आविर्भाव हुआ था। वे श्रीविद्या के परम आचार्य के रूप में आज भी माने व जाने जाते हैं। उनकी जयंती के उपलक्ष्य पर शंकराचार्य आश्रम रायपुर में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित है जिसमे गणपति पाठ, चंडी पाठ, ललिता सहस्त्रनाम का अर्चन एवं सायंकाल भगवान सिद्धेश्वर का रुद्राभिषेक किया जाएगा। शंकराचार्य आश्रम के समन्वयक व प्रवक्ता पं सुदीप्तो चटर्जी ने विज्ञप्ति जारी कर यह जानकारी दिए और सभी भक्तों को आश्रम में उपस्थित रहने हेतु आग्रह किये साथ ही उन्होंने बताया कि वृंदावन धाम में स्वामिश्री: अविमुक्तेश्वरानन्द: सरस्वती का चातुर्मास्य व्रत चल रहा है जिस हेतु वृंदावन के जयपुर मंदिर में स्वामिश्री: का जन्म उत्सव मनाया जाएगा तथा यह बहुत ही बड़ा संयोग की बात है कि इस मौके पर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती एवं द्वारका पीठ के मंत्री दंडी स्वामी सदानंद सरस्वती भी वृंदावन धाम में उपस्थित हैं जिस हेतु धर्म सम्राट करपात्री जी महाराज का प्राकट्य उत्सव भी एक ही साथ बड़े भक्तिमय माहौल में मनाया जाएगा।

पत्रकार खबरीलाल की विशेष टिप्पणी :: क्या उत्तरप्रदेश में पुल गिरना दैवीय प्रकोप है ?

आज दिनांक 11 अगस्त 2018 को उत्तरप्रदेश के लखनऊ और गोरखपुर के बीच बन रहे निर्माणाधीन पुल अचानक गिर गया जिसमें बड़े तादाद में लोगों के दबे होने की बात सामने आ रही है। कुछ माह पहले बनारस (काशी) में भी निर्माणाधीन पुल गिरा जिसमे कई लोगों की असमय मृत्यु हुई। अब प्रश्न यहां यह उठ रहा है कि कहीं यह दैवीय प्रकोप तो नहीं, क्यों कि विश्व की प्राचीन धर्म नगरी तथा बाबा भोलेनाथ की नगरी बनारस (काशी) जो पीएम मोदी का संसदीय क्षेत्र है तथा महंत योगी राज्य के संवेदनशील मुख्यमंत्री हैं वहां विकास के नाम पर प्रशासन द्वारा कई प्राचीन मंदिरों को ध्वस्त किया गया है तथा देव मूर्तियाँ खंडित अवस्था मे मिली जिसकी जानकारी जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती के शिष्य प्रतिनिधि दंडी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने प्रेस कांफ्रेंस कर मीडिया को बताया था जिसे प्रमुखता के साथ कई समाचार पत्रों में प्रकाशित भी हुआ और चैनलों में भी प्रसारित हुए। ज्ञात हो ही विगत कई महीनों से अकेले दंडी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती , दंडी हाथ मे लिए एक विशुद्ध धर्म योद्धा की तरह मन्दिरों को बचाने हेतु बर्लिन वाल के रूप में अपने कुछ अनुयायियों के साथ खड़े हुए हैं और मंदिर बचाओ आन्दोलनम का नेतृत्त्व कर रहे है। पुराणों में वर्णित 56 विनायकों में से दो विनायक मन्दिरों के साथ साथ व्यास जी के राधा कृष्ण मंदिर, भारत माता मंदिर (महा लक्ष्मी मन्दिर) तोड़ दिए गए जिसके कारण देव मूर्तियाँ जो सदियों से पूजी जा रही थी वह खंडित हो गई और सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार कुछ मूर्तियाँ मलबे में भी तब्दील कर दी गई या गायब कर दी गई है। स्वामिश्री: का कहना है कि मन्दिरों को क्यों तोड़े जा रहे हैं जो सनातन धर्म के पूजन का स्थल है, आस्था का केंद्र है, एकता का प्रतीक है और सर्वोपरि हमारे देवता वहां वास करते हैं। स्वामिश्री: ने नंगे और रक्तरंजित पांव से चलकर काशी के सभी देवताओं से माफी मांगी, सर्वोदेव कोपहार महायज्ञ किया और इसके बावजूद जब शासन और प्रशासन के कानों में जूं नहीं रेंगी तब स्वामिश्री ने पराक व्रत (उपवास) किया। क्या देवतागण स्वामिश्री: के घोर तपस्या को देख नहीं रहे हैं ? क्या सनातन धर्मी के लोग नहीं देख रहे हैं। हो सकता है देवतागण स्वामिश्री: के इस घोर तपस्या को देख कर दुखी भी हैं और खुश इसलिए कि कोई तो एक घोर तपस्वी है जो हम देवताओं के मंदिरों और विग्रहों को बचाने के लिये उठ खड़ा हुआ है। लेकिन लगता है देवताओं को भी स्वामिश्री: के इस घोर तप को देखकर कष्ट हो रहा है जिस हेतु वे बीच बीच मे संकेत दे रहे हैं। अभी भी समय है यदि काशी में मन्दिर तोड़ना नहीं रोका गया और काशी को अपने पुराने स्वरूप में नहीं रख गया तो हो सकता है कहीं शिव जी के त्रिशूल में बसी नगरी से स्वयं भोले शंकर अपना त्रिशूल ही न हटा लें और पूरा काशी देव विहीन हो जाये। सबसे बड़ी बात जो काशी में अभी तक सामने आई कि काशी वासियों ने मौन क्यों धारण करके रखे हैं और अपने आंखों के सामने ये होते देख रहे हैं। जब कि प्रत्येक को जानकारी है कि स्वामिश्री: प्रत्येक के हितों के रक्षा के लिए धर्म युद्ध कर रहे हैं फिर भी काशी वासी चुप हैं। क्या काशी के लोग कौरव रूपी होकर अधर्म का साथ दे रहे हैं ? यह बहुत ही महत्त्वपूर्ण प्रश्न है ? पहले तो काशी वासियों और अन्य शहरों में जहां मन्दिर तोड़े जा रहे हैं वे कौरवों के मानसिकता के हैं या पांडवों के मानसिकता के हैं इसे सिद्ध करे ? सभी जानते हैं धर्म युद्ध मे भगवान श्रीकृष्ण ने धर्म का साथ दिया था और अंत मे धर्म की ही विजय हुई थी। " जागिये - जगाइए - मन्दिरों को बचाइए " वाला नारा खूब प्रचलित हो रहा है।

खबरीलाल रिपोर्ट (वृंदावन) ::-  जिसके पेट मे गौ माता का गोश्त वो कैसा मेरा दोस्त ।।

जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी सरस्वती के 68 वें चातुर्मास्य के अवसर पर वृंदावन धाम में स्थित श्रीउड़िया बाबा आश्रम में सत्संग के दौरान वडोदरा से पहुंचे किशोर महाराज जी ने अपने चिरपरिचित अंदाज में आज हिंदुत्त्व की अलख सभा मे जला दी जिसे उपस्थित सभी भक्तों ने करतल ध्वनि से स्वागत किया। अपने उद्बोधन में किशोर महाराज ने कहा जिसके पेट मे गाय का गोश्त हो वो कैसे मेरा दोस्त होगा। जो हमारे गौ माता की हत्या कर खाए वो हमारे भाई कैसे हो सकते हैं। जो गाय का भक्त है वो हिन्दू है और जो नहीं है वह हिन्दू कभी भी नहीं हो सकता है। आगे उन्होंने कहा कि आजकल देश और विश्व मे केवल हिन्दू-हिन्दू चल रहा है। जो लोग हिन्दू की व्याख्या नहीं जानते हैं वे आज हिन्दू संगठन चला रहे हैं। जन्म जन्मांतर तक जो धर्म कल्याण कर सके वो केवल सनातन धर्म है। ॐ कार के जो मानते हैं वे हिन्दू हैं। प्रत्येक श्लोक की शुरुवात ॐ से होती है। बौद्ध, सिख, आर्य समाजी भी ॐ कार को मानते हैं और उसे प्राधान्य देते हैं। वे पुनर्जन्म को भी मानते है। इसी कड़ी में गार्गी जी ने कहा जो पुनर्जन्म में विश्वास रखते हैं वे ही हिन्दू हैं। उन्होंने प्रश्न उठाया कि स्त्रियों व अन्य जातियों को जो अधिकार नही वे उसे करने की चेष्टा क्यों करते है। संदर्भ था वेद अध्यन का, जिसमे स्त्री और शूद्र जाती के लोग वेद शास्त्र नहीं पड़ सकते हैं, केवल ब्राह्मण पुरुष ही इसका अध्यन करने हेतु अधिकृत हैं जो कालांतर से चली आ रही है। हक नहीं है वेद पढ़ने का लेकिन भक्ति करने का हक तो है। भक्ति में जात पात नहीं देखी जाती है पर वेद अध्यन करने के लिए देखना जरूरी है। भगवद्गीता पढ़िए, राम चरित मानस पढ़िए, भागवत पढ़िए लेकिन जिसका अधिकार न हो उसे पड़ने के लिए चेष्टा क्यों करना। इसी कड़ी में ब्रह्मचारी ब्रह्मविद्यानन्द ने कहा लोग मन्दिरों को बचाने हेतु भी आगे नही आ रहे हैं। काशी में विकास के नाम पर मंदिर तोड़े गए , नागपुर में 1600 मन्दिर तोड़े जाने हैं, राजस्थान में भी मन्दिर तोड़े गए हैं फिर भी किसी हिन्दू ने , सनातन धर्मियों ने आवाज नहीं उठाई। सिर्फ एक धर्म योध्या स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती मंदिरों को बचाने हेतु हाथ मे दंड लिए उठ खड़े हुए और विशाल मंदिर बचाओ आन्दोलनम का रूप दिया। इसके बावजूद सनातन धर्मी आगे नहीं आ रहे हैं। धर्म शास्त्र कहता है जो मंदिर बनाता है उसके साथ आने वाली पीढ़ी तर जाती है। यदि मन्दिर ही नहीं रहेंगे तो हम सनातन धर्मी पूजार्चना करने कहाँ जाएंगे। कहाँ सरकार को मन्दिरों का रक्षण करना चाहिए उसे ही वे तथाकथित विकास के नाम पर तोड़ रहे हैं। क्या वे इस घोर पाप से बच पाएंगे ?  वर्तमान में भाजपा ने हिन्दू हितों को आगे कर सत्ता में आसीन हुए पर इनके शासन काल मे जो हो रहा है उससे हम सभी आश्चर्यचकित हैं। आगे ब्रह्मचारी ब्रह्मविद्यानन्द ने कहा कि काशी की धरती नित्य सत्तावान भूमि है जिसके कण कण में शंकर बसते हैं। उसी भूमि में सभी अपने अपने देवताओं को स्थापित कर पूजा आदि करते हैं। ब्रह्मचारी ब्रह्मविद्यानन्द ने मंच से स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के नेतृत्त्व में इस पुनीत कार्य हेतु समर्थन देने की घोषणा की। उनके घोषणा पश्चात किशोर महाराज, साध्वी लक्ष्मी मणी शास्त्री, दंडी स्वामी गोविंदानन्द सरस्वती, दंडी स्वामी शिवप्रियानन्द सरस्वती, विदुषी गार्गी जी व उपस्थित संत, महात्माओं और सनातन धर्मियों ने भी स्वामिश्री: के समर्थन में एक सुर में सुर मिलाए और कहे जब भी स्वामिश्री: हमे बुलाएंगे हम उनके साथ खड़े होकर एक और स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ेंगे। स्वामिश्री: ने सबकी बातों को सुनकर आभार प्रकट किया और कहा कि जनता भी आन्दोलनम में आना चाहती है और किसी ने भी अभी तक असहमति नहीं जताई है। यदि हम सच्चे मन से देवताओं की भक्ति करते हैं तो हमे आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता। अपनी चिंता छोड़ भगवान की चिंता करे वही भक्ति है और भगवान का जो भोग करे वही भक्त है।

खबरीलाल रिपोर्ट (वृंदावन) ::- माया को पार करना कठिन है, भगवान की शरण मे जाने से माया के पार हो सकते हैं :- स्वरूपानन्द सरस्वती ।।

जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने आज चातुर्मास्य व्रत अनुष्ठान के 13 वें दिवस पर सांयकालीन सत्संग सभा में उपस्थित भक्तों से कहा कि माया को पार करना कठिन है, पर भगवान की शरण मे जाने से माया के पार हो सकते हैं। आज के इस विशेष दिन पर पूज्य महाराजश्री के शिष्य प्रतिनिधि दंडी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज, स्वामी सदाशिवेंद्र सरस्वती जी महाराज, ब्रह्मचारी ब्रह्मविद्यानंद जी महाराज , किशोर जी महाराज, ब्रह्मचारी कैवल्यानन्द जी महाराज, साध्वी लक्ष्मी मणि शास्त्री व आदि संत, महात्मा एवं श्रद्धालुगण उपस्थित होकर मंत्रमुग्ध होकर पूज्य शंकराचार्य जी महाराज के सत्संग का लाभ ले रहे थे। स्वामी स्वरूपानन्द जी महाराज ने आगे कहा की सत्पुरुषों के संग से भगवान की कथा सुनने का अवसर प्राप्त होता है जिससे उसके महत्त्व का बोध हो जाता है। भगवान की कथा मनुष्य के लिए कर्ण रसाथन है। हृदय की निर्बलता और दोष कथा श्रवण के रसायण से दूर होता है। कथा श्रवण से मन , संसार से हटकर , प्राणी को मोक्ष मार्ग हेतु गति प्रदान करती है। भगवान के स्वरूप का बोध होने पर मनुष्य उनका ही हो जाता है। दुःख होने पर सब आंखे फेर लेते हैं पर भगवान उस समय भी हमारे सहाय करते हैं। आगे महाराजश्री ने कहा कि भगवान शंकर कहते हैं कि एक बार कोई श्रीराम के स्वभाव को जान ले तो उन्हें कोई छोड़ नहीं सकेगा। श्रीराम कोई साधारण मनुष्य नहीं और ना ही महामानव हैं, वे तो साक्षात परब्रह्म परमात्मा हैं।  आगे पूज्य महाराजश्री ने रामजी के प्रकट होने की कहानी बताई जिसमे उन्होंने कहा श्रीराम प्रकृति से उत्पन्न इंद्रियों के विषय नहीं है। श्रीराम जी ने प्रकट होने के लिए समग्र ब्रह्मांड में जम्बूद्वीप भारतवर्ष  आयोध्या दशरथ जी के महल के कौशल्या जी भवन का चयन किया। प्राकट्य तो भगवान जी का लीला है। भगवान की दो प्रकार की माया होती है - स्वजन मोहिनी माया तथा विमुखजन मोहिनी माया। इन्ही शब्दों के साथ महाराजश्री ने सत्संग में अपना आशीर्वचन प्रदान किया तथा आगे और भगवान की लीलाएं एवं कथा का रस पान होगा जिससे मनुष्य की शंकाएं दूर होती चली जायेगी और व्यक्ति सत्संग से जुड़कर नियमित भगवान की आराधना करेंगे जो प्राकृतिक रूप से प्रत्येक को श्रवण करना चाहिए।

खबरीलाल रिपोर्ट (वृंदावन) ::- गृहिणी गृहस्त आश्रम की केंद्र है :: स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ।।

जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज के 68 वें चातुर्मास्य व्रत अनुष्ठान में आज संत, महात्माओं व विध्वत जन सत्संग में सम्मिलित हुए जहां वर्णाश्रम धर्म और नारी शक्ति पर सत्संग में मंचासीन वक्ताओं ने अपनी बातें रखी। सर्व प्रथम जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती महाराज के शिष्य प्रतिनिधि दंडी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने कहा कि नारी और पुरुष दोनों ही अपने सिमा में रहते हुए स्वतंत्रता भोग करते हैं। घर मे रहने मात्र से कोई गृहस्त नहीं हो जाता है। घर मे जब गृहिणी आ जाती है तब गृहस्त जीवन शुरू होता है। गृहस्ती गृहिणी को केंद्र में रखकर चलती है। आगे स्वामिश्री: ने कहा कि भारतीय संस्कृति में स्त्री और पुरुष आधे आधे हैं। भगवान जब हमे दर्शन देते हैं तो वे अर्धनारीश्वर के रूप में दर्शन देते हैं। विदुषिका गार्गी जी ने सर्व प्रथम प्रार्थना के साथ अपना कथन रखा। उन्होंने कहा की विद्यालय, महाविद्यालय और विश्वविद्यालय में राष्ट्रभक्ति नहीं पढ़ाई गई तो वह शिक्षित शैतान बनाने की कारखाना बन जाएंगे। आजकल पैसे कैसे कमाए जाते हैं उसकी शिक्षा दी जा रही है तथा परंपराओं की अनदेखी करना आज फैशन सा हो गया है। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो व्यास जी को नहीं जानते हुए भी मंच से बयान बाजी करते हैं। आगे उन्होंने कहा कि रक्षा करने वाले से ज्यादा मूल्यवान वो होते हैं जिनकी रक्षा की जाती है जैसे पिता अपनी बेटी की रक्षा करता है, पति अपने स्त्री की रक्षा करता है। पत्नी के लिए उनका पति ही सबसे बड़ा गुरु होता है। आज जो दुष्कर्म की घटनाएं घाट रही है वह पाखंड बाबाओं के शरण मे जाने के कारण से हो रहा है जबकि स्त्रियों को अपने पति के शरण मे जाना चाहिए। आगे गार्गी जी ने कहा कि लड़कियां ज्यादा मूल्यवान होती हैं क्यों कि आगे चलकर उन्हें ही विवेकानन्द, भगत सिंह आदि के जैसे संतानों का जन्म देना है। गुजरात के वड़ोदरा से पधारे किशोर भाई दवे महाराज ने अपने क्रांतिकारी लहजे में बोलते हुए सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया। उन्होंने राष्ट्र के प्रति प्रेम और नारियों के प्रति सम्मान की एक अलग ही अलख आज के सत्संग में जला दिए। उन्होंने कहा राष्ट्र की रक्षा सर्वोपरि है और यह मुद्दा बार बार उठाये जाते हैं और उठाये जाने चाहिए। किसी देश को माता नहीं कहा जाता है केवल भारत को ही माता कहते हैं। हमारे देश के संस्कार ऐसे हैं कि हम सभी प्रातः उठते साथ अपने धरती माँ को प्रणाम करते हैं और भारत माता की जय बोलते हैं। गौ भी हमारी माता है जिसकी रक्षा हमारा परम् कर्तव्य है। जब पूजा की बात आती है तो भगवान, गाय, गुरु और माता पिता की पूजा की जाती है। उन्होंने क्रांतिकारी मदन लाल धींगड़ा, भगत सिंह के ऊपर भी प्रकाश डाला। बलिदान की संस्कृति हमारी है। अंत मे उन्होंने कहा कि देश के लिए, गाय के लिए, अपने संस्कृति की रक्षा के लिए हमे बलिदान देने हेतु हमेशा तैयार रहना चाहिए। इसके पश्चात ब्रह्मचारी शिवप्रियानन्द, साध्वी लक्ष्मी मणि शास्त्री, केशवानंद जी महाराज , स्वामी गोविंदानन्द सरस्वती व आदि संत, महात्मा एवं विध्वत जनों ने सत्संग में अपनी बातें रखी जिसे उपस्थित सभी भक्तगण, श्रद्धालु गण मंत्रमुग्ध हो गए और अंत में ज्योतिष पीठ व्यास के सुरेश पांडेय रामायणी के सुमधुर भजन से सत्संग समाप्त हुआ।

खबरीलाल रिपोर्ट (वृंदावन) ::- एक बार किसी के अंदर प्राण आ गया तो उसे आप मार नहीं सकते - स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ।।

ज्योतिष एवं द्वारका शारदा पीठ के पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द जी सरस्वती का 68 वां चातुर्मास्य व्रत अनुष्ठान वृंदावन धाम स्थित श्रीउड़िया बाबा आश्रम में आयोजित है जिसमे प्रतिदिन रासलीला, वेदांत अध्यन एवं सत्संग नियमित हो रहे हैं और इस सत्संग में संत, महात्मा अपने श्रीमुख से प्रवचन का रस पान कराते हैं जिसमे सैंकड़ो श्रद्धालुगण उपस्थित होकर पूज्य शंकराचार्य महाराज एवं अन्य संत, महात्माओं द्वारा दिये गए प्रवचनों को सुनकर अपने मन के संशय को दूर करते हैं। इसी कड़ी में आज शंकराचार्य महाराज के शिष्य प्रतिनिधि परम् पूज्य दंडी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने अपने प्रवचन में देवताओं के ऊपर हो रहे अत्याचार ( काशी में मंदिर तोड़े गए ) पर अपनी बात रखते हुए कहा की यदि 3 दिनों तक लगातार किसी मूर्ति या पत्थर की रोजाना पूजा अर्चना किया जाए, स्नान कराया जाए और भोग लगाया जाए तो शास्त्र अनुसार उस मूर्ति या पत्थर में प्राण आ जाते हैं । एक बार किसी मे प्राण आ जाये तो उसे हम मार नहीं सकते। व्यवहारिक दृष्टि की यदि बात करें तो वैध संतान और अवैध संतान होते हैं। जो संतान पाणिग्रहण के पश्चात उत्पन्न होता है वह वैध संतान कहलाता है पर जो संतान कामाचार्य से उत्पन्न होता है उसे हम अवैध कहते हैं जब कि संतान अवैध नहीं होता हैं बल्कि जो पुरुष और स्त्री अवैध रूप से कामाचार्य किये हैं बिना पाणिग्रहण के वह अवैध है। लेकिन अवैध संपर्क के कारण जो संतान पृथ्वी पर आया है क्या धर्म शास्त्र और भारत का संविधान उसे मारने की अनुमति देता है ? नहीं देता है , बल्कि उस संतान के लिए सरकार अनाथालय में व्यवस्था करती है जिससे कि उसका भरण पोषण हो सके। एक बार किसी के अंदर प्राण आ गया तो उसे आप कदापि मार नहीं सकते। आप बताइए वैध और अवैध का क्या मानक है ? काशी खंड में जिन मन्दिरों का उल्लेख किया गया है वह स्कन्द पुराण का अंग है और स्कन्द पुराण वैस जी द्वारा लिखा गया है जो हजार वर्ष पहले का लिखा हुआ है । यदि व्यक्ति इतिहासकार की दृष्टि से भी देखे तो वो 1000 वर्ष पहले की है। हजार साल पहले भारत मे कहाँ संविधान था वह तो 70-71 साल से लागू हुआ है। उससे पहले अंग्रेज थे, मुग़ल साम्राज्य था। उस समय शस्त्रीय संविधान लागू था, वेद मंत्रों से राजा बनाया जाता था, उनके मंत्री ब्राह्मण होते थे और विद्ववत परिषद होता था। ऐसा कोई अवसर आता था तो विद्वानों की परिषद निर्णय देती थी और उसे ही समाज स्वीकार करता था। पुराने समय में पट्टा आदि शुरू ही नहीं हुए थे और लोगों को जहां जगह मिली वहीं बस गया और वहीं आबादी बस गई। देश स्वतंत्र होने के बाद जो जहां बसा था उसे सरकार ने पट्टा दे दिया। जो जहां बैठ गया उसी को देखकर नक्शा बनाया गया। जो पहले आके बैठ गया उस स्थान पर उसका अधिकार है। जब भगवान वहां पहले से बैठे हैं , उन्हें किस कानून से वहां से हटा रहे हो और कैसे वे अवैध हैं यह भी बताओ ? जो मंदिर काशी में हैं वे पहले से वहां हैं इसलिए वह अवैध नहीं हो सकता। वो भगवान का जगह है और मनुष्य को उन्हें हटाने का कोई अधिकार ही नहीं है।

खबरीलाल रिपोर्ट (वृंदावन) ::-  " मैं हूं " इतना तो लोग जानते हैं, किन्तु अपनी आनन्दरूपता को नहीं जानते हैं :: स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती ।।

प्रातःकालीन सत्र में  बृहदारण्यक पर चर्चा करते हुए शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी महाराज ने रेखांकित किया कि शास्त्र उन्ही के लिए हैं जो शरीर को आत्मा से अलग मानते हैं और इस बात का उपाय करते हैं कि शरीर के न रहने पर आत्मा को परलोक में सुख मिले, आत्मा की सद्गति हो। मन का मैल निष्काम कर्म, ईश्वरार्पण बुद्धि और परोपकार से छूटता है। ईश्वर से कोई न कोई सम्बन्ध जोड़ लेना चाहिए। इससे उपासना आसान हो जाता है। माताभाव से, पिताभाव से , पुत्रभाव से किसी भी भाव से उपासना करें, किन्तु आत्मभाव ही मुख्य और सर्वोत्तम सम्बन्ध है।  वेदांत कक्षा में पञ्चदशी पढ़ाते हुये महाराजश्री ने बताया कि  वेद्य अर्थात् ज्ञेय अनेक हैं, संवित् अर्थात् ज्ञान एक है। वेद्य परिवर्तित होते रहते हैं, संवित् नहीं। वह संवित् ही आत्मा है।  प्रत्येक प्राणी का अपने आप से स्वाभाविक या अकारण प्रेम होता है। इसीलिए प्रत्येक प्राणी अपने अस्तित्व को बचाना चाहता है। अन्य से सोपाधिक या सकारण प्रेम होता है। आत्मा ही सबके लिए परम प्रेमास्पद है। आत्मा और उसके आनन्द का ज्ञान न होने के कारण ही लोग विषयों में आनन्द खोजते हैं। जिस प्रकार निकट के सरोवर में काई से ढका जल न दिखने से कोई दूर की मृगमरीचिका की ओर जल की खोज में जाये उसी प्रकार अज्ञान से ढके होने के कारण आत्मानन्द का लाभ न लेकर लोग विषयों की ओर भागते हैं। "मैं आनन्दरूप हूं", यह नहीं जानते। इसका कारण अनादि अविद्या है। वह अविद्या अनादि है किन्तु अनन्त नहीं। ज्ञान से उसका अन्त हो जाता है। उसके अन्त होने पर जीव अपने स्वरूपानन्द में स्थित हो जाता है। माया और अविद्या में अन्तर - ईश्वर का सम्बन्ध माया से है,  जीव का अविद्या से। माया ईश्वर के वश में है, जबकि जीव अविद्या के वश में। अविद्या के कारण मनुष्य शरीर को अपना स्वरूप और शरीर के सम्बन्धियों को "मेरा" कहता है। सृष्टि की रचना ईश्वर की आज्ञा से जीवों के भोग के लिए होती है। 

बचपन का पुनर्जन्म

बचपन की यादों की पोटली बाँध कर रखी थी मैंने , बुढ़ापे में बच्चों के साथ कब ये पोटली खुलती गई पता ही नहीं चला और कब बचपन की यादों की मेरी ये विरासत मैंने इन्हें सौप दी इसका अहसास ही नहीं हुआ |”सुबह के तक़रीबन पांच बजे थे अचानक पेट में दर्द उठा मैंने इन्हें उठाया और कहाँ की सुनो मुझे काफी दर्द हो रहा है थोड़ी ही देर में एम्बुलेंस की आवाज कानों में पड़ी फिर जब मेरी आंखें खुली तो मेरे पास एक नन्ही सी परी थी| थोड़े दिन बाद हम हॉस्पिटल से घर आये मेरी बेटी अब पंद्रह दिनों की थी |उसकी देखभाल में सारा घर भी कम पड़ जाता जैसे एक दरबार में किसी राजा को खुश करने में प्राजा लगी रहती है वैसा कुछ माहौल था |घर के सदस्य कोई उसके साथ बच्चों जैसी आवाज में बोलता तो कोई उलटी सीधी आवाज निकाल कर उसे हसाता |लोग उसके साथ रहकर अपनी उम्र भी भूल गये थे |मै भी उसके काम में करते करते खुद को भूल जाती उसके साथ कब सुबह होती कब रात पता ही नहीं चलता |कुछ दिनों में उसका नामकरण संस्कार किया गया और अब उसे सब लोग हृति कहकर बुलाने लगे |हृति जो अपने नाम की तरह ही हमारे जीवन की ख़ुशी लाई थी | जैसे जैसे समय गुजरता जा रहा था हृति की बदमाशियां भी बडती जा रही अब उसकी बदमाशियां देख उसे शैतान  की नानी ,बदमाश लड़की ना जाने कई नामों से पुकारने लगे हम |हृति को मैं खाना ही खिला रही थी की अचानक दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी उस दिन घर में कोई न होने के कारण मुझे उसे अकेले छोड़ दरवाजा खोलने जाना पड़ा देखा पोस्टमैंन था वापस आकार देखि तो हृति ने सारा खाना अपने ऊपर गिरा रखी थी |अब ये उसकी रोज की आदत सी बन चुकी थी जिसे करने से उसे खाफी ख़ुशी मिलती हो उसकी ये आदत की मुझे भी आदत हो गई थी| समय पंख लगा कर उड़ता चला गया और हृति की उम्र भी समय के साथ बडती चली गई अब हृति अब खाना गिराना वाला खेल छोड़ अब धुल मिटटी में खेलना उसका पसंदीदा खेल बन चूका था |खेल बदलने के साथ साथ शौक भी बदते गये अब हृति अपनी तोतली भाषा में अपनी पसंद ना पसंद कह सकती थी अब उसे जो पहनना है वही पहनना होता था | तोतलाना उसका छूटा ही नहीं था की उसके स्कूल जाने का पहला दिन आगया हृति का पहला दिन था पर डर मुझे लग रहा था की वो कैसे वहां रहेगी रोएगी या नहीं ,खाना खा लेगी या नहीं ना जाने इसे कई सवाल मन में सता रहे थे कुछ दिनों में उसके कई दोस्त बनगए थे अब सारा समय उसके दोस्तों के साथ बिताये पल के बारे में सुनते और उसकी रोज की नई-नई डिमांड सुनते निकल जाता | आज उसके बचपन का हर दिन मैं अपने बचपन के दिन की तरह ही जीती हूँ उसके साथ रह कर बिलकुल बच्ची बनकर इसलिए मुझे अक्सर ऐसा महसूस होता है की मेरे बचपन का पुनर्जन्म हुआ हो |अक्सर हम बच्चों के साथ बच्चे बन जाते है हमे अपनी उम्र का अहसास भी नहीं रहता और हम भी बच्चों जैसी हरकते करने लगते है |कभी उनके लिए घोड़ा बन जाते है तो, कभी उनके लिए कागज़ की कश्ती बना कर पानी में बहाते है| इसी बहाने हम अपनी बचपन की यादों को जीते है और हमे पता ही नहीं चलता की जो चीजे हमने  बचपन में की थी वो अब हम अपने बच्चों और नाती पोतों के साथ उसे कर के अपने बचपन की यादों को जी रहें हैं और उन बच्चों को अपने बचपन की विरासत सौप रहे जो वो बड़े होने के बाद आने वाली जनरेशन को देंगें |इसी लिए ये कहना गलत नहीं होगा की बचपन का पुनर्जन्म होता है |वर्षा भिवगड़े गलपांडे  

खबरीलाल लाइव न्यूज़ ::-  अधर्म करके जो सुखी हो रहे हैं वे फांसी के मुलजिम हैं : स्वरूपानन्द सरस्वती ।।

चातुर्मास्य व्रत अनुष्ठान के चतुर्थ दिन वृंदावन स्थित उड़िया बाबा आश्रम में सत्संग के अवसर पर द्विपीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती महाराज ने उपस्थित सभी भक्तों एवं श्रद्धालुओं से कहा कि जो व्यक्ति अधर्म करके सुखी हो रहे हैं वे फांसी के मुलजिम हैं। उन्हें उनके किये गए घोर पाप का दुःख भोगना ही पड़ेगा। अगर वे इससे बचना चाहते हैं तो उन्हें मृत्य भय को छोड़ मृत्यु की तैयारी करना पड़ेगा। कोई भी प्राणी मरने से बचना चाहता है। किट पतंग भी चाहते हैं कि उनकी मृत्यु न हो। जब जन्म लिया है तो मृत्यु निश्चित है और मृत्यु पश्चात जन्म भी निश्चित है। भगवान श्रीराम ने कहा था कि मैं कितना अभागा हूँ कि मुझे पितृ प्यार से वंचित रहना पड़ा और मेरे शोक में मेरे पिता की मृत्यु हो गई। भगवान श्रीराम ने जटायु से उन्हें अपने पिता बनने के लिए कहा। तब जटायु ने उत्तर दिया कि मैं आपका पिता नहीं बनना चाहता हूँ क्यों कि मैं अपने मृत्यु के समय आपको देखकर आपके गोद मे प्राण त्याग करना ज्यादा पसंद करूँगा। राजा दशरथ तो आपके बिना देखे ही प्राण त्याग दिए इसलिए मैं आपका पिता नहीं बनूंगा। आगे महाराजश्री ने कहा कि भगवान निर्बल के लिए हैं जो उन्हें बल प्रदान करते हैं। मरने से बचना है तो भगवान के शरण मे जाना चाहिए। आगे महाराजश्री ने पुनर्जन्म होता है कि नहीं उस पर भी प्रकाश डालते हुए भक्तों को अपनी बात बताई। सत्संग की शुरुवात ब्रह्मचारी ब्रह्मविद्यानन्द ने मंगलार्चन से किया तत पश्चात पादुका पूजन होने के बाद महाराजश्री ने अपने आशीर्वचन में उक्त बातें कही। आज के सत्संग में स्वामिश्री: अविमुक्तेश्वरानंद: सरस्वती , स्वामी सदाशिवेंद्र सरस्वती, साध्वी लक्ष्मी मणि शास्त्री व आदि महात्माओं ने भी अपने विचार रखे। इस अवसर पर बहु संख्या में भक्तों एवं श्रद्धालुओं ने उपस्थित होकर प्रवचन का लाभ उठाया

खबरीलाल लाइव रिपोर्ट ::- अपने सुख के लिए हम सबको छोड़ देते हैं, लेकिन अपना सुख नहीं छोड़ते हैं :: स्वरूपानंद सरस्वती ।।

अनंत श्री विभूषित ज्योतिष एवं द्वारका शारदा पीठ के पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी सरस्वती महाराज के 68 वें चातुर्मास्य व्रत अनुष्ठान वृंदावन स्थित उड़िया बाबा आश्रम में आयोजित है। आज 31 जुलाई 2018 को चातुर्मास्य व्रत अनुष्ठान के चतुर्थ दिन वेदांत अध्यन के समय पूज्य महाराजश्री ने कहा कि अपने सुख के लिए व्यक्ति सबको छोड़ देता है लेकिन अपना सुख कोई नहीं छोड़ता है। आगे उन्होंने कहा कि जहाँ प्रेम होता है वहां पर आनंद होता है। हम अपने आप से क्यों प्रेम करते हैं इसका कारण कोई नहीं बता सकता है। आगे महाराजश्री ने बताया कि आत्मा सत्य, चित्त और आनंद है। आत्मा सचिदानन्द का स्वरूप है। प्रत्येक मनुष्य का पिता है लेकिन सबके ऊपर जो पिता है वह स्वयं शंकर हैं। जिनका कोई पिता न हो उनका परमपिता होता है। इस अवसर पर महाराजश्री के शिष्य प्रतिनिधि दंडी स्वामी सदानंद सरस्वती व दंडी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती, स्वामी अमृतानन्द सरस्वती, ब्रह्मचारी सुबुद्धानन्द जी महाराज, ब्रह्मचारी ब्रह्मविद्यानन्द जी महाराज, साध्वी लक्ष्मी मणी शास्त्री, सुधा मोहता, सुचित्रा मोहता, पुष्पा पड़िया एवं आदि संत, महात्मा व भक्तगण उपस्थित थे। अंत मे महाराजश्री ने कहा कि प्रत्येक मनुष्य मरने से डरता है क्यों कि वह अपने अस्तित्व को खोने के लिए तैयार नहीं होता है। मनुष्य तो दूर, किट-पतंग भी मरने से डरता है। असल मे मृत्यु कोई नहीं चाहता है क्यों कि वे अपने से प्यार करते हैं। माना कि आत्मा सचिदानन्द स्वरूप है लेकिन उसका किसी भी वस्तु से प्रेम या द्वेष ज्ञान से होता है। बिना जाने प्रेम नहीं होता है। आत्मा में ही सुख है और प्रेम करने के लिए भी ज्ञान होना चाहिए।

खबरीलाल रिपोर्ट (वृंदावन) ::- कुसंग से बचने के लिए सत्संग करना चाहिए : स्वरूपानंद सरस्वती।।

वृंदावन के उड़िया बाबा आश्रम में आयोजित ज्योतिष एवं द्वारका शारदा पीठ के पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी महाराज के 68 वें चातुर्मास्य व्रत अनुष्ठान में आयोजित सत्संग में पूज्य महाराजश्री ने उपस्थित भक्तों से कहा कि " कुसंग से बचने के लिए सत्संग करना चाहिए" । सत्संग से ही मन में जमे हुए मेल, शंका दूर होते हैं और व्यक्ति ज्ञान अर्जित कर अपने बुद्धि से सफलता की ओर अग्रसित होते हैं। आज के सत्संग में सैंकड़ों भक्तों की उपस्थिति में पूज्य महाराजश्री का चरण पादुका का पूजन भक्तों ने किया और उनसे आशीर्वाद प्राप्त किया। पूज्य महाराजश्री ने अपने आशीर्वचन में प्रत्येक भक्तों के उद्देश्य से कहा कि गुरु की सेवा के साथ साथ सत्संग करना चाहिए, इससे मन मे न तो मैल जमती है, न शंका उत्पन्न होती है और न ही ईर्ष्या द्वेष की भावना जागृत होती है। साथ ही उन्होंने कहा कि व्यक्ति को अपने पद, पैसे आदि की घमंड कदापि नहीं करना चाहिए इससे व्यक्ति अकेला हो जाता है और वही घमंड, अहम उन्हें नीचे ला देती है। पूज्य महाराजश्री ने एक कहानी सुनाई जिसमे एक चोर अपने चार पुत्रों से कहता है कि कभी सत्संग में नहीं जाना और यदि किसी सत्संग वाली जगह से गुजरते हो तो कानों में उंगली डाल लेना, पर सत्संग नहीं सुन्ना। एक दिन एक स्त्री काली के भेष में उन चोरों के घर गई और उनसे कुछ कह। काली के रौद्र रूप को देखकर सभी भयभीत हो गए पर छोटे पुत्र ने तलवार निकली और काली की ओर मारने दौड़े जिसे देखते हुए काली की भेष वाली स्त्री भाग निकली जिससे उसके नकली हाथ, दांत आदि इधर उधर गिर गए। जब चोर के पिता ने पूछा कि तुम्हे कैसे मालूम पड़ा कि वो बहरूपिया है तब उनके छोटे पुत्र ने कहा कि मैं एक दिन एक सत्संग वाली जगह से गुजर रहा था कानों को बंद करके, पर जब प्यास लगी तो कान से हाथ हटाया, तब एक वाणी कानों में आई कि भगवान की कभी छाया नहीं पड़ती और यही बात हमको याद थी जिससे पता चला कि ये बहरूपिया है जो काली के भेष में आई थी। इसलिए हमेशा सत्संग करना चाहिए और अपने गुरु की बातों को मानकर चलना चाहिए क्यों कि गुरु ही व्यक्ति को सही रास्ता दिखाते हैं और व्यक्ति बिना किसी शंका से प्रसन्नचित रहता हैं।

खबरीलाल रिपोर्ट (वृंदावन) ::-  ब्रह्म का प्रत्यक्ष ज्ञान केवल श्रुतिवाक्य से होता है : स्वामी स्वरूपानन्द ।।

परम् पूज्य शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती अपने 68 तम चातुर्मास्य व्रत अनुष्ठान के तृतीय दिवस पर वेदांत पर चर्चा करते हुए बताया की ग्रंथ पंचदशी में लिखे हुए श्लोकों को पढ़ाते व समझाते हुए कहा कि ज्ञान एक और अखण्ड है, भेद केवल ज्ञेय में है जो उपाधिगत है। आत्मा न जागता है न सोता है न स्वप्न देखता है। वह जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति इन तीनों का साक्षी है। पूज्य महाराजश्री ने कहा कि ब्रह्म प्रमाण से नहीं जाना जा सकता। किन्तु उसका प्रत्यक्ष कैसे होगा? प्रत्यक्ष तो स्वयं प्रमुख प्रमाण है, शेष 5 प्रमाण इसके सहायक हैं। तो इसका उत्तर है कि ब्रह्म का प्रत्यक्ष ज्ञान श्रुति से होता है। श्रुति के महावाक्य तत्वमसि इत्यादि का जब सद्गुरु से श्रवण होता है तब उसके मनन निदिध्यासन से ब्रह्म का प्रत्यक्ष होता है। महाराजश्री ने दृष्टान्त दिया कि 10 व्यक्ति कहीं जा रहे थे। उनमें से प्रत्येक जब गिनती करता तो अपने को छोड़ देता था और कहता था कि हम 10 भेजे गये थे 9 ही हैं, 10वां कहां गया? तब एक बुद्धिमान् व्यक्ति आया और सबसे कहा कि 10वें तुम हो, तब सबको समझ में आया। इसी प्रकार जब गुरु बताता है कि ब्रह्म और कोई नहीं, तुम ही हो, तब शिष्य को  ब्रह्म का प्रत्यक्ष बोध हो जाता है । इस अवसर पर महाराजश्री के शिष्य प्रतिनिधि दंडी सन्यासी स्वामी सदानन्द जी सरस्वती एवं दंडी सन्यासी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी सरस्वती तथा , ब्रह्मचारी सुबुद्धानन्द जी महाराज, ब्रह्मचारी ब्रह्मविद्यानन्द व आदि संत, महात्मा, शिष्य, भक्त, श्रद्धालुगण उपस्थित थे। पूज्य शंकराचार्य जी महाराज ने आगे बताया कि कर्म से ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो सकती है इसके लिए अज्ञानता का नष्ट होना जरूरी है और ज्ञान - ज्ञान में भेद नहीं होता है। उन्होंने कहा ज्ञान स्वयं प्रकाश है तथा आत्मा और ज्ञान एक ही है। मन यदि कान के साथ जुड़ा न हो तो वह सुन नहीं सकता अर्थार्थ वह ज्ञान नहीं प्राप्त कर सकता है। इसलिए कोई यदि अपनी ही खोज करे तो वह परमात्मा को प्राप्त कर सकता है। इसलिए ब्रह्म ही सबका अधिपति है।

खबरीलाल रिपोर्ट (वृंदावन) ::-  कृष्ण की रासलीला देख मुग्ध हुए श्रद्धालुगण।।

ज्योतिष एवं द्वारका शारदा पीठ के पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी सरस्वती महाराज के 68 तम चातुर्मास्य व्रत अनुष्ठान के तृतीय दिवस की सुबह 8 बजे से वृंदावन स्थित उड़िया बाबा आश्रम में भगवान श्रीकृष्ण के रासलीला का आयोजन किया गया जिसमें सैंकड़ो श्रद्धालु एवं भक्तगण उपस्थित होकर रासलीला का आनंद लिए। कलाकारों ने बहुत ही सुंदर मंचन किया जिसमें माखन चोरी से लेकर वस्त्र चुराना, राधा की मुदली चुराना फिर सखियों द्वारा राधा से कृष्ण की बांसुरी आदि चुराने हेतु कहना और फिर जब कृष्ण निद्रा में थे तब राधा एवं उनके सखियों द्वारा कृष्ण के बांसुरी, अंगूठी आदि लेकर भाग जाना बहुत ही मनमोहक दृश्य था जिसे उपस्थित जनों ने खूब आनंद उठाया और राधे कृष्ण का जयकारा किये।

खबरीलाल रिपोर्ट (वृंदावन) ::-चातुर्मास्य व्रत अनुष्ठान में शिष्ययों ने गया सुमधुर भजन।।

जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी सरस्वती महाराज के 68 वें चातुर्मास्य व्रत अनुष्ठान के पावन अवसर पर 28 जुलाई 2018 की संध्या को पूज्य महाराजश्री के शिष्य एवं साध्वियों ने मिलकर पूज्य महाराजश्री के सामने सुमधुर भजन प्रस्तुत कर वातावरण को पूर्ण रूप से भक्तिमय बना दिया। इस विशेष दिन पर अखिल भारतीय हिंगलाज सेना (महिला ईकाई) की अध्यक्षा लक्ष्मीमणि शास्त्री, नीलमणि शास्त्री, सुचित्रा मोहता, मीता खेतान एवं मधु मिश्रा ने एक से बढ़कर एक मधुर भजन प्रस्तुत किये जिससे उपस्थित अन्य शिष्य, भक्तगण एवं श्रद्धालुओं ने सुर में सुर मिलते हुए संध्याकालीन समय को भक्तिमय बना दिया जिसे शंकराचार्य महाराज व उपस्थित अन्य संत महात्माओं ने बड़े प्रसन्नता के साथ सुनते हुए भगवान को याद किया। इस अवसर पर शंकराचार्य महाराज जी के शिष्य प्रतिनिधि दंडी स्वामी सदानंद जी सरस्वती, दंडी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी सरस्वती, ब्रह्मचारी शारदानंद जी महाराज, ब्रह्मचारी रामानंद जी महाराज व आदि संत , महात्मा व शिष्य उपस्थित थे।