विशेष

बंधन

बंधन शब्द बहुत प्यार शब्द है जब भी हम ये शब्द सुनते है तो दिमाग में बहुत से रिश्ते सामने आजाते है।बंधन में बहुत से वादे होते है।बहुत सारा प्यार होता है बहुत नाजुक रिश्ता होता है बंधन का। कोई भी व्यक्ति जन्म से ही इस बंधन शब्द से जुड़ता चला जाता है जब वो पैदा होता है तो हमारे माता पिता से एक बंधन जुड़ जाता है।जब बड़े होते है तो भी बहन से बंधन जुड़ता है जब स्कूल जाते है तो दोस्तों से बंधन होता है बड़े होने पर शादी हुई तो पत्नी के साथ बंधन में बंध जातें है।फिर बच्चे होने पर उसके जिमेदारी का बंधन ।इन सब बंधन में तीन बंधन होते है जो बहुत महत्व पूर्ण होते है।पहला भाई-बहन का बंधन जब बहन भाई को राखी बांधती है तो वो बंधन में बहुत से वादे होते है जिन वादों को निभाने का वचन भी देता है। वैसा ही पति-पत्नी का बंधन होता है जिसमे एक पति शादी के वक्त अपनी पत्नी को सात वचन देता है उसी प्रकार एक पिता भी अपनी बेटी को कई वादा करता है। हर बंधन में एक वादा जरूर होता है सुरक्षा का और अपनों को खुशी देने का ,हर परिस्थिति में उनकी जरूरत को पूरा करने का।बस विश्वास पर टिका होता है बंधन का संसार।मनुष्य के जीवन में जन्म से मरने तक ये बंधन का चक्र चलता ही रहता है । जो भी हो ये रिश्तों के बंधन से हमें बहुत सारा प्यार,सम्मान और इज्जत मिलती है और इन्ही रिश्तों के बंधन के इर्द गिर्द हमारी दुनिया बस्ती है । वर्षा गलपाण्डे

जन्मदिन विशेष :: स्वामिश्री: द्वारा रचित कविता ।।

जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती महाराज के शिष्य प्रतिनिधि व क्रांतिकारी सन्त दंडी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती द्वारा अपने गुरु भाई तथा महाराजश्री के शिष्य प्रतिनिधि व द्वारका पीठ के मंत्री दंडी स्वामी सदानंद सरस्वती जी महाराज के जन्मदिवस के उपलक्ष्य पर खुद के द्वारा रचित कविता से उन्हें बधाई प्रेषित किये।  विद्याधर से तात मात श्री मानकुंवर सी। एक एक से भ्रात भगिनियां भांति भ्रमर सी  गुरु पायो जगत्रात इष्ट ललिता नवचण्डी । सदानन्द छितरात जात जहं आज ये दण्डी । श्रीगुरुवर के काज आज यह करत निरन्तर । छवि ललाम लखि राखि सदा हृदय के अन्तर । जात जहाँ पठवात भिलाई या भीवण्डी । गनत न दिन अरु रात न गर्मी अथवा ठण्डी ।। सहत सदा बिधि बाण जो अपने अपर चलावत । सबही की सुधि लेत न हिंसा उर में लावत । अर्थी जन के हेतु हरी फहरावें झण्डी । हर चाहत मिलि जात यहाँ  यह ऐसी मण्डी । कहता है अविमुक्त न करता फल की आशा। जो निकली है आज वो है हिरदै की भाषा । सत्य सनातनधर्म बढे घट जायं पाखण्डी । करेंगे ऐसा काज  सदानन्द स्वामी दण्डी । साठ वर्ष हो गये आज जिनमें से चालीस । श्रीगुरुवर के पास करी सेवा है खालिस । चालीस सेवा और निरन्तर करें अमन्दी । श्रीगुरुवर शिव रहें सदानन्द होवें नन्दी । अविमुक्तेश्वरानन्दः

जन्मदिवस विशेष ::- पूज्यपाद महाराज श्री के दिशानिर्देशों का पालन कर रहे हैं स्वामी जी ।।

।।स्वामी  सदानंद सरस्वती जी महाराज के वर्धापन पर विशेष।। रविकांत तिवारी की कलम से ::- धूमा(सिवनी)हमारी भारतीय परंपरा में कहा गया कि आज भी पृथ्वी में कहीं न कहीं कोई न कोई ईश्वरीय अवतार किसी भी रूप में अवतरित होता है जैसे सनातन धर्म की रक्षार्थ भगवान शिव ने आद्य शंकराचार्य जी के रूप में अवतार लेकर पृथ्वी पर सनातन धर्म की रक्षा की । उसी परंपरा का निर्वहन करने म. प्र. के सिवनी जिले में पूज्यपाद ज्योतिष्पीठाधीश्वर एवम द्वारकाशारदापीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी श्री स्वरूपानन्द सरस्वती जी महाराज का अवतार हुआ । ठीक उसी परंपरा में अपनी उपस्थिति प्रस्तुत करने एवम पूज्यपाद महाराज श्री द्वारा बताये गए दिशा निर्देशों एवम मार्गदर्शन में कार्य करने हेतु नरसिंहपुर जिले के ग्राम बरगी (करकबेल) में भाद्रपद कृष्णपक्ष द्वितीया सं. २०१४ तदनुसार ३१ अगस्त सन १९५७ ई. को माता सौ. मानकुंवर देवी एवम आयुर्वेद रत्न पं. विद्याधर अवस्थी जी के यहाँ एक बालक का जन्म हुआ माता पिता ने नामकरण किया रमेश कुमार अवस्थी । बालक रमेश की प्रारम्भिक शिक्षा ग्राम में ही तथा नरसिंहपुर में सम्पन्न हुई, वहीँ संस्कृत की शिक्षा का आरम्भ ऋषिकुल संस्कृत विद्यालय झोतेश्वर तथा पूज्यपाद महाराज श्री के सान्निध्य में, एवम वाराणसी में संस्कृत विद्या एवम व्याकरण -वेदान्तादि शास्त्रों का अध्ययन किया । आपकी ब्रम्हचर्य दीक्षा प्रयाग महाकुम्भ सन १९७७ ई. के अवसर पर सम्पन्न हुई !नामकरण किया गया ब्रम्हचारी सदानंद आपके दीक्षा गुरु पूज्यपाद ज्योतिष्पीठाधीश्वर एवम द्वारकाशारदापीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी श्री स्वरूपानन्द सरस्वती जी महाराज हुए । वैयक्तिक आध्यात्मिक साधना एवम चिंतन के अतिरिक्त ज्योतिष्पीठ एवम द्वारकाशारदापीठ द्वारा संचालित जनकल्याण की अनेक प्रवृत्तियों में समर्पण भाव से निरंतर सेवा सदानंद जी में स्वाभाविक प्रवृत्ति मानी गयी । आपकी पूज्यपाद महाराज श्री के चरणो में अपार श्रद्धा ही इस बात का प्रतीक है की पूज्यपाद श्री चरणो की कृपा रज से बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी में वैशाख शुक्लपक्ष पूर्णिमा संवत २०६० तदनुसार १५ अप्रैल २००३ को दण्ड संन्यास की दीक्षा से आपको अलंकृत किया गया और नामकरण किया गया स्वामी सदानंद सरस्वती ! पूज्य सदानंद जी ने अपने इस स्वाभाविक गुण के ही प्रभाव एवम पूज्यपाद महाराज श्री के दिशानिर्देशानुसार एवम पराम्बा भगवती राजराजेश्वरी महात्रिपुर सुंदरी की कृपा से पूज्य महाराज श्री के कार्यों को पूर्ण करते आ रहे हैं उदाहरणार्थ परमहंसी गंगा आश्रम का सौंदर्यीकरण,सुचारू एवम व्यवस्थित सञ्चालन,गौशाला का निर्माण संचालन, माता गिरिजा देवी एवम पिता श्री धनपति उपाध्याय समिति का गठन कर निशक्त एवम असहाय निर्धन बालकों की शिक्षा के लिए अंग्रेजी एवम हिंदी माध्यम के विद्यालय का निर्माण एवम सुचारू सञ्चालन जिसमे दूर दराज के  बालकों/बालिकाओं के लिए बस सञ्चालन की व्यवस्था की गयी ! पूज्यपाद महाराज श्री के दिशानिर्देशों के अनुसार प्रदेश का एकमात्र निःशुल्क नेत्र चिकित्सालय का शुभारम्भ पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के मुख्य आतिथ्य में कराकर जिले ही नहीं अपितु समस्त प्रदेश के हर वर्ग को लाभान्वित कर पूज्यपाद महाराज श्री के चरणो के प्रति अपनी अपार अगाध श्रद्धा प्रस्तुत की है !!  स्वामी सदानंद सरस्वती जी महाराज अपने नाम के अनुसार ही अत्यंत सरल एवम सहज हैं । आप पराम्बा भगवती की साधना एवम पूज्यपाद महाराज श्री के चरणों की सेवा में निरंतर लगे हुए हैं स्वामी जी के साहित्य कृतित्व में भगवती राजराजेश्वरी त्रिपुरसुंदरी नित्याराधना स्त्रोत्राणि,जीवन सन्देश गुजराती में आद्य शंकराचार्य जी जीवन परिचय, दिव्य द्वारका भव्य शारदापीठ,सौंदर्य लहरी,मणिद्वीप सन्देश,क्या हिंदुत्व खतरे में है, श्रीविद्या समाराधना, भागवत प्रवचन(संकलन),गीता प्रवचन(संकलन), भज गोविन्द (व्याख्या), परमार्थ पथ(संकलन), मठाम्नाय महानुशासनम् (गुजराती व्याख्या),गुरुदीक्षा क्रम, शंकराचार्य स्त्रोत्रावली,प्रस्थानत्रयी(हिंदी अनुवाद), गुजराती मासिक पत्रिका नवभारती के स्वत्वाधिकारी,शारदापीठ विद्यासभा की शोध पत्रिका शारदापीठ का प्रकाशन, द्वारकाशारदापीठ आर्ट्स कॉमर्स एवम एजुकेशन कॉलेज की वार्षिक पत्रिका नवभारती का प्रकाशन निरंतर करा रहे हैं । आज स्वामी श्री सदानंद सरस्वती जी महाराज का 60 वा जन्मोत्सव है हम स्वामी से प्रेरणा लेकर उन्हें अपना आदर्श मानकर उनकी वंदना करें । संकलन - रविकांत तिवारी धूमा सिवनी 

खबरीलाल रिपोर्ट ::- शंकराचार्य आश्रम में श्रावणी उपक्रम मनाया गया।

रायपुर के बोरियाकला स्थित जगद्गुरु शंकराचार्य आश्रम व भगवती राजराजेश्वरी मंदिर में श्रावणी उपक्रम के साथ साथ संस्कृत दिवस भी मनाया गया। आश्रम प्रमुख ब्रह्मचारी डॉ इंदुभवानन्द जी महाराज ने बताया कि शुक्ल यजुर्वेद के अध्येता, पाठक, अध्यापक व आदि ब्राह्मणों ने मिलकर श्रावणी मनाया जिसमे हेमाद्रि संकल्प कर के दस प्रकार के विधि से स्नान किया जाता है। इस स्नान को प्रायश्चित स्नान भी कहा जाता है। आगे ब्रह्मचारी डॉ इंदुभवानन्द जी महाराज ने बताया कि वर्ष भर में जो ज्ञात, अज्ञात रूप से पाप हो जाता है उसका प्रायश्चित किया जाता है। इसके साथ ही पितरों का तर्पण भी किया जाता है तथा यह ब्राह्मणों का प्रमुख उपक्रम है। इस उपलक्ष्य पर आचार्य धर्मेंद महाराज, भूपेंद्र पांडेय, श्रीकृष्ण तिवारी, डीपी तिवारी, एमएल पांडेय, रत्नेश शुक्ला, विद्यार्थीगण व आदि ब्राह्मण समुदाय के लोग उपस्थित थे।

खबरीलाल रिपोर्ट (वृंदावन) ::- हिन्दू कोई जीवन पद्धति नहीं है अपितु हिन्दू एक धर्म है ::- स्वामिश्री: ।।

खबरीलाल रिपोर्ट (वृंदावन) ::- ज्योतिष एवं द्वारका शारदा पीठ के पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती महाराज के शिष्य प्रतिनिधि क्रांतिकारी सन्यासी दंडी स्वामी अविमुक्तेश्वरानन्द सरस्वती ने अपने चिरपरिचित अंदाज में ऐसा निशाना साधा की समूचा सभागृह जय कारे से गूंज उठा। स्वामिश्री: ने कहा समाज का निर्माण जैसे चेहरा करता है ठीक उसी प्रकार ब्राह्मण भी समाज का निर्माण करता है। उन्होंने कहा सदा से यह प्रयास चलता रहा कि सनातन धर्म को नष्ट कर दिया जाए। वर्णाश्रम ही सनातन धर्म है। सनातन धर्म के रक्षा का कार्य ब्राह्मणों का है।  स्वामिश्री: ने कहा कि हमारे देश के संवेदनशील पीएम विश्व का ऐसा कोई देश शायद बचा हो जहां वे नहीं गए होंगे। कटाक्ष करते हुए उन्होंने कहा कि शायद पीएमओ के अधिकारी मैप लेकर ढूंढ रहे होंगे कि कौन सा देश और बचा है जहां हमारे पीएम नहीं गए होंगे। स्वामिश्री: ने पीएम को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि वे जिस भी देश मे गए हैं वहां वे कहते हैं कि हम बुद्ध और गांधी के देश से आये हैं। उन्होंने कभी यह नहीं कहा कि हम माँ गंगा, माँ यमुना के देश से आये है , उन्होंने कभी नहीं कहा कि हम भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण के देश से आये हैं। जब कि उन्होंने भारत मे अपने संसदीय क्षेत्र में कहा कि मुझे माँ गंगा ने बुलाया है। आज घोर अनीति हो रही है। स्वामिश्री: ने कहा कि आप अगर धर्म निरपेक्ष हो तो धर्म स्थानों को क्यों अधिकृत कर रहे हो और अधिकृत करने के लिए क्या केवल हिन्दू धर्म है ? इतना शनते ही समूचा सभा गृह हर हर महादेव के नारे से गूंज उठा और उपस्थित सभी ने करतल ध्वनि से उनके बात का जोरदार समर्थन किया।  स्वामिश्री: ने आगे कहा कि हमारे देश मे एक ऐसी संस्था है जो स्वयं सेवकों की भर्ती करती है। अब इन पूर्ण कालिक स्वयं सेवकों को काम मिले इस हेतु वे हमारे तीर्थ स्थानों, मंन्दिरों को अधिग्रहण कर रहे हैं, देव मंन्दिरों को तोड़ रहे हैं। वे उन देव मंन्दिरों को भी नहीं छोड़ रहे हैं जिनका वर्णन पुराणों में है। आगे उन्होंने कहा काशी में 8 मंदिर तोड़े जा चुके हैं और जब से हमने मंदिर बचाओ आन्दोलनम शुरू किए हैं उसके बाद 9 वां मंदिर वे तोड़े नहीं हैं लेकिन यह भी स्पष्ट नहीं किये है कि आगे तोड़ेंगे या नहीं तोड़ेंगे। देश मे नदियों की हत्या हो रही है, साबरमती नदी जैसे मॉडल बनाने की चेष्टा हो रही है फिर भी हम चुप हैं। स्वामिश्री: ने मंच से सभी के उद्देश्य से कहा - आपने लिए भले मत लड़ो लेकिन अपने सनातन धर्म, तीर्थ स्थानों और मंन्दिरों के लिए लड़ो। स्वामिश्री: ने बहुत बड़ा सवाल उठाते हुए कहा कि क्या पर्यटन और तीर्थस्थान एक है ? यदि सभी का अधिग्रहण कर गाइड पद्धति ला दोगे तो तीर्थ पुरोहित क्या करेंगे ? कहाँ से वे अपने और अपने परिवार का पेट पालेंगे ?  जो तीर्थ करने आते हैं वे कर्मकांड के लिए ब्राह्मण ढूंढते है और उन ब्राह्मणों के मुख से मंत्र और श्लोक सुनकर वे तृप्त होते हैं और मन को संतुष्ट कर तीर्थ कर घर लौटते हैं । क्या यह कार्य कोई गाइड कर सकता है ? कभी नहीं कर सकता है। हम प्रत्येक को संगठित होकर रहने की आवश्यकता है नहीं तो एक समय आएगा जब ब्राह्मणों के लिए कुछ नहीं बचेगा।

खबरीलाल रिपोर्ट (वृंदावन) ::- शंकराचार्य ने दिया संदेश - " ब्राह्मण एक हो जाएं और संगठित हो जाएं "।

खबरीलाल रिपोर्ट (वृंदावन) ::-  जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी महाराज ने अखिल भारतीय तीर्थ पुरोहित महासभा के मंच से देश के प्रत्येक ब्राह्मणों के उद्देश्य में कहा - "ब्राह्मण एक हो जाएं "। आज स्थिति ऐसी हो गई है कि ब्राह्मणों को ढकेलते ढकेलते दीवाल तक पहुंचा दिया है। शंकराचार्य महाराज ने जोर आवाज में कहा ब्राह्मण संगठित हो जाएं जिससे एक बुलंद आवाज बनेगी और सत्ता में बैठे लोगों के साथ साथ आम नागरिक भी सुनेगी। उनके इस उद्गार से खचाखच भरे सभागृह में लोगों ने हर हर महादेव के नारे से पूरा वातावरण धर्म और न्याय मय बना दिया। शंकराचार्य महाराज ने आगे कहा की हमारे देश मे समाज का निर्माण धर्म के लिए हुआ था। उस धर्म को पालन करने में राज्य हमारी सहायता करे। भारत की प्राचीन राजनीति उसी के आधार पर चलती थी लेकिन आज का परिदृश्य विपरीत से हो गया है। आज लोग सोचते हैं ब्राह्मण ही क्यों पूजा-पाठ आदि करे, क्यों न ब्राह्मणों की जगह दूसरे को सीखा दिया जाए।  हम जब भी अपने इष्ट देवता की आराधना करते हैं तब हम स्मरण करते हैं - ब्रह्म लोक से लेकर लोकालोक पर्वत तक जहां सृष्टि समाप्त हो जाती है उन सबके बीच जितने भी ब्राह्मण देवता निवास करते हैं उन्हें हम प्रणाम करते हैं। शंकराचार्य महाराज ने कहा कि ब्राह्मणों को समाप्त करने के लिए अंतरजातीय विवाह करवाये जा रहे हैं जिसे सरकार प्रोत्साहित कर रही है। आजकल कुछ व्यापारी लोग तीर्थ स्थानों में बैठ गए हैं और तीर्थ पुरोहितों का कार्य कर रहे हैं। उन्होंने तीर्थ पुरोहित, पुजारी, ब्राह्मणों को सचेत करते हुए कहा कि आगे संकट और आने वाला है। हमारा भारत देश सनातन धर्म से है और इसे नष्ट करने की साजिश हो रही है। प्रत्येक से पूज्य शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती ने कहा - हमे धर्म को आगे रखकर चलना चाहिए और यह कार्य वृंदावन धाम से शुरू हो। हम तो भोजन खिलाकर तब खाने वालों में से हैं इसलिए हमें पूर्ण रूप से संगठित होना पड़ेगा। शंकराचार्य महाराज ने कहा अभी देश मे मंदिर, मूर्तियां तोड़े जा रहे हैं वह इसलिए क्यों कि सरकार अपना आमदानी बढ़ाना चाहती है। यदि हम संगठित नहीं हुए तो आगे धीरे धीरे सब उनके हाथ मे चला जायेगा, ऐसे में हम सनातन धर्म की शिक्षा कैसे देंगे ?  इसका शसक्त विरोध होना चाहिए और यदि विरोध नहीं हुआ तो सरकार अपने खर्चे के लिए भारत के मठ, मंन्दिरों में चढ़ने वाला दान, देवी देवताओं के गहने , बर्तन इत्यादि उनके कब्जे में चले जायेंगे। आप देख ही रहे हो सरकार अपने खर्चे के लिए गोमांस का निर्यात कर रही है जो घोर पाप है साथ ही कुछ राज्यों में सरकार शराब भी बेच रही है। अब उनकी निगाहें सनातन धर्म के मठ, मंन्दिरों पर है। हमारा हिन्दू धर्म  ब्राह्मण धर्म है। इस महासभा में पूज्य शंकराचार्य महाराज के शिष्य प्रतिनिधि क्रांतिकारी दंडी सन्यासी स्वामिश्री: अविमुक्तेश्वरानन्द: सरस्वती ने भी अपने ओजस्वी रूप में सभा को संबोधित किया साथ ही अखिल भारतीय तीर्थ पुरोहित महासभा के अध्यक्ष व अन्य संत, महात्मा एवं तीर्थ पुरोहित महासभा के सदस्यों ने भी संबोधित किया और पूज्य महाराजश्री का स्वागत के साथ साथ वंदन और अभिनंदन किया।

खबरीलाल रिपोर्ट (वृंदावन) ::- डॉ अरोड़ा ने अपनी पुस्तक जल - अमृत या विष पूज्य शंकराचार्य महाराज के चरणों मे अर्पित किया।।

ज्योतिष एवं द्वारका शारदा पीठ के पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज के 68 वें चातुर्मास्य व्रत अनुष्ठान में पधारे सर गंगाराम हॉस्पिटल , नई दिल्ली के आयुर्वेदिक चिकित्सक डॉ परमेश्वर अरोड़ा ने अपनी किताब " जल - अमृत या विष ? पूज्यपाद शंकराचार्य महाराज के चरणों मे अर्पित किया तथा उपस्थित संत, महात्मा एवं भक्तों को बताया कि कौन से समय मे पानी पीना चाहिए और शीतल या गुनगुना पानी में से कौन सा सेहत के लिए फायदेमंद है। डॉ अरोड़ा ने वेद के अध्ययन के बाद रिसर्च कर इस पुस्तक को लिखा और मूर्त रूप दिया। पूज्य शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी महाराज ने डॉ अरोड़ा के कथन को सुनकर तथा पुस्तक का अवलोकन कर अपनी राय देते हुए भक्तों एवं उपस्थित श्रद्धालुओं से कहा कि आज के समय मे पूरा पानी अशुद्ध हो गया है। हमारे देश के नदियों , तालाबों में दूषित जलों का प्रवाह हो रहा है जिससे पानी पीने योग्य तक नहीं रहा। आज आरओ का पानी, बोतल बन्द पानी आदि सब शुद्ध नहीं रहे। रासायनिक खाद से अन्न दूषित हो रहा है, शाक-सब्जी में कीटनाशक डाले जा रहे हैं, सब्जियों का रंग रोगन भी हो रहा है तो ऐसे में व्यक्ति कैसे स्वस्थ रह सकता है ? आगे पूज्य महाराजश्री ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने चिकित्सक के सलाह पर चलना चाहिए साथ ही अपने खान-पान को शुद्ध रखना चाहिए। हमारा आहार ही हमे स्वस्थ रखता है और ताकत के साथ साथ ऊर्जा प्रदान करता है। आज लोग गोबर खाद की जगह रासायनिक खाद का भरपूर उपयोग कर रहे हैं जिससे अशुद्ध अनाज हमे प्राप्त हो रहे हैं। पूज्य महाराजश्री ने प्रत्येक से यह भी कहा कि रोजाना कसरत, चलना, साईकल चलाना आदि करें जिससे शारीरिक परिश्रम हो और आपके शरीर के प्रत्येक अंग प्रत्यंग भी स्वस्थ रहे।

खबरीलाल रिपोर्ट (वृंदावन) ::-  सब नामों में सर्वश्रेष्ठ "राम" नाम है : स्वरूपानन्द सरस्वती ।।

ज्योतिष एवं द्वारका शारदा पीठ के पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी महाराज ने भक्तों से कहा कि सब नामों में सर्वश्रेष्ठ "राम" नाम है। जन्म जन्मांतर से जो पाप हो रहे हैं उन पापों की गठरी को जीव डोह रहा है। इन पापों का नाश अग्नि करता है, उसे भस्म कर देता है। अज्ञान का कारण परमात्मा के निकट रहते हुए भी हम उन्हें पहचान नहीं पाते हैं। अज्ञान का नाश राम नाम का "अ" कार करता है। जो शीतलता प्रदान करता है, अशांति दूर करता है वह राम नाम का "म" कार है। आगे महाराजश्री ने कहा कि राम नाम और ओंकार में कोई फर्क नहीं है।  गोस्वामी तुलसीदास महाराज ने कहा था राम से भी बड़ा उनका नाम है। समुद्र में सेतु बनाने के लिए जब वानर सेना ने पत्थरों के ऊपर राम नाम लिखर फेंका तो पत्थर डूबे नहीं अपितु तैरने लगे। यह है उनके नाम का प्रभाव। भगवान श्रीराम सेतु का निरीक्षण करने पहुंचे तो देखा समुद्र में पत्थर तैर रहे हैं। उन्होंने पूछा ये पत्थर कैसे तैर रहे हैं ? तब वानर सेना ने कहा प्रभु आपके नाम के प्रभाव के कारण ही पत्थर तैर रहे हैं। तब भगवान राम ने भी एक पत्थर समुद्र में फेंका तो वह डूब गया। तभी हनुमान जी ने कहा की प्रभु आप खुद ही पत्थर को फेंकोगे तो वह तो डूबेगा । इसलिए कहते हैं कि सब नामों में सर्वश्रेष्ठ "राम" नाम ही है।

खबरीलाल रिपोर्ट (वृंदावन) ::- परमात्मा के रहने मात्र से नहीं होगा उन्हें पहचानना होगा : स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती ।।

श्रीउड़िया बाबा आश्रम स्थित श्री शंकराचार्य निवास में आयोजित सत्संग में द्विपीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी महाराज के प्रवचन व आशीर्वचन हेतु वृंदावन के निवासियों के साथ साथ देश के कोने कोने से आये भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ी। शंकराचार्य जी महाराज के शिष्य प्रतिनिधि दंडी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज मंच संचालन करते हुए प्रथमः प्रत्येक विद्वत जन एवं भक्तों का स्वागत किया तथा मंगलाचरण हेतु बाल व्यास प्रशांत त्रिपाठी, योगेशनाथ त्रिपाठी, नमन तिवारी एवं सबसे छोटे उम्र के बटुक दुष्यंत पारासर को मंच में स्वागत किया। इन वेद के विद्यार्थियों के मंगलाचरण और कथा पश्चात स्वमश्री: ने ब्रह्मचारी रामेश्वरानन्द जी महाराज, ज्योतिष पीठ के व्यास जी एवं साध्वी लक्ष्मी मणी शास्त्री व नील मणी शास्त्री को कथा का रस पान कराने हेतु आग्रह किया। इनके कथा के पश्चात पूज्य शंकराचार्य जी महाराज का पादुका पूजन ब्रह्मचारी रामेश्वरानन्द जी महाराज ने सम्पन्न करवाया तथा मंत्रोच्चारण ब्रह्मचारी ब्रह्म विद्यानंद जी महाराज ने किया। शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज ने उपस्थित भक्तों एवं श्रद्धालुओं से कहा कि परमात्मा के रहने मात्र से नहीं होगा उन्हें पहचानना होगा जिस हेतु राम नाम का जाप और ध्यान करना होगा। आगे उन्होंने कहा कि एक अखंड सच्चिदानन्द समस्त विश्व मे व्याप्त है तथा प्राणियों में उनका निवास है लेकिन उनको जानना कठिन है। पूज्य शंकराचार्य महाराज ने कहा कि परमात्मा की चार रूपों में अभिव्यक्ति होती है - नाम, रूप, लीला और धाम। यह माना जाता है कि यह चार होते हुए भी अभिन्न हैं। इनमें से किसी एक को कोई पकड़ ले तो परमात्मा को प्राप्त कर सकता है। लोग नाम का ही स्मरण करते हैं क्यों कि वह प्रधान है। " वंदो नाम राम रघुवर को, हेतु कृसाणु भानु हिमकरको "। राम नाम कृसाणु , भानु, हिमकर का हेतु है। कृसाणु का अर्थ है अग्नि, भानु का अर्थ है सूर्य और हिमकर का अर्थ है चंद्रमा। इन्हें बीजाक्षर कहा जाता है। इन्ही बीज अक्षर में बिंदु लग जाने से यह बीजाक्षर हो जाते हैं।  आज के सत्संग में स्वामी सदाशिवेंद्र सरस्वती, स्वामी गोविंदानन्द सरस्वती, ब्रह्मचारी कैवल्यानन्द जी महाराज, ब्रह्मचारी धरानन्द जी महाराज, ब्रह्मचारी सुप्रियानन्द जी महाराज, कथा वाचक किशोर व्यास जी महाराज, ब्रह्मचारी रामानन्द जी महाराज, ब्रह्मचारी शारदानन्द जी महाराज एवं अन्य संत, महात्मा व भक्तगण उपस्थित थे।

बालश्रम में खोता बचपन

अभी तो आंखें खोली ही थी मैने अभी तो लोगों ने मेरे आने की खुशियां ही मानीई थी पर ये खुशी ज्यादा देर की नही थी ।देखते ही देखते दिन बीतते गए कब मैं हुन हां करते करते शब्दो को जोड़ना सिख गया पता ही नही चला उम्र की बाली सी उम्र में कदम रखा ही था कि गाड़ियों की शोर चारों ओर सुनाई देने लगी थी मैं मां की आँचल में महफूज़ तो था पर मां मुझे लोगों को दिखा दिखा कर सड़क पर लोगों से पैसे मांग रही थी कुछ दिन ऐसा ही चलता रहा अब मैं 8 साल का हो चुका था अब मां की जगह मैं लोगों से पैसे मांग रहा था। एक दिन रोज की तरह मैं सड़क पर सिंग्नल होने पर लोगों की गाड़ियों में बैठे लोगों से पैसे मांग रहा था तभी एक गाड़ी का मिरर थोड़ा नीचे हुआ और वहां से एक मैडम ने आवाज लगाई और कहां क्या तुम रोज यही काम करते हो मैं डर के भाग आया। दूसरे दिन वो मैडम फिर वहां आई पर आज वो अकेली नही थी उनके साथ कुछ और लोग भी थे वो सब बच्चों को यहीं पूछ रहे थे कि क्या वो रोज यही काम करते है कुछ बच्चों ने जवाब दिया हां कुछ डर के मारे कुछ बोल ही नही रहे थे उनमें से एक मैं भी था। तीसरे दिन वापस वही लोग आये और कहां की अब से आप लोग स्कूल जायेंगें हम ये शब्द पहली बार सुन रहे थे हम इसका अर्थ भी नही पता था क्यों जब से आंख खुली थी तब से मैंने ये सड़क और यहां का शोर शराबा ही सुना था यहीं हमारी दुनिया थी पर अब.... हम स्कूल जाने लगे थे अब हाथ गाड़ियों के दरवाजे की तरफ नही बढ़ते थे बल्कि अब हाथों में किताबे थी अक्षरों का ज्ञान हो रहा था।जीवन बदल रहा था किस्मत का सूरज अब उदय हो रहा था जिसकी चमक से आज मैं अच्छे अस्पताल का डॉक्टर बन गया था । आज मेरे साथ साथ उन सभी बच्चों की जिंदगी बदल गई जो वहां मेरे साथ सिग्नल पर गाड़ियां साफ कर लोगों से पैसे मांगा करते थे।आज वो दिन हम कभी नही भूल सकते जब वो खिड़की के शीशा खुला और वहां से आई आवाज और वो मैडम हमारे लिए एक फरिश्ते से कम न थी। आज हम उन्ही के रास्तों पर चलकर हम जैसे गरीब बच्चों की मदत कर रहे है ताकि उनके जीवन मे भी उज्जवल भविष्य का सूरज चमके और वो भी अच्छी जिंदगी जी सके। बहुत से बच्चे हैं जो इस गरीबी के कारण गलत दुनिया मे चले जाते है जिन्हें अच्छा बुरा पता ही नही होता ।बस पेट की भूख का पता होता है जिसे भुझाने के लिए वो कुछ भी करने को तैयार होता है।कहते है बच्चे देश का भविष्य होते हैं। तो उसकी अच्छी परवरिश करना भी हमारी ही जिम्मेदारी है चाहे वो हमारे बच्चे हो या किसी और के बस हमे उन्हें हमारा बच्चा ही समझे हम और उसकी मदत करें। तभी कुछ हद तक बाल मजदूरी कम हो सकेगी।ऐसे बच्चों के उज्वल भविष्य की कामना करती मैं...... वर्षा गलपाण्डे

खबरीलाल रिपोर्ट (वृंदावन) ::- शंकराचार्य कोई लाभ का पद नहीं है, वे आज भी भिक्षा करके भोजन करते हैं ::- शंकराचार्य स्वरूपानन्द सरस्वती ।।

ज्योतिष एवं द्वारका शारदा पीठ के पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती ने उपस्थित संत, महात्मा एवं श्रद्धालुओं से कहा कि जब जब धर्म की ग्लानि होती है तब तब भगवान अवतरित होते हैं। यह याद रखिये की पाखण्ड मन मनुष्य को धर्म के मार्ग से विमुख कर देता है। आज कल एक से एक लोग खड़े हो रहे हैं, कोई महिला है जो अपने आप को नेपाल का शंकराचार्य घोषित कर दिया है साथ ही एक संस्था ऐसी है जो नए नए शंकराचार्य बनाती है और उनके अनुसार वे शंकराचार्य बोले। सोच यह है कि क्यों महिलाओं को वंचित किया जाए, उन्हें भी शंकराचार्य बना दिया जाए जैसे विधायक, सांसद बनाये जाते हैं। यह स्पष्ट हो सभी को की शंकराचार्य का पद कोई लाभ का पद नही है। प्रत्येक को यह जानना जरूरी है कि शंकराचार्य का कोई वेतन नहीं होता है। वह भिक्षा मांग कर ही भोजन करता है, तपस्या करता है, साधना करता है, सन्यास धर्म का पालन करता है, धर्म के प्रचार के लिए भ्रमण करता है, धर्म की रक्षा हेतु आवाज उठाता है और लोगों को धर्म मार्ग पर चलने के लिए कहता है और प्रेरित करता है।  उस महिला को इसलिए शंकराचार्य बनाया जा रहा है क्यों कि उसे राधास्वामी और ब्रह्मकुमारी का समर्थन प्राप्त है। एक अखिल भारतीय विद्वत परिषद है जिसे आरएसएस और भाजपा के लोगों ने बना के रखा है जो शंकराचार्य बनाते हैं। ये ब्रह्मकुमारी और राधास्वामी सनातन धर्म का नाश करने के लिए बने हैं। आगे स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने कहा कि शंकराचार्य वो होता है जिसमे धर्म के विपरीत कार्य करने वालों के खिलाफ बोलने और आवाज उठाने की ताकत हो और जो धर्म की रक्षा करने में सक्षम हो।

खबरीलाल रिपोर्ट (वृंदावन) ::-  जो धर्म करेगा उसे मोक्ष की प्राप्ति होगी :- शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ।।

द्विपीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी महाराज ने श्री शंकराचार्य निवास, वृंदावन में चल रहे उनके 68 तम चातुर्मास्य व्रत अनुष्ठान के सायंकालीन सत्संग में कहा कि मनुष्य के जीवन मे 4-पुरुषार्थ होते हैं - अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष। इस पर यदि विचार करें तो धर्म ही श्रेष्ठ पुरुषार्थ है।  धर्म से ही अर्थ और काम प्राप्त होते हैं। जो धर्म न करे और अधर्मी हो वह भोग नहीं कर सकता भले उसके पास कितना भी अर्थ क्यों न हो। जो व्यक्ति धर्म की रक्षा करता है, धर्म के लिए आवाज उठाता है, गौ माता की सेवा करता है, अहंकार नहीं करता है , लोगों की मदद करता है इत्यादि उसे अर्थ के साथ साथ मोक्ष की भी प्राप्ति होती है। रोगी आदमी क्या भोग करेगा ? आज के समय मे 100 में से 75 प्रतिशत लोग शुगर की बीमारी से ग्रसित हैं। उनके पास अर्थ है पर वे भोग नहीं कर पा रहे हैं, जो भोजन उन्हें पसंद होगा उससे उन्हें परहेज करना होगा नहीं तो शुगर बढ़ जाएगा। कहते हैं कि पूर्व जन्म में यदि पुण्य किये होंगे तो भोजन मिलेगा और उसे पाचन की शक्ति मिलेगी। जो पुण्य नहीं किये होंगे उनके पास अर्थ जरूर होंगे पर भोजन करने और पचाने की शक्ति नहीं होगी। इसलिए व्यक्ति को धर्म के कार्य मे लीन होना चाहिए और अधर्म के कार्यों से बचना चाहिए। जो व्यक्ति धर्म करेगा उसे परलोक में भी सहायता मिलेगी।

खबरीलाल रिपोर्ट (वृंदावन) ::-  स्वामिश्री: ने स्वयं रुद्राभिषेक सम्पन्न किये।।

सावन माह के चौथे सोमवार को ज्योतिष एवं द्वारका शारदा पीठ के पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी महाराज के शिष्य प्रतिनिधि दंडी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज ने श्री शंकराचार्य निवास, उड़िया बाबा आश्रम, वृंदावन में स्थापित भगवान चंद्रमौलेश्वर महादेव जी का आज पूरे विधि विधान के साथ रुद्राभिषेक सम्पन्न किये तथा महारती पश्चात पुष्पांजलि अर्पित किए। स्वामिश्री: ने अभिषेक पश्चात खुद भगवान चंद्रमौलेश्वर महादेव जी का श्रृंगार कर आरती किये और पुष्पांजलि प्रभु के चरणों मे अर्पित किये। इस विशेष दिन में अनेक श्रद्धालुगण उपस्थित थे और प्रत्येक को स्वामिश्री: ने खुद अपने हातों से चरणामृत दिए और प्रसाद वितरित किये।

खबरीलाल रिपोर्ट (वृंदावन) ::- विचार, भोजन और मित्र सात्विक होना चाहिए :: शंकराचार्य स्वरूपानन्द सरस्वती।।

अष्टमी तिथि होने के कारण अनाध्याय था जिस हेतु पूज्य शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी महाराज से मिलने श्री शंकराचार्य निवास, वृंदावन में भक्तों का तांता लगा हुआ था। महाराजश्री से मिलने आये भक्तों से उन्होंने कहा कि किसी भूखे को खाना खिलाना, किसी प्यासे को पानी पिलाना यह ऐसे कर्म हैं जिससे मन खुद ब खुद प्रसन्न हो जाता है। मन खुद ही कहता है कि आज हमने एक अच्छा कार्य किया। इसी चंचल रूपी मन को ही वश में करना है क्यों कि वह इधर उधर खूब भागता है।  महाराजश्री ने आगे अपने प्रवचन में उपस्थित भक्तों के उद्देश्य में कहा कि सात्विक सुख प्राप्त करना बहुत जरूरी है, तभी पाप कार्य बन्ध होंगे, क्यों कि जब तक व्यक्ति का मन सात्विक रहेगा उसका मन कहीं और नही भटकेगा। मन, शरीर तभी सात्विक होंगे जब व्यक्ति सात्विक भोजन ग्रहण करेगा, उनके मित्र भी सात्विक होंगे और साथ ही सत्संग भी करेगा। गलत लोग गलत रास्ते पर ले जाते हैं इसलिए जो मित्र व्यक्ति को गलत रास्ते पर चलने के लिए कहे यह प्रोत्साहित करे वह मित्र नहीं अपितु आपका परम् शत्रु है। मित्र वही होता है जो सच्चाई के मार्ग पर चलने की सलाह दे , इसलिए कहते हैं कि सच्चा साथी चुनने के लिए विवेक होना जरूरी है।

खबरीलाल रिपोर्ट (वाराणसी) ::-  एक ओर मन है तो दूसरी ओर भगवान :: शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ।।

द्विपीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज ने आज 18 अगस्त 2018 को श्री शंकराचार्य निवास, वृंदावन में उपस्थित श्रद्धालुओं को आशीर्वचन देते हुए कहा कि एक ओर मन है तो दूसरी ओर भगवान। ज्ञात हो कि महाराजश्री जी का 68 वां चातुर्मास्य व्रत अनुष्ठान वृंदावन धाम में आयोजित है जिसमे उनके शिष्य प्रतिनिधि द्वय दंडी स्वामी सदानन्द सरस्वती जी महाराज व स्वामिश्री: अविमुक्तेश्वरानन्द: सरस्वती जी महाराज के साथ साथ दंडी स्वामी अमृतानन्द सरस्वती जी महाराज, दंडी स्वामी सदाशिवेंद्र सरस्वती, ब्रह्मचारी सुबुद्धानन्द जी महाराज, ब्रह्मचारी ब्रह्म विद्यानंद जी महाराज, ब्रह्मचारी कैवल्यानन्द जी महाराज, ब्रह्मचारी रामेश्वरानन्द जी महाराज , ब्रह्मचारी धरानन्द जी महाराज एवं आदि संत ,महात्मा सम्मिलित हुए हैं और चातुर्मास्य व्रत के पालन के साथ साथ स्वाध्याय हो रहे हैं एवं रोजाना सायंकालीन प्रवचन भी हो रही है। आज के प्रवचन में सर्वप्रथम ज्योतिष पीठ के व्यास जी ने कीर्तन के साथ साथ राम कथा सुनाई तत्पश्चात स्वामिश्री: के सचिव मयंक शेखर मिश्रा, प्रवक्ता प्रशांत त्रिपाठी ने अपनी अपनी बातें रखी जिसे उपस्थित श्रद्धालुओं ने करतल ध्वनि से उनके कहे बातों को स्वीकारा। पूज्य शंकराचार्य महाराज ने अपने आशीर्वचन में कहा कि मन ही मनुष्य के मोक्ष का कारण है। जब मन विषयों में, रोगों में आसक्त हो जाता है तो वह बन्ध जाता है। जब सभी से छुटकारा मिल जाये तो मोक्ष की प्राप्ति होगी, इसलिए मन को अच्छा भी और बुरा भी माना गया है। महात्मा के मन को जो वस्तु अच्छा लगता है वह भटकाता है और उसे वह महात्मा शीघ्र त्याग कर देता है। महात्मा अपने मन को समझाते हैं कि रहने के लिए यदि मकान न मिले तो पेड़ की छांव में रह लो, खाने के लिए भिक्षा कर लो, प्यास लगे तो नदी का पानी पी लो और शीत से बचने के लिए कुछ नहीं हो तो जो लोग कपड़े फेंक देते हैं उसे उपयोग कर शीत से अपने को बचा लो। श्रीराधा और मुरलीधर का भजन कर अनेकों प्रकार के कष्ट भोगकर महात्मा लोग वृंदावन में रहते हैं। एक दूसरे कवि ने कहा कि मन को वश में करके रखिये। वही मन यदि वश में हो जाये तो स्वाभाविक है कि परम् ब्रह्म की प्राप्ति हो जाएगी। मन को वश में करने के लिए साधना कि जरूरत है। मन रूपी मुलजिम के लिए अभ्यास और वैराग्य नामक दो पुलिस लगाए जाते हैं। इसलिए एक ओर मन है तो दूसरी ओर भगवान।