विशेष

बालश्रम में खोता बचपन

अभी तो आंखें खोली ही थी मैने अभी तो लोगों ने मेरे आने की खुशियां ही मानीई थी पर ये खुशी ज्यादा देर की नही थी ।देखते ही देखते दिन बीतते गए कब मैं हुन हां करते करते शब्दो को जोड़ना सिख गया पता ही नही चला उम्र की बाली सी उम्र में कदम रखा ही था कि गाड़ियों की शोर चारों ओर सुनाई देने लगी थी मैं मां की आँचल में महफूज़ तो था पर मां मुझे लोगों को दिखा दिखा कर सड़क पर लोगों से पैसे मांग रही थी कुछ दिन ऐसा ही चलता रहा अब मैं 8 साल का हो चुका था अब मां की जगह मैं लोगों से पैसे मांग रहा था। एक दिन रोज की तरह मैं सड़क पर सिंग्नल होने पर लोगों की गाड़ियों में बैठे लोगों से पैसे मांग रहा था तभी एक गाड़ी का मिरर थोड़ा नीचे हुआ और वहां से एक मैडम ने आवाज लगाई और कहां क्या तुम रोज यही काम करते हो मैं डर के भाग आया। दूसरे दिन वो मैडम फिर वहां आई पर आज वो अकेली नही थी उनके साथ कुछ और लोग भी थे वो सब बच्चों को यहीं पूछ रहे थे कि क्या वो रोज यही काम करते है कुछ बच्चों ने जवाब दिया हां कुछ डर के मारे कुछ बोल ही नही रहे थे उनमें से एक मैं भी था। तीसरे दिन वापस वही लोग आये और कहां की अब से आप लोग स्कूल जायेंगें हम ये शब्द पहली बार सुन रहे थे हम इसका अर्थ भी नही पता था क्यों जब से आंख खुली थी तब से मैंने ये सड़क और यहां का शोर शराबा ही सुना था यहीं हमारी दुनिया थी पर अब.... हम स्कूल जाने लगे थे अब हाथ गाड़ियों के दरवाजे की तरफ नही बढ़ते थे बल्कि अब हाथों में किताबे थी अक्षरों का ज्ञान हो रहा था।जीवन बदल रहा था किस्मत का सूरज अब उदय हो रहा था जिसकी चमक से आज मैं अच्छे अस्पताल का डॉक्टर बन गया था । आज मेरे साथ साथ उन सभी बच्चों की जिंदगी बदल गई जो वहां मेरे साथ सिग्नल पर गाड़ियां साफ कर लोगों से पैसे मांगा करते थे।आज वो दिन हम कभी नही भूल सकते जब वो खिड़की के शीशा खुला और वहां से आई आवाज और वो मैडम हमारे लिए एक फरिश्ते से कम न थी। आज हम उन्ही के रास्तों पर चलकर हम जैसे गरीब बच्चों की मदत कर रहे है ताकि उनके जीवन मे भी उज्जवल भविष्य का सूरज चमके और वो भी अच्छी जिंदगी जी सके। बहुत से बच्चे हैं जो इस गरीबी के कारण गलत दुनिया मे चले जाते है जिन्हें अच्छा बुरा पता ही नही होता ।बस पेट की भूख का पता होता है जिसे भुझाने के लिए वो कुछ भी करने को तैयार होता है।कहते है बच्चे देश का भविष्य होते हैं। तो उसकी अच्छी परवरिश करना भी हमारी ही जिम्मेदारी है चाहे वो हमारे बच्चे हो या किसी और के बस हमे उन्हें हमारा बच्चा ही समझे हम और उसकी मदत करें। तभी कुछ हद तक बाल मजदूरी कम हो सकेगी।ऐसे बच्चों के उज्वल भविष्य की कामना करती मैं...... वर्षा गलपाण्डे

खबरीलाल रिपोर्ट (वृंदावन) ::- शंकराचार्य कोई लाभ का पद नहीं है, वे आज भी भिक्षा करके भोजन करते हैं ::- शंकराचार्य स्वरूपानन्द सरस्वती ।।

ज्योतिष एवं द्वारका शारदा पीठ के पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती ने उपस्थित संत, महात्मा एवं श्रद्धालुओं से कहा कि जब जब धर्म की ग्लानि होती है तब तब भगवान अवतरित होते हैं। यह याद रखिये की पाखण्ड मन मनुष्य को धर्म के मार्ग से विमुख कर देता है। आज कल एक से एक लोग खड़े हो रहे हैं, कोई महिला है जो अपने आप को नेपाल का शंकराचार्य घोषित कर दिया है साथ ही एक संस्था ऐसी है जो नए नए शंकराचार्य बनाती है और उनके अनुसार वे शंकराचार्य बोले। सोच यह है कि क्यों महिलाओं को वंचित किया जाए, उन्हें भी शंकराचार्य बना दिया जाए जैसे विधायक, सांसद बनाये जाते हैं। यह स्पष्ट हो सभी को की शंकराचार्य का पद कोई लाभ का पद नही है। प्रत्येक को यह जानना जरूरी है कि शंकराचार्य का कोई वेतन नहीं होता है। वह भिक्षा मांग कर ही भोजन करता है, तपस्या करता है, साधना करता है, सन्यास धर्म का पालन करता है, धर्म के प्रचार के लिए भ्रमण करता है, धर्म की रक्षा हेतु आवाज उठाता है और लोगों को धर्म मार्ग पर चलने के लिए कहता है और प्रेरित करता है।  उस महिला को इसलिए शंकराचार्य बनाया जा रहा है क्यों कि उसे राधास्वामी और ब्रह्मकुमारी का समर्थन प्राप्त है। एक अखिल भारतीय विद्वत परिषद है जिसे आरएसएस और भाजपा के लोगों ने बना के रखा है जो शंकराचार्य बनाते हैं। ये ब्रह्मकुमारी और राधास्वामी सनातन धर्म का नाश करने के लिए बने हैं। आगे स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने कहा कि शंकराचार्य वो होता है जिसमे धर्म के विपरीत कार्य करने वालों के खिलाफ बोलने और आवाज उठाने की ताकत हो और जो धर्म की रक्षा करने में सक्षम हो।

खबरीलाल रिपोर्ट (वृंदावन) ::-  जो धर्म करेगा उसे मोक्ष की प्राप्ति होगी :- शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ।।

द्विपीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी महाराज ने श्री शंकराचार्य निवास, वृंदावन में चल रहे उनके 68 तम चातुर्मास्य व्रत अनुष्ठान के सायंकालीन सत्संग में कहा कि मनुष्य के जीवन मे 4-पुरुषार्थ होते हैं - अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष। इस पर यदि विचार करें तो धर्म ही श्रेष्ठ पुरुषार्थ है।  धर्म से ही अर्थ और काम प्राप्त होते हैं। जो धर्म न करे और अधर्मी हो वह भोग नहीं कर सकता भले उसके पास कितना भी अर्थ क्यों न हो। जो व्यक्ति धर्म की रक्षा करता है, धर्म के लिए आवाज उठाता है, गौ माता की सेवा करता है, अहंकार नहीं करता है , लोगों की मदद करता है इत्यादि उसे अर्थ के साथ साथ मोक्ष की भी प्राप्ति होती है। रोगी आदमी क्या भोग करेगा ? आज के समय मे 100 में से 75 प्रतिशत लोग शुगर की बीमारी से ग्रसित हैं। उनके पास अर्थ है पर वे भोग नहीं कर पा रहे हैं, जो भोजन उन्हें पसंद होगा उससे उन्हें परहेज करना होगा नहीं तो शुगर बढ़ जाएगा। कहते हैं कि पूर्व जन्म में यदि पुण्य किये होंगे तो भोजन मिलेगा और उसे पाचन की शक्ति मिलेगी। जो पुण्य नहीं किये होंगे उनके पास अर्थ जरूर होंगे पर भोजन करने और पचाने की शक्ति नहीं होगी। इसलिए व्यक्ति को धर्म के कार्य मे लीन होना चाहिए और अधर्म के कार्यों से बचना चाहिए। जो व्यक्ति धर्म करेगा उसे परलोक में भी सहायता मिलेगी।

खबरीलाल रिपोर्ट (वृंदावन) ::-  स्वामिश्री: ने स्वयं रुद्राभिषेक सम्पन्न किये।।

सावन माह के चौथे सोमवार को ज्योतिष एवं द्वारका शारदा पीठ के पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी महाराज के शिष्य प्रतिनिधि दंडी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज ने श्री शंकराचार्य निवास, उड़िया बाबा आश्रम, वृंदावन में स्थापित भगवान चंद्रमौलेश्वर महादेव जी का आज पूरे विधि विधान के साथ रुद्राभिषेक सम्पन्न किये तथा महारती पश्चात पुष्पांजलि अर्पित किए। स्वामिश्री: ने अभिषेक पश्चात खुद भगवान चंद्रमौलेश्वर महादेव जी का श्रृंगार कर आरती किये और पुष्पांजलि प्रभु के चरणों मे अर्पित किये। इस विशेष दिन में अनेक श्रद्धालुगण उपस्थित थे और प्रत्येक को स्वामिश्री: ने खुद अपने हातों से चरणामृत दिए और प्रसाद वितरित किये।

खबरीलाल रिपोर्ट (वृंदावन) ::- विचार, भोजन और मित्र सात्विक होना चाहिए :: शंकराचार्य स्वरूपानन्द सरस्वती।।

अष्टमी तिथि होने के कारण अनाध्याय था जिस हेतु पूज्य शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी महाराज से मिलने श्री शंकराचार्य निवास, वृंदावन में भक्तों का तांता लगा हुआ था। महाराजश्री से मिलने आये भक्तों से उन्होंने कहा कि किसी भूखे को खाना खिलाना, किसी प्यासे को पानी पिलाना यह ऐसे कर्म हैं जिससे मन खुद ब खुद प्रसन्न हो जाता है। मन खुद ही कहता है कि आज हमने एक अच्छा कार्य किया। इसी चंचल रूपी मन को ही वश में करना है क्यों कि वह इधर उधर खूब भागता है।  महाराजश्री ने आगे अपने प्रवचन में उपस्थित भक्तों के उद्देश्य में कहा कि सात्विक सुख प्राप्त करना बहुत जरूरी है, तभी पाप कार्य बन्ध होंगे, क्यों कि जब तक व्यक्ति का मन सात्विक रहेगा उसका मन कहीं और नही भटकेगा। मन, शरीर तभी सात्विक होंगे जब व्यक्ति सात्विक भोजन ग्रहण करेगा, उनके मित्र भी सात्विक होंगे और साथ ही सत्संग भी करेगा। गलत लोग गलत रास्ते पर ले जाते हैं इसलिए जो मित्र व्यक्ति को गलत रास्ते पर चलने के लिए कहे यह प्रोत्साहित करे वह मित्र नहीं अपितु आपका परम् शत्रु है। मित्र वही होता है जो सच्चाई के मार्ग पर चलने की सलाह दे , इसलिए कहते हैं कि सच्चा साथी चुनने के लिए विवेक होना जरूरी है।

खबरीलाल रिपोर्ट (वाराणसी) ::-  एक ओर मन है तो दूसरी ओर भगवान :: शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ।।

द्विपीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज ने आज 18 अगस्त 2018 को श्री शंकराचार्य निवास, वृंदावन में उपस्थित श्रद्धालुओं को आशीर्वचन देते हुए कहा कि एक ओर मन है तो दूसरी ओर भगवान। ज्ञात हो कि महाराजश्री जी का 68 वां चातुर्मास्य व्रत अनुष्ठान वृंदावन धाम में आयोजित है जिसमे उनके शिष्य प्रतिनिधि द्वय दंडी स्वामी सदानन्द सरस्वती जी महाराज व स्वामिश्री: अविमुक्तेश्वरानन्द: सरस्वती जी महाराज के साथ साथ दंडी स्वामी अमृतानन्द सरस्वती जी महाराज, दंडी स्वामी सदाशिवेंद्र सरस्वती, ब्रह्मचारी सुबुद्धानन्द जी महाराज, ब्रह्मचारी ब्रह्म विद्यानंद जी महाराज, ब्रह्मचारी कैवल्यानन्द जी महाराज, ब्रह्मचारी रामेश्वरानन्द जी महाराज , ब्रह्मचारी धरानन्द जी महाराज एवं आदि संत ,महात्मा सम्मिलित हुए हैं और चातुर्मास्य व्रत के पालन के साथ साथ स्वाध्याय हो रहे हैं एवं रोजाना सायंकालीन प्रवचन भी हो रही है। आज के प्रवचन में सर्वप्रथम ज्योतिष पीठ के व्यास जी ने कीर्तन के साथ साथ राम कथा सुनाई तत्पश्चात स्वामिश्री: के सचिव मयंक शेखर मिश्रा, प्रवक्ता प्रशांत त्रिपाठी ने अपनी अपनी बातें रखी जिसे उपस्थित श्रद्धालुओं ने करतल ध्वनि से उनके कहे बातों को स्वीकारा। पूज्य शंकराचार्य महाराज ने अपने आशीर्वचन में कहा कि मन ही मनुष्य के मोक्ष का कारण है। जब मन विषयों में, रोगों में आसक्त हो जाता है तो वह बन्ध जाता है। जब सभी से छुटकारा मिल जाये तो मोक्ष की प्राप्ति होगी, इसलिए मन को अच्छा भी और बुरा भी माना गया है। महात्मा के मन को जो वस्तु अच्छा लगता है वह भटकाता है और उसे वह महात्मा शीघ्र त्याग कर देता है। महात्मा अपने मन को समझाते हैं कि रहने के लिए यदि मकान न मिले तो पेड़ की छांव में रह लो, खाने के लिए भिक्षा कर लो, प्यास लगे तो नदी का पानी पी लो और शीत से बचने के लिए कुछ नहीं हो तो जो लोग कपड़े फेंक देते हैं उसे उपयोग कर शीत से अपने को बचा लो। श्रीराधा और मुरलीधर का भजन कर अनेकों प्रकार के कष्ट भोगकर महात्मा लोग वृंदावन में रहते हैं। एक दूसरे कवि ने कहा कि मन को वश में करके रखिये। वही मन यदि वश में हो जाये तो स्वाभाविक है कि परम् ब्रह्म की प्राप्ति हो जाएगी। मन को वश में करने के लिए साधना कि जरूरत है। मन रूपी मुलजिम के लिए अभ्यास और वैराग्य नामक दो पुलिस लगाए जाते हैं। इसलिए एक ओर मन है तो दूसरी ओर भगवान।

खबरीलाल रिपोर्ट (वृंदावन) ::- बिना गुरु के भगवान का दर्शन नहीं हो सकता है :: स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ।।

गोस्वामी तुलसीदास जी के जयंती के उपलक्ष्य पर श्री शंकराचार्य निवास, वृंदावन में आयोजित सत्संग सभा मे धर्म सम्राट अनंत श्री विभूषित ज्योतिष एवं द्वारका शारदा पीठ के पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी सरस्वती ने कहा कि बिना गुरु के भगवान का दर्शन कभी नहीं हो सकता है। शंकराचार्य जी महाराज ने गोस्वामी तुलसीदास के जीवन और कथा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि तुलसीदास जी कहते थे कि गुरु परंपरा से जो ज्ञान आता है उससे ही आदर मिलता है तथा यह भी कहा कि जो पंथ आते हैं उनके पीछे मत पड़ो क्यों कि वे पगदंडी हैं। जो हमारी गुरु परम्परा है उसी में हमे चलना चाहिए। आज के इस विशेष दिन में पूज्य शंकराचार्य जी महाराज के शिष्य प्रतिनिधि दंडी स्वामी अविमुक्तेश्वरानन्द सरस्वती, ब्रह्मचारी कैवल्यानन्द जी महाराज, ब्रह्मचारी रामेश्वरानन्द जी महाराज, साध्वी लक्ष्मी मणी शास्त्री, नील मणी शास्त्री, स्वामी त्रिभुवन दास एवं अन्य संत, महात्मा व श्रद्धालुगण उपस्थित होकर पूज्य शंकराचार्य महाराज के श्रीमुख से गोस्वामी तुलसीदास जी के बारे में कथा का रस पान किये। इस शुभ अवसर पर पूज्य महाराजश्री का पादुका पूजन बनारस और इटली से पधारे उनके भक्त ने किया तथा मंत्रोच्चारण ब्रह्मचारी ब्रह्मविद्यानन्द जी महाराज ने किया। आगे पूज्य महाराजश्री ने बताया कि गोस्वामी तुलसीदास जी के गुरु नरहरिदास थे और तुलसीदास जी कहते थे की गुरु के चरण के हम धुली हैं। भगवान शंकर चिता की भस्म को अपने शरीर मे लपेटते थे जिससे वह भस्म पवित्र हो जाता था। उसी तरह गुरु के चरण की रज को जो धारण करता है उसे सब चीज की प्राप्ति होती है। इसलिए बिना गुरु के भगवान का दर्शन नहीं हो सकता है।

खबरीलाल रिपोर्ट (वृंदावन) :- धर्म भी एक पुरुषार्थ है जो परलोक में भी सुख प्रदान करता है :: शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वति ।।

वृंदावन में स्थित श्री शंकराचार्य निवास, उड़िया बाबा आश्रम में आज सत्संग में धर्म सम्राट अनंत श्री विभूषित ज्योतिष एवं द्वारका शारदा पीठ के पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज ने अपने आशीर्वचन में कहा कि अपने शास्त्रों में 4 पुरुषार्थ बताए गए हैं - अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष। देखा गया कि धन (अर्थ) के लिए लोग काम करते हैं और उसे पुरुषार्थ मानते हैं और वही धन के लिए देश भी छोड़ देते हैं और दूसरे का दास बनकर धन उपार्जन करते हैं। धन यानी रुपया पैसा, सोना, चांदी, हीरा व आदि। क्या इनसे मनुष्य का पेट भरता है ? लेकिन लोग सोचते हैं कि धन रहेगा तो सुख के सारे उपकरण हमारे पास होंगे, नई सवारी खरीदेंगे, घर बनाएंगे व इत्यादि। आगे पूज्य शंकराचार्य जी महाराज ने बताया मान लीजिए आप कहीं गए हैं और उस जगह आपका धन चोरी हो जाये। आप तब घर मे या रिश्तेदारों को फ़ोन कर पैसे मंगवाओगे लेकिन परलोक में कहाँ से लाओगे ? जो धर्म आपने किया है वही परलोक में आपके साथ जाएंगे। धन, सोना, चांदी, हीरा मोती इत्यादि सब धरती पर रह जाएंगे, स्त्री भी घर के चौखट तक साथ देगी, सब लौट कर आ जाएंगे , जो आपके साथ जाएगा वह आपका धर्म जाएगा। मनुष्य का सच्चा मित्र धर्म है जो मरने के बाद भी साथ जाता है। सब मित्र छूट जाएंगे लेकिन धर्म रूपी मित्र केवल आपके साथ जाएगा। इसलिए धर्म भी एक पुरुषार्थ है जो परलोक में भी हमे सुख प्रदान करता है। सत कर्म से सुख की प्राप्ति होगी और दुष्कर्म से दुःख की प्राप्ति होगी। भगवान की प्राप्ति ही मोक्ष है। इसलिए मोक्ष को चुने और धर्म करें पर कामना का त्याग कर करें।

खबरीलाल रिपोर्ट (वृंदावन) :- शास्त्र अनुमोदित कार्य सभी को करना चाहिए :: शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती ।।

धर्म सम्राट अनंत श्री विभूषित ज्योतिष एवं द्वारका शारदा पीठ के पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी महाराज ने कहा कि यदि व्यक्ति शास्त्र अनुमोदित कार्य करे तो ही भारत की अस्मिता सुरक्षित रह पाएगी। शंकराचार्य जी महाराज ने आगे कहा कि भारत को यदि सच्चे अर्थ में भारत बनाना है तो आज के नौजवानों को अपनी संस्कृति, सभ्यता और शास्त्र को समझने की जरूरत है और उन्हें सही दिशा में चलने हेतु भारत के शास्त्र, संस्कृति का अध्यन करने की आवश्यकता है। भारतीय संस्कृति को आगे बढ़ाकर ही भारत की रक्षा की जा सकती है। काशी में मन्दिर तोड़े जाने को लेकर शंकराचार्य जी महाराज ने कहा कि काशी में मन्दिर तोड़े और वहां ऐसी घटना घटी जिससे कई लोगों की मौत हो गई। शासन को चाहिए कि वे धर्म की रक्षा करे क्यों कि धर्म की रक्षा के लिए ही शासन होता है। जहाँ लोग अनर्थ करते हैं वह जगह डूब जाता है। इसलिए अनर्थ करने से बचें और धर्म की रक्षा के साथ साथ मठ, मंदिरों और देव विग्रहों को अनार्थियों के हाथ से बचाये।

खबरीलाल रिपोर्ट ::- शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती ने स्वातंत्र्य बलिवेदी में अपना बलिदान देने वाले सेनानियों की दी श्रद्धांजलि।।

धर्मसम्राट पूज्य शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी महाराज ने आज देश के 72 वें स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य पर कहा कि अंग्रेजी तारीख 15 अगस्त के अनुसार भारत का स्वतंत्रता दिवस है। यह स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के बलिदान के पुण्यस्मरण का दिन है। 1857 से प्रारम्भ स्वतंत्रता संग्राम 1947 तक चला। इन 90 वर्षों में हजारों देशभक्तों ने अपना बलिदान किया इस इतिहास का पूरा ज्ञान किसी भी व्यक्ति के लिए असंभव है। हजारों लाखों युवाओं ने अपने जीवन, घर परिवार के प्रेम को भुलाकर देश के लिए निःस्वार्थ भाव से सर्वस्व बलिदान किया, वे हमारे लिए ऋषि, मुनि से कम नहीं। सन 1942 के अंग्रेजों भारत छोड़ो का अभियान बहुत विचार विमर्श के बाद चरणबद्ध तरीके से प्रारंभ किया गया था जो कि साफल अभियान था, इसी आंदोलन की पूर्णता के फलस्वरूप स्वतंत्रता प्राप्त हुई। इस आंदोलन में हमने भी भाग लिया और दो बार प्रथम वाराणसी में एवं बाद में मध्यप्रदेश के नरसिंहपुर जिले में हमे दो मास का सश्रम कारावास दिया गया था। भारत किसी समय मे पूरे विश्व का शासक था किंतु कालक्रम से राजनैतिक परतंत्रता धीरे धीरे बढ़ती गई और पूरा भारत इसकी चपेट में आ गया। पूरे विश्व को स्वतंत्रता की शिक्षा देने वाला भारत परतंत्र था किंतु जिस तरह अमानुषिक अत्याचारों को सहकर भी हमने पुनः स्वतंत्रता प्राप्त की तो विश्व ने भी हमारी स्वतंत्रता के महत्त्व को समझा। आज के नेताओं में देश प्रेम की वह बात नहीं दिखती यह चिंता का विषय है। साम्प्रदायिक रूप से, जातिगत रूप से अगड़ा, पिछड़ा, दलित; स्त्री-पुरुष सभी तरह से वर्गवाद बनाकर वोटों के लिए देश की एकता तोड़ने का जो कार्य हो रहा है वह अत्यंत ही घातक है। आज स्वतंत्रता दिवस के दिन बलिदान देने वाले सेनानियों को अपनी विनम्र श्रद्धांजलि देते हुए राष्ट्र को नमन करते हैं।

खबरीलाल रिपोर्ट ::-  बिना मदद के आगे बढ़ना है :: स्वामीश्री: अविमुक्तेश्वरानंद: ।।

गुरुकुल की परंपरा यदि देखना है तो श्रीविद्या मठ, केदारघाट , वाराणसी आकर देखना होगा क्यों कि यहां जो गुरुकुल " जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी न्याय वेदांत महाविद्यालय " संचालित हो रहे हैं वो जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी महाराज के शिष्य प्रतिनिधि दंडी स्वामीश्री: अविमुक्तेश्वरानंद: सरस्वती जी महाराज द्वारा संचालित किया जा रहा है जिसमे 4 वेदों के 11 शाखाओं में वैदिक छात्र अध्यनरत हैं। इस वर्ष गुरु पूर्णिमा के दिन नए विद्यार्थियों की प्रवेशिका हुई जिसमें 100 विद्यार्थियों को प्रवेश दिया गया और उन्हें शिक्षकों के अलावा स्वामिश्री: खुद बच्चों को पढ़ाते हैं और संस्कार सिखाते हैं। इसी कड़ी में स्वामिश्री: ने नए प्रवेश लिए विद्यार्थियों से कहा की - विद्यार्थियों को कक्षा में अन्य विद्यार्थियों के मदद के बिना ही आगे बढ़ना है। कक्षा में कोई सहयोग और मदद पढ़ाई लिखाई के मामले में नहीं लेनी चाहिए। हमारा जो मस्तिष्क है वह प्रत्येक बातों को रिकॉर्ड कर लेता है लेकिन उसके लिए ध्यान / मनोयोग की जरूरत होती है। स्मृति में सब रहता है बस उसे ढूंढना है और यह तभी संभव होगा जब विद्यार्थी पूरा ध्यान लगाकर अपने गुरु की बातों को सुनेगा और पढ़ाई करेगा। आगे स्वामिश्री: ने विद्यार्थियों से कहा कि आप सभी के मन मे जिज्ञासा होनी चाहिए। उदाहरण स्वरूप उन्होंने बताया कि जब भूख लगती है और खाना माँ से मांगते हो ठीक उसी प्रकार जिज्ञासा की भूख आपके अंतर्मन से उठकर आना चाहिए तब आपको आपके जिज्ञासा का सदुत्तर आपके गुरु से मिलेगा और आप तृप्त महसूस करोगे। स्वामिश्री: ने कहा सवाल पूछते रहो, यह मत सोचो कि सवाल कितने गहरे हैं । इससे आपकी खुद की प्रतिभा में निखार आएगा और आप सफल होंगे। गुरु से जितना चाहो सवाल पूछो और ज्ञान अर्जित करो। यह मत सोचो कि - "मैं यह सेवाल करूँ की नहीं " । 

खबरीलाल रिपोर्ट (वृंदावन) ::-  प्रत्येक प्राणी एक दूसरे की कल्याण की बात करे :- स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ।।

68 वें चातुर्मास्य व्रत अनुष्ठान में आयोजित सायंकालीन सत्संग में ज्योतिष एवं द्वारका शारदा पीठ के पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती ने धर्म सम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज को याद करते हुए कहे कि धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो, विश्व का कल्याण हो आदि नारे उन्ही की देन है। इन नारों / जय घोष के मतलब को समझना होगा कि क्यों यह जय घोष स्वामी करपात्री जी महाराज ने दिया। स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी महाराज ने कहा कि अन्य धर्मों के शुरू होने की तारीख है लेकिन सनातन धर्म अनादि काल से चली आ रही है जिसकी कोई तारिख ही नहीं है। उन्होंने कहा कौन सा ऐसा सनातन धर्म है जिसका पिता सनातनी न हो। लोग आज धर्म से भटक रहे हैं। विभिन्न प्रकार के पंथ, सनातन धर्मियों को मार्ग से भटका रहे हैं। सनातन धर्मी के लोग उदार हैं कर के ही वे यह कर पा रहे हैं। जब जब धर्म की ग्लानि होती है तब तब अधर्म बढ़ जाता है। आगे पूज्य महाराजश्री ने कहा कि भगवान जब सोचेंगे तो सही सोचेंगे। वे कभी गलत नहीं सोचेंगे। भगवान जब अवतरित होते हैं तब हम कहते हैं कि धर्म की जय हो , पर हम यह नहीं कहते हैं कि अधर्मियों का नाश हो। यह सोचना होगा और विचार योग्य कथनी है। हम यह कहते हैं कि अधर्मी व्यक्ति भी धर्म के मार्ग पर चलकर धर्म की जयकारा करे। इसके पश्चात महाराजश्री ने कहा कि " विश्व का कल्याण हो ", मतलब की प्रत्येक प्राणी एक दूसरे के कल्याण की बात करे। हम यह नहीं कहते कि हिंदुओं का भला हो और मुसलमान का नाश हो। इन जय कारों में गहरा मतलब छुपा हुआ है जिसे प्रत्येक प्राणी को समझना होगा, जानना होगा तभी विश्व का कल्याण संभव है। गुरु रूपी भगवान शंकर हमे अज्ञान रूपी अंधकार से उठाकर ज्ञान रूपी प्रकाश में लाते हैं। सत्संग के इस शुभअवसर पर दंडी स्वामी अविमुक्तेश्वरानन्द सरस्वती, दंडी स्वामी सदाशिवेंद्र सरस्वती जी, ब्रह्मचारी ब्रह्मविद्यानन्द जी महाराज, ब्रह्मचारी कैवल्यानन्द जी महाराज, ब्रह्मचारी रामेश्वरानन्द जी महाराज एवं आदि संत, महात्मा तथा शिष्य व भक्तगण उपस्थित थे।

खबरीलाल रिपोर्ट ::- शंकराचार्य आश्रम में मनाया जाएगा धर्म सम्राट करपात्री जी महाराज का प्राकट्य उत्सव।

रायपुर के बोरियाकला स्थित जगद्गुरु शंकराचार्य आश्रम में 13 अगस्त को धर्म सम्राट करपात्री जी महाराज की जयंती बड़े धूम धाम से मनाई जाएगी साथ ही जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती महाराज के शिष्य प्रतिनिधि दंडी स्वामी अविमुक्तेश्वरानन्द सरस्वती जी महाराज का भी जन्म उत्सव मनाया जाएगा। आश्रम प्रमुख ब्रह्मचारी डॉ इंदुभवानन्द ने बताया कि श्रवण शुक्ला द्वितीया में धर्म सम्राट करपात्री जी का आविर्भाव हुआ था। वे श्रीविद्या के परम आचार्य के रूप में आज भी माने व जाने जाते हैं। उनकी जयंती के उपलक्ष्य पर शंकराचार्य आश्रम रायपुर में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित है जिसमे गणपति पाठ, चंडी पाठ, ललिता सहस्त्रनाम का अर्चन एवं सायंकाल भगवान सिद्धेश्वर का रुद्राभिषेक किया जाएगा। शंकराचार्य आश्रम के समन्वयक व प्रवक्ता पं सुदीप्तो चटर्जी ने विज्ञप्ति जारी कर यह जानकारी दिए और सभी भक्तों को आश्रम में उपस्थित रहने हेतु आग्रह किये साथ ही उन्होंने बताया कि वृंदावन धाम में स्वामिश्री: अविमुक्तेश्वरानन्द: सरस्वती का चातुर्मास्य व्रत चल रहा है जिस हेतु वृंदावन के जयपुर मंदिर में स्वामिश्री: का जन्म उत्सव मनाया जाएगा तथा यह बहुत ही बड़ा संयोग की बात है कि इस मौके पर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती एवं द्वारका पीठ के मंत्री दंडी स्वामी सदानंद सरस्वती भी वृंदावन धाम में उपस्थित हैं जिस हेतु धर्म सम्राट करपात्री जी महाराज का प्राकट्य उत्सव भी एक ही साथ बड़े भक्तिमय माहौल में मनाया जाएगा।

पत्रकार खबरीलाल की विशेष टिप्पणी :: क्या उत्तरप्रदेश में पुल गिरना दैवीय प्रकोप है ?

आज दिनांक 11 अगस्त 2018 को उत्तरप्रदेश के लखनऊ और गोरखपुर के बीच बन रहे निर्माणाधीन पुल अचानक गिर गया जिसमें बड़े तादाद में लोगों के दबे होने की बात सामने आ रही है। कुछ माह पहले बनारस (काशी) में भी निर्माणाधीन पुल गिरा जिसमे कई लोगों की असमय मृत्यु हुई। अब प्रश्न यहां यह उठ रहा है कि कहीं यह दैवीय प्रकोप तो नहीं, क्यों कि विश्व की प्राचीन धर्म नगरी तथा बाबा भोलेनाथ की नगरी बनारस (काशी) जो पीएम मोदी का संसदीय क्षेत्र है तथा महंत योगी राज्य के संवेदनशील मुख्यमंत्री हैं वहां विकास के नाम पर प्रशासन द्वारा कई प्राचीन मंदिरों को ध्वस्त किया गया है तथा देव मूर्तियाँ खंडित अवस्था मे मिली जिसकी जानकारी जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती के शिष्य प्रतिनिधि दंडी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने प्रेस कांफ्रेंस कर मीडिया को बताया था जिसे प्रमुखता के साथ कई समाचार पत्रों में प्रकाशित भी हुआ और चैनलों में भी प्रसारित हुए। ज्ञात हो ही विगत कई महीनों से अकेले दंडी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती , दंडी हाथ मे लिए एक विशुद्ध धर्म योद्धा की तरह मन्दिरों को बचाने हेतु बर्लिन वाल के रूप में अपने कुछ अनुयायियों के साथ खड़े हुए हैं और मंदिर बचाओ आन्दोलनम का नेतृत्त्व कर रहे है। पुराणों में वर्णित 56 विनायकों में से दो विनायक मन्दिरों के साथ साथ व्यास जी के राधा कृष्ण मंदिर, भारत माता मंदिर (महा लक्ष्मी मन्दिर) तोड़ दिए गए जिसके कारण देव मूर्तियाँ जो सदियों से पूजी जा रही थी वह खंडित हो गई और सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार कुछ मूर्तियाँ मलबे में भी तब्दील कर दी गई या गायब कर दी गई है। स्वामिश्री: का कहना है कि मन्दिरों को क्यों तोड़े जा रहे हैं जो सनातन धर्म के पूजन का स्थल है, आस्था का केंद्र है, एकता का प्रतीक है और सर्वोपरि हमारे देवता वहां वास करते हैं। स्वामिश्री: ने नंगे और रक्तरंजित पांव से चलकर काशी के सभी देवताओं से माफी मांगी, सर्वोदेव कोपहार महायज्ञ किया और इसके बावजूद जब शासन और प्रशासन के कानों में जूं नहीं रेंगी तब स्वामिश्री ने पराक व्रत (उपवास) किया। क्या देवतागण स्वामिश्री: के घोर तपस्या को देख नहीं रहे हैं ? क्या सनातन धर्मी के लोग नहीं देख रहे हैं। हो सकता है देवतागण स्वामिश्री: के इस घोर तपस्या को देख कर दुखी भी हैं और खुश इसलिए कि कोई तो एक घोर तपस्वी है जो हम देवताओं के मंदिरों और विग्रहों को बचाने के लिये उठ खड़ा हुआ है। लेकिन लगता है देवताओं को भी स्वामिश्री: के इस घोर तप को देखकर कष्ट हो रहा है जिस हेतु वे बीच बीच मे संकेत दे रहे हैं। अभी भी समय है यदि काशी में मन्दिर तोड़ना नहीं रोका गया और काशी को अपने पुराने स्वरूप में नहीं रख गया तो हो सकता है कहीं शिव जी के त्रिशूल में बसी नगरी से स्वयं भोले शंकर अपना त्रिशूल ही न हटा लें और पूरा काशी देव विहीन हो जाये। सबसे बड़ी बात जो काशी में अभी तक सामने आई कि काशी वासियों ने मौन क्यों धारण करके रखे हैं और अपने आंखों के सामने ये होते देख रहे हैं। जब कि प्रत्येक को जानकारी है कि स्वामिश्री: प्रत्येक के हितों के रक्षा के लिए धर्म युद्ध कर रहे हैं फिर भी काशी वासी चुप हैं। क्या काशी के लोग कौरव रूपी होकर अधर्म का साथ दे रहे हैं ? यह बहुत ही महत्त्वपूर्ण प्रश्न है ? पहले तो काशी वासियों और अन्य शहरों में जहां मन्दिर तोड़े जा रहे हैं वे कौरवों के मानसिकता के हैं या पांडवों के मानसिकता के हैं इसे सिद्ध करे ? सभी जानते हैं धर्म युद्ध मे भगवान श्रीकृष्ण ने धर्म का साथ दिया था और अंत मे धर्म की ही विजय हुई थी। " जागिये - जगाइए - मन्दिरों को बचाइए " वाला नारा खूब प्रचलित हो रहा है।

खबरीलाल रिपोर्ट (वृंदावन) ::-  जिसके पेट मे गौ माता का गोश्त वो कैसा मेरा दोस्त ।।

जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी सरस्वती के 68 वें चातुर्मास्य के अवसर पर वृंदावन धाम में स्थित श्रीउड़िया बाबा आश्रम में सत्संग के दौरान वडोदरा से पहुंचे किशोर महाराज जी ने अपने चिरपरिचित अंदाज में आज हिंदुत्त्व की अलख सभा मे जला दी जिसे उपस्थित सभी भक्तों ने करतल ध्वनि से स्वागत किया। अपने उद्बोधन में किशोर महाराज ने कहा जिसके पेट मे गाय का गोश्त हो वो कैसे मेरा दोस्त होगा। जो हमारे गौ माता की हत्या कर खाए वो हमारे भाई कैसे हो सकते हैं। जो गाय का भक्त है वो हिन्दू है और जो नहीं है वह हिन्दू कभी भी नहीं हो सकता है। आगे उन्होंने कहा कि आजकल देश और विश्व मे केवल हिन्दू-हिन्दू चल रहा है। जो लोग हिन्दू की व्याख्या नहीं जानते हैं वे आज हिन्दू संगठन चला रहे हैं। जन्म जन्मांतर तक जो धर्म कल्याण कर सके वो केवल सनातन धर्म है। ॐ कार के जो मानते हैं वे हिन्दू हैं। प्रत्येक श्लोक की शुरुवात ॐ से होती है। बौद्ध, सिख, आर्य समाजी भी ॐ कार को मानते हैं और उसे प्राधान्य देते हैं। वे पुनर्जन्म को भी मानते है। इसी कड़ी में गार्गी जी ने कहा जो पुनर्जन्म में विश्वास रखते हैं वे ही हिन्दू हैं। उन्होंने प्रश्न उठाया कि स्त्रियों व अन्य जातियों को जो अधिकार नही वे उसे करने की चेष्टा क्यों करते है। संदर्भ था वेद अध्यन का, जिसमे स्त्री और शूद्र जाती के लोग वेद शास्त्र नहीं पड़ सकते हैं, केवल ब्राह्मण पुरुष ही इसका अध्यन करने हेतु अधिकृत हैं जो कालांतर से चली आ रही है। हक नहीं है वेद पढ़ने का लेकिन भक्ति करने का हक तो है। भक्ति में जात पात नहीं देखी जाती है पर वेद अध्यन करने के लिए देखना जरूरी है। भगवद्गीता पढ़िए, राम चरित मानस पढ़िए, भागवत पढ़िए लेकिन जिसका अधिकार न हो उसे पड़ने के लिए चेष्टा क्यों करना। इसी कड़ी में ब्रह्मचारी ब्रह्मविद्यानन्द ने कहा लोग मन्दिरों को बचाने हेतु भी आगे नही आ रहे हैं। काशी में विकास के नाम पर मंदिर तोड़े गए , नागपुर में 1600 मन्दिर तोड़े जाने हैं, राजस्थान में भी मन्दिर तोड़े गए हैं फिर भी किसी हिन्दू ने , सनातन धर्मियों ने आवाज नहीं उठाई। सिर्फ एक धर्म योध्या स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती मंदिरों को बचाने हेतु हाथ मे दंड लिए उठ खड़े हुए और विशाल मंदिर बचाओ आन्दोलनम का रूप दिया। इसके बावजूद सनातन धर्मी आगे नहीं आ रहे हैं। धर्म शास्त्र कहता है जो मंदिर बनाता है उसके साथ आने वाली पीढ़ी तर जाती है। यदि मन्दिर ही नहीं रहेंगे तो हम सनातन धर्मी पूजार्चना करने कहाँ जाएंगे। कहाँ सरकार को मन्दिरों का रक्षण करना चाहिए उसे ही वे तथाकथित विकास के नाम पर तोड़ रहे हैं। क्या वे इस घोर पाप से बच पाएंगे ?  वर्तमान में भाजपा ने हिन्दू हितों को आगे कर सत्ता में आसीन हुए पर इनके शासन काल मे जो हो रहा है उससे हम सभी आश्चर्यचकित हैं। आगे ब्रह्मचारी ब्रह्मविद्यानन्द ने कहा कि काशी की धरती नित्य सत्तावान भूमि है जिसके कण कण में शंकर बसते हैं। उसी भूमि में सभी अपने अपने देवताओं को स्थापित कर पूजा आदि करते हैं। ब्रह्मचारी ब्रह्मविद्यानन्द ने मंच से स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के नेतृत्त्व में इस पुनीत कार्य हेतु समर्थन देने की घोषणा की। उनके घोषणा पश्चात किशोर महाराज, साध्वी लक्ष्मी मणी शास्त्री, दंडी स्वामी गोविंदानन्द सरस्वती, दंडी स्वामी शिवप्रियानन्द सरस्वती, विदुषी गार्गी जी व उपस्थित संत, महात्माओं और सनातन धर्मियों ने भी स्वामिश्री: के समर्थन में एक सुर में सुर मिलाए और कहे जब भी स्वामिश्री: हमे बुलाएंगे हम उनके साथ खड़े होकर एक और स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ेंगे। स्वामिश्री: ने सबकी बातों को सुनकर आभार प्रकट किया और कहा कि जनता भी आन्दोलनम में आना चाहती है और किसी ने भी अभी तक असहमति नहीं जताई है। यदि हम सच्चे मन से देवताओं की भक्ति करते हैं तो हमे आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता। अपनी चिंता छोड़ भगवान की चिंता करे वही भक्ति है और भगवान का जो भोग करे वही भक्त है।