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बिहार की शाही लीची पर लगा जीआई टैग
Posted Date : 18-October-2018

बिहार की शाही लीची पर लगा जीआई टैग

मुजफ्फरपुर - बिहार के मुजफ्फरपुर की पहचान शाही लीची को अब राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिल गई है। बौद्धिक संपदा कानून के तहत शाही लीची को अब जीआई टैग (जियोग्राफिकल आइडेंटिफि केशन) दे दिया गया है। बिहार लीची उत्पादक संघ ने जून 2016 को जीआई रजिस्ट्री कार्यालय में शाही लीची के जीआई टैग के लिए आवेदन किया था।

मुजफ्फरपुर राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र के निदेशक विशालनाथ ने गुरुवार को बताया कि जीआई टैग मिलने से शाही लीची की बिक्री में नकल या गड़बड़ी की आशंकाएं काफी कम हो जाएंगी। जीआई टैग मिलने से खुश विशालनाथ ने कहा कि मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर, वैशाली व पूर्वी चंपारण के किसान ही अब शाही लीची के उत्पादन का दावा कर सकेंगे। ग्राहक भी ठगे जाने से बच सकेंगे। बिहार लीची उत्पादक संघ के अध्यक्ष बच्चा प्रसाद सिंह ने बताया कि काफी परिश्रम के बाद बिहार की शाही लीची को जीआई टैग मिल गया है। उन्होंने बताया कि जीआई टैग देने वाले निकाय ने शाही लीची का सौ साल का इतिहास मांगा था। उन्होंने बताया कि कई साक्ष्य प्रस्तुत करने पर पांच अक्टूबर को शाही लीची पर जीआई टैग लग गया।
जियोग्राफिकल आइडेंटिफि केशन किसी उत्पाद को दिया जाने वाला एक विशेष टैग है। जीआई टैग उसी उत्पाद को दिया जाता है, जो किसी विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र में उत्पन्न होता है। लीची की प्रजातियों में ऐसे तो चायना, लौगिया, कसैलिया, कलकतिया सहित कई प्रजातियां है परंतु शाही लीची को श्रेष्ठ माना जाता है। यह काफी रसीली होती है। गोलाकार होने के साथ इसमें बीज छोटा होता है। स्वाद में काफी मीठी होती है। इसमें खास सुगंध होता है।
बिहार के मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर, वैशाली व पूर्वी चंपारण शाही लीची के प्रमुख उत्पादक क्षेत्र हैं। देश में कुल लीची उत्पादन का आधा से अधिक लीची का उत्पादन बिहार में होता है। आंकड़ों के मुताबिक बिहार में 32,000 हेक्टेयर में लीची की खेती की जाती है।

पूर्वी राज्यों में धान की पड़त भूमि में दलहन-तिलहन उत्पादन की रणनीति बनाने कार्यशाला का  आयोजित
Posted Date : 09-September-2018

पूर्वी राज्यों में धान की पड़त भूमि में दलहन-तिलहन उत्पादन की रणनीति बनाने कार्यशाला का आयोजित

देश के आठ राज्यों के प्रतिनिधि हुए शामिल
रायपुर, 09 सितम्बर 2018  मुख्य सचिव  अजय सिंह ने कहा है कि छत्तीसगढ़ में धान की फसल के बाद पड़ती भूमि पर रबी में दलहन और तिलहन फसलें उगाये जाने की असीम संभावनाएं हैं। विगत दो वर्षाें से इस पड़ती भूमि पर रबी में दलहन और तिलहन फसलें उगाये जाने के अच्छे परिणाम मिले हैं। इस योजना के तहत पिछले वर्ष राज्य के पांच जिलों के पांच सौ गांवों को लिया गया था जिसका विस्तार इस वर्ष नौ जिलों के नौ सौ गांवों में किया जा रहा है।  सिंह ने उम्मीद जताई कि इस योजना के आशानुकूल परिणाम प्राप्त होंगे और छत्तीसगढ़ दलहन और तिलहन उत्पादन के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनेगा।  सिह आज यहां भारत सरकार के कृषि, सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग तथा छत्तीसगढ़ शासन के कृषि एवं जैव प्रौद्योगिकी विभाग के संयुक्त तत्वावधान में ‘‘पूर्वी भारत में चावल की पड़त भूमि पर दलहन एवं तिलहन उत्पादन की रणनीति’’ विषय पर आयोजित एक दिवसीय कार्यशाला का शुभारंभ कर रहे थे। इस कार्यशाला में पूर्वी भारत के आठ राज्यों - असम, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, बिहार, झारखण्ड़, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के प्रतिनिधि शामिल हुए। शुभारंभ समारोह को  छत्तीसगढ़ के कृषि उत्पादन आयुक्त श्री सुनिल कुजूर, भारत सरकार के कृषि आयुक्त डॉ. एस.के. मल्होत्रा, भारत सरकार के संयुक्त सचिव कृषि श्री बी. राजेन्द्रन, छत्तीसगढ़ शासन के सचिव कृषि श्री अनूप कुमार श्रीवास्तव, इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. एस.के. पाटील तथा संचालक कृषि   एम.एस. केरकेट्टा ने भी संबोधित किया।  

उल्लेखनीय है कि भारत के पूर्वी राज्यों में लगभग 85 लाख हेक्टेयर भूमि ऐसी है जो खरीफ में धान की फसल लेने के बाद वर्ष के शेष समय में पड़ती पड़ी रहती है। इस भूमि का सदुपयोग करने के लिए राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत वर्ष 2016-17 से ‘‘टारगेटिंग राइस फैलो एरिया (टी.आर.एफ.ए)’’ उपयोजना प्रारंभ की गई जिसके तहत प्रथम वर्ष में छह राज्यों के 15 जिलों के 15 सौ गांवों में धान के बाद दलहन एवं तिलहन फसल लेने का कार्यक्रम शुरू किया गया। कार्यक्रम की सफलता से उत्साहित होकर वर्ष 2017-18 में यह योजना 35 जिलों के 35 सौ गांवों में संचालित की गई। इस वर्ष यह योजना पूर्वी भारत के आठ राज्यों के 50 जिलों के पांच हजार गांवों में क्रियान्वित की जा रही है। छत्तीसगढ़ में यह योजना गरियाबंद, रायगढ़, राजनांदगांव, कांकेर, कोण्डगांव, सरगुजा, बिलासपुर, बलोदाबाजार और बस्तर जिलों मंे क्रियान्वित की जा रहीं है। वर्ष 2020 तक इस योजना के तहत पूर्वी राज्यों में 25 लाख टन दलहन और सात लाख टन तिलहन के अतिरिक्त उत्पादन संभावित है

 चना उत्पादक किसानों को मिलेगी  118 करोड़ से ज्यादा की प्रोत्साहन राशि राज्य सरकार ने जारी किया आदेश
Posted Date : 01-September-2018

चना उत्पादक किसानों को मिलेगी 118 करोड़ से ज्यादा की प्रोत्साहन राशि राज्य सरकार ने जारी किया आदेश

 रायपुर,  राज्य सरकार द्वारा रबी वर्ष 2017-18 के चना उत्पादक किसानों को इस वित्तीय वर्ष 2018-19 में 1500 रूपए प्रति एकड़ की दर से 118 करोड़ 54 लाख रूपए की प्रोत्साहन राशि का वितरण किया जाएगा। कृषि एवं जैव प्रौद्योगिकी विभाग के अधिकारियों ने आज यहां बताया कि इस राशि का आवंटन यहां मंत्रालय (महानदी भवन) से कृषि संचालनालय को जारी किया जा चुका है। कृषि संचालनालय द्वारा जिला कलेक्टरों से प्राप्त मांग के अनुसार उन्हें यह आवंटन तत्काल उपलब्ध कराया जाएगा। 
    विभाग द्वारा जारी आदेश के अनुसार प्रोत्साहन राशि का भुगतान किसानों को सीधे उनके बैंक खातों में प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) प्रक्रिया के अनुसार संबंधित जिला कलेक्टरों के माध्यम से किया जाएगा। पारदर्शिता की दृष्टि से वितरण सूची अंतरित राशि सहित ग्राम पंचायतों के सूचना पटल पर चस्पा की जाएगी। उल्लेखनीय है कि मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की अध्यक्षता में इस वर्ष दस अप्रैल को आयोजित मंत्रिपरिषद की बैठक में राज्य के वर्ष 2017-18 के चना उत्पादक किसानों को प्रति एकड़ 1500 रूपए की प्रोत्साहन राशि देने का निर्णय लिया गया था। कृषि मंत्री श्री बृजमोहन अग्रवाल ने विभागीय अधिकारियों को यह सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं कि प्रोत्साहन राशि का वितरण जल्द से जल्द कर दिया जाए। इस सिलसिले में कृषि और जैव प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा 27 अगस्त को यहां मंत्रालय (महानदी भवन) से जहां संचालक कृषि को भुगतान योग्य राशि का आवंटन आदेश जारी कर दिया है। वहीं विभाग द्वारा 27 अगस्त को ही एक अन्य परिपत्र में संबंधित अधिकारियों को प्रोत्साहन राशि के भुगतान के लिए पात्रता और भुगतान प्रक्रिया आदि के संबंध में बिन्दुवार दिशा-निर्देश भी जारी किए गए हैं। 
    कृषि एवं जैव प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा यह परिपत्र सचिव राजस्व एवं आपदा प्रबंधन, आयुक्त भू-अभिलेख, संचालक कृषि, प्रबंध संचालक, राज्य बीज एवं कृषि विकास निगम सहित सभी पांच संभागीय कमिश्नरों और सभी 27 जिला कलेक्टरों को जारी किया गया है। परिपत्र के अनुसार प्रोत्साहन राशि रबी वर्ष 2017-18 के अंतर्गत किसानों द्वारा बोए गए चने की फसल के रकबे के आधार पर दी जाएगी। इस योजना के कार्य क्षेत्र में सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ राज्य को शामिल किया गया है। सभी जिला कलेक्टर रबी वर्ष 2017-18 के चना उत्पादक किसानों की संख्या, राजस्व अभिलेख में दर्ज बोये गए रकबे की ग्रामवार और विकासखण्डवार जानकारी और उस आधार पर आवश्यक आवंटन की मांग कृषि संचालनालय को भेजेंगे। 

  धान पौधों के कमजोर होने पर यूरिया डालनेे की सलाह धान में कन्से निकलने की स्थिति में यूरिया की दूसरी मात्रा जरूरी
Posted Date : 30-August-2018

धान पौधों के कमजोर होने पर यूरिया डालनेे की सलाह धान में कन्से निकलने की स्थिति में यूरिया की दूसरी मात्रा जरूरी

रायपुर 30 अगस्त 2018 कृषि वैज्ञानिकों ने पिछले 15-20 दिनों से सूर्य प्रकाश की कमी की स्थिति में धान के पौधे कमजोर होने पर यूरिया डालने की सलाह किसानों को दी है। कृषि वैज्ञानिकों ने आज यहां जारी विशेष कृषि बुलेटिन में कहा है कि सूर्य प्रकाश की कमी की वजह से पौधों की बढ़ोतरी कम हो जाती है। इस स्थिति में पौधों की बाढ़ संतुलित रखने के लिए यूरिया डालना जरूरी होता है।
    कृषि वैज्ञानिकों ने कहा कि रोपाई वाले खेतों में लगभग 5 सेंटीमीटर पानी रोक कर रखना चाहिए। अधिक मात्रा में पानी रखने से कन्सो की संख्या प्रभावित होती है। धान फसल की बियासी करने के बाद तत्काल सघन चलाई करनी चाहिए। इसके बाद 10 से 15 प्रतिशत अधिक यूरिया छिड़काव करना फायदे मंद होता है। धान फसल में कन्से निकलने की स्थिति हो तो यूरिया की दूसरी मात्रा डालनी चाहिए। इससे कन्सो की स्थिति में सुधार आती है। धान फसल में कीट या खरपतवार होने की स्थिति में दोनों के नियंत्रण के बाद ही 40 किलोग्राम यूरिया प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़कना चाहिए।

धान खेतों की नियमित निगरानी करते रहना चाहिए। धान फसल में पत्ती मोड़क का प्रकोप एक पौधे में एक से अधिक दिखाई देने पर क्लोरोप्यरीफोस 1 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से 500 लीटर पानी में मिलाकर छिड़कना चाहिए। जिन खेतों में तना छेदक की तितली एक वर्ग मीटर में एक से अधिक दिखाई दे रही हो तो वहां कार्बोफुरान 33 किलोग्राम या फर्टेरा 10 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से डालना लाभदायक होता है। रोपा धान में सकरी पत्ती वाली खरपतवार के नियंत्रण के लिए रोपाई के तीन दिन के अंदर ब्यूटाक्लोर डेढ़ किलोग्राम सक्रिय तत्व या आक्साडायर्जिल 70 ग्राम सक्रिय तत्व डालना चाहिए। धान फसल में हानिकारक कीटों के नियंत्रण के लिए प्रकाश प्रपंच उपकरण का उपयोग किया जा सकता है। प्रकाश प्रपंच उपकरण फसल से थोडी दूर पर लगाकर शाम 6.30 बजे से रात्रि 10.30 बजे तक ही बल्ब जलाना चाहिए तथा सुबह एकत्रित कीड़ों को नष्ट कर देना चाहिए।

 धान की रोपाई में देरी होने की स्थिति में एक स्थान पर चार-पांच पौधे लगाना जरूरी : रोपाई वाले खेतों में 5 सेंटीमीटर भरना चाहिए
Posted Date : 10-August-2018

धान की रोपाई में देरी होने की स्थिति में एक स्थान पर चार-पांच पौधे लगाना जरूरी : रोपाई वाले खेतों में 5 सेंटीमीटर भरना चाहिए

रायपुर  कृषि वैज्ञानिकों ने पिछले दिनों से हो रही बारिश के पानी को धान के खेतों में रोकने के लिए समुचित प्रबंध करने की सलाह किसानों को दी है। कृषि वैज्ञानिकों ने आज  कहा है कि धान के बोता तों में बियासी के लिए तथा रोपाई वाले खेतों में रोपा लगाने के लिए पानी रोकना चाहिए।
    कृषि वैज्ञानिकों ने कहा है कि धान की रोपाई में देरी होने पर रोता लगाते समय एक स्थान पर चार-पांच पौधों की रोपाई करनी चाहिए। ऐसी स्थिति में 10 प्रतिशत अधिक खाद डालना चाहिए। रोपे गए खेतों में लगभग 5 सेंटीमीटर पानी भर कर रखना लाभदायक होता है। ऐसे खेतों में अधिक पानी भरा होने से धान के कन्सो की संख्या प्रभावित होती है। धान नर्सरी में कार्बोफ्यूरान दानेदार दवा 20 किलो प्रति एकड़ के हिसाब से थरहा निकालने के चार दिन पहले नर्सरी में डालना चाहिए।
    कृषि वैज्ञानिकों ने यह भी कहा है कि प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में कम वर्षा की स्थिति है। इन क्षेत्रों की धान फसलों में कटुआ इल्ली की आशंका है। सूखे खेतों में कटुआ इल्ली का प्रकोप होने पर डाइक्लोरोवास एक मिली लीटर एक लीटर पानी में घोल कर 200 लीटर प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करना चाहिए। जिन खेतों में पानी भरा है और वहां कटुआ इल्ली दिखाई दे तो एक लीटर मिट्टी तेल प्रति एकड़ की दर से खेतों के पानी में डालकर पौधों के ऊपर रस्सी चलाना चाहिए, ताकि इल्लियां मिट्टी तेल युक्त पानी में गिरकर मर जाएं।
    कृषि वैज्ञानिकों ने कहा है कि धान फसल में हानिकारक कीड़ों पर सतत निगरानी रखनी चाहिए। इसके लिए प्रकाश प्रपंच उपकरण का उपयोग किया जा सकता है। प्रकाश प्रपंच उपकरण फसल से थोड़ी दूरी पर लगाकर शाम 6.30 से रात्रि 10.30 बजे तक बल्ब जलाना चाहिए। सुबह कीड़ों को एकत्र कर नष्ट कर देना चाहिए। सोयाबीन की फसल में पत्ती खाने वाली इल्लियां एवं चक्र भंृग कीड़े ज्यादा दिखने पर ट्राईजोफास दवा की 2 मिली लीटर मात्रा एक लीटर पानी या फ्लुबेंडामाईट आधा मिली लीटर एक लीटर पानी में घोल बनाकर 200 लीटर घोल प्रति एकड़ के हिसाब से छिड़काव करना चाहिए। दवा छिड़कने के तीन घंटे के भीतर बारिश हो जाने पर पुनः घोल छिड़कना जरूरी होता है

छत्तीसगढ़ में खरीफ फसलों की 80 प्रतिशत बोनी पूरी
Posted Date : 03-August-2018

छत्तीसगढ़ में खरीफ फसलों की 80 प्रतिशत बोनी पूरी

रायपुर, 03 अगस्त २०१८ छत्तीसगढ़ में खरीफ फसलों की 80 प्रतिशत बोनी पूरी हो गई है। राज्य शासन के कृषि विभाग ने इस साल 48 लाख 20 हजार हेक्टेयर में अनाज, दलहन, तिलहन और साग-सब्जी बोने का लक्ष्य रखा है। इस लक्ष्य के विरूद्ध अभी तक किसानों ने 38 लाख 70 हजार हेक्टेयर में विभिन्न फसलों की बोनी पूर्ण कर ली है। 
कृषि मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने आज यहां बताया कि चालू खरीफ मौसम में 33 लाख 87 हजार हेक्टेयर में अनाज फसलों की बोनी हो गई है। छत्तीसगढ़ में किसान इस मौसम में अनाज फसलों के अंतर्गत धान, मक्का, कोदो-कुट्की की खेती करते हैं। अनाज फसलों में सबसे अधिक रकबा धान का होता है। अभी तक 31 लाख 48 हजार हेक्टेयर में धान की बोआई हो गई है।
 अग्रवाल ने बताया कि इस साल दलहन के लिए 3 लाख 86 हजार 800 हेक्टेयर  रकबा रखा गया है। अभी तक लगभग एक लाख 95 हेक्टेयर में अरहर, उड़द, मूंग, कुल्थी आदि की बोनी की जा चुकी है। तिलहन फसलों के लिए निर्धारित रकबे में से 2 लाख हेक्टेयर में मुंगफली, सोयाबीन, रामतिल, सूरजमुखी और अरण्डी बोई जा चुकी है। इसी प्रकार लगभग 95 हजार हेक्टेयर में साग-सब्जियों की बोआई सब्जी उत्पादक किसानों ने कर ली है। 

 

धान फसल में हानिकारक कीड़ों की निगरानी करने प्रकाश प्रपंच उपकरण उपयोगी
Posted Date : 30-July-2018

धान फसल में हानिकारक कीड़ों की निगरानी करने प्रकाश प्रपंच उपकरण उपयोगी

 रायपुर, 30 जुलाई 2018 कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को धान फसल में हानिकारक कीड़ों की निगरानी करने प्रकाश प्रपंच उपकरण का उपयोग करने की सलाह दी है। उन्होंने आज यहां जारी सम-सामयिक कृषि बुलेटिन में कहा है कि प्रकाश प्रपंच उपकरण फसल से थोड़ी दूर पर लगाकर शाम 6.30 बजे से रात 10 बजे तक बल्ब जलाना चाहिए। इसके बाद एकत्रित कीड़ों को सुबह नष्ट कर देना चाहिए।
    कृषि वैज्ञानिकों ने कहा है कि धान खेतों की मेड़ों को बांधकर पानी रोकने का सही समय है। रोपा लगाने के बाद खेतों में पांच सेंटीमीटर से ऊपर पानी रोक कर रखा जाना चाहिए। अधिक पानी होने से धान कंसों की संख्या प्रभावित होती है। जहां धान की बोनी फसल 25 दिनों की हो गई हो, वहां 5 से 10 सेंटीमीटर पानी होने की स्थिति में बियासी कर लेना चाहिए। बियासी के तुरंत बाद सघन चलाई करना फायदेमंद होता है, इससे कम से कम पौधे नष्ट होते हैं। चलाई के समय  प्रति वर्ग मीटर में 150 की संख्या में पौधे होने चाहिए। रासायनिक निंदा नियंत्रण फसल की प्रारंभिक अवस्था में ही कारगर होता है। धान रोपा लगाते समय पौधों के बीच पर्याप्त दूरी रखनी  चाहिए। प्रत्येक तीन मीटर के पश्चात 30 सेंटीमीटर की पट्टी निरीक्षण पथ के रूप में छोड़ना जरूरी है। नत्रजन उर्वरक का उपयोग रोपा लगाने के सात दिन बाद करना चाहिए। स्वचलित यंत्र द्वारा धान रोपाई करने के पूर्व खेतों की उथली मचाई ट्रैक्टर चलित रोटरी पडलर द्वारा की जानी चाहिए। स्वचलित यंत्र द्वारा रोपाई के लिए तैयार की गई मेट टाइप नर्सरी में यह ध्यान रखना चाहिए कि पौधों की जड़ों की लम्बाई अधिक न हो।

 

खरीफ मौसम में हल्की जमीनों पर 100 से 115 दिन में पकने वाली धान की किस्मों की बोआई करने की सलाह
Posted Date : 07-July-2018

खरीफ मौसम में हल्की जमीनों पर 100 से 115 दिन में पकने वाली धान की किस्मों की बोआई करने की सलाह

  रायपुर कृषि विशेषज्ञों और कृषि विभाग के अधिकारियों ने खरीफ मौसम में हल्की जमीनों पर 100 से 115 दिन में पकने वाली धान की किस्मों की बोआई करने की सलाह किसानों को दी है। कृषि विशेषज्ञों द्वारा आज  जानकारी देते हुए  बतया है कि धान की दंतेश्वरी, पूर्णिमा, इंदिरा बारानी धान-1, अनंदा, समलेश्वरी, एमटीयू-1010 तथा आई.आर. 36 किस्में 100 से 115 दिन के भीतर पक कर तैयार हो जाती है। उन्होंने कहा कि इन किस्मों के प्रमाणित बीज उपलब्ध न हो तो किसान स्वयं के बीजों को 17 प्रतिशत नमक के घोल एवं बाविस्टीन से उपचारित कर बोनी कर सकते हैं।
कृषि बुलेटिन में यह भी बताया गया है कि कतार बोनी धान में बोआई के तीन दिन के अंदर अंकुरण पूर्व प्रस्तावित निंदानाशक पेण्डीमेथेलिन 1.25 लीटर की 500 लीटर पानी में घोल बनाकर एक हेक्टेयर में छिड़काव करना चाहिए। शीघ्र एवं मध्यम अवधि की धान किस्मों की कतार बोनी करनी चाहिए। इनमें बियासी की आवश्यकता नहीं होती तथा धान की फसल 10-15 दिन पहले पक कर तैयार हो जाती है। सोयाबीन में खरपतवार नियंत्रण के लिए अंकुरण पूर्व क्यूजोलाफाप-पी-एथिल, इमेजाथाइपर या पेन्डीमेथिलिन या मैट्रीबुजिन का छिड़काव अनुशंसित मात्रा में करना फायदेमंद होता है। उकठा रोग से प्रभावित क्षेत्रों में अरहर के साथ ज्वार की मिलवा खेती करने से अरहर में इस रोग का प्रकोप कम हो जाता है।

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