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संपादकीय

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संगीतमय श्रीमद् भागवत कथा देवरानी में 11फरवरी सें
Posted Date : 10-February-2019

संगीतमय श्रीमद् भागवत कथा देवरानी में 11फरवरी सें

हेमंत जायसवाल@BBN24- ●साहू परिवार द्वारा आयोजित भागवत कथा● *बिर्रा - मुरली मनोहर श्री माधव के असीम कृपा से ग्राम देवरानी में संगीतमय श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन 11 फरवरी से कलश यात्रा एवं व्यास पूजन के साथ प्रारंभ होगी।व्यास वाचक आदरणीय पं.अवधेश तिवारी जी द्वारा कथा सुनाई जायेगी। कथा प्रतिदिन 2बजे सें शाम 07बजे तक भागवत कथा का रस पान करेगें।12फरवरी भागवत महात्म्य, 13 फरवरी परिक्षित जन्मकथा, 14फरवरी प्रहलाद चरित्र, भरत चरित्र, 15 फरवरी श्रीराम जन्म श्रीकृष्ण जन्मोत्सव, 16फरवरी बाललीला, माखनचोर, 17फरवरी श्रीकृष्ण रूखमणी विवाह, 18फरवरी सुदामा चरित्र कथा विश्राम चढोतरी, 19 फरवरी तुलसी वर्षा हवन सहस्त्र धारा बाम्हण भोजन के साथ विसर्जन किया जायेगा।वहीं इसके मुख्य यजमान तीजू राम साहू - श्रीमती मोहनकुमारी साहू (सरपंच ग्राम पंचायत देवरानी)होगें वहीं आयोजन को लेकर साहू परिवार जुटे हुए है।
लड़की होने पर गर्व करूँ या ?
Posted Date : 08-March-2018 6:38:37 am

लड़की होने पर गर्व करूँ या ?

आज सारी दुनिया महिला दिवस मना रही है और लड़की होने के नाते शायद मुझे भी ये दिन मनाना चाहिए पर मै नहीं मना पा रही इस दिन को | मन में सवालों का बवंडर घूम रहा है की आज मै लड़की होने पर गर्व करूँ या लड़की होने पर उदास होऊं? भगवान् ने इतनी खुबसुरत चीज बनाई है वो है औरत ,जिससे ये सारी दुनिया बनी है | ये ना हो तो इन्सान जाती ही ना हो | हम औरत को कितने ही रूपों में देखते है कभी माँ, बहन, नानी, चाची, पत्नी , बेटी, भाभी और भी ना जाने कितने रूप है औरत के | यहाँ तक की औरत को पूजा भी जाता है सारे स्थानों में माँ का स्थान सबसे ऊपर रखा गया है | तो आज सबसे ज्यादा रेप क्यूँ हो रहें है, पुरुष को ये सब करते समय उसे ध्यान क्यूँ नहीं आता की वो भी इसी औरत से बना है जिस माँ की कोख से पैदा हुआ है उसी औरत के साथ रेप कैसे कर सकता है ?भले ही वो जिसके साथ गलत कर रहा है वो बेशक उसकी माँ , बहन, बेटी ना हो पर है तो उन्ही मेसे एक ? फिर भी उसकी रूह नहीं कापती किसी औरत के साथ गलत करते वक्त ?

 आज मेरे इस आर्टिकल में क्या लिखूं ये समझ नहीं आरहा महिलाओं की तारीफ़ लिखूं या उनके साथ हो रहे अपमान को लिखूं या दूसरों की तरह मै भी महिलाओं की वीरता के किस्से लिखूं ? मै आप सब से एक सवाल पूछना चाहती हूँ की क्या औरत केवल एक दिन के सम्मान के काबिल है ?क्या हमें एक ही दिन औरत का  सम्मान करना चाहिय या हर दिन ?कुछ पति ये कह कर इस दिन पत्नियों को आराम देते है या देंगें की आज का दिन आप का है ये आप एक दिन करने का सोच रहे हो तो ये आप हर रोज भी तो कर सकते हो |एक दिन आराम देने और एक दिन गिफ्ट देने से औरत का सम्मान हो जाता है क्या ? क्या है औरत का असली सम्मान ये हमें सोचना चाहिए ?

 आज औरतें अपने ही घर में मैह्फुस नहीं है | आज एसा माहौल है की कोई दूर का नहीं बल्कि कोई अपना ही हमारे पर बुरी नजर गडाये रहता है, हम अपनी बच्चियों को भी घर में अपनों के पास छोड़ नहीं सकते | मैने  सोशल मीडिया में 26  फरवरी 2018 को उतरप्रदेश के मुजफ्फरनगर एक खबर पड़ी की एक बहन ने अपनी ही  16 साल की बहन को किसी बहाने से एक खाली घर में ले गई जहाँ उसका 22 साल का भाई पहले से ही मौजूद था और जब वो लड़की वहां पहुची तो उसका भाई उसके साथ रेप किया और जो उस लड़की की बहन थी जिसने उसे वहा बहला के लाइ थी वो उसका वीडियो बना रही थी फ़िलहाल ये दोनों भाई बहन फरार है |एक और खबर थी की जो 7 मार्च 2018 कोलकत्ता ही की है जहां एक 3 साल लड़की के साथ एक खाली बस में एक आदमी ने दरिंदागी की जब वो उस लड़की का रेप कर रहा था तो उस लड़की का भाई दरवाजे में खड़े हो कर अपनी बहन को छोड़ देने की मिन्नतें कर रहा था | जब उसने ये सारी बातें अपनी माँ को बताई तो उसकी माँ जब वहां पहुची तो बच्ची के शारीर से खून बह रहा था और जब उस मासूम को अस्पताल ले जाया गया तो उसकी हालत नाजुक बताई है | एसी ही कई खबरे हम रोज अखबार और टेलीविसन में पड़ते और सुनते है | ये सब केवल भारत में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में देखते है की औरत के साथ हमेशा ही गलत होता है |

आज हम बड़े गर्व से कहतें है की आज हम मर्दों के साथ कदम से कदम मिला के चल रहे है पर ये भी सच है की हम कितना भी आगे निकल गयें हों पर आज भी हमारी इज्जत दाव पर लगी रहती है हम आज भी अकेले जाने में अपने आप को सहज महसूस नहीं समझते है और ना ही हमारे घर वाले | अब ये सब पड़ने के बाद आप खुद सोचें की क्या वाकई में हमें इस दिन को सैलीब्रेट करना चाहिए या नहीं ?

आज वक्त है लड़कियों पर हम जो रोक टोक लगाते है वो रोक टोक अब हम लड़कों पर लगायें , उनकी हर बातों पर ध्यान दें की वो क्या कर रहें है, आज लड़कियों को नहीं लड़कों को कहें की शाम के घर से बाहर ना जायें, आधी रात तक बाहर ना रहे क्यूँ की जो भी आज हो रहा है लड़कियों के साथ उसके जिमेदार लड़के ही है और उनकी ये मानसिकता की हम पुरुष हैं कुछ भी कर सकतें है ये हमारी मर्दानगी है और इस सोच को बढावा हमने ही दिया है | हमने ही इन पुरुषों को इतनी छुट दे रखी है की वो कुछ भी करेगा तो हम ही उसे लड़का है करके माफ़ कर देंगें और सारा इल्जाम लड़की पर ही डाल देते है | जब तक इस मानसिकता को नहीं बदलेंगें तब तक लड़कियों के साथ गलत ही होता रहेगा और ये सब कौन बदलेगा ? इन सब को हमने ही बढावा दिया है तो हम ही इसको बदल सकते है अपनी मानसिकता को बदल कर और बच्चों को अच्छी सिख दे कर |

मै आज के दिन की विरोधी नहीं हूँ मैं भी इस दिन को ख़ुशी और गर्व के साथ मनाना चाहती हूँ औरत होने पर घमंड करना चाहती हूँ जो चीज मुझमे है वो पुरषों में नहीं इसपर इतराना चाहती हूँ पर साथ-साथ आप सब को यहीं कहना चाहती हूँ की अपनी सुरक्षा के लिए आत्म रक्षा की शिक्षा हर लड़की को लेनी चाहिए ताकि वो हर जगह अपनी रक्षा खुद कर सके और कोई भी हमारे संस्कार और हमारे पहनावे पर ऊँगली ना उठा सके | हम लोगों को और उनकी सोच को नहीं बदल सकते पर खुद को तो बदल सकतें है | 

वर्षा बी गलपांडे 

 

 

 

पर्यावरण और इंसानी सोच (बस एक नजर  में )
Posted Date : 30-June-2017 4:54:48 pm

पर्यावरण और इंसानी सोच (बस एक नजर में )

  बचपन में हमारे दादा-दादी,नाना-नानी हमें विभिन्न  प्रकार की कहानियां सुनाते थे,किस्से सुनाते थे, किवदंतियां सुनाते थे, इसमें यह स्थापित करने की कोशिश होती थी कि एक स्वर्ग होता है और एक नरक होता है तथा यह समझाने की भी कोशिश होती थी कि यदि आप अच्छे काम करेंगे तो स्वर्ग में जाएंगे और गलत काम करेंगे तो नरक में जायेंगे।इसके लिए स्वर्ग में स्थापित आनंद की सारी खूबियों का बखूबी वर्णन किया जाता था और नर्क के अंदर कितने भयंकर कष्ट होते हैं उसका वर्णन करते हुई कहानी सुनाई जाती थी। नतीजन जो कहीं ना कहीं हमारे  मन मस्तिष्क में स्वर्ग व नरक की कल्पना स्थापित हो ही जाती है। जिसका असर ताह उम्र इंसान के जीवन मे  कम या अधिक बना ही रहता है। 

    जैसे जैसे हम बड़े होते जाते है समझ बढ़ती है जिससे हममे अपनी तर्क संगत बात लोगो के सामने रखने की क्षमता आने लगती है। एक उम्र के पड़ाव के बाद इंसान को उसका अनुभव ही सीखा जाता है की इस ब्रम्हांड में कोई भी ऐसी जगह प्रकृति के द्वारा स्थापित नहीं है जिसे स्वर्ग और नरक कहा जा सके। 

हर इंसान अपने व्यवहार, आचरण, बोलचाल, चाल- चलन और अपनी सोच से ही इस ब्रम्हांड में अपने लिए और अपने समाज के लिए स्वर्ग और नरक स्थापित करता जाता है।

इंसान की जितनी सोच  स्वार्थ आधारित होगी उतने ही हम इस पृथ्वी को नरक बनाने के करीब ले जाने के जिम्मेदार होंगे तथा दूसरी ओर हमारी जितनी सोच समाजिक व  व्यापक होगी उतने ही हम स्वर्ग को स्थापित करने में भागीदार की भूमिका में होंगे।

इस पृथ्वी के पर्यावरण से ही स्वर्ग और नरक स्थापित होता है। जितना हम अपने जीवन को प्रकृति के करीब रखते हुए पर्यावरण की रक्षा करने का संकल्प अपने दिलों दिमाग में स्थापित कर पाएंगे उतने ही पैमाने में  इंसान इस पृथ्वी को स्वर्ग के करीब तथा नरक से दूरी बनाने में सफल होगा।

अपने चारों तरफ हरियाली  की चादर, चिड़ियों का चहकना, कोयल की मन मोह लेने वाली आवाज को सुनना, नीलकंठ का दिखना, मोरो को नाचते हुए देखना, रंगबिरंगी फूलो का खिलना और उसकी महक, भौरों की गुंजन,जुगनुओं को जगमगाहट, रंगबिनरंगी तितलियों को उड़ते देखना,पहाड़ियों से पानी को गिरते हुए देखना,झील से,जंगलो से प्राकृतिक सौंदर्य की अनुभूति प्राप्त करना किसे अच्छा नही लगता। 

 सभी मन से चाहते है ऐसा ही वातावरण अपने चारों तरफ हो,तभी तो ऐसे ही वातावरण की चाहत में इंसान सपरिवार या दोस्तो के साथ जाता है कुछ दिनों की छुट्टियां मानने ,ऐसे ही किसी कल्पनाशील जगह की तलाश कर जहाँ पर वह कुछ दिन प्रकृति के करीब रहकर उसका भरपूर आनंद ले सके,वह भी भारी भरकम पैसों को खर्च कर।

पृथ्वी में बसे हर इंसान को यह सोचना चाहिए जिस प्राकृतिक वातावरण के चाहत के लिए वह भटकता है उसे अपने आसपास भी तो बना सकता है,कम पैसों को खर्च कर, उसके लिए उसे केवल अपनी सोच के साथ अपनी दिनचर्या भी  बदलनी होगी तभी जाकर बड़ी कठिन तपस्या के बाद हम सब लोग यकीनन ऐसा ही वातावरण अपने आस पास प्राप्त कर सकते है।

  हमेशा सरकार की ओर मुंह नही ताकना चाहिए हमे भी आगे बढ़ कर इस दिशा में कुछ ठोस कदम उठाने होंगे स्वार्थवश ही सही, क्योकि अपने आसपास जो भी वातावरण होगा उसका सीधा असर हमारी जीवन पर ही पड़ता है किसी सरकार के नही। अपने लिए ना सही अपनी आने आने वाली पीढ़ी के लिए तो हम इसकी नीव रख कर जा ही सकते है।

रवि तिवारी 
 

  सभी चाहते है सुख-दुःख,प्यार-घृणा में स्पर्श
Posted Date : 24-June-2017 12:44:41 pm

सभी चाहते है सुख-दुःख,प्यार-घृणा में स्पर्श

सभी सुख-दुःख,प्यार-घृणा में एक दूसरे का स्पर्श चाहते और करते हैं। माँ का वात्सल्य बच्चे को सीने से स्पर्श में ही प्रकट होता है। हम जब किसी को प्रेम करते हैं तो उसे आलिंगनबद्ध करना चाहते हैं।  
जब कोई दोस्त किसी बात से परेशान होता है तो हम उसका हाथ अपने हाथ में लेकर बिना कुछ कहे ही बहुत कुछ कह देते है..रात को जब बच्चा सोता है तो माँ उसके सर पर हाथ फेरती है और बच्चा सुकून से सो जाता है...आप सोच रहे होगे की मैं क्या लिखना चाह रही हूँ......मैं एक ऐसे शब्द  के बारे में लिखना चाह रही हूँ जो सोचने में बहुत छोटा लगता है पर ये शब्द बहुत बड़ा...जी हाँ मैं बात कर रही हूँ “स्पर्ष” शब्द के बारे में ...ये शब्द की सुनने में कितना साधारण सा शब्द लगता है....पर है कितना सुकून पहुचने वाला..आप को मुन्ना भाई MBBS फिल्म तो याद होगी उसमें हीरो जो भी व्यक्ति दुखी होता या परेशां होता उसे वो “हग” करता यानि की गले से लगाता और सब को यही करने को कहता..जिसे वो जादू की “झप्पी” कहता....आप ने कभी सोचा है की इस फिल्म के माध्यम से क्या दिखाना और समझाना चाह रहा था....ये स्पर्ष ही है जो इस फिल्म में दिखाया गया था...हम इसे “टचिंग पावर ” भी कह सकते है....इसमे इतनी शक्ति होती है की एक बीमार आदमी को  भी ठीक कर सकता है....एक रोते इन्सान को सुकून दे सकता है... स्पर्ष के बहुत से रूप है जैसे माता–पिता का स्पर्ष, पति-पत्नी का स्पर्ष, दोस्त का स्पर्ष, दादा-दादी का स्पर्ष, स्पर्ष चाहे जिस रूप में भी हो सच यही है की स्पर्ष हमेशा ख़ुशी ही देता है....
वर्षा.....

संपादकीयः सुनवाई से उम्मीद
Posted Date : 12-May-2017 1:08:49 pm

संपादकीयः सुनवाई से उम्मीद

तीन तलाक के मसले पर सर्वोच्च न्यायालय की ऐतिहासिक सुनवाई गुरुवार को शुरू हो गई। न्यायालय ने इस मसले को कितना महत्त्व दिया है इसका अंदाजा दो बातों से लगाया जा सकता है। न्यायालय ने गरमी की छुट्टी में भी सुनवाई करना मंजूर किया। दूसरे, उसने इस मामले को संविधान पीठ को सौंप दिया। पीठ में प्रधान न्यायाधीश समेत पांच वरिष्ठतम जज शामिल हैं। यह भी गौरतलब है कि पांचों जज अलग-अलग धर्म से ताल्लुक रखते हैं। तीन तलाक प्रथा से पीड़ित मुसलिम महिलाओं द्वारा दायर की गई सात याचिकाओं पर अलग-अलग विचार करने के बजाय अदालत को मुसलिम समुदाय में तीन तलाक के चलन की कानूनी वैधता पर विचार करना जरूरी लगा। पीठ को इस पर दो खास बिंदुओं से विचार करना है। एक, यह कि क्या तीन तलाक मजहब का अनिवार्य या अंतर्निहित अंग है? दूसरा, क्या यह संविधान द्वारा प्रदत्त नागरिक अधिकारों के आड़े आता है?

आॅल इंडिया मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड समेत अनेक मुसलिम संगठन और तमाम मौलाना मानते हैं कि तीन तलाक उनकी मजहबी व्यवस्था का अंग है और इसे बदलना या निरस्त करना उनके धार्मिक मामले में दखल देना होगा, जबकि संविधान ने सारे समुदायों को धार्मिक स्वायत्तता की गारंटी दे रखी है। लेकिन याचिकाकर्ताओं और मुसलिम महिलाओं के कई संगठनों का कहना है कि तीन तलाक का इस्लाम के बुनियादी उसूलों या कुरान से कोई लेना-देना नहीं है; यह लैंगिक भेदभाव का मामला है और इसी नजरिए से इसे देखा जाना चाहिए। इस आग्रह में दम है। हमारा संविधान कानून के समक्ष समानता का भरोसा दिलाता है। जबकि तीन तलाक प्रथा तलाक के मामले में मुसलिम मर्द के एकतरफा व मनमाने अधिकार की व्यवस्था है। यही कारण है कि मुसलिम महिलाओं में शिक्षा तथा अपने हकों के प्रति जागरूकता के प्रसार के साथ-साथ मुसलिम समाज में भी तीन तलाक के खिलाफ आवाज उठने लगी है, भले अभी उसे मुख्य स्वर न कहा जा सके। केंद्र सरकार ने जरूर इस मामले में दिए हलफनामे के जरिए अपना पक्ष रखते हुए कहा है कि तीन तलाक मुसलिम महिलाओं की प्रतिष्ठा व सम्मान के खिलाफ है और इसे समाप्त होना चाहिए। बहरहाल, अगर मजहबी नजरिए से देखेंगे, तो तीन तलाक का विवाद अंतहीन बना रह सकता है। क्योंकि मजहबी मान्यताओं और परंपराओं की कई व्याख्याएं होंगी, फिर किस व्याख्या को माना जाएगा? इसलिए असल मसला तो यह है कि क्या यह कानून के समक्ष समानता के सिद्धांत और नागरिक अधिकारों के आड़े आता है?

शनि शिंगणापुर और हाजी अली की दरगाह के मामलों में संबंधित धार्मिक स्थलों के प्रबंधकों ने यही दलील दी थी कि वहां स्त्रियों के प्रवेश पर लगी पाबंदी सदियों पुरानी है तथा परंपरा का हिस्सा है। लेकिन मुंबई उच्च न्यायालय ने इस तर्क को नहीं माना और पाबंदी हटा लेने का आदेश देते हुए अपने फैसले में कहा कि विभिन्न समुदायों को धार्मिक स्वायत्तता की गारंटी संविधान ने जरूर दे रखी है, पर वह असीमित नहीं हो सकती। धार्मिक स्वायत्तता तभी तक है जब तक वह नागरिक अधिकारों के आड़े न आए। तीन तलाक का मसला चूंकि मुसलिम महिलाओं के खिलाफ भेदभाव व अन्याय का मसला है, इसलिए इसे मजहबी चश्मे से न देख कर, सभी के समान नागरिक अधिकार तथा कानून के समक्ष समानता की दृष्टि से देखना होगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि मामले की सुनवाई कर रहे संविधान पीठ का फैसला जल्द आएगा और तीन तलाक के पीड़ितों को इंसाफ मिलने के साथ ही एक लंबे विवाद का तर्कसंगत पटाक्षेप होगा।

सुकमा की लालक्रांति का अंत कब ?
Posted Date : 25-April-2017 4:20:59 pm

सुकमा की लालक्रांति का अंत कब ?

 

हमारी आतंरिक सुरक्षा के लिए आतंक और नक्सलवाद की पनती विषबेलें बड़ा खतरा बन गयी हैं। लोकतंत्र में विचारों की संस्कृति पर बंदूक की सभ्यता भारी दिखती है। चरमपंथ की यह विचाराधारा देश को कहां ले जाएगी पता नहीं, लेकिन अतिवाद के बल पर सत्ता के समानांतर व्यवस्था खड़ी करने वालों का सपना पूरा होगा या नहीं,ं यह वक्त बताएगा। हलांकि मजबूत होती नक्सलवाद की जड़ें और जवानों की बढ़ती शहादत हमें विचलित करती हैं। आतंकवाद से भी बड़े खतरे के रुप में नक्सलवाद उभरा है। आतंकवादी हमलों में इतनी तादात में जवान कभी नहीं शहीद हुए जितने की नक्सल प्रभावित इलाकों में बारुदी सुरंगों और सीधी मुठभेंड में मारे गए। हमें यह कबूल करने में कोई गुरज नहीं करना चाहिए की नक्लवाद और आतंकवाद की रणनीति के आगे हमारा सुरक्षा और खुफिया तंत्र बौना साबित हो रहा है। सुकमा के जंगलों में काफी तादात में सेना और सीआरपीएफ के जवान शहीद हुए हैं। जवानों की शहादत का देश अभ्यत हो चुका है। एक हमले से निपटने के लिए जब तक हम रणनीति बनाते हैं तब तक दूसरा हमला हो चुका होता है। छत्तीगढ़ के बस्तर जिले में एक बार फिर सुकमा के जंगलों में नक्सलियों ने खूनी खेल खेला है। सैकड़ों की संख्या में महिला और पुरुष नक्सलियों ने रणनीति के तहत जवानों पर हमला बोला और उन्हें मौत की नींद सुला दिया। इस सुनियोजित षडयंत्र में अब तक 40 से अधिक सीआरपीएफ के जवान शहीद हो गए। हमला उस समय किया गया जब जवान निर्माणाधीन सड़क पर चलने वाले काम को खुलवाने गए थे। नक्सलियों ने सड़क निर्माण पर प्रतिबंध लगा रखा। सुबह छह बजे 90 की संख्या में जवान गए थे।

सुकमा से 64 किमी दूर बुर्कापाल में दोपहर में जब जवान भोजन ले रहे थे उसी समय हथियारों से लैस नक्सलियों ने चैथरफा हमला कर, गोलिया बरसा जवानों की निर्मम हत्या कर दी। कहा जा रहा है कि हमला करने वाली गैंग में सबसे आगे सेना की वर्दी में महिलाएं थी और उन्हें सुरक्षा कवर पुरुष नक्सली दे रहे थे। यह घटना दिल को दहलाने वाली है। लेकिन कहीं न कहीं से हमारे सुरक्षा और खुफिया तंत्र की विफलता साबित करती है। हमें यह पता नहीं चल सका की नक्सली बड़े हमले का गेम प्लान तैयार कर रखें है। नक्सलियों ने जवानों की हत्या करने के बाद उनके पर्स, मोबाइल, हथियार भी लूट ले गए। यहां तक की मुठभेंड में मरे अपने साथियों को भी घसीट कर जंगल में ले गए। सुकमा के जंगलों में सेना और सीआरपीएफ के जवानों की शहादत आम बात हो चली है। लेकिन नक्सलियों से निपटने के लिए अभी तक हमने कोई ठोस नीति नहीं तैयार कर पाए। 2011 के बाद संभवतः यह दूसरा बड़ा नक्सली हमला है जिसमें 76 जवानों की मौत हुई थी। इसके पूर्व बड़े हमले में कांग्रेस के कई दिग्गत नेताओं को मौत के घाट उतार दिया गया था। जिसमें वीसी शुक्ल, कर्माकर और दूसरे नेता शामिल थे। इस घटना में तो नक्सलियों ने लाशों में नृत्य भी किया था। नक्सलवाद हमारे लिए आतंक से भी बड़ी चुनौती बना है।

  माओेवाद विकास और लोकतंत्र की भाषा नहीं समझता है। वह वर्तमान व्यवस्था से अलग बंदूक संस्कृति के जरिए जल, जंगल और जमींन की आजादी चाहता है। वह अपनी सत्ता चाहता है जहां उसका कानून चले जबकि सरकार ऐसा कभी होने नहीं देगी। सरकारें आदिवासी और पिछड़े इलाकों में उनकी सांस्कृतिक सुरक्षा और सर्वांगीण विकास के लिए संकल्पित हैं। नक्सल प्रवावित उड़ीसा, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, झारखंड और बिहार में विकास योजनाएं क्रियान्वित हैं। लेकिन माओवादियों का विकास में भरोसा ही नहीे, आदिवासी इलाकों में वह विकास नहीं चाहते। उन्हें डर है कि अगर ऐसा हो गया तो लोग मुख्यधारा की तरफ लोैट जाएंगे, फिर हमारे अतिवाद का क्या होगा। वह लोकतांत्रिक मूल्यों का गलाघांेट बंदूक के बल पर सब कुछ हासिल करना चाहते हैं। मुख्यधारा में लौटना नहीं चाहते या फिर कोशिश नहीं करना चाहते। दुनिया भर में हिंसक संस्कृति का कोई स्थान नहीं है। लोकतांत्रिक और वैचारिक नीतियों के जरिए ही हम कामयाब हो सकते हैं।जिन बारह जिलों में नक्सवाद फैला है वहां सबसे अधिक प्राकृतिक खनिज संपदा है। लेकिन वहां के आदिवासी लोगों का विकास आज भी बदतर हालात में हैं। सरकारों ने प्राकृतिक संसाधनों को खूब दोहन किया। लेकिन आदिवासियों के पुनर्वास के लिए नीतिगत योजनाएं नहीं बनाई गई। सरकारी नीतियों ने प्राकृतिक संसाधनों से संपंन इन इलाकों के लोगों को विपन्न बना दिया। जिसका नतीजा हमारे सामने नक्सलवाद के रुप में है।

नक्सलवाद के खात्मा के लिए हमें ठोस और नीतिगत निर्णय लेना होगा। सुरक्षा और खुफिया तंत्र को नक्सलियों के मुकाबले अधिक सुरक्षित और मजबूत बनाना होगा। इसके अलावा स्थानीय लोगों का विश्वास जीतना होगा। हमें यह अच्छी तरह मालूम है कि सुरक्षा में जरा सी लापरवाही हमारे लिए मुश्किल खड़ी कर सकती है। आपको मालूम होगा नोटबंदी के बाद सरकार की तरफ से खूब प्रचारित किया गया कि इस फैसले से आतंक और नक्सलवाद की कमर टूट गई है। काफी तादात में नक्सलियों ने आत्मसमर्पण भी किया। मीडिया ने इस तरह की खबरों को खूब प्रसारित भी हुई। लोगों में भरोसा जगा कि विपक्ष जो भी चिल्लाए, लेकिन सरकार ने अच्छा काम किया है। उसके बाद भी कई हमले हुए जिसमें हमारे बेगुनाहों की जान गई।  नक्सलवाद सिर्फ एक विचारधारा की जंग नहीं है। इकसे पीछे राष्टविरोधी ताकतें भी लगी हैं। हमारा तंत्र नक्सलियों की रणनीति में सेंध लगाने में नाकाम रहा है। दुर्गम इलाकों में इतनी आसानी से आधुनिक आयुध, एक-47, गोले, बारुद, सेना की वर्दी और रशद सामाग्री की पहुंच कैसे सुलभ होती है। देश की सीमा पाकिस्ता, बंग्लादेश, अफगानिस्ता, नेपाल, से घिरी हुई है। यहां हमारे सशस्त्र जवान सुरक्षा में लगे हैं। इसके बाद भी इतनी सामाग्रियंा कहां से और कैसे पहुंच जाती हैं। इन सबके लिए फंडिंग कहा से होती है। युवाओं और महिलाओं को इतनी सुनियोंजित तरीके से प्रक्षिण कैसे दिया जाता है। सेना की तरफ नक्सलियों ने भी कई स्तरीय सुरक्षा कोर स्थापित किया है

। सभी नेटवर्क को ध्वस्त करने में हम नाकाम हुए हैं। हम इसके लिए किसी खास सरकारों को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते हैं। इसके लिए हमारी सुरक्षा नीतियां ही दोषी हैं। हमने कभी इस रणनीति पर विचार नहीं किया कि बस यह अंतिम हमला होगा। आदिवासी इलाकों की समस्याओं के गहन अध्यन के लिए आयोग गठित करने की जरुरत हैं। यह जरुरी नहीं की हम बंदूक की संस्कृति का जबाब उसकी लौटती भाषा में ही दें। नक्सल संगठनों से बात करनी चाहिए। उनकी मांगों पर जहां तक संभव हो, उस पर लोकतांत्रिक तरीकों और बातचीत के जरिए विचार होना चाहिए। उन्हें मुख्यधारा में लौटाना चाहिए। क्योंकि मरने और मारने वाले दोनों अपने हैं। किसी भी स्थिति में छति देश की होती है। अब वक्त आ गया है जब लाल सलाम की खूनी संस्कृति पर विराम लगना चाहिए।

प्रभुनाथ शुक्ल स्वतंत्र पत्रकार

Mo : 8924005444  

 पत्रकारिता धर्म और दायित्वबोध की नई भाषा और परिभाषा......  सुप्रीत
Posted Date : 13-April-2017 10:41:35 am

पत्रकारिता धर्म और दायित्वबोध की नई भाषा और परिभाषा...... सुप्रीत

 
 पत्रकारिता धर्म और दायित्वबोध की नई भाषा और परिभाषा......  सुप्रीत 

भारतीय पत्रकारिता इतिहास में जहां तक मेरा खयाल है यह घटना दिल को झिंझोड़ने वाली है। टीवी एंकर सुप्रीत कौर ने पत्रकारिता का मिजाज बदल दिया है। उन्होंने पत्रकारिता धर्म और दायित्वबोध की नई भाषा और परिभाषा गढ़ी है। पत्रकार और पत्रकारिता धर्म को सवालों के कटघरे में खड़े करने वाले लोगों को यह घटना सोचने को मजबूर करेगी और बोलेगी कि चुप रहो ! सवाल मत खड़े करों, उनका दिल रोएगा, जिन्होंने इस मिशन के लिए सब कुछ कुर्बान कर दिया। अपनी बेदना, संवदेना के साथ, उस जीवन साथी को भी जिसके साथ कभी जिंदगी भर साथ निभाने का वादा किया था।
यह सब कुछ कर दिखाया है छत्तीगढ़ के रायपुर स्थित एक निजी टीवी चैनल की एंकर सुप्रीत कौर ने। वह पत्रकारिता की रोल माडल बन गयी हैं।  पत्रकारिता के पीछे सोच रखने वालो के लिए भी जिनकी निगाह में शायद पत्रकारिता नाम की संस्था और पत्रकार पेशा और पैसा से अधिक कुछ नहीं होता है।

 लेकिन कौर ने यह साबित किया है कि दायित्व का धर्म और जिम्मेदारियां कहीं अपनों से बड़ी होती हैं। जरा सोचिए, जाने अनजाने ही सहीं, जब सच का उन्हें एहसास हुआ होगा, तो उस महिला ने कैसा महसूस किया होगा। सुप्रीत महासमुंद में सड़क हादसे में मारे गए तीन लोगों के मौत की खबर का लाइव प्रसारण कर रही थी उसी में जान गंवाने वाला एक शख्स हर्षद गावड़े भी थे जो उस महिला एंकर के पति थे।
एंकर ने खुद अपने पति की मौत की खबर प्रसारित किया। यह बात हो सकती है की खबर पढ़ने के पहले सुप्रीत को यह बात मालूम न रही हो। लेकिन आप सुप्रीत की जगह अपने को रख कर देखें। यह घटना दिल को दहला देने वाली है।हलांकि खबर के लाइव प्रसारण के दौरान ही सुप्रीत को आशंका हो गयी थी की उसने किसी अपने को खो दिया है। यह हादसा राज्य के महासमुंद में टक और एसयूपी यानी डस्टर वाहन में हुई थी। जिसमें डस्टर में सवार पांच लोगों में से तीन की मौत हो गई थी। महासमुंद से लाइव टेलीकास्ट के दौरान रिपोर्टर से घटना की सारी जानकारी भी कौर ने हासिल किया था। एंकर की आशंका को उस समय अधिक बल मिला जब पता चला की सभी भिलाई के रहने वाले हैं और पति भी सुबह मित्रों साथ डस्टर वैन से महासमुंद की तरफ निकले थे। 
वैसे वक्त के साथ पत्रकार और उसकी परिभाषा भी बदलती गयी। उसके काम करने का तरीका भी बदला। लेकिन पत्रकारिता की पेशागत अवधारणा आज भी वहीं है जो आजादी के दौर में थी। पत्रकारिता पेशा के साथ-साथ एक धर्म भी है कम से कम उस पत्रकार के लिए जो संबंधित संस्थान के लिए काम करता है। बदलते हुए दौर में पत्रकारिता की साख और उसकी गरिमा सवालों के कटघरे में हैं। चाय-पान की चैपाल से लेकर संसद तक मीडिया और पत्रकारो पर कीचड़ उछालने वालों की भी कमी नहीं है। आधुनिक भारतीय राजनीति की बदली सोच और परिवेश में लोग पत्रकारों और मीडिया को बिकाउ तक कह डालते हैं। उस पर तमाम तरह के आरोप-प्रत्यारोप लगते हैं। सच्चाई सामने लाने पर जिंदा जला दिया जाता है। हलांकि यह बात कुछ हद तक सच भी हो सकती है। लेकिन इसके लिए सिर्फ पत्रकार उसका काम ही जिम्मेदार और जबाबदेह है ऐसा नहीं, जो पत्रकार और पत्रकारिता के खुद के खबरों के सरोकार तक देखते हुए उनके लिए पत्रकारिता का दायित्व बेहद सीमित होता है। पत्रकार खुद के लिए नहीं समाज और व्यवस्था के लिए जीता और लिखता है। उसकी अपनी चिंता को टटोलने का कभी वक्त भी नहीं मिलता है। लोग उसकी निजी जिंदगी के बारे में बहुत कम पढ़ पाते हैं, इसकी वजह है की वह अपने को अधिक पढ़ना चाहते हैं। 
हम अपनों के खोने की कल्पना मात्र से बेसुध हो जाते हैं। उस स्थिति में हमें अपनी दुनिया का पता ही नहीं रहता है। लेकिन एक औरत जिसका पति इस दुनिया से चला गया और वह खुद पति की मौत का लाइव प्रसारण कर रही थी। यह सब एक आम इंसान के बूते की बात नहीं हो सकती है। पत्रकारिता का इससे बड़ा कोई धर्म हो ही नहीं सकता। यह उस युद्ध रिपोर्टिंग से भी खतरनाक क्षण हैं। महिला एंकर ने पत्रकारिता के जिस धर्म दायित्व निभाया है दुनिया में उसकी मिसाल बेहद कम मिलती है। पत्रकारिता में यु़़द्ध कवरेज सबसे खतरनाक होता है। वहां खुद की जान जाने का हमेंशा खतरा बना रहता है। लेकिन उससे भी बड़ी संवेदनशीलता की बात है जब किसी अपने को खोने का हमें एहसास हो जाए बावजूद इसके हम अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें। किसी महिला के लिए उसका पति कितना अहम होता है, यह एक महिला के सिवाय दूसरा कोई नहीं समझ सकता।
 छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने टीवी एंकर की इस दिलेरी की ट्वीट कर प्रशंसा की है। लेकिन यह काम केवल ट्वीट और प्रशंसा तक सीमित नहीं रहना चाहिए। पीएम मोदी और राज्य सरकार के साथ पत्रकारिता एवं प्रसारण मंत्रालय की तरफ से उस जांबाज महिला एंकर का सम्मान होना चाहिए। सुप्रीत को पत्रकारिता का सर्वोच्च सम्मान मिलना चाहिए। दुनिया में इस तरह के कार्य के लिए ऐसी संस्थाएं जो काम कर रही हैं इस घटना का संज्ञान उन्हें दिलाया जाना चाहिए। सुप्रीत की पूरी दुनिया उजड़ गयी है। उनके नाम पर पत्रकारिता पुरस्कारों की शुरुवात होनी चाहिए।देश की सरकार को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। सुप्रीत के साथ एक ऐसी याद जुड़ी रहनी चाहिए जिससे पत्रकारिता जगत उस महिला का ऋणी रहे और इस दुनिया में काम करने वाले लोगों को हमेंशा अपने कर्तब्य और दायित्वबोध का ध्यान होता रहे। निश्चित तौर पर समाज को पत्रकारों के प्रति नजरिया बदलना होगा। पूरे देश और दुनिया में सुप्रीत की जांबाजी की प्रशंसा हो रही है। देश की मीडिया में यह खबर सुर्खियां बनी है। पत्रकारिता के दायित्व को उन्होंने जिस तरह निभाया उसके लिए किसी के पास कुछ कहने को शब्द नहीं बचता। सुप्रीत कौर की इस दिलेरी को हम सलाम करते हैं, साथ ही आंसूओं से भिनी एक संवेदना भरी श्रद्धांजलि गावडे जी  लिए जो इस दुनिया में खोकर अपनी सुप्रीत को पत्रकारिता इतिहास में अमर कर गए। 
       प्रभुनाथ शुक्ल
लेखकः स्वतंत्र पत्रकार  
Mo : 8924005444 
email - pnshukla6@gmail.com 
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आमबजट-2017 –  सपने वही दिखाए जाएं जो यथार्थ की जमीन पर साकार होते दिखें..
Posted Date : 31-January-2017 10:07:50 am

आमबजट-2017 – सपने वही दिखाए जाएं जो यथार्थ की जमीन पर साकार होते दिखें..

इन दिनों बस स्टॉप से लेकर निजी और सरकारी दफ्तरों में एक ही चर्चा है इसबार का बजट भला होगा कैसा। 92 साल बाद आमबजट और रेलबजट एक साथ सामने होंगे। 1924 में दोनों को अलग अलग किया गया था। इन सबके बीच लोगों की जुबान पर एक ही चर्चा पीएम की बातें हवा हवाई नहीं हैं तो नोटबंदी के बाद जितना धन टैक्स के रुप में सरकारी खजाने में आने का दावा किया जा रहा है उससे देश की जनता का कुछ तो भला किया ही जा सकता है। बातचीत को एक मूकदर्शक की तरह सुना जाए तो समझ आ जाता है कि हर जुबां पर जो जिक्र है वह अपने लिए संचय का नहीं है.. देश हित में आने वाली पीढि़यों के लिए हर व्यक्ति सब लुटा देने को तैयार है..शर्त बस इतनी सी कि जो कहा जा रहा है वह जमीन पर दिखाई देना चाहिए...

तर्क तो ऐसे कि जब माननीय के आने से पहले 24 घंटे में 10किमी सड़क बनाई जा सकती है तो क्या बनी बनाई सड़कों को नहीं सुधारा जा सकता...क्या शिक्षा जो व्यवसायिकता के दौर से गुजरते हुए नीलामी के बाजार में खड़ी हो गई है जिसे ऊंची बोली लगाकर ही खरीदे जा सकने की नौबत आ गई है का दोबारा सरकारीकरण या यूं कहें कि बजट से शिक्षा के लिए कुछ बेहतर विकल्प तैयार नहीं किया जाना चाहिए...स्वास्थ्य सेवाओं में इजाफा किए जाने पिटारे से कुछ निकलना ही चाहिए...

नौकरीपेशा व्यक्ति जब सब कुछ बैंक में रखकर टैक्स पटाएगा..बैंक से निकासी की राशि भी तय होगी तो क्या बुजुर्ग हो चुके माता पिता के लिए अब भी कोई स्वास्थ्य बीमा योजना सस्ते में उपलब्ध होगी..घर की चिंता भी पीएम आवास देने से खत्म नहीं होती..उसमें जो भ्रष्टाचार का कीड़ा लगा है उसे दूर करने से मिटेगी..फिर होम लोन सस्ते करने के विकल्प पर क्या सरकार ध्यान देगी..या नोटबंदी और डिजिटिलाइजेशन के नाम पर ढोल पीटकर देश की आम जनता फिर ठगी जाएगी। केंद्र सरकार अपना आम बजट एक फरवरी को पेश करने जा रही है। बजट से सीधे तौर पर मध्यम वर्ग के परिवारों पर सबसे ज्यादा असर होता है। और आम आदमी का वास्ता शिक्षा, स्वास्थ्य, रोटी, कपड़ा और मकान तक सीमित है।

उन्हें कुछ चाहिए तो सस्ता ट्रांसपोर्ट, फिर रेल हो या बस..इसके अलावा आयकर में छूट की सीमा बढ़ाया जाने की मांग पिछले तीन बजट से हर नौकरी पेशा कर रहा है। नोटबंदी और कालेधन पर अंकुश के जुमले ने इस बार के आम बजट से हर वर्ग की उम्मीदें बढ़ा दी हैं। इनका रखा जाए ध्यान तो बनेगी बात- शिक्षा पर खर्च सीमित किया जाए आज के समय में बच्चों की पढ़ाई मध्यम वर्ग के परिवारों के लिए एक चुनौती बन गई है एक नौकरी पेशा व्यक्ति को कुल सैलरी का 20-30 प्रतिशत तक केवल बच्चों की पढ़ाई पर खर्च करना पड़ता है। इस खर्च को सीमित करने के लिए सरकार को पहल करनी चाहिए। कर्मचारियों के लिए सातवां वेतन मान लागू किए जाने के बाद आयकर सीमा बढ़ाकर न्यूनतम पांच लाख रुपए करनी चाहिए। अभी सैलरी का लगभग 20 प्रतिशत तो टैक्स में ही चला जाता है। अमीर हो या गरीब सभी के बच्चों का शिक्षा का समान अधिकार दिया जाना चाहिए..नौनिहालों की चिंता है तो बजट में निजी स्कूलों की फीस पर नियंत्रण लगाने फीस नियामक आयोग का गठन किया जाने जैसे प्रावधान और स्कूलों की फीस श्रेणीवार तय कर देनी चाहिए। हेल्थ इंश्योरेंस सस्ती दरों पर हो उपलब्ध हेल्थ इंश्योरेंस को भी बुजुर्गों के लिए कम खर्चीला किए जाने की जरूरत है। न सिर्फ बुजुर्ग बल्कि देश के हर युवा को स्वास्थ्य गारंटी सेवा के तहत कम दरों पर हेल्थ इंश्योरेंस उपलब्ध कराए जाने के प्रवाधान किए जाने चाहिए।

साथ जीवन रक्षक दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करते हुए इसके दायरे में और भी दवाओं को शामिल किया जाना चाहिए। टैक्स की मार अब कम की जाए सबसे पहले केंद्र सरकार को करों का बोझ मध्यम वर्ग पर कम करना चाहिए। वर्तमान में आयकर सीमा 3 नहीं 3.50 किए जाने की आवश्यकता है प्रति व्यक्ति आय के दावे देखे जाएं तो आज आम आदमी की जरूरत 900- 1000 रुपए प्रतिदिन की है। जिसे टैक्स फ्री किया ही जाना चाहिए। मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए इतनी राहत ही संजीवनी का काम करेगी। होमलोन को सस्ता किए जाने की जरूरत अपना घर सबका सपना होता है कस्बों का शहर में तब्दील होना वहां प्रॉपर्टी के रेटों में जिस स्तर का इजाफा हो रहा है उससे लोगों के खुद के घर के सपने पूरे नहीं किए जा सकते। आम आदमी आज भी टू बीएचके की चाहत पूरी करने की स्थिती में नहीं है। ऐसे में पीएम आवास विकल्प हो सकता है लेकिन पहली पसंद नहीं.. वो गरीबों के लिए है मध्यम वर्गीय परिवार इनसे अब भी अधूता है।

िलहाजा बैंक की ब्याज दरों में कटौती की मांग भी इस बजट में किए जाने की पहल होनी ही चाहिए। घर के होमलोन की ईएमआई कम हो जाने का सपना पूरा हुआ तो लोगों के अपने घर के सपना भी पूरा हो जाएगा। सबसे पहले तो होमलोन की दरों को कम करके इसे सस्ता किए जाने की जरूरत है। उद्योगों को भी राहत की दरकार- देश में ज्यादातर उद्योग मंदी के दौर से गुजर रहे हैं। बिजली, पानी के लिए तरसते उद्योगों को भी सस्ती दरों पर बिजली के साथ ही पानी भी सस्ती दरों पर उपलब्ध कराने की दिशा में पहल की जानी चाहिए। स्वयं का व्यवसाय स्थापित करने लोगों के लिए बेहतर योजनाओं के साथ ही उन्हें अनुभव का लाभ दिलाने बड़ी कंपनियों में प्रशिक्षण जैसे अवसर भी दिए जाने के विकल्पों पर काम किया जाना चाहिए। घरेलू उद्योग और पारंपरिक उद्योंगो को बढ़ावा देने के लिए योजनाएं तैयार की जाएं। बहुमंजिला इमारतों के साथ बड़े बड़े कॉर्पोरेट दफ्तरों से पहचान रखने वाली बी ग्रेड टाउन की तरफ आईटी कंपनियों की आमद के लिए उन्हें पर्याप्त रियायतें दी जानी चाहिए। जिससे बी ग्रेड टाउन में ही पढ़े लिखे युवाओं को रोजगार उपलब्ध करवाया जा सके। कृषि एक बेहतर विकल्प- रोजगार और उद्योग दोनों ही रुपों में देश में कृषि को बढ़ावा दिए जाने की आवश्यकता है। इसके लिए आम बजट में सरकार को किसानों की जमीन खरीद फरोख्त पर रोक लगाए जाने से लेकर फसल उत्पादान बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाए जाने की उम्मीदें किसानों को हैं। किसान अपने हरे भरे खेतों और पशुधन के साथ खुश रहना चाहता है बशर्ते कि उसे उत्पादन का सही मूल्य मिले। इतना ही नहीं समय पर बिजली, पानी और खाद, बीज का इंतजाम किए जाने से ही वह खुश है। मंहगाई की मार से कोई निजात दिला सकता है तो वह इस देश का किसान है जो सही मायनों में देश निर्माता है। इसलिए खाद्य उत्पादन की दिशा में नए कदम उठाए जाने के साथ ही किसान बीमा, फसल बीमा, मवेशी बीमा के साथ पूर्व के बजट में घोषित मृदा परीक्षण प्रयोगशालाओं के संचालन के लिए भी बजट का प्रावधान होना चाहिए। जागरुक किसान तो केंद्र सरकार को अभी से किसान विरोधी करार देने लगी है..जानकर आश्चर्य हुआ तो पूछ लिया वजह क्या है ऐसी सोच क्यों? उत्तर आप भी सुनिए...70 साल तक शासन करने वाली कांग्रेस को कोसने वालों से पूछो...यूपीए की सरकार किसानों को प्रति क्विंटल 200 रुपए प्रोत्साहन राशि दे रही थी..आखिर उसे बंद क्यों किया...गेंहू उत्पादन में भारत पहले नंबर पर है...चावल उत्पादन में हम दूसरे नंबर पर हैं...दलहन और तिलहन के उत्पादन की स्थिती भी ठीक ही है...ये किसान आंकड़े सामने रखते हुए बात कर रहे हैं। सरकारी रिकॉर्ड में पिछले दो सालों से उत्पादन की स्थिती यूपीए सरकार की तुलना में बेहतर है...फिर अपनी ही रिपोर्ट में दूसरे देशों को गेंहू और चावल भेजने वाले देश को भला बाहर से गेंहू और चावल के साथ दालें मंगवाने की जरूरत क्यों पड़ी...

सवाल मुझे तो सोचने पर मजबूर कर देता है..अब जरा आप भी सोचिए... पांच राज्यों में चुनाव के मद्देनजर आमबजट का लोक लुभावन होना तय है लेकिन आवश्यका इस बात की है बजट लागू किए जाने योग्य भी हो घोषणाएं महज कागजों तक सिमट कर न रह जाएं.. तीन साल तक बातें बहुत हुई अब जनता का विश्वास जीतने कुछ ठोस कदम उठाए जाने की आवश्यकता है सपने वही दिखाए जाएं जो दो सालों में यथार्थ की जमीन पर साकार होते दिखें...

कुमार पाठक 

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