ज्योतिष

बिना किसी संत के जीवात्मा को परमात्मा स्वीकार नहीं करते- रामकृष्णाचार्य जी महाराज

बिना किसी संत के जीवात्मा को परमात्मा स्वीकार नहीं करते- रामकृष्णाचार्य जी महाराज

*प्रतिभाशाली को कभी भी छोटा नहीं समझना चाहिए*

*जीवन में सफलता का सबसे बड़ा मंत्र सहजता ही है*

राजकुमारी जानकी ने धनुष टूट जाने के पश्चात राघव जी से कहा हे प्रभु इस समाज में जिस ने धनुष को तोड़ा वह तो विनम्रता से सिर झुकाए खड़ा है और जो इसे डिगा तक नहीं सके वे अभी भी अकड़ कर खड़े हैं आप कुछ समय और ऐसे ही खड़े रहें ताकि इन अभिमानीयों को शिक्षा मिले यह बातें निकुंज आश्रम श्रीधाम अयोध्या से पधारे हुए जगद्गुरु रामानुजाचार्य श्री स्वामी रामकृष्णाचार्य जी महाराज ने शिवरीनारायण मठ महोत्सव में राम कथा के रस पान करने के लिए भारी संख्या में उपस्थित श्रोताओं को संबोधित करते हुए व्यासपीठ की आसंदी से अभिव्यक्त की उन्होंने कहा कि रावण और बाणासुर जैसे महान योद्धा शिव धनुष को उठाना, तोड़ना तो बहुत बड़ी बात है तिल भर भूमि डिगा नहीं सके, तब दस हजार राजा एक साथ धनुष को उठाने लगे "भूप सहस दस एकहीं बारा, लगे उठावन टरहिं न टारा" कुछ लोग यह प्रश्न करते हैं कि दस हजार राजागण एक साथ धनुष को कैसे पकड़े होंगे याद रखना यह कोई साधारण धनुष नहीं भगवान शिव का धनुष है यह राजाओं को देखकर उनकी क्षमता के अनुसार भारित या हल्का हो जाता था यह धनुष जड़ नहीं चेतन है, राजाओं का जो समूह है वह तारों की तरह है और धनुष अंधकार की तरह *अहंकार शिव बुद्धि अज, मन शशि चित्त महान* शिव का धनुष अहंकार का प्रतीक है और अहंकार को कभी भी अहंकार तोड़ नहीं सकता उसे तो कोई विनम्र पुरुष ही तोड़ सकता है! सभी राजा श्रीहत हो गए अर्थात उनके चेहरे की कांति मलिन पड़ गई पूरे राजसभा में सन्नाटा छा गया, राजा जनक के हृदय में पीड़ा भर आया उन्होंने कहा *वीर विहीन महि मैं जानी* मैं समझ गया कि अब धरती वीरों से रहित हो गई है, वैदेही का विवाह ब्रह्मा ने लिखा ही नहीं है,हे राजाओं अपने -अपने घर को लौट जाओ मैं अपना प्रतिज्ञा छोड़ नहीं सकता अपने सुकृत पुण्य को जाने नहीं दूंगा, भले ही मेरी बेटी कुंवारी ही क्यों न रह जाए, जनक की बातों को सुनकर लक्ष्मण जी क्रोधित हो गए *कही जनक जस अनुचित बानी, विद्यमान रघुकुल मणि जानी* रघुकुल तिलक के समाज में रहते हुए कोई भी ऐसा अनुचित बानी कहने की साहस नहीं कर सकता जैसा जनक ने कहा है! उनके होंठ फड़कने लगे "जब मणि पर विपत्ति आती है तब फनी ही बोलता है" लक्ष्मण जी शेषनाग हैं उन्होंने एक को धनुष टूटने के पहले डांटा और दूसरे को धनुष टूटने के बाद। उन्होंने ज्ञानी जनक जी को भी डाटा और वीर परशुराम जी को भी कारण कि लक्ष्मण जी *रघुपति कीरति बिमल पताका* रघुनाथ जी की कीर्ति को फहराने वाले दंड के समान हैं, वे जीवों के आचार्य हैं जब कोई परमात्मा के विरुद्ध कार्य करता है तब वे उन्हें दंड देने से नहीं चूकते। लक्ष्मण जी की क्रोध से धरती डगमगाने लगी, लेकिन सीता जी के हृदय में प्रसन्नता छा गई वह जानती थी कि जब तक लक्ष्मण बोलेंगे नहीं तब तक रघुनाथ जी डोलेंगे नहीं, वह शांत ही रहेंगे कारण कि रामजी ब्रह्म हैं, उन्हें ना तो संसार में कुछ पाने की लालसा है और ना ही कुछ खोने की चिंता! जब तक किसी का जीवन बाँकी हो उसे तोड़ा नहीं जा सकता इसलिए विश्वामित्र जी समय की प्रतीक्षा कर रहे थे अभी धनुष का जीवन बाँकी था उचित समय आने पर विश्वामित्र ने राघव को आदेश दिया। याद रखना राजा जनक ज्ञानी हैं और जब ज्ञानी दुखित हो जाता है तब समाज का अहित होता है इसलिए मुनि विश्वामित्र ने कहा हे राम उठो धनुष का भंजन करो और हे तात जनक जी के हृदय की संताप को मिटाओ *सहज ही चले सकल जग स्वामी* संपूर्ण जगत के स्वामी साधारण चाल से सहजता पूर्वक चलने लगे, याद रखना आप जब समाज में आगे बढ़ जाओगे तब आपको आलोचना -समालोचना का सामना करना ही पड़ेगा, आप इन सभी के मध्य अपनी सहजता को बनाए रखना राम जी जब धनुष तोड़ने के लिए आगे बढ़े तब माता सुनैना व्याकुल हो गई उसने सोचा कि यह छोटा सा बालक धनुष कैसे तोड़ पाएगा ?इसे कोई समझाता क्यों नहीं है? तब उनकी सखीयों ने कहा- हे महारानी प्रतिभाशाली को कभी छोटा नहीं समझना चाहिए! एक छोटा सा दीपक कमरे का अंधकार दूर कर देता है। धनुष टूटने के पश्चात माता जानकी जय माला लेकर राघव के सामने उपस्थित हुई वह प्रेम से विहल हो गई है, उनसे प्रेम विवसता के कारण जय माला पहनाई नहीं जा रही थी रामचंद्र जी ने कहा हे राजकुमारी जयमाला पहनाओ तब सीता जी ने कहा प्रभु इस समाज में जिस ने धनुष को तोड़ा वह तो विनम्रता से सिर झुकाए हैं, और जो इसे तिल भर भूमि हिला तक न सके वह अभी भी अकड़ कर खड़े हैं आप कुछ समय ऐसे ही खड़े रहें ताकि अभिमानियों को शिक्षा मिले। धनुष अहंकार का प्रतीक है जब तक अहंकार रहता है तब तक भक्त और भगवान का मिलन हो ही नहीं सकता बिना किसी संत के जीवात्मा को परमात्मा स्वीकार नहीं करते *बिलासपुर विश्वविद्यालय के कुलपति उपस्थित हुए कथा श्रवण के लिए* शिवरीनारायण मठ महोत्सव अपने पूरे शबाब पर है लोगों का हुजूम उमड़ रहा है लोग दूर-दूर से बड़ी संख्या में सपरिवार आकर के भगवान की कथा को सुनकर अपना जीवन धन्य बना रहे हैं, इसी सिलसिले में अटल बिहारी वाजपेई विश्वविद्यालय बिलासपुर के कुलपति श्री जी डी शर्मा कथा सुनने के लिए उपस्थित हुए उनके साथ श्री लक्ष्मण प्रसाद मिश्र भी थे कुलपति ने व्यासपीठ का अभिवादन किया एवं आशीर्वाद प्राप्त की इस अवसर पर उन्होंने उपस्थित विशाल जनसमूह को संबोधित करते हुए कहा कि यहां आकर शिक्षा की पद्धति पर विचार करने का मन करता है हम लोग बहुत परिश्रम करके भी ऐसी शिक्षा अपने विश्वविद्यालय एवं विद्यालयों में छात्र-छात्राओं को प्रदान नहीं कर पाते। हमें भी अपने विश्वविद्यालय स्तर पर इस तरह के शिक्षा पद्धति का समावेश करना होगा ताकि लोगों को अच्छे से अच्छा संस्कार मिल सके, वर्तमान परिवेश में छात्र-छात्राएं उच्च शिक्षा प्राप्त तो कर रहीं हैं लेकिन उचित संस्कार के अभाव में वे अपनी माता पिता एवं समाज से दूर होते जा रहे हैं जो कि चिंता का विषय है उन्होंने राजेश्री महन्त जी महाराज के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त किया और कहा कि हमें बार-बार इस तरह के कार्यक्रम में उपस्थित होने का सौभाग्य प्रदान करते हैं। मंच में हमेशा की तरह मुख्य यजमान के रूप में राजेश्री डॉक्टर महन्त रामसुन्दर दास जी महाराज विराजित थे।

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