ज्योतिष

शिष्य जो गुरु-आज्ञा का पालन करता है, उसी का कल्याण होता है, दूसरे का नहीं - भानुजी शुक्ल ।

शिष्य जो गुरु-आज्ञा का पालन करता है, उसी का कल्याण होता है, दूसरे का नहीं - भानुजी शुक्ल ।

ज्योतिष गुरु एवं कथा वाचक पंडित भानुजी महाराज ने बताया कि जैसे किसान खेत में बीज बोने से पहले उसकी घासादि निकालकर खेत की सफाई करता है, हल चलाकर नरम करता है, उसके कंकड़-पत्थर निकालकर खाद डालता है, जब भूमि बोने योग्य हो जाती है, तब उसमें ऋतु के अनुसार निर्दोष बीज बोता है। फिर समय-समय पर उसकी गुड़ाई-सिंचाई करता है। जब तक फसल नहीं पकती, उसको हानि पहुँचाने वाले जीव-जन्तु तथा मनुष्यों से रक्षा करता है,  पक जाने पर काटता है। वैसे ही सद्गुरु रूपी किसान शिष्य के चित्तरूपी भूमि में कर्म-उपासनादि बीज बोने से पहले उसके दुर्व्यसनों को दूर करते हैं। उक्त कथन ज्योतिष गुरु पं भानुजी महाराज आदर्श नगर मोवा में सत्संग के दौरान भक्तों से कही। आगे उन्होंने बताया यदि उसकी कर्म में रुचि है, संसार के भोगों से वैराग्य नहीं है, तो वह कर्म का अधिकारी है, उसे कर्म का उपदेश देते हैं। यदि वह संसार में न अधिक अनुरक्त है न विरक्त ही है,  मध्यम श्रेणी का है, तो भक्तियोग का उपदेश देते हैं। यदि लोक-परलोक के भोगों से परम विरक्त है, तो ज्ञान का बीज डालकर जब तक वह परिपक्व नहीं होता, तबतक कामादि शत्रुओं से रक्षा करते हैं। किन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि शिष्य कुछ भी न करे, उसे गुरु आज्ञानुसार चलना चाहिए। पं भानुजी महाराज ने आगे बताया कि जीव पर चार कृपा होने से ही जीव का कल्याण होता है - १. ईश्वर कृपा - मनुष्य शरीर की प्राप्ति। २. शास्त्र कृपा - शास्त्रानुसार आचरण व शास्त्रोक्त गुरु की प्राप्ति। ३. गुरु कृपा - रहस्यों सहित सद्गुरु से दीक्षा की प्राप्ति। ४. आत्म कृपा - ऊपर कहे तीनों प्रकार की कृपा होने पर भी यदि शिष्य शास्त्र और गुरुओं की आज्ञा का पालन नहीं करता, तो तीनों कृपा व्यर्थ हो जाती है। अतः जो शिष्य गुरु-आज्ञा का पालन करता है, उसी का कल्याण होता है, दूसरे का नहीं।

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