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छतीसगढ़ में एक ऐसा मंदिर जहा तालाब के पानी से छिडकाव करने पर शरीर कि बीमारी व खेतो के फसलो मे लगे कीडे होते है दूर.....पढ़े BBN24NEWS की ये विशेष खबर

छतीसगढ़ में एक ऐसा मंदिर जहा तालाब के पानी से छिडकाव करने पर शरीर कि बीमारी व खेतो के फसलो मे लगे कीडे होते है दूर.....पढ़े BBN24NEWS की ये विशेष खबर

BBN24NEWS विशेष खबर

 

माँ मावली का मंदिर कब और किसने बनवाया इसका कही कोई प्रमाण नही मिलता जनश्रुति है कि पहले राजस्थान से बंजारा जाति के लोग अपने काफिले के साथ गेरू बेचने आया करते थे जो ग्राम सिंगारपुर मे महिनो अपना पडाव डालकर रहते थे और इस मंदिर तथा तलाब का निर्माण उन्ही के द्वारा कराया गया था प्राचीन काल मे यह क्षेत्र मंडला,गढा, कोटा के गोड राजाओ के अधीन था, और गोड आदिवासी जाति के लोग ही रहा करते थे मराठा शासको के आधिपत्य में इस क्षेत्र के आ जाने के पश्चात रघुजी तृतीय ने सन 1827 मे रायपुर के जगदेव साव को इस इलाके के 11 ग्राम इनाम स्वरूप  प्रदान किये थे। जिसमे सिंगारपुर भी एक था तब भाटापारा का अस्तित्व था ही नही और उस समय सिंगारपुर मे माँ मावली का मंदीर था जिसका उल्लेख प्रथम अंग्रेजी गजेटियर सन 1901 मे मिलता था गजेटियर मे अचंल के प्राचीन मंदिरों मे सिंगारपुर की माँ मावली एवं तरेंगा की महामाया का ही उल्लेख है लोगो का कथन है कि मॅा मावली का मंदिर तीन से चार सौ वर्ष पुराना है आज तरेंगा के महामाया मंदीर और सिगारपुर की माँ मावली की ख्याति दिनो दिन बढती जा रही है।  प्राचीन काल से ही दोनो स्थानो पर गोड जाति के पुजारी ही माँ की पुजा अर्चना किया करते थे और आज भी मावली माँ की पुजा अर्चना उन्ही गोड पुजारियो के वंशज करते आ रहे है।

 

आप को बता दे कि जनश्रुति है कि वीरू नाम का बैगा माॅ मावली की पुजा अर्चना किया करता था उसके साथ माॅ मावली बालिका रूप मे बाजार आदि घुमने जाया करती थी वीरू के पश्चात उसके वंशज गुलाल,गंजन,गोपाल पीढी दर पीढी पुजन करते रहे गोपाल बैंगा की बहन  सुखरी बाई थी जो माॅ मावली को अन्नन्त भक्त थी वह प्रति दिन और  रात्रि मे माॅ का पुजन करती थी कहते है कि सुखरी को माॅ का प्रत्यक्ष दर्शन होता था।सुखरी को देखने वाले आज भी अनेक वृद्व मोजुद है ||

NEWS EDIT BY : YASH LATA 

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