राजनीति

		रहस्यों से भरा है विधायक दलेश्वर का कार्यकाल

रहस्यों से भरा है विधायक दलेश्वर का कार्यकाल

सूरज लहरे

राजनांदगांव। लोकतंत्र का अर्थ है, एक ऐसी जीवन पद्धति जिसमें स्वतंत्रता, समता और बंधुता समाज-जीवन के मूल सिद्धांत होते हैं। लोकतंत्र, अपनी महंगी और समय बर्बाद करने वाली खूबियों के साथ सिर्फ भ्रमित करने का एक तरीका भर है, जिससे जनता को विश्वास दिलाया जाता है कि वह ही शासक है जबकि वास्तविक सत्ता के कुछ गिने-चुने लोगों के हाथ में ही होती है। उपरोक्त दोनों कथन एक-दूसरे के विरुद्ध होने के बाद भी लोकतंत्र की व्यापकता को इंगित करने के लिए पर्याप्त हैं। लोकतंत्र शब्द राजनीतिक शब्दावली के सर्वाधिक इस्तेमाल किए जाने वाले शब्दों में से एक है। यह महत्वपूर्ण अवधारणा है, जो अपनी बहुआयामी अर्थों के कारण समाज और मनुष्य के जीवन के बहुत से सिद्धांतों को प्रभावित करता है। लोकतंत्र में चुने हुए विधायक दलेश्वर डोंगरगाव विधानसभा से विधायक हैं और इनके विधानसभा में जो कुछ इनके कार्यकाल में हुआ है वो चौकाने वाला है। डोंगरगांव विधानसभा के अधीनस्थ एक पंचायत तिलईरवार है जहां लगभग दो साल पहले रामाधीन के घर के सामने सामुदायिक भवन का निर्माण होने के बाद विधायक के हाथों से उदघटित होना था, निर्माण के दौरान रामाधीन अपने घर के सामने हो रहे निर्माण से परेशान था और उद्घाटन के दौरान विधायक के साथ झूमा झटकी और विवाद का वातावरण निर्मित हो गया। फिर क्या भवन का उद्घाटन तो हुआ ही लेकिन उसी दिन से रामाधीन गायब हो गया। सूत्र बताते है कि रामाधीन को खोजने के अथक प्रयास के बाद भी रामाधार मिला तो नहीं लेकिन अबला हुए परिवार को विधायक का सहारा मिल गया और रामाधीन के परिवार को विधायक दलेश्वर द्वारा तिलईरवार से आलीवारा ले आये रामाधीन के परिवार में पत्नी और बच्चे ही थे, बच्चा छोटा था, लेकिन पत्नी को किसी भी के सहारे की जरुरत थी और उसे विधायक दलेश्वर की दरियादिली से मिल गई। अब रामाधार की पत्नी दलेश्वर के फार्म हाऊस में काम करने लगी। इसी बीच विधायक रामाधीन की पत्नी को सहयोग करते हुए स्वयं के जमीन से लगे हुए एक मकान भी बना कर भी दे दिए लेकिन इसी बीच विधायक के पिता ने सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे का शिकायत किये। शिकायत की जांच हुई शिकायत सही पाई गई और निर्मित मकान को तोडऩे का आदेश पारित हुआ। मकान तोड़ दिया गया, इस बीच ना ही रामाधार मिला और ना ही रामाधार की खोज खबर प्राप्त हुई और अब परिवार के लोग साकरदाहरा में रहकर जीवन यापन कर रहे हैं। मामले में गुमशुदगी की रिपोर्ट भी दर्ज हुई है।

*गरीबों की शिकायत पर प्रसाशन की चुप्पी संदेह के दायरे में* तिलइरवार में निवासरत रामाधीन पिता सदाराम पटेल का मतदाता सूची विधानसभा क्रमांक 76 भाग संख्या 143 में दर्ज है। जो सामुदायिक भवन निर्माण के दौरान हुई झूमा झटकी और विवाद के बाद से गायब है, जिनकी खोज खबर के बाद भी कोई जानकारी नहीं मिलने के बाद संबंधित थाने में गुमशुदगी की रिपोर्ट भी दर्ज कराये लेकिन रामाधीन के बारे में आज तक कोई जानकारी नहीं मिली और ना ही कोई खबर प्राप्त हुई। संबंधित मामले में विभाग की लापरवाही ही कहा जाए कि मामले को लेकर कोई भी जिम्मेदारी का निर्वहन नहीं किये। रामाधीन के गायब पर गांववालो के बीच कानाफूसी के साथ विधायक के कार्यशैली पर उंगली उठते हुए दिखाई दे रहे हैं। लोगो का कहना है कि विवाद के बाद परिवार को सहायता देने वाले विधायक के पिता ही ने निर्मित मकान को तोड़वाने में शिकायतकर्ता कैसे हो गए। आखिर इस शिकायत के पीछे का राज क्या है और भी कई तरह की बातों के बीच हुई घटना का रहस्य क्या है और वो परिवार को सहायता देने के बाद फिर से बेघर होने के बाद चुप क्यों क्यों है?

*क्या मामले को शांत करने विधायक ने दी पनाह* जाहिर तौर पर हमें इस पर गर्व है और होना भी चाहिए। पर, क्या हमने लोकतांत्रिक मूल्यों और आदर्शों का भी निर्वहन किया है? क्या सिर्फ चुनावी औपचारिकता निभाने मात्र से लोकतंत्र मजबूत हो जाता है? क्या बड़ी संख्या में हमारे राजनीतिक दल और नेता ‘लोकतंत्रÓ के नाम पर लोकतांत्रिक मूल्यों की धज्जियां नहीं उड़ा रहे हैं? क्यों हर तरह से असफल और नाकाबिल लोग हमारे शासक बनते जा रहे हैं? क्यों हम चाह कर भी कुछ नहीं कर पाते हैं? बहुत से प्रश्न हैं, जो आज हमें झकझोर रहे हैं- क्या हमारे यहां सचमुच में लोकतंत्र है? या यह सिर्फ एक भीड़तंत्र है, जिसे एक छोटा सा अपितु प्रभावी वर्ग अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए इस्तेमाल कर रहा है? क्या लोकतांत्रिक मूल्य केवल जुबानी जमा-खर्च के लिए हैं? क्या उनका कोई व्यावहारिक मूल्य नहीं है? क्या जात-पात, धर्म-संप्रदाय के संकीर्ण दायरे में सिमटे मतदाताओं और उनके द्वारा चुने जन-प्रतिनिधियों पर देश का भविष्य छोड़ा जा सकता है? क्या क्या आजादी के सत्तर साल बाद भी लोकतंत्र के नाम पर बढ़ती असमानता, भुखमरी, गरीबी आदि पर आंखे मूंदी जा सकती हैं? और सबसे बड़ी बात, क्या लोकतंत्र के नाम पर नेताओं को लूट-खसोट की अनुमति दी जा सकती है?

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