छत्तीसगढ़

विशेष :  माओवादी कर रहे हैं मानव अधिकार का हनन  आदिवासी ग्रामीणों को उन की वजह से उठानी पड़ती हैं कई परेशानियां

विशेष : माओवादी कर रहे हैं मानव अधिकार का हनन आदिवासी ग्रामीणों को उन की वजह से उठानी पड़ती हैं कई परेशानियां

जल जंगल जमीन की लड़ाई में हजारों आदिवासी जेल गए

कई आदिवासीयो को मुखबिर के नाम पर उतार दिया मौत के घाट, पत्रकारों को भी बना रहे निशान

बीजापुर -- जिला मुख्यालय हो दंतेवाड़ा,सुकमा, नारायपुर हो ग्रामीण क्षेत्र के आदिवासी ग्रामीण होते हैं परेशान जल जंगल जमीन की लड़ाई में अब तक हजारों आदिवासी जेल पहुंच चुके हैं । वहीं मुठभेड़ में भी आदिवासी ग्रामीण माओवादी मारे गए हैं । अलग-अलग क्षेत्रों में हजारों की संख्या में ग्रामीण आदिवासियों के ही मौत हुई है । कई तरह की परेशानियों का शिकार आदिवासी ग्रामीणों के परिवार को ही उठानी पड़ती है । कुछ दिन पूर्व पुलिस मुखबिरी के नाम पर मेटापाल, पालनार, सावनार, कोंडापल्ली , जैसे आदिवासी क्षेत्र के कई नव युवकों को जनअदालत लगाकर मुखबिरी के नाम पर मौत की सजा दे दी गई माओवादियों के द्वारा परिवार के सदस्यों को उनके शव भी नहीं मिले कितनी खामोशी से कई आदिवासी परिवार ने माओवादी के इस जुल्म को सहा यह कहा जा सकता है । कि एक तरह से मानव अधिकार का हनन किया माओवादियों के खिलाफ परिवार ने दबी जुबान से विरोध तक नहीं किया खामोशी से सह लिय क्योंकि अगर आवाज उठती तो अगली बारी किसी और परिवार की होती । छत्तीसगढ़ के बस्तर के कई इलाके जंगली क्षेत्रों में आते हैं । जहां माओवादियों के अपने कब्जे में कर लिया है । सरकार के साथ भ्रष्टाचार की लड़ाई ,सलवा जुडूम की लड़ाई से बचें कुछ परिवार को खत्म करने का जुनून माओवादीयो में कुछ इस कदर हैं कि कभी भी कही भी किसी को भी मार देते है ।दूसरी ओर माओवादी और पुलिस के बीच के बीच छिड़ी जंग से कई आदिवासी बेकसूर परिवार को सजा मिल रही हैं ।माओवादियों की संगठन का कोई लीडर यह नहीं समझ पा रहा है । क्षेत्र की समस्याओं को कैसे दूर करे परंतु माओवादी लीडर सिर्फ जन अदालत लगाकर अनजान व्यक्ति को मुखबिरी का नाम दें मौत की सजा ही दे पाते हैं । उसके बदले में ग्रामीण क्षेत्र के कई निर्दोष युवक पुलिस के हत्थे चढ़े जेल पहुंच चुके हैं ।

पत्रकारों को भी बना रहे हैं निशान पिछले दोनो माओवादीयो के द्वारा दो वरिष्ट पत्रकारों को मार चुके है । वही कुछ दिनों पहले एक पेड़ में पर्चा लिख कर पत्रकार को मारने की बात लिखी थी । माओवादी सगठन के बड़े लिडर एक ओर बोलते है । कई घटनाओं के होने के बाद प्रेस नोट जारी कर जाँच करें की बात बुद्विजीवियों से कहते हैं । दूसरी ओर पत्रकार ,बुद्विजीवी वर्ग को भी अपने जाना का खतरा है । माओवादी सगठन से क्योंकि की सगठन में मिलिशय वर्ग के माओवादीयो को जानकारी नहीं होती किसी भी बात की क्योंकि य मिलिशय वर्ग ओ आदिवासी समुदाय के लोग है । जो गाँव मे रह कर छोटा -मोटा काम कर के जीवन यापन कर रहे है । साथ ही माओवादियों के काम भी करते है किसी बात की जानकारी नहीं होती बड़े लीडरों की जब गाँव की ओर पुलिस जाती हैं । बेगुनाह और आदिवासी क्षेत्रों के आदिवासी ग्रामीण पुलिस के हत्थे चढ़ते हैं और या मुठभेड़ में मारे जाते हैं या जेल भेज दिए जाते हैं फिर उनके परिवार पर आती है बड़ी विपत्ति जल जंगल जमीन की लड़ाई करने वाले की मदद कोई नहीं करते फिर परिवार के पास पैसे तक नहीं होते कोर्ट के लिए ना जगदलपुर, दंतेवाडा, बीजापुर में बंद अपने परिवार के सदस्य जो जेल में है उनसे मिलने जाने के लिए ऐसे कई परिवार है जो कई सालों से परिवार से दूर है ।

सामाजिक कार्यकर्ता व वकील बेला भाटिया कहती हैं विश्व भर में शोषित वंचित वर्ग के अथक संघर्ष और बलिदानों के बाद सन 1948 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने विश्वव्यापी मानव अधिकार घोषणापत्र में प्रत्येक मनुष्य के बुनियादी मानव अधिकार को मान्यता दी अगर हम एक बेहतर समाज चाहते हैं तो सबसे पहले हमें खुद बाघ्य होना पड़ेगा की हम किसी के मानव अधिकार का हनन ना करें यही लोकतांत्रिक होने की एकमात्र कसौटी है बस्तर में चल रहे युद्ध का निराकरण तभी हो सकता है जब सरकार और सीपीआई (माओवादी) मानव अधिकारो की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध रहे ।

सामाजिक कार्यकर्ता सोनी सोढ़ी कहती हैं कि माओवादियों के द्वारा लगाए गए बैनर पोस्टर की प्रशासन ,सरकार से जांच होनी चाहिए कार्यवाही होनी चाहिए एक कमेटी बनाकर लोगों से बैठकर चर्चा भी होनी चाहिए । तभी सच्चाई सामने आएगी ।

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