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कृषि अनुसंधान में परमाणु ऊर्जा के उपयोग के मिल रहे हैं चमत्कारिक परिणाम

कृषि अनुसंधान में परमाणु ऊर्जा के उपयोग के मिल रहे हैं चमत्कारिक परिणाम

रायपुर, 22 फरवरी, 2020। परमाणु ऊर्जा का नाम सुनते ही जेहन में परमाणु बम या नाभिकीय विखण्डन का खयाल आता है लेकिन कृषि अनुसंधान के क्षेत्र में परमाणु ऊर्जा के उपयोग के चमत्कारिक परिणाम सामने आ रहे हैं। परमाणु ऊर्जा के उपयोग से फसलों के गुणों में परिवर्तन और उत्पादन में वृद्धि के साथ ही उनकी संग्रहण अवधि में बढ़ोतरी की जा रही है। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर और भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र, मुम्बई के संयुक्त तत्वावधान में फसलों में सुधार की परियोजना के आशातीत परिणाम प्राप्त हुए हैं। विभिन्न फसलों की अनेक किस्मों में विकिरण तकनीक का उपयोग कर पौधों की ऊचाई कम करने, उपज बढ़ाने और परिपक्वता अवधि कम करने में कामयाबी हांसिल की गई है। इसके साथ ही विकिरण तकनीक का उपयोग कर फसलों एवं उनके उत्पादों की संग्रहण अवधि बढ़ाने में भी सफलता मिली है। यह जानकारी इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय में भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र एवं छत्तीसगढ़ शासन के कृषि विभाग के सहयोग से ‘‘कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण में विकिरण तकनीक का अनुप्रयोग’’ विषय पर आयोजित एक दिवसीय कार्यशाला में दी गई। कार्यशाला के मुख्य अतिथि छत्तीसगढ़ शासन में कृषि विभाग के सचिव श्री धनंजय देवांगन ने इस अवसर पर कहा कि यहां आकर पता लगा कि परमाणु ऊर्जा का कृषि अनुसंधान के क्षेत्र में किस तरह रचनात्मक उपयोग किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय और भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र कृषि तथा किसानों के हित में महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं। विकिरण तकनीक के माध्यम से फसलों की उपज और संग्रहण अवधि बढ़ाई जा रही है जिससे कुपोषण दूर करने में मदद मिलेगी। उन्होंने कहा कि इस तकनीक के उपयोग से छत्तीसगढ़ के 37 लाख किसान परिवारों को किस तरह लाभान्वित किया जा सकता है, इस पर विचार किया जाना चाहिए। कार्यशाला की अध्यक्षता करते हुए इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डाॅ. एस.के. पाटील ने कहा कि इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय में बार्क के सहयोग से संचालित फसल सुधार परियोजना में म्यूटेशन ब्रीडिंग तकनीक का उपयोग कर फसलों के आनुवांशिक गुणों में परिवर्तन कर धान की नई किस्में विकसित की गई है जैसे - ट्राॅम्बे छत्तीसगढ़ दुबराज म्यूटेन्ट-1, विक्रम टी.सी.आर.। नवीन किस्मों के पौधों की ऊंचाई और परिपक्वता अवधि कम की गई है तथा उपज में वृद्धि की गई है। इसके साथ ही अन्य फसलों पर भी अनुसंधान कार्य चल रहा है। डाॅ. पाटील ने बताया कि परियोजना के तहत कृषि वैज्ञानिकों द्वारा 90 दिन में पकने वाली तिवड़ा की नई किस्म विकसित की गई है जबकि तिवड़ा की फसल सामान्यतः 120 दिन में पकती है। उन्होंने बताया कि इस परियोजना में मुख्य रूप से तीन बिन्दुआंे पर अनुसंधान चल रहा है - फसल सुधार, संग्रहण अवधि में वृद्धि और खाद्य प्रसंस्करण कर रेडी टू ईट फूड का निर्माण। उन्होंने उम्मीद जताई कि आने वाले वर्षाें में इस परियोजना के अंतर्गत और भी उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल होंगी। कार्यशाला में भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र के नियंत्रक डाॅ. पी. गोवर्धन ने कहा कि इस परियोजना के तहत इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय ने काफी उपलब्धियों हासिल की है जिसका लाभ छत्तीसगढ़ और देश के किसानों को मिलेगा उन्होंने कहा कि आज की कार्यशाला में परियोजना के बारे में स्पष्ट रोड मैप देखने को मिला है जिससे पता चलाता है कि इस परियोजना में आगे और भी सफलताएं मिलनी तय है। उन्होंने परियोजना के सफल संचालन के लिए इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डाॅ. एस.के. पाटील, प्रमुख अन्वेषक डाॅ. दीपक शर्मा और उनकी पूरी टीम को बधाई और शुभकामनाएं दी। उन्होंने आशा व्यक्त की कि आगामी वर्षाें में भाभा परमाणु आनुसंधान केन्द्र और इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय इसी तरह मिलकर नई-नई सफलताएं प्राप्त करते रहेंगे। कार्यशाला को बार्क मुम्बई के वरिष्ठ अधिकारियों डाॅ. वी.पी. वेनुगोपालन, डाॅ. पी.के. पुजारी और डाॅ. पी. सुप्रसन्ना ने भी संबोधित किया। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय में परियोजना के प्रमुख अन्वेषक डाॅ. दीपक शर्मा ने परियोजना के तहत संचालित अनुसंधान कार्य की रूप-रेखा प्रस्तुत की। उल्लेखनीय है कि परमाणु ऊर्जा विभाग भारत सरकार द्वारा प्रायोजित इस एक दिवसीय कार्यशाला में भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र के वैज्ञानिकों द्वारा विभिन्न विषयों पर व्याख्यान दिए गए जिनमें कृषि में विकिरण तकनीक का उपयोग और फसल पौधों का सुधार, प्रेरित विकिरण उत्परिवर्तन प्रजनन द्वारा पारंपरिक/कृषक प्रजातियों में सुधार, जैव कीटनाशक एवं जैव उर्वर, कृषि अपशिष्ट के उपयोग हेतु तकनीकी, फसल वृद्धि एवं जल संरक्षण वृद्धि के लिए विकिरण आधारित तकनीकी, व्यवसायिक फसल सुधार के लिए कृत्रिम परिवेशम में उत्परिवर्तन प्रजनन, कृषि उत्पाद की विकिरण प्रसंस्करण और पैकेजिंग प्रौद्योगिकी एवं रेडी टू ईट उत्पादों के विकास के लिए विकिरण तकनीकी शामिल हैं। इस अवसर पर परियोजना में सहयोग देने वाले प्रगतिशील कृषकांे को सम्मानित किया गया। परियोजना के व्यापक प्रचार-प्रसार के लिए दूरदर्शन केन्द्र, रायपुर में कृषि दर्शन कार्यक्रम के अधिकारी नीलम सोना को भी सम्मानित किया गया

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