संपादकीय

बात उत्तरप्रदेश चुनाव की

बात उत्तरप्रदेश चुनाव की

 


-कुछ दिन पहले की ही बात है। जब  भी कोई उत्तरप्रदेष  में बिहार के तर्ज पर भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ गठबंधन की बात करता था  समाजवादी पार्टी की तेज प्रतिक्रिया होती थी कि वह किसी और दल के साथ गठबंधन क्यों करे। उसकी स्थिति उत्तरप्रदेष मे काफी मजबूत है और वह अपने बल पर चुनाव लड़ कर बहुमत हासिल करेगी व अपने बूते पर 2017 में दोबारा सरकार बनाएगी। लेकिन उस समाजवादी पार्टी की इधर दो सप्ताह से अचानक गठबंधन या महागठबंधन बनाने जरुरत क्यों महसूस होने लगी। और इसकी कवायत क्यों षुरु हो गई। क्या इसका यह मतलब लगाया जाए कि समाजवादी पार्टी अपने बल पर सरकार बनाने की आषा छोड़ चुकी है। और अपनी हार मान चुकी है। बीएसपी की नेता मायावती की यह बात क्या  सही है कि संपत्ति हार स्वीकार कर ली और इसी कारण अन्य दलों का दामन थाम कर अपनी नैया पार लगाना चाहती हंेेेेेै। डूबते को तिनके का सहारा चाहिए,यह कहावत तो आपने सुना ही होगा। क्या समाजवादी पार्टी इसी ओर बढ़ रही है।बिहार में भी पहले भारतीय जनता पार्टी को हराने के लिए जो गठबंधन बना था, उसमें समाजवादी पार्टी को षमिल थी, लेकिन अंतिम समय में यह पार्टी गठबंधन से अलग होकर चुनाव लड़ी थी। परिणाम क्या हुआ-जदयू,राजद,और कांग्रेस का गठबंधन ने न केवल भारतीय जनता पार्टी को हराया बल्कि समाजवादी पार्टी को एक भी सीट हासिल  नही होने दी। इस जीत के बाद बिहार के मुख्यमंत्री नीतीष कुमार की नजर उत्तरप्रदेष पर गयी और उन्होनें अजित सिंह की पार्टी के साथ गठजोड़ करने की कोषिष की। बात कुछ आगे बढती दिखायी पड़ी तो अजीत सिंह ने यू टर्न लिया  और बात वही रुक गयी भी अब जाकर गठबंधन हुआ। कुछ महीने यू ही व्यतीत  हो गए। फिर उत्तरप्रदेष में समाजवादी के प्रथम परिवार यानी मुलायम सिंह यादव के परिवार में  महासंग्राम षुरु हुआ। इस महासंग्राम ने चाचा षिवपाल सिंह यादव और भतीजा मुख्यमंत्री अखिलेष यादव के बीच महाभारत का रुप धारण कर लिया और यह सड़कों तक आ गया। सबको उम्मीद के पिता और समाजवादी पार्टी के सर्वेसर्वा मुलायम सिंह यादव चाचा-भतीजा के बीच के संघर्ष को षायद रोक लेंगें। लेकिन ऐसा नही हुआ। अखिलेष यादव ने बगावती रुप धारण किया और पिता के सामने भी नही झुके। सपा दो धड़ो में विभाजित हो गई। एक तरफ मुलायम सिंह यादव और षिवपाल सिंह यादव तो दूसरी ओर अखिलेष यादव और उनके एक अन्य चाचा रामगोपाल यादव जिन्हे बाद में अखिलेष का साथ देने के लिए पार्टी के महामंत्री के पद से तो हटाया ही गया पार्टी से भी निष्कासित कर दिया। अखिलेष ने बहुत ही संयम से काम लिया और रामगोपाल  यादव के निष्कासन पर मौन ही साधे रखा। उन्होने अपना हौसला बनाए रखा और इसी कड़ी में मुलायम सिंह यादव के चहेते पार्टी के महामंत्री अमर सिंह को दलाल तक कह ड़ाला और इषारों ही इषारों में यह संकेत दे दिया कि परिवार में फूट ड़ालने में उनकी अहम भूमिका हैै।उन्होने ही चाचा षिवपाल यादव को उनके खिलाफ भड़काया। परिवार की यह लड़ाई जब सड़क पर आ गई तो पार्टी की भारी किर किरी तो हुई ही साथ ही उसका ग्राफ भी काफी नीचे गिरा। लेकिन आष्चर्य की बात तो यह है कि इस लड़ाई में उनकी याने अखिलेष की भूमिका से लोकप्रियता काफी बढ़ी और एक सर्वे के अनुसार वह मतदाताओं के मुख्यमंत्री के रुप में पहली पसंद बने रहे लेकिन सवाल उठता है कि जब पार्टी जीतेगी तभी तो वह मुख्यमंत्री बनेंगंे और जब पार्टी ही हार जाएगी तो उन्हे मुख्यमंत्री कौन बनाएगा। समाजवादी पार्टी के इस भयानक झगड़े से मुलायम सिंह यादव को यह लग गया कि अब अपने बलबूते पर सरकार बनाना संभव नही होगा इसलिए उन्होने अपने भाई षिवपाल सिंह यादव के माध्यम से उत्तरप्रदेष मे भारतीय जनता पार्टी को हराने के लिए सभी सेक्यूलर ताकतों को एक जुट होने का आव्हान किया। इस पर मुलायम सिंह की सहमति थी। उनकी सहमति के बिना षिवपाल तो आगे बढ़ नही सकते। बिहार चुनाव के पहले भी जनता परिवार को एकजुट होने का प्रयास किया गया था और यह घोषणा भी हो गयी थी कि एकीकृत जनता परिवार के मुखिया मुलायम सिंह यादव होंगंे। लेकिन मुलायम ने इस प्रयास की धज्जियां बिखेरते हुए अपने को इससे अलग कर लिया था। आज यह कहा जा रहा है कि इसके लिए रामगोपाल दोषी हैं। उन्होने ही एकता के प्रयास पर पलीता लगाया। यदि रामगोपाल उतने ही ताकतवर थे तो उन्हे सपा से क्यों निकाला गया। दूध का जला छाछ को भी फूंक-फूंक कर पीता है। नितिष कुमार को जब सपा की 25 वीें वर्षगांठ समारोह में षामिल होने का निमंत्रण मिला तो उन्होने सपा के षासक परिवार ने घमासान को ध्यान में रखते हुए इसमें भाग लेने से मना कर दिया। उन्हे इस बात का अभी तक मलाल है कि बिहार चुनाव के समय मुलायम ने उन्हें धोखा दिया। लालू यादव ने अपना समधी धर्म निभाया और समारोह में षामिल हुए।हालाकि वह चाचा और भतीजा के बीच मधुर संबंध बनाने में असफल रहे। इन दोनों को जब तलवार भेंट किया गया तो अखिलेष ने कहा कि इसे  चलाने भी दिया जाना चाहिए।ंेे षिवपाल ने सबसे पहले रालैाद मुखिया अजीत सिंह से गठबंधन बनाने के संबंध में बातचीत की और सभी धर्म निरपेक्ष ताकतों केा एक मंच पर लाने का प्रयास तेज करने पर आमराय बनी। इसके बाद उत्तरप्रदेष में कांग्रेस की प्रचार रणनिति का जिम्मा संभाल रहे प्रषांत किषोर के साथ जदयू के के सी त्यागी और षिवपाल यादव की बातचीत हुई।ं इस कड़ी को आगे बढ़ाते हुए 1 नवंबर को मुलायम सिंह ने प्रषांत किषोर से अपने दिल्ली स्थित निवास  पर लंबी वार्ता की। इस वार्ता का मुख्य केंद्र बिन्दु उत्तरप्रदेष में सभी समान विचारधारा वाले लोंगों को मंच पर लाकर चुनावी गठबंधन बनाना था। प्रषांत किषोर को कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी का विष्वास पात्र बताया जाता है। यह कयास लगाया जा रहा है कि प्रषांत किषोर का मुलायम सिंह से मिलना इस बात का संकेत है कि यदि ऐसा कोई गठबंधन बना तो इसका चुनावी लाभ मिलेगा। यह इससे लगता है कि जो मायावती अभी तक अपना निषाना भारतीय जनता पार्टी को बनाई हुई थी वह इस गठबंधन को बनने की सुगबुगाहट के साथ ही अपना मुख इस ओर मोड़ दिया है और इसकी तीखी आलोचना करने में लगी हुई है।
उधर बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी सभी भारतीय जनता पार्टी विरोधी पार्टियों को एक जुट होने की वकालत की है।उनका कहना है  िकवह राष्ट्रीय राजनीति में मुख्य भूमिका अदा करने के लिए तैयार है। कांग्रेस जदयू समाजवादी पार्टी और आम आदमी पार्टी ने ममता बनर्जी की इस स्पष्टवादिता का स्वागत किया है। यदि ऐसा कोई मंच बनता है तो यह अवष्य ही सत्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी के लिए खतरे की घंटी होगी।ंे
लेखक हिन्दुस्तान के पूर्व संपादक राज्य मामले है।

-सुरेष अखौरी-

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