संपादकीय

रामायण, महाभारत जैसे अन्य प्राचीन धर्म में किन्नरों की स्थिति प्रतिष्ठित बताई गई है  मृदुला चंद्राकर

रामायण, महाभारत जैसे अन्य प्राचीन धर्म में किन्नरों की स्थिति प्रतिष्ठित बताई गई है मृदुला चंद्राकर

रायपुर l 12 वर्ष के वनवास में अर्जुन अपने पिता इन्द्रदेव से मिलने इन्द्रलोक जाते है l जहां उनकी मुलाकात उर्वशी से होती है l तब अर्जुन द्वारा देर रात रात्री अकेले आने का कारण पूछने पर आतिथ्य धर्म का पालन करने आने का कारण बताती है और अपने प्रेम का इजहार करते हुए आतिथ्य धर्म में सब कुछ समर्पण करने की प्रबल इच्छा जताती है l तभी अर्जुन के मना करने और उनके द्वारा बाहर जाने के निवेदन पर उर्वशी अपने प्रेम की उपेक्षा से नाराज होकर अर्जुन को श्राप देती है कि एक वर्ष के लिए तुम्हारा पुरुषत्व नाश हो जाएगा और तुम नपुंसक हो जाओगे l जहां अर्जुन इस श्राप को स्वीकार कर लेते है l तो वही उर्वशी का भयंकर श्राप बाद में अर्जुन के लिए वरदान साबित होता है बारह वर्ष के वनवास में एक वेश अज्ञातवास का बचा होता है अर्जुन अर्धनारीश्वर दिखने लगते है और उन्हें कोई पहचान नहीं पाता l राजा विराट के यहां कार्य करते हुए अपना अज्ञातवास पूरा कर करने में सफल रहते है l


उक्त जानकारी राज्य शैक्षिक अनुसंधान परिषद शंकर नगर रायपुर में आयोजित तृतीय लिंग समुदाय के प्रति संवेदनशील जागरूकता और समन्वय कार्यक्रम में दी गई l जहां एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया था l वही लोक शिक्षण संचालनालय की सहायक संचालक मृदुला चंद्राकर ने कहा कि इस तरह रामायण, महाभारत जैसे अन्य प्राचीन धर्म में किन्नरों की स्थिति प्रतिष्ठित बताई गई है l लेकिन वर्तमान युग में हमारे समाज में व्याप्त तृतीय लिंग की मनोदशा बेहद विचारणीय है, सोचनीय है l आज तृतीय लिंग का एक छोटा सा वर्ग अपनी दयनीय स्थिति से निजात पाने प्रयासरत है l जो सरहानीय एवं प्रशंसनीय है l उन्होंने बताया कि इस कार्यक्रम में प्रतिभागियों के साथ-साथ कुछ अतिथि तृतीय लिंग के व्यक्ति विशेष आमंत्रित किए गए थे l जहां उन्होंने अपने अनुभव साझा किए l

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