संपादकीय

लड़के और लड़कियों की शादी की उम्र में अंतर क्यूँ ?

लड़के और लड़कियों की शादी की उम्र में अंतर क्यूँ ?

भारत में लड़कियों को यूँ तो बहुत सम्मान की नज़रों से देखा जाता है |आज की महिलाए भी अपने अधिकारों के प्रति सजग है और किसी भी तरह के अन्याय के प्रति वो आवाज उठाने के लिए डरती नहीं | वर्ष १९६० और वर्ष २०१९ तक के महिलाओं के सफ़र पर नजर डाले तो हमें देखते है की उनका सफ़र कितना कठिनाइयों से भरा हुआ था वर्ष २०१९ तक आते-आते में इनकी परिस्थितियों में कितना सुधार हुआ है |आज हम बहुत गर्व से कहते है की हम आज की नारी है लडको के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है पर जब समाज में झाकते है तो वहां की हकीकत हमारे सामने दिख रहे समाज से बिलकुल परे है जैसे पुराने मकान को रंगीन चटकदार रंगों से रंग दिया हो, हाँ वो रंगने के बाद थोडा नया जरुर दिखेगा पर हकीकत में वो पुराना मकान ही कहलायेगा वैसे ही आज हमारा समाज खुद को आधुनिकता के रंगों से रंग तो लिया है पर आज भी अपनी सोच को नहीं बदल सका है और इनमें हम केवल पुरुषों को ही इसके जिम्मेदार नहीं कहेंगे इसमें महिलाए भी शामिल है जो दकिया नुसी समाज के नियमों का पालन कर रही है और पुरानी सोच का पालन बड़ी उदारता के साथ कर रही है |समाज पुरुषों और महिलायें से मिलकर बनता है, हाँ ये बात कहना गलत नहीं होगा की हमारा समाज हमेशा से ही पुरुष प्रधान देश रहा है | आज मैं समाज और हमारे कानून की बात करुँगी जिसमें लड़के और लड़कियों की शादी की उम्र में इतना अंतर क्यूँ है ?वैसे आज भी समाज में बहुत सी परम्पराएं है जो समाज के लिए हितकारी नहीं है उन्हें बंद करना चाहिए पर हमारे देश में समाज के आगे कुछ कदम उठाना मतलब आग से टकराने जैसा है |कई परिस्थितियों में मैंने कानून को भी इस समाज के सामने झुकते देखा है, इससे ही आप समझ सकते है की हमारे देश में समाज का क्या स्थान है |आपने कभी सोचा है की शादी के लिए लड़कों की उम्र २१ वर्ष और लड़कियों की उम्र १८ वर्ष क्यूँ राखी गई है ?भारत ही नहीं दुनिया के कई देशों में लड़के और लड़की की शादी की उम्र में फर्क है |लड़कियों की उम्र कहीं भी लड़कों से ज्यादा नहीं राखी गई है |दिलचस्प बात ये है की हमारे देश में बालिग़ होने की कानूनी उम्र दोनों को एक है पर मगर शादी के लिए न्यूनतम कानूनी उम्र अलग-अलग है | इतना पड़ने के बाद हम सब के मन में एक सवाल जरुर आ रहा होगा की क्या किसी ने इसके प्रति आवाज नहीं उठाई होगी ?आपको बता दूँ की इस विषय के लिए समाज और कोर्ट में आवाजें हमेशा उठती रही है और समय-समय जरूरत के हिसाब से कानून भी बने है |अभी हाल ही में फिर ये मुद्दा उठाया है वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय ने इन्होने दिल्ली हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की है |याचिका में मांग की गई है की लड़के और लड़कियों के लिए शादी की उम्र का कानूनी अंतर ख़त्म किया जाए |याचिका कहती है की उम्र के इस अंतर का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है |यह पित्र सत्तात्मक विचारों की देन है |इस याचिका ने एक बार फिर भारतीय समाज के सामने शादी की उमरा का मुद्दा सामने खड़ा कर दिया है |आपको बता देन की ये पहला मौका नहीं है | भारत में शादी कि उम्र काफी अरसे से चर्चा में रही है |इसके पीछे सदियों से चली आरही बाल विवाह की प्रथा को रोकने का ख़याल रहा है |ध्यान देने वाली बात है की इसके केंद्र में हमेशा लडकियों की जिन्दगी रही है |उसी की जिन्दगी बेहतर बनाने के लिहाज़ से ही उम्र का मसला सवा सौ साल से बार-बार उठता रहा है | साल १८८४ में औपनिवेशिक भारत में डॉक्टर रुखमाबाई के केस और १८८९ में फुलमोनी दासी की मौत के बाद यह मामला पहली बार जोरदार तरीके से बहस के केंद्र में आया |रुखमाबाई ने बचपन की शादी को मानने से इनकार कर दिया था जबली ११ साल की फुलमोनी की मौत ३५ साल के पति के जबरिया यौन सम्बन्ध बनाने यानी बलात्कार की वजह से हो गई थीं | फुलमोनी के पति को हत्या की सज़ा तो मिली लेकिन वह बालात्कार के आरोप से मुक्त हो गया |तब बाल विहाह की समस्या से निपटने के लिए ब्रितानी सरकार ने १८९१ में सहमती की उम्र का कानून बनाया |इसके मुताबिक़ यौन संबंधन के लिए सहमती की उम्र १२ साल तय की गई|इसके लिए बेहरामजी मालाबारी जैसे कई समाज सुधारकों ने कई अभियान चलाये | डी नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ़ चाइल्ड राइट्स {एनसीपीसीआर } की रिपोर्ट चाइल्ड मैरेज इन इंडिया के मुताबिक़ ,इसी तरह मैसूर राज्य ने १८९४ में एक कानून बनाया |इसके बाद आठ साल से कम उम्र की लड़की की शादी पर रोक लगी | इंदौर रियासत ने १९१८ में लडको के लिए शादी की न्यूनतम उम्र १४ और लड़कियों के लिए १२ साल तय की|पर एक पुख्ता कानून की मुहीम चलती रही |१९२७ में राय साहेब हरबिलास सारदा ने बाल विवाह रोकने के लिए विधेयक पेश किया और इसमें लडको के लिए न्यूनतम उम्र १८ और लड़कियों के लिए १४ साल करने का प्रस्ताव था |१९२९ में यह कानून बना|इसे ही सारदा एक्ट के नाम से जाना जाता है | इस कानून में १९७८ में संशोधन हुआ |इसके बाद लड़कों के लिए शादी की कानूनी उम्र २१ साल और लड़कियों के लिए १८ साल हो गई |मगर कम उम्र की शादियाँ रुकी नहीं |तब इसकी जगह २००६ में इसकी जगह नया कानून बाल विवाह रोकने के लिए बनाया गया |इस कानून ने बाल विवाह को जुर्म बताया | अब सवाल ये उठता है की इतना सब कानून बनने के बाद भी क्या बाल विवाह प्रथा को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया है इसका जवाब क्या है, हम सब भली भाति जानते है | यूनिसेफ के मुताबिक़ भारत में बाल विवाह के बंधन में बंधी दुनिया भर की एक तिहाई लडकियां रहती है | राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ सर्वेक्षण २०१५-१६ के आंकड़े बताते है की पुरे देश में २०-२४ साल की लगभग २६.८ फीसदी लड़कियों की शादी १८ साल से पहले हो चुकी थी |इसके बारअक्स २५-२९ साल के लगभग २०.४ फीसदी लड़कों की शादी २१ साल से पहले हुई थी |यूएनएफ़पीए बाल विवाह को मानवाधिकार का उल्लंधन मानता है | सभी धर्मों ने लड़कियों की शादी के लिए सहीं समय उसके शारीर में होने वाले जैविक बदलाव को माना है |यानी महावारी से ठीक पहले या महावारी के तुरंत बाद या माहावारी के आते ही लड़कियों की शादी कर देनी चाहिए एसा धार्मिक ख़याल रहा है |इसलिए चाहे आजादी के पहले के कानून हो या बाद के ,जब भी लड़कियों की शादी की उम्र बढाने का मुद्दा जब भी समाज के सामने आया तो बड़े पैमाने में इसे विरोध का सामना करना पडा है |आज भी कम उम्र की शादी के पीछे वजह है साथ ही ,लड़कियों को बोझ मानने ,लड़कियों की सुरक्षा ,लड़कियों के बिगड़ जाने की आशंका ,दहेज़ ,गरीबी,लड़कियों की कम पढाई अनेक एसी बातें है जो कम उम्र की शादी की वजह है | इससे ये पता लगता है की हमारा समाज लड़कियों को उसके शारीर से नापता-जोखता है |उसके लिए उम्र के साल बेमानी है |बदन से ही वह उसे शादी और माँ बनने लायक तय कर देता है | हमारे देश में चाहे बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, हिन्दू विवाह कानून या पारसी विवाह अधिनियम और तलाक अधिनियम या भारतीय इसाई अधिनियम सब में यही माना गया है की शादी के लिए लड़के को २१ साल और लड़की को १८ साल से कम नहीं होना चाहिए | अगर हम सच्चे मायने में बराबरी चाहते है तो आपसी रजामंदी से शादी के लिए बालिगों के अलग-अलग उम्र की मान्यता ख़त्म क्र देनी चाहिए |जब बालिक होने की दोनों की उम्र १८ साल है तो शादी की उम्र भी सामान ही होनी चाहिए |पतियों और पत्नी की बीच अंतर का क़ानूनी तौर पर कोई आधार नहीं है|शादी में शामिल दंपत्ति हर मामले में बराबर है और उनकी समझदारी भी बराबर लोगों के बीच होनी चाहिए |उम्र का अंतर गैर बराबरी है इसलिए गैरबराबरी को कम से कम कानूनी तौर पर ख़त्म होना चाहिए |इसलिए बेहतर है इससे आगे की सोची जानी चाहिए | नोट-इसमें दिए गये आकड़े बीबीसी की एक रिपोर्ट से लिए गये है | लेखक - वर्षा गलपांडे

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