संपादकीय

	लोकतंत्र : क्वालिटी नहीं महज क्वांटिटी की बात

लोकतंत्र : क्वालिटी नहीं महज क्वांटिटी की बात

लोकतंत्र में संख्याबल ही सबकुछ है... जिसके पास ज्यादा लोग उसके हाथ में लोकसत्ता... और वही राजा... आज इसे वोट बैंक के नाम से परिभाषित किया जाता है। जिसका जैसा वोट बैंक उसका वैसा ही दर्जा.. अब तो सरकारों ने ब्यूरोकेसी में भी लोकतंत्र की नींव रख दी है। अच्छा होगा... शायद मैं नहीं समझ पा रहा.. इसलिए सोचता हूं कि क्या क्वालिटी (गुणवत्ता) नहीं क्वांटिटी(संख्या) ही तय करेगी की इस सरकार में मुखिया कौन हो... प्रदेश का सबसे बड़ा अधिकारी किस तबके से हो...ऐसा ही हो रहा है.. यह लोकशाही का विगत कुछ वर्षों में सामने आया मॉडल है.. प्रदेश में फलां तबके का वोट बैंक कम है तो उस समुदाय से सरकार में उनका प्रतिनिधि(मंत्री ) होगा या नहीं... उसका अनुभव.. राजनितिक कुशलता कोई मायने नहीं रखती... क्योंकि चयन का आधार सिर्फ यही है कि संख्याबल उसके साथ कितना है यह और इससे बड़ी बात.. क्या वह जिस वर्ग से आता है उसका संख्या बल प्रदेश में कितना है.. इनके असंतोष का सरकार पर असर कितना होगा...

इससे आगे बढ़कर बात करना ज्यादा जरूरी है... हाल में ही प्रदेश के स्कूलों में एक भाषा विशेष को पढ़ाए जाने की वकालत शुरू हुई... वकालत इस लिए लिख रहा हूं क्योंकि मामला हाइकोर्ट तक पहुंचा है... आधार यहां भी संख्याबल ही.. जिसके आगे सरकारें नतमस्तक हैं... अब जरा सोचिए... देश में हिंदी हर प्रदेश में अनिवार्य विषय हो इसकी वकालत क्यों नहीं हो रही... खैर प्रदेश में ही पिछले15 सालों में छत्तीसढ़ी कामकाज और स्कूलों में विषय के रुप में क्यों लागू नहीं हो पाई.. क्या इनका संख्याबल कम है... जी.. नहीं.. दरअसल मसला एक तबके विशेष को साधने का है... और जब नगरीय निकाय चुनाव सामने हों तो यह राजनीतिक पार्टियों के लिए बहुत जरूरी हो जाता है। लेकिन क्या ऐसा करने से सामाजिक सुचिता नहीं बिगड़ेगी... इस बात से किसी को क्या लेना देना.. कल दूसरे तबके के लोग भी हैं जो दो लाख से ज्यादा हैं वे भी किसी विशेष मांग को लेकर खड़े हो जाएंगे... जरा पड़ोसी राज्य के सीएम से पूछ लीजिए... वे छत्तीसगढ़ से भाषा विशेष को पढ़कर निकले यहां के किसी मूलनिवासी व्यक्ति को ओडिशा में नौकरी देंगे... तो फिर छत्तीसगढ़ी का क्या होगा... भूल जाना चाहिए..

बात इन सबसे बहुत ऊपर उठकर सोचने की है...दरअसल लोकतंत्र में संख्याबल को कुछ लोगों ने गलत तरीके से परिभाषित कर दिया है... संख्याबल किसी एक समुदाय विशेष की संख्या से तय नहीं होता.. दरअसल यह मामला सहयोग और लोकप्रियता का है... और सच कहूं तो पसंद और नापसंद का है... अगर ऐसा नहीं तो कोई बुद्धजीवी ही मुझे बता दे कि पिछड़ा वर्ग बाहुल्य क्षेत्र से उसी वर्ग का प्रत्याशी चुनाव क्यों हार जाता है... कई बार तो सबसे कम संख्याबल होने के बावजूद उस क्षेत्र से किसी दूसरे ही तबके का नेता चुन लिया जाता है। तो क्या विधानसभावार आरक्षण बेमानी नहीं है। दरअसल तय यह होना चाहिए कि इस प्रदेश में इस तबके का संख्याबल इतना है इन्हें राजनीतिक पार्टी को हर हाल में इतने पदों पर उम्मीदवारी देनी ही होगी... मतलब पार्टीवार उम्मीदवारी में आरक्षण हो.. न कि विधानसभा रिजर्व की जाए... फिर उम्मीदवारों का चयन कर राजनीतिक कौशल परीक्षण आजमाया जाए... आधार है भी कुछ ऐसा ही...थोड़ा बहुत संविधान मैंने भी पढ़ा है... और मैं यही समझ सका हूं...

अब सोचना यह है कि लोकतंत्र की नुमाइंदगी कर रहे लोगों ने भला संख्याबल का जो गणित पढ़ाना शुरू किया है वह सफल कहां तक है... जिस समाज का संख्याबल ज्यादा उसकी चलेगी... तो फिर सरकार को जनसंख्या नियंत्रण और परिवार नियोजन जैसी योजनाओं पर खर्च होने वाले अरबों रुपयों की बर्बादी बंद कर देनी चाहिए..साथ ही बच्चे दो ही अच्छे.. हम दो हमारे दो.. काबिल बच्चा एक ही अच्छा जैसे नारों पर भी रोक लगा ही देना चाहिए... क्योंकि जब लोकतंत्र में संख्याबल ही सबकुछ तय करेगा.. तो हर सामाजिक तबका संख्याबल बढ़ाने पर ही जोर रखे... भुखमरी... बेरोजगारी... आवास.. शिक्षा...स्वास्थ्य.. यह सरकार देखे... हम तो संख्या में ज्यादा होना चाहेंगे... देश का फिर चाहे जो हो...

जरा सोचिएगा... अगर सोच ऐसी बनने लगी तो हालात क्या होंगे... फिलहाल, मैं सच कहूं.. तो संख्याबल बढ़ाने की ही सोच रहा हूं... आप क्या करेंगे... यह आप सोचिए....

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