संपादकीय

सुकमा की लालक्रांति का अंत कब ?

सुकमा की लालक्रांति का अंत कब ?

 

हमारी आतंरिक सुरक्षा के लिए आतंक और नक्सलवाद की पनती विषबेलें बड़ा खतरा बन गयी हैं। लोकतंत्र में विचारों की संस्कृति पर बंदूक की सभ्यता भारी दिखती है। चरमपंथ की यह विचाराधारा देश को कहां ले जाएगी पता नहीं, लेकिन अतिवाद के बल पर सत्ता के समानांतर व्यवस्था खड़ी करने वालों का सपना पूरा होगा या नहीं,ं यह वक्त बताएगा। हलांकि मजबूत होती नक्सलवाद की जड़ें और जवानों की बढ़ती शहादत हमें विचलित करती हैं। आतंकवाद से भी बड़े खतरे के रुप में नक्सलवाद उभरा है। आतंकवादी हमलों में इतनी तादात में जवान कभी नहीं शहीद हुए जितने की नक्सल प्रभावित इलाकों में बारुदी सुरंगों और सीधी मुठभेंड में मारे गए। हमें यह कबूल करने में कोई गुरज नहीं करना चाहिए की नक्लवाद और आतंकवाद की रणनीति के आगे हमारा सुरक्षा और खुफिया तंत्र बौना साबित हो रहा है। सुकमा के जंगलों में काफी तादात में सेना और सीआरपीएफ के जवान शहीद हुए हैं। जवानों की शहादत का देश अभ्यत हो चुका है। एक हमले से निपटने के लिए जब तक हम रणनीति बनाते हैं तब तक दूसरा हमला हो चुका होता है। छत्तीगढ़ के बस्तर जिले में एक बार फिर सुकमा के जंगलों में नक्सलियों ने खूनी खेल खेला है। सैकड़ों की संख्या में महिला और पुरुष नक्सलियों ने रणनीति के तहत जवानों पर हमला बोला और उन्हें मौत की नींद सुला दिया। इस सुनियोजित षडयंत्र में अब तक 40 से अधिक सीआरपीएफ के जवान शहीद हो गए। हमला उस समय किया गया जब जवान निर्माणाधीन सड़क पर चलने वाले काम को खुलवाने गए थे। नक्सलियों ने सड़क निर्माण पर प्रतिबंध लगा रखा। सुबह छह बजे 90 की संख्या में जवान गए थे।

सुकमा से 64 किमी दूर बुर्कापाल में दोपहर में जब जवान भोजन ले रहे थे उसी समय हथियारों से लैस नक्सलियों ने चैथरफा हमला कर, गोलिया बरसा जवानों की निर्मम हत्या कर दी। कहा जा रहा है कि हमला करने वाली गैंग में सबसे आगे सेना की वर्दी में महिलाएं थी और उन्हें सुरक्षा कवर पुरुष नक्सली दे रहे थे। यह घटना दिल को दहलाने वाली है। लेकिन कहीं न कहीं से हमारे सुरक्षा और खुफिया तंत्र की विफलता साबित करती है। हमें यह पता नहीं चल सका की नक्सली बड़े हमले का गेम प्लान तैयार कर रखें है। नक्सलियों ने जवानों की हत्या करने के बाद उनके पर्स, मोबाइल, हथियार भी लूट ले गए। यहां तक की मुठभेंड में मरे अपने साथियों को भी घसीट कर जंगल में ले गए। सुकमा के जंगलों में सेना और सीआरपीएफ के जवानों की शहादत आम बात हो चली है। लेकिन नक्सलियों से निपटने के लिए अभी तक हमने कोई ठोस नीति नहीं तैयार कर पाए। 2011 के बाद संभवतः यह दूसरा बड़ा नक्सली हमला है जिसमें 76 जवानों की मौत हुई थी। इसके पूर्व बड़े हमले में कांग्रेस के कई दिग्गत नेताओं को मौत के घाट उतार दिया गया था। जिसमें वीसी शुक्ल, कर्माकर और दूसरे नेता शामिल थे। इस घटना में तो नक्सलियों ने लाशों में नृत्य भी किया था। नक्सलवाद हमारे लिए आतंक से भी बड़ी चुनौती बना है।

  माओेवाद विकास और लोकतंत्र की भाषा नहीं समझता है। वह वर्तमान व्यवस्था से अलग बंदूक संस्कृति के जरिए जल, जंगल और जमींन की आजादी चाहता है। वह अपनी सत्ता चाहता है जहां उसका कानून चले जबकि सरकार ऐसा कभी होने नहीं देगी। सरकारें आदिवासी और पिछड़े इलाकों में उनकी सांस्कृतिक सुरक्षा और सर्वांगीण विकास के लिए संकल्पित हैं। नक्सल प्रवावित उड़ीसा, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, झारखंड और बिहार में विकास योजनाएं क्रियान्वित हैं। लेकिन माओवादियों का विकास में भरोसा ही नहीे, आदिवासी इलाकों में वह विकास नहीं चाहते। उन्हें डर है कि अगर ऐसा हो गया तो लोग मुख्यधारा की तरफ लोैट जाएंगे, फिर हमारे अतिवाद का क्या होगा। वह लोकतांत्रिक मूल्यों का गलाघांेट बंदूक के बल पर सब कुछ हासिल करना चाहते हैं। मुख्यधारा में लौटना नहीं चाहते या फिर कोशिश नहीं करना चाहते। दुनिया भर में हिंसक संस्कृति का कोई स्थान नहीं है। लोकतांत्रिक और वैचारिक नीतियों के जरिए ही हम कामयाब हो सकते हैं।जिन बारह जिलों में नक्सवाद फैला है वहां सबसे अधिक प्राकृतिक खनिज संपदा है। लेकिन वहां के आदिवासी लोगों का विकास आज भी बदतर हालात में हैं। सरकारों ने प्राकृतिक संसाधनों को खूब दोहन किया। लेकिन आदिवासियों के पुनर्वास के लिए नीतिगत योजनाएं नहीं बनाई गई। सरकारी नीतियों ने प्राकृतिक संसाधनों से संपंन इन इलाकों के लोगों को विपन्न बना दिया। जिसका नतीजा हमारे सामने नक्सलवाद के रुप में है।

नक्सलवाद के खात्मा के लिए हमें ठोस और नीतिगत निर्णय लेना होगा। सुरक्षा और खुफिया तंत्र को नक्सलियों के मुकाबले अधिक सुरक्षित और मजबूत बनाना होगा। इसके अलावा स्थानीय लोगों का विश्वास जीतना होगा। हमें यह अच्छी तरह मालूम है कि सुरक्षा में जरा सी लापरवाही हमारे लिए मुश्किल खड़ी कर सकती है। आपको मालूम होगा नोटबंदी के बाद सरकार की तरफ से खूब प्रचारित किया गया कि इस फैसले से आतंक और नक्सलवाद की कमर टूट गई है। काफी तादात में नक्सलियों ने आत्मसमर्पण भी किया। मीडिया ने इस तरह की खबरों को खूब प्रसारित भी हुई। लोगों में भरोसा जगा कि विपक्ष जो भी चिल्लाए, लेकिन सरकार ने अच्छा काम किया है। उसके बाद भी कई हमले हुए जिसमें हमारे बेगुनाहों की जान गई।  नक्सलवाद सिर्फ एक विचारधारा की जंग नहीं है। इकसे पीछे राष्टविरोधी ताकतें भी लगी हैं। हमारा तंत्र नक्सलियों की रणनीति में सेंध लगाने में नाकाम रहा है। दुर्गम इलाकों में इतनी आसानी से आधुनिक आयुध, एक-47, गोले, बारुद, सेना की वर्दी और रशद सामाग्री की पहुंच कैसे सुलभ होती है। देश की सीमा पाकिस्ता, बंग्लादेश, अफगानिस्ता, नेपाल, से घिरी हुई है। यहां हमारे सशस्त्र जवान सुरक्षा में लगे हैं। इसके बाद भी इतनी सामाग्रियंा कहां से और कैसे पहुंच जाती हैं। इन सबके लिए फंडिंग कहा से होती है। युवाओं और महिलाओं को इतनी सुनियोंजित तरीके से प्रक्षिण कैसे दिया जाता है। सेना की तरफ नक्सलियों ने भी कई स्तरीय सुरक्षा कोर स्थापित किया है

। सभी नेटवर्क को ध्वस्त करने में हम नाकाम हुए हैं। हम इसके लिए किसी खास सरकारों को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते हैं। इसके लिए हमारी सुरक्षा नीतियां ही दोषी हैं। हमने कभी इस रणनीति पर विचार नहीं किया कि बस यह अंतिम हमला होगा। आदिवासी इलाकों की समस्याओं के गहन अध्यन के लिए आयोग गठित करने की जरुरत हैं। यह जरुरी नहीं की हम बंदूक की संस्कृति का जबाब उसकी लौटती भाषा में ही दें। नक्सल संगठनों से बात करनी चाहिए। उनकी मांगों पर जहां तक संभव हो, उस पर लोकतांत्रिक तरीकों और बातचीत के जरिए विचार होना चाहिए। उन्हें मुख्यधारा में लौटाना चाहिए। क्योंकि मरने और मारने वाले दोनों अपने हैं। किसी भी स्थिति में छति देश की होती है। अब वक्त आ गया है जब लाल सलाम की खूनी संस्कृति पर विराम लगना चाहिए।

प्रभुनाथ शुक्ल स्वतंत्र पत्रकार

Mo : 8924005444  

Leave a comment