संपादकीय

आमबजट-2017 –  सपने वही दिखाए जाएं जो यथार्थ की जमीन पर साकार होते दिखें..

आमबजट-2017 – सपने वही दिखाए जाएं जो यथार्थ की जमीन पर साकार होते दिखें..

इन दिनों बस स्टॉप से लेकर निजी और सरकारी दफ्तरों में एक ही चर्चा है इसबार का बजट भला होगा कैसा। 92 साल बाद आमबजट और रेलबजट एक साथ सामने होंगे। 1924 में दोनों को अलग अलग किया गया था। इन सबके बीच लोगों की जुबान पर एक ही चर्चा पीएम की बातें हवा हवाई नहीं हैं तो नोटबंदी के बाद जितना धन टैक्स के रुप में सरकारी खजाने में आने का दावा किया जा रहा है उससे देश की जनता का कुछ तो भला किया ही जा सकता है। बातचीत को एक मूकदर्शक की तरह सुना जाए तो समझ आ जाता है कि हर जुबां पर जो जिक्र है वह अपने लिए संचय का नहीं है.. देश हित में आने वाली पीढि़यों के लिए हर व्यक्ति सब लुटा देने को तैयार है..शर्त बस इतनी सी कि जो कहा जा रहा है वह जमीन पर दिखाई देना चाहिए...

तर्क तो ऐसे कि जब माननीय के आने से पहले 24 घंटे में 10किमी सड़क बनाई जा सकती है तो क्या बनी बनाई सड़कों को नहीं सुधारा जा सकता...क्या शिक्षा जो व्यवसायिकता के दौर से गुजरते हुए नीलामी के बाजार में खड़ी हो गई है जिसे ऊंची बोली लगाकर ही खरीदे जा सकने की नौबत आ गई है का दोबारा सरकारीकरण या यूं कहें कि बजट से शिक्षा के लिए कुछ बेहतर विकल्प तैयार नहीं किया जाना चाहिए...स्वास्थ्य सेवाओं में इजाफा किए जाने पिटारे से कुछ निकलना ही चाहिए...

नौकरीपेशा व्यक्ति जब सब कुछ बैंक में रखकर टैक्स पटाएगा..बैंक से निकासी की राशि भी तय होगी तो क्या बुजुर्ग हो चुके माता पिता के लिए अब भी कोई स्वास्थ्य बीमा योजना सस्ते में उपलब्ध होगी..घर की चिंता भी पीएम आवास देने से खत्म नहीं होती..उसमें जो भ्रष्टाचार का कीड़ा लगा है उसे दूर करने से मिटेगी..फिर होम लोन सस्ते करने के विकल्प पर क्या सरकार ध्यान देगी..या नोटबंदी और डिजिटिलाइजेशन के नाम पर ढोल पीटकर देश की आम जनता फिर ठगी जाएगी। केंद्र सरकार अपना आम बजट एक फरवरी को पेश करने जा रही है। बजट से सीधे तौर पर मध्यम वर्ग के परिवारों पर सबसे ज्यादा असर होता है। और आम आदमी का वास्ता शिक्षा, स्वास्थ्य, रोटी, कपड़ा और मकान तक सीमित है।

उन्हें कुछ चाहिए तो सस्ता ट्रांसपोर्ट, फिर रेल हो या बस..इसके अलावा आयकर में छूट की सीमा बढ़ाया जाने की मांग पिछले तीन बजट से हर नौकरी पेशा कर रहा है। नोटबंदी और कालेधन पर अंकुश के जुमले ने इस बार के आम बजट से हर वर्ग की उम्मीदें बढ़ा दी हैं। इनका रखा जाए ध्यान तो बनेगी बात- शिक्षा पर खर्च सीमित किया जाए आज के समय में बच्चों की पढ़ाई मध्यम वर्ग के परिवारों के लिए एक चुनौती बन गई है एक नौकरी पेशा व्यक्ति को कुल सैलरी का 20-30 प्रतिशत तक केवल बच्चों की पढ़ाई पर खर्च करना पड़ता है। इस खर्च को सीमित करने के लिए सरकार को पहल करनी चाहिए। कर्मचारियों के लिए सातवां वेतन मान लागू किए जाने के बाद आयकर सीमा बढ़ाकर न्यूनतम पांच लाख रुपए करनी चाहिए। अभी सैलरी का लगभग 20 प्रतिशत तो टैक्स में ही चला जाता है। अमीर हो या गरीब सभी के बच्चों का शिक्षा का समान अधिकार दिया जाना चाहिए..नौनिहालों की चिंता है तो बजट में निजी स्कूलों की फीस पर नियंत्रण लगाने फीस नियामक आयोग का गठन किया जाने जैसे प्रावधान और स्कूलों की फीस श्रेणीवार तय कर देनी चाहिए। हेल्थ इंश्योरेंस सस्ती दरों पर हो उपलब्ध हेल्थ इंश्योरेंस को भी बुजुर्गों के लिए कम खर्चीला किए जाने की जरूरत है। न सिर्फ बुजुर्ग बल्कि देश के हर युवा को स्वास्थ्य गारंटी सेवा के तहत कम दरों पर हेल्थ इंश्योरेंस उपलब्ध कराए जाने के प्रवाधान किए जाने चाहिए।

साथ जीवन रक्षक दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करते हुए इसके दायरे में और भी दवाओं को शामिल किया जाना चाहिए। टैक्स की मार अब कम की जाए सबसे पहले केंद्र सरकार को करों का बोझ मध्यम वर्ग पर कम करना चाहिए। वर्तमान में आयकर सीमा 3 नहीं 3.50 किए जाने की आवश्यकता है प्रति व्यक्ति आय के दावे देखे जाएं तो आज आम आदमी की जरूरत 900- 1000 रुपए प्रतिदिन की है। जिसे टैक्स फ्री किया ही जाना चाहिए। मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए इतनी राहत ही संजीवनी का काम करेगी। होमलोन को सस्ता किए जाने की जरूरत अपना घर सबका सपना होता है कस्बों का शहर में तब्दील होना वहां प्रॉपर्टी के रेटों में जिस स्तर का इजाफा हो रहा है उससे लोगों के खुद के घर के सपने पूरे नहीं किए जा सकते। आम आदमी आज भी टू बीएचके की चाहत पूरी करने की स्थिती में नहीं है। ऐसे में पीएम आवास विकल्प हो सकता है लेकिन पहली पसंद नहीं.. वो गरीबों के लिए है मध्यम वर्गीय परिवार इनसे अब भी अधूता है।

िलहाजा बैंक की ब्याज दरों में कटौती की मांग भी इस बजट में किए जाने की पहल होनी ही चाहिए। घर के होमलोन की ईएमआई कम हो जाने का सपना पूरा हुआ तो लोगों के अपने घर के सपना भी पूरा हो जाएगा। सबसे पहले तो होमलोन की दरों को कम करके इसे सस्ता किए जाने की जरूरत है। उद्योगों को भी राहत की दरकार- देश में ज्यादातर उद्योग मंदी के दौर से गुजर रहे हैं। बिजली, पानी के लिए तरसते उद्योगों को भी सस्ती दरों पर बिजली के साथ ही पानी भी सस्ती दरों पर उपलब्ध कराने की दिशा में पहल की जानी चाहिए। स्वयं का व्यवसाय स्थापित करने लोगों के लिए बेहतर योजनाओं के साथ ही उन्हें अनुभव का लाभ दिलाने बड़ी कंपनियों में प्रशिक्षण जैसे अवसर भी दिए जाने के विकल्पों पर काम किया जाना चाहिए। घरेलू उद्योग और पारंपरिक उद्योंगो को बढ़ावा देने के लिए योजनाएं तैयार की जाएं। बहुमंजिला इमारतों के साथ बड़े बड़े कॉर्पोरेट दफ्तरों से पहचान रखने वाली बी ग्रेड टाउन की तरफ आईटी कंपनियों की आमद के लिए उन्हें पर्याप्त रियायतें दी जानी चाहिए। जिससे बी ग्रेड टाउन में ही पढ़े लिखे युवाओं को रोजगार उपलब्ध करवाया जा सके। कृषि एक बेहतर विकल्प- रोजगार और उद्योग दोनों ही रुपों में देश में कृषि को बढ़ावा दिए जाने की आवश्यकता है। इसके लिए आम बजट में सरकार को किसानों की जमीन खरीद फरोख्त पर रोक लगाए जाने से लेकर फसल उत्पादान बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाए जाने की उम्मीदें किसानों को हैं। किसान अपने हरे भरे खेतों और पशुधन के साथ खुश रहना चाहता है बशर्ते कि उसे उत्पादन का सही मूल्य मिले। इतना ही नहीं समय पर बिजली, पानी और खाद, बीज का इंतजाम किए जाने से ही वह खुश है। मंहगाई की मार से कोई निजात दिला सकता है तो वह इस देश का किसान है जो सही मायनों में देश निर्माता है। इसलिए खाद्य उत्पादन की दिशा में नए कदम उठाए जाने के साथ ही किसान बीमा, फसल बीमा, मवेशी बीमा के साथ पूर्व के बजट में घोषित मृदा परीक्षण प्रयोगशालाओं के संचालन के लिए भी बजट का प्रावधान होना चाहिए। जागरुक किसान तो केंद्र सरकार को अभी से किसान विरोधी करार देने लगी है..जानकर आश्चर्य हुआ तो पूछ लिया वजह क्या है ऐसी सोच क्यों? उत्तर आप भी सुनिए...70 साल तक शासन करने वाली कांग्रेस को कोसने वालों से पूछो...यूपीए की सरकार किसानों को प्रति क्विंटल 200 रुपए प्रोत्साहन राशि दे रही थी..आखिर उसे बंद क्यों किया...गेंहू उत्पादन में भारत पहले नंबर पर है...चावल उत्पादन में हम दूसरे नंबर पर हैं...दलहन और तिलहन के उत्पादन की स्थिती भी ठीक ही है...ये किसान आंकड़े सामने रखते हुए बात कर रहे हैं। सरकारी रिकॉर्ड में पिछले दो सालों से उत्पादन की स्थिती यूपीए सरकार की तुलना में बेहतर है...फिर अपनी ही रिपोर्ट में दूसरे देशों को गेंहू और चावल भेजने वाले देश को भला बाहर से गेंहू और चावल के साथ दालें मंगवाने की जरूरत क्यों पड़ी...

सवाल मुझे तो सोचने पर मजबूर कर देता है..अब जरा आप भी सोचिए... पांच राज्यों में चुनाव के मद्देनजर आमबजट का लोक लुभावन होना तय है लेकिन आवश्यका इस बात की है बजट लागू किए जाने योग्य भी हो घोषणाएं महज कागजों तक सिमट कर न रह जाएं.. तीन साल तक बातें बहुत हुई अब जनता का विश्वास जीतने कुछ ठोस कदम उठाए जाने की आवश्यकता है सपने वही दिखाए जाएं जो दो सालों में यथार्थ की जमीन पर साकार होते दिखें...

कुमार पाठक 

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