संपादकीय

बात दुआ से दवा और अब दारू तक पहुंच ही गई है तो फिर बेवजह हंगामा क्यों.... कुमार संजय

बात दुआ से दवा और अब दारू तक पहुंच ही गई है तो फिर बेवजह हंगामा क्यों.... कुमार संजय

छत्तीसगढ़ सरकार ने दारू की होम डिलेवरी करवाने का फैसला लिया है। इसके बाद से राजनितिक विरोधियों और बुद्धिजीवियों के बीच एक बड़ी बहस सही और गलत को लेकर छिड़ गई है। सोशल मीडिया से लेकर चौक-चौराहों तक इस बात की चर्चा है.. अब जरा सोचिए.. कि क्या यह महज विरोध है या फिर इसके पीछे कोई बड़ा मकसद छिपा हुआ है.. जो सरकार लोगों को दवाएं और किराना दुकानों से राशन होम डिलेवरी से नहीं पहुंचवा पाई.. पीडीएस के इतने बड़े ऑनलाइन सिस्टम से छात्रों को मध्याह्न भोजन का राशन नहीं दिलवा पाई.. वह आखिर दारू कैसे पहुंचवा पाएगी... इसके लिए शराब के हर शौकीन को अपने मोबाइल पर एप डाउनलोड करना पड़ेगा... साथ ही पेमेंट भी ऑनलाइन करना होगा। आखिरकार.. कुतर्क यह कि प्रदेश की जनता जो शिक्षा, स्वास्थ्य और राशन के ऑनलाइन सिस्टम से तालमेल नहीं बैठा पाई वह दारू के लिए कम से कम मोबाइल एप्लीकेशन यूज करना तो सीख ही जाएगी... और जब लोगों को कुछ नया सीखने को मिल रहा है तो फिर आपके पेट में दर्द क्यूं है.. अगर आपको सरकार का दारू की होम डिलेवरी करवाने का सिस्टम नहीं पच रहा तो आप सिर्फ विरोधी हैं... और राजद्रोही भी... एक तो हम सरकार की इस घोषणा के पीछे छुपी उसकी वृहद सकारात्मक सोच को नहीं समझ रहे और दूसरी ओर विरोध पर उतारू हैं.. आप भी गोदीमय हैं.. या हो जाने की तैयारी में हैं... जरा सोचिए.. कहीं आप परंपराओं के भी तो खिलाफ नहीं हो रहे हैं.. देश में कोरोना का ही रोना नहीं बल्कि जब भी कोई महामारी आई हमने दुआओं का सहारा लिया है चेचक को माता का नाम देकर भगवती का प्रकोप तक घोषित कर दिया... बीमारी को ठीक करने के लिए हमारे पूर्वज भी पहले भगवान की शरण में जाकर मंदिरों में प्रार्थनाएं करते रहे... सेंट्रल के नेता आज भले ही खामोश हों.. शुरूआत उन्होंने ने भी मंदिरों, गिरिजाघरों मस्जिदों, गुरुद्वारों में प्रार्थनाओं से ही करवाई थी... आप सबों ने भी ताल से ताल मिलाकर पुरजोर समर्थन के साथ घंटी, शंख, प्लेट और थाल खूब बजाए... देश भर में दिए जलवाए... लाखों टन तेल कोराना भगाने में दिए पी गए... कोरोना तो नहीं भागा... फिर इसका फायदा हुआ किसे... जरा सोचिए।

अब सोचना यह है कि जब बुजुर्गों ने ही दुआ के बाद दवा-दारू की परंपरा बनाई है तो हमारी राज्य सरकार भी सही ही कर रही है.. सेंट्रल ने दुआ से दवा तक का काम किया, लेकिन कोरोना पर फतह हासिल नहीं हुई... अब अगर राज्य सरकार ने दारू का सहारा लिया है तो इसमें गलत क्या है... आप नहीं कर पाए इसकी खीज है.. फिर जब केंद्र सरकार राज्यों को मुफ्त दवा और टीके दे नहीं रही तो ऐसे में इन्हें खरीदने के लिए भी खासी रकम चाहिए... वह राजस्व से ही आएगी... और आप चाहते हैं कि राज्य सरकार दवा और टीके सहित जरूरी संसाधन जुटाने के लिए राजस्व भी न जुटा पाए... तो आप राजद्रोही हैं.. जो सरकार की तरक्की से खुश नहीं...

जरा सोचिए... यदि सरकार ने आम जनता की जान बचाने के लिए इतना बड़ा कदम उठाया है तो कुछ सोच समझकर ही उठाया होगा.. आखिर पूरी सरकारी मशीनरी... काबिल नेता.. अफसर... सलाहकर.. सब के सब तो गलत नहीं होंगे...एक आप ही समझदार नहीं हैं.. फिर सरकार बनाने बिगाड़ने के लिए विधायक, सांसद खरीदने तो यह सब कभी किया ही नहीं गया... मामला देश की आम जनता का है... फिल्में टैक्स फ्री हो सकती हैं... कोरोना की दवाएं नहीं... इन्हें तो, सभी टैक्स देकर ही लेना पड़ेगा... तभी तो राजस्व चाहिए.. और उसके लिए शराब (होम डिलेवरी) के साथ बिकवाना बेहद जरूरी और अनिवार्य है... फिर शराब की जगह स्प्रिट, सेनिटाइजर पीकर चार लोग मर भी तो गए...

जरा सोचिए.. दवा और रेमडेसिविर न मिलने से हजारों लोग मरे तो क्या चाहतें हैं.. दवाएं भी न खरीदें... आपातकाल है... इसमें तो लोगों के लिए 35 रुपए का सामान हजारों में भी मंगवाकर देंगे.. देंगे क्या कई दवाएं दस से चार गुना कीमत देकर रि-टेंडर कर मंगवाई हैं...

आप रोक नहीं पाएंगे... यह सरकार है.. जनहित में आवश्यक कदम उठाएगी ही.. और मैं तो कहता हूं कि जिन राज्यों में इनकी सहयोगी सरकारें हैं, उन्हें भी इस तरह से राजस्व जुटाने का मॉडल प्रोजेक्ट तुरंत लागू करना चाहिए... यह बात और है कि हमारे कुछ पड़ोसी राज्य जहां केंद्र सरकार वाली सरकारें हैं वे इसे भले ही लागू न करें... विरोधी हैं तो विरोध करने का हक भी है.

नोट- सच कहने के लिए चाटुकारिता की चासनी कहां मिलती है अगर आपको पता हो मुझे भी बताएं...

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