संपादकीय

किसानों का हित किस में? खुद खेती करने में ,या उद्योगपतियों से खेती करवाने में ?

किसानों का हित किस में? खुद खेती करने में ,या उद्योगपतियों से खेती करवाने में ?

बलोदा बाजार । राजेश मिश्रा,स्वतंत्र पत्रकार, लेखक। मैं नरेंद्र मोदी सरकार के कृषि कानून बिल से सहमत हूं ।मेरी यह कल्पना थी कि जो किसान सैकड़ों साल तक खेती करने के बाद आज तक अमीर नहीं बन पाया अपनी निम्न मध्यमवर्गीय श्रेणी से ऊपर नहीं उठ पाया वह किसान आजीवन खेती करके आखिर कैसे ऊपर उठेगा। यह एक विचारणीय प्रश्न है। मेरे विचार से उद्योगपतियों से खेती करवाना काफी हद तक ठीक है। क्योंकि किसान खेती करके हमेशा घाटा ही कमाता है और उस घाटे से वह आजीवन उबर नहीं पाता। उबरने के प्रयास में हर वर्ष सिर्फ घाटा ही घाटा उसके हिस्से में आता है ।मेरी कल्पना है कि यदि किसान की खेती उद्योगपति ठेके पर लेकर निर्धारित निश्चित मूल्य किसान को देता है तो किसान निश्चिंत होकर अन्य कार्य कर सकते हैं। मैंने देखा है कि कृषि कार्य से जुड़े हुए किसान का परिवार खेती में ही बंधा रह जाता है। वह अन्य कार्य नहीं कर पाता है जबकि कृषि कार्य से मुक्त होने पर कृषक परिवार अपने लिए अन्य व्यवसाय सोच सकता है ।किसान के बच्चे अच्छी पढ़ाई कर सकते हैं ।यदि किसान को निर्धारित आय मिलती है और उस आय से किसान अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाकर इस काबिल बनाता है की किसान का बेटा भी उद्योगपति डॉक्टर इंजीनियर व्यापारी बन सके। तो किसान और उद्योगपतियों के बीच में छोटे बड़े का फर्क मिट सकता है। मेरा मानना है कि किसानों की खेती ठेके पर उद्योगपतियों को देना चाहिए ।कांट्रैक्ट फार्मिंग यह सही कंसेप्ट है। इससे किसान खेती के बोझ से मुक्त होगा। निश्चित निर्धारित आय मिलेगी और अपने बच्चों को, बच्चों का भविष्य बनाने के लिए वह निर्णय ले सकेगा। जबकि बड़े बड़े उद्योग धंधों में कृषक परिवारों की भागीदारी सुनिश्चित करना चाहिए जब किसान का बेटा पढ़ लिख कर उद्योगों में काम करने लायक बनेगा तो वह सीखेगा भी और उसकी आर्थिक स्थिति पारिवारिक स्थिति भी मजबूत होगी। कृषि कानून बिल में कहीं भी इस बात का उल्लेख नहीं है की मंडियों को समाप्त कर दिया जाएगा या किसान को एमएसपी नहीं दी जाएगी। किसान स्वतंत्र है अपनी फसल अपनी मर्जी के अनुसार जहां चाहे वह बेच सकता है। किसान को जहां अधिक मूल्य मिलेगा वहां पर वह अपनी फसल बेचेगा इसमें बुराई क्या है यदि व्यापारी सरकार के समर्थन मूल्य से अधिक दाम पर किसान की फसल नहीं खरीदेगा तो किसान के पास सरकार के पास अपनी फसल बेचने का विकल्प उपलब्ध रहेगा। फिर विरोध क्यों ?किस लिए? किसके लिए? यह सोचना जरूरी है।

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