बड़ी खबर

छत्तीसगढ़ में नहीं है रेबीज़ की दवाइयां ....  सबसे बुरी स्थिति है बिलासपुर शहर की..पढ़े ये खास रिपोर्ट ...देखे क्या कहना बिलासपुर विधायक शैलेश पांडेय,का

छत्तीसगढ़ में नहीं है रेबीज़ की दवाइयां .... सबसे बुरी स्थिति है बिलासपुर शहर की..पढ़े ये खास रिपोर्ट ...देखे क्या कहना बिलासपुर विधायक शैलेश पांडेय,का

 

अजीत मिश्रा @ BBN24NEWS

प्रतिदिन ओपीडी में 30 मरीज आते हैं

वेक्सीन की संख्या 5 से 6 ही होती है।

मजबूरी में महंगे दामों में खरीदनी पड़ती है दवाइयां ।

सरकारी अस्पताल प्रबंधन असहाय ।

शहर के विधायक भी कुछ कर पाने में है असमर्थ। 

 दवाइयों की लोकल परचेज इन में होता है खेल

सरकार जितना भी चाहे स्वास्थ्य विभाग को सुधारने का प्रयास कर ले, लेकिन यह विभाग सुर्खियां पा ही लेता है। इस बार मामला रेबीज के इंजेक्शन को आपूर्ति से जुड़ा है। शहर के सरकारी अस्पतालों में हर महीने हज़ारों मरीज कुत्तों के काटने से घायल हो इलाज कराने आते हैं। लेकिन यहां दवाइयां उपलब्ध ही नही होती। इस पर अस्पताल प्रबंधन कुछ कर पाने की स्थिति में नही है और शहर के जिम्मेदार विधायक भी अपना पल्ला झाड़ने में लगे हैं। इन सब के बीच शहर का गरीब मरीज़ मारने को मजबूर है। 

देखे  क्या कहना बिलासपुर विधायक शैलेश पांडेय का देखिए  विडियों  

सिम्स मेडिकल कॉलेज में ही रोजाना औसतन 30 मरीज डॉग बाईट वाले इलाज के लिए आते हैं। जबकि एन्टी रेबीज इंजेक्शन की आपूर्ति आधे से भी कम है। सिम्स के एम एस सुप्रिटेन्डेट डॉ आरती पांडे की माने तो उनके पास रोजाना 5 से 6 रेबीज की दवाइयां उपलब्ध होती हैं और यह दवाइयां पहले आओ पहले पाओ के तर्ज पर मरीजों को लगा दी जाती है इसके बाद जो मरीज यहां पहुंचते हैं उन्हें उसी दवाई के लिए बाजार में मोटी रकम चुकानी पड़ती है। ऐसे में समझा जा सकता है बाकी मरीजों का हाल क्या होता होगा। लेकिन अस्पताल प्रबंधन को भला इससे क्या सरोकार।

 इस पूरे मामले में शहर के विधायक शैलेश पांडे ने भी अपना पल्ला झाड़ते हुए यह कह दिया कि आखिरकार जब दवाइयां उपलब्ध ही नहीं है तो वह क्या कर सकते हैं। दवाइयों के लोकल परचेसिंग के नाम पर जो कुछ होता है वह सभी जानते हैं ऐसे में हेलो एक विधायक क्या करें। 

 जब दवाइयां कम हो और मरीज ज्यादा तो जाहिर सी बात है इसे मैनेज करने के लिए अस्पताल प्रबंधन को कई तरह के हथकंडे अपनाने पड़ते हैं। इन्हीं हथकंडों में से एक है। अस्पताल में लगी है यह अलग-अलग पर्चियां अस्पताल के दीवारों में चस्पा की गई ये पर्चियां। जिनमे साफ-साफ लिखा है यहां सिर्फ इंजेक्शन लगाया जाता है ओपीडी में डॉक्टर का सील और साइन होना अनिवार्य है । इसके अलावा यहां ड्रेसिंग या अन्य कार्य नहीं किया जाता। इतना ही नहीं चस्पा की गई इन पर्चियों में कई महत्वपूर्ण दस्तावेजों के फोटो कॉपी भी मांगे जाते हैं जिनके बिना एंटी रेबीज इंजेक्शन नहीं लगाया जाएगा। कुल मिलाकर देखा जाए तो सरकारी अस्पताल में रेबीज के इंजेक्शन लगवा पाना आम लोगों के लिए इतना कठिन बना दिया गया है कि इससे बेहतर वह पैसे खर्च कर निजी अस्पताल में अपना इलाज कराना बेहतर समझते हैं।

(Edited By : YASH LATA)

Leave a comment