विशेष

 मकर संक्रांति विशेष-प्यार की पतंग ..वर्षा

मकर संक्रांति विशेष-प्यार की पतंग ..वर्षा

प्यार की पतंग

तेरी नज़रों में ऐसी धार थी

तुमसे नज़रे क्या मिली हमारी,

पतंग के साथ-साथ दिल भी

काट के तुम अपने साथ ले गई।

तिल के लड्डुओं की ख़ुशबू पूरे घर में महक रही थी. साथ ही नमकीन भी खाने की टेबल पर सजी थी।दादा जी ने आवाज़ लगाई अरे सुधीर पतंगे खरीदे लाये हो ना और फिरकी भी सुनो वो बगल वाले शर्मा जी के घर में भी बता अना की जल्दी से वो अपने सारे काम करके हमारी छत पर आजाये सुधीर ने भी हाथ में एक तिल का लड्डू लेते हुए बोला दादा जी आप चिंता मत करो सारी तैयारी कर रखी है।पूजा को बीच में रोकते हुए दादी ने आवाज़ लगाई ममता अरी ओ ममता, ममता ने भी किचन से हड़बड़ाती हुई आवाज में कहा हां दादी।आज खाने में क्या बनाना है पता है न तुझे ममता ने भी धीमी आवाज में कहा जी दादी आज खिचड़ी बनती है तो उसी की तैयारी कर रही थी दादी ने भी तंज कसते हुआ कहा चलो कुछ तो सिखाया है तेरी माँ ने तुझे और फिर अपनी पूजा करने में मग्न हो गई।दादा जी और शर्मा जी भी छत पर पहुच चुके थे बच्चे भी सब अपनी पतंगों को हवा में उड़ा रहे थे मैंने कुछ पुराने गानों की धुन लगाई और पतंग उड़ाने में मस्त हो गया।दादा जी मूंगफलियों को हाथों में लेते हुए बोले शर्मा जी से कहने लगे यार वो भी क्या दिन थे जब हम भी खूब पतंगे उड़ाया करते थे शर्मा जी ने दादा जी को अपनी कोहनी मरते हुए मज़ाकिया अंदाज़ में कहा रुक्मणि भाभी और तुम्हारी पहली मुलाक़ात भी तो आज ही के दिन यानी मकर संक्रांति के दिन हुई थी याद है जब तुमने उनकी पतंग से कैसे ख़ुद ही अपनी पतंग कटवा ली थी और भाभी कितना ख़ुश हो गई थी की उन्होंने तुम्हारी पतंग काटी है।हां यार आज पूरे 55 साल हो गए हमारी उस पहली मुलाक़ात को पर लगता है जैसे कल की ही बात हो।उसे जब पहली बार देखा था और आज जब उसे देखता हूँ तो वो अब भी वही 20 साल पहले वाली रुक्मणि ही लगती है वो बिल्कुल नहीं बदली वही उसकी ठेठ बोली में बोलना,साधा पहनावा सब आज भी वैसा ही है हां अब थोड़ी झुर्रियां आ गई है उसके चैहरे पर ,पर वो भी अब उसकी खूबसूरती को और बड़ा देती है जब भी इन झुर्रियों को देखता हूँ उसके चैहरे पर तो हमारे प्यार की प्रगाढ़ता मुझे दिखती है और इतने सालों उसने जो मेरे और मेरे परिवार के लिए अपना जीवन समर्पित किया है।कुछ देर बाद दादी ने भी एक पतंग ली और हवा में उड़ाने लगी सब की निग़ाहें उन पर ही टिक गई दादा ने भी जल्दी से एक पतंग उठाई और वो भी दादी की पतंग के पीछे अपनी पतंग से पेच लड़ाने लगे उस वक्त मानों समय 55 साल पीछे लौट गया था ।दादी और दादा की आंखों में एक चमक सी आ गई थी ज़ोर-ज़ोर से शर्मा जी की पोती कमौन दादी दादी के नारे लगाने लगी उसे देख हम सारे लड़के भी कमौन दादा दादा के नारे लगाने लगे दादा और दादी की तरफ सब की निगाहें टिक गई दादा ने एक नज़र दादी की ओर देखा तब तक दादा की पतंग हवा में लड़खड़ाती हुई नीचे गिरने लगी थी दादी ने ज़ोर से आवाज लगाई थारी पतंग कट गई से।दादा हर साल यही करते थे ताकि वो दादी की एक मुस्कान देख सके जो उन्होंने पहली बार उनकी पतंग कटने पर दादी के चैहरे पर देखी थी और दादी ने भी शरमा के पल्लू से अपना मुंह छुपा लिया। हम भी इस पल का हर साल बेसब्री से इंतज़ार करते थे कि कब दादा और दादी बीते पलों को ताज़ा करें।मैंने भी सोच रखा था कि मैं भी शर्मा जी की पोती की पतंग से खुद की पतंग कटवाऊंगा और मैंने भी ऐसा ही किया पीछे से ममता ने आवाज लगाई सुनो जी अब तक मैंने आपकी चार पतंगे काट दी है मुझे पता है आप ये जान बूझ के करते हो चलो नीचे चलते है धूप भी बहुत हो चुकी है।मैंने भी हँसते हुए उसके हाथों से पतंग का मंजा लेकर टेबल पर रख और उसको अपनी बाहों में भरते हुए हम सीढ़ियों नीचे उतर आये थे पर अब भी कई छतों में न जाने कितनी ही पतंगे अपने प्यार की तलाश में खुले आसमान में उड़ रही थी।

||वर्षा||

Leave a comment